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राजा और रंक

#लघुकथा - राजा और रंक 

नोट - इस लघुकथा की किसी भी जीवित और मृत व्यक्ति, संस्था, स्थान या घटना से कोई संबंधता नहीं है।
फिर भी यदि किसी प्रकार की कोई समानता पाई जाती है तो यह केवल मेल होगा, वास्तविक नहीं
लघुकथा - विधायक जी
राजपूताना की रियासत शिकानेर के एक ठिकाने के आमजन सीधे - सादे और वीश्वासी होते है। निकट की रियासत जयपुर के गुरुकुल से पढ़ कर आया महत्वकांक्षी नौजवान नागेंद्र टूटे से पुराने हरे रंग के रथ में सवार हो कर गढ़ पर चढ़ाई करने आ पहुंचा।
यहां की जनता ने सूझबूझ से गढ़ की रक्षा करते हुए आक्रांता को मार भगाया।
कुछ समय बाद इसी ठिकाने के कोहर सिंह, दुखराम और अन्य लोगों ने ठिकानेदार का घमंड तोड़ने के लिए इस बाहरी आक्रांता से हाथ मिला लिया। घुसपैठिए पूरी चौरासी कोस की धरती पर फैल गए और सब से पहले उन्होंने यहां की जाति एवं धर्म के अंतर विहीन माहौल में जाति और धर्म के साथ गौत्र और क्षेत्र का ज़हर घोलना शुरू किया। स्थान और समर्थन मिलने के बाद चक्रव्यूह रचने की शुरुआत हुई।
इस ठिकाने में कभी भी धर्म - जाति का झगड़ा नहीं रहा। शिकानेर रियासत के समय आक्रमण होने पर गढ़ की सुरक्षा में यहां के सभी नागरिकों का यथायोग्य स्थान रहा। जागीरदारों की स्त्रियों ने चांदी के गोले बनाने के लिए बड़ी खुशी से अपनी रखड़ी और सतलड़ा बारूदखाने में भिजवा दिया।
इसके बाद बीकानेर की सेना तो चली गई पर राजा चाटुकारों से घिर गए ओर कहावत चली -
कांदा खाया कमधजा घी खाया गोला
रियासत चाली ठाकरां बाजतां ढोला
यही स्थिति इस ठिकाने की बन गई। आक्रांता और घुसपैठियों के साथ कुछ अमल, शराब, लकड़ी, डोडा - पोस्त के तस्कर इस गैंग में शामिल हो गए। दूध में पानी मिलाने वालों का एक विशेष समूह घर - घर लालच दे कर इस गैंग को बढ़ा रहा था। सबने मिलकर ऐसा जाल बिछाया कि इनका चक्र चल गया।
आक्रांता नागेंद्र ने सब से पहले यहां के हर गांव और ढाणी में अपना आदमी तय किया। इसका एक ही काम था आपस में छोटा - मोटा झोड़ - झगड़ा होने पर एक पक्ष को आक्रांता की ड्योढ़ी पर ले जाना।
वह अहलकारों को सांची - झूठी डांट - डपट मार कर उसे राजी कर लेता। इस अभियान का एक ही उद्देश्य था कि ठिकाने का कोई व्यक्ति यहां की वास्तविक समस्या के बारे में बात करने की बजाय व्यक्तिगत भलाई की बात और मांग करें।
दूसरा यह कि इन चाटुकारों को अपने अपने इलाके के अहलकारों से देश निकाला देने का भय दिखा कर उचित - अनुचित काम करवा कर उगाही की पूरी छूट दी गई। आक्रांता का चलाया चक्र अपना वेग खोने लगा तो उसने स्थिति को भांपते हुए बहती हवा के फूलों को पकड़ लिया और लगातार सत्तासीन रहा। उगाही का हाल यह था कि ठिकाने के हर विभाग में एक खास टेरिया बैठा दिया गया। वह कामगारों से हफ्ता वसूली करता, आधा हिस्सा अपने पास रखता आधा नागेंद्र को देता। ठिकाने में कोई भी निर्माण या परियोजना संचालन होता तो नागेंद्र गैंग का हिस्सा पहले तय होता, इसके बाद ही काम शुरू हो पता।
भय और आतंक के वातावरण के सामने लगभग सभी ने आत्मसर्पण कर दिया। जिन्होंने नहीं किया उनमें से किसी पर ठिकाने के नियमों का उल्लंघन करने और किसी को अन्य झूठे आरोप में फंसा कर देश निकाला दे दिया जाता। उनमें से कुछ लोग शरणागत हो जाते तो वापस सजा माफ़ हो जाती जो सामना करते वो यह सजा लगातार झेलते रहते। इनमें से कुछ आज भी मूंछों के ताव दे कर लड़ रहे हैं।
इन टेरियों के साथ दूधियों का गिरोह सक्रिय हुआ। एक दूधिया इस गैंग के कौर ग्रुप में शामिल होने में सफल हो गया। नागेंद्र ने अपनी दुधारी चाल और स्वः हितार्थ लुट को बढ़ाने हेतु दूधिए को ठिकाने का मुंशी बनाने की सोची। यहां गाड़ी फंस गई, नियम यह कि पढ़ा - लिखा व्यक्ति ही मुंशी बन सकता है पर इसने तो स्कूल का मूंह ही नहीं देखा। खैर, चोर को हर गली पता होती है। आक्रांता ने दूधिए को दूर की रियासत के लुटेरे साथियों का पता दे कर संदेशा भिजवाया कि जिसे मैं आपके पास भेज रहा हूं, अपनी अपनी ही बिरादरी का छोटा डाकू है। इसे अपने यहां की पाठशाला में अध्ययन करने की कोई सनद दे दीजिए। चोर - चोर मौसेरे भाई, और दूधिए को सनद मिल गई।
अब वह जिला मुंशी बन गया। राजा को इस चोरी का पता चल गया पर बड़े डकैतों के वरदहस्त के कारण उसकी नौकरी ही नहीं बची पूरी प्रमोशन भी हुआ।
अब दोनों बड़े बड़े घपले करने लगे और सम्मिलित व्यापार देश से बाहर जमाना शुरू कर दिया। प्रजा में यह भी सुनने में आ रहा था
दूधिए ने आका की हैसियत पर हाथ साफ करने का मन बनाया।
दूधिए ने निकट के ठिकाने मोर नगर के जानकार लोगों को आक्रांता के ठिकाने पर 50 - 60 रथों पर सवार कर भिजवाया। इन लोगों ने आक्रांता को विश्वास दिलाया कि आप यदि इस ठिकाने पर आक्रमण करते हैं तो हम आपके साथ हैं।
आक्रांता इस क्षेत्र में बार - बार युद्ध की स्थिति में बाल बराबर बचने के की स्थिति से अति व्याकुल एवं व्याघ्र रहता था। मोर नगर के लोगों के बहकावे में आ गया और आक्रमण कर दिया। यहां पर सरेंद्र नामक जागीरदार का राज था। मोर नगर के लोगों ने बड़ी चपलता और रणनीति से उसे बुरी तरह से हरा दिया।
दूधिया अब नागेंद्र की जागीर का जागीरदार बन गया।
समय बदलता है, व्यक्ति जो बोता है उसे वही मिलता है। जिस नागेंद्र को कोहर सिंह और दुखाराम ने स्थापित किया था ने उनकी सभी जागीर छीन ली। अब नागेंद्र, कोहर सिंह और दुखराम अपने पुराने स्थान की प्राप्ति हेतु जी जान एक किए हुए हैं।
संदेश - समय जब करवट बदलता है तो सभी चालाकियां धरी रह जाती हैं।
#जिगर_चूरूवी

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