1971 कहानी फत्तू खां फौजी की -
बात आज से लगभग 80 साल पुरानी है मेरे गांव की निकटतम गांव झारिया में पंच भाई अलीम खान आलमान की मृत्यु हो गई। घर की जिम्मेदारी बड़े बेटे फतेह खान पर आ गई जिन्हें बाद में फ़त्तू खान के नाम से जाना गया।
थोड़े दिन मजदूरी करने के बाद फत्तू खान जोधपुर में RAC में भर्ती हुए और लगभग 2 से 3 महीने वहां काम किया कम मजदूरी होने के कारण वहां से चूरू आ गए। यहां आ कर रेलवे में 12 मासिया के पद पर लगे। लगभग 1 वर्ष काम करने के बाद रेलवे में ही काम करने वाले किसी व्यक्ति से इनका झगड़ा हो गया और खान साहब रेल्वे की नौकरी छोड़, घर आ गए।
गांव वालों और ससुराल वालों ने बातें बनाई की नौकरी करना आसान नहीं है, आपने दो-दो नौकरियां छोड़ दी। नौकरी बहुत मुश्किल से मिलती है।
2 जून 1965 की शाम को उनके साथी हामूसर निवासी लियाकत खान चूरु आए और उन्हें बताया की सेना में भर्ती होने जा रही है, हम भी सेना में भर्ती होंगे।
दोनों साथ-साथ सेना भर्ती हेतु दौड़ और दूसरे फिजिकल टेस्ट देने पुलिस लाइन में आ धमके। दौड़, सीना, वजन आदि नापने के बाद तत्कालीन 14 ग्रेनेडियर्स की सी कंपनी के सूबेदार ताजू खां चेनपुरा झुंझुनू के द्वारा इनको फिट मानते हुए भर्ती कर लिया गया। मेडिकल आदि के बाद नसीराबाद छावनी बुलाया गया।
यहां जाने से पहले फत्तू खान पर रेलवे की नौकरी करने का बहुत दबाव रहा, जिसका कारण ससुराल पक्ष की रेलवे में अधिकता थी। दोनों सेवाओं में वेतन का अधिक अंतर नहीं था, रेलवे में इन्हें 100 रुपए और सेना में लगभग 110 रुपए के आस - पास वेतन मिलता था।
सभी बातों को नजरअंदाज करते हुए फ़त्तू खान 3 जुलाई 1965 को 14 गग्रेनेडियर्स की सी कंपनी में भर्ती हो गए।
अजमेर के पास की नसीराबाद छावनी से ट्रेनिंग के बाद तकनीकी रूप से सुदृढ़ फौजी बन कर जबलपुर पहुंचे।
इसके साथ थे हामुसर के लियाकत खान।
छः साल सेंटर में रहने के बाद 14 ग्रेनेडियर्स को कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में तैनात किया गया।
इसी बीच भारत पाकिस्तान युद्ध प्रारंभ हो गया। कबाइलियों और आम कश्मीरी के भेष में पाक सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसने की जी तोड़ कोशिशें कीं परन्तु सी कंपनी जहां तैनात होती है, परिंदा भी पंख नहीं मार सकता।
सी कंपनी राजस्थान में राजपूत मुस्लिम समुदाय (कायमखानियों) की कंपनी थी जिनका मोटो है -
"वतन से मोहब्बत - अमन की बहाली।"
कायमखानी समुदाय का डंका 1947, 1965, एवं अन्य युद्धों में बज चुका है। इस से पहले प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में इन सैनिकों ने अद्वितीय शौर्य एवं पराक्रम का प्रदर्शन कर कई सेना, शौर्य और वीर चक्र प्राप्त किए।
यह विशेष बात है कि राजस्थान में किसी समाज विशेष के रूप में कायमखानी समाज के पास सब से अधिक चक्र एवं मेडल हैं। इस समुदाय के 250 से अधिक जवान सेना में शहीद हुए हैं।इसी समुदाय से सी कंपनी के सिपाही फत्तू खां थे।
भारत पाक युद्ध का अंतिम दौर चल रहा था। सुबेदार ताज मोहम्मद खान को पाक सीमा के 15 किलोमीटर अंदर बने बंकर ध्वस्त करने की कमांड मिली। इस से पहले दूसरी कंपनी को यह काम सौंपा गया पर सफलता नहीं मिल सकी।
कंपनी के जवान, रात होने का इंतजार करने लगे। दस बजे घुप अंधेरा होने के बाद पहाड़ियों से नीचे उतरना शुरू हुए और कुछ ही देर में सीमा के अंदर।
इस इन्फेंट्री डिवीजन के रास्ते में आने वाली हर बाधा ग्रेनेड, LMG, खुखरी, संगीन और गुप्ति के सामने परे होती गई।
रात के करीब चार बज गए, पाक सैनिकों को ढेर करते हुए कंपास की सहायता से हर बंकर और चौकी को ध्वस्त करते हुए जवान बीस किलोमीटर से अधिक अंदर घुस गए।
अचानक फाइटर प्लेन की तेज आवाज आई, और दूर कहीं तेज आग की लपटें उठने लगीं। सुबेदार ताज मोहम्मद खान समझ गए, उन्हें लेने आया भारतीय मिग दुर्घटनाग्रस्त हो गया। कोड में सभी साथियों को वापस चलने का इशारा दे दिया गया।
दुर्घटनाग्रस्त विमान की टोह लेने पाक सैनिक आ चुके थे। पूरी कंपनी के लोग 10 - 20 के समूह में बिखरे थे में से एक टुकड़ी उनके कब्जे में आ गई। अब दिन निकल आया। असला, रसद और जरूरी सामान छोड़ सभी बचने का प्रयास करने लगे। पास ही एक खाली गोदाम जैसा ढांचा खड़ा था। धीरे धीरे सब वहां इकट्ठे होने शुरू हुए। नौ बजे तक यहां 680 में से 60 लोग पहुंचे। बाकी सब शहीद हो चुके थे। फैक्ट्री में पहुंचने वालों में से फत्तू खां भी एक थे।
पाकिस्तानी सेना ने सभी को पकड़ कर एक ट्रक में डाल दिया। एक दिन चौकी पर रखने के बाद इन्हें रावलपिंडी के लिए रवाना कर दिया गया। ना खाना, ना पानी, ना हाजत पूरी और ऊपर से बंदूक के बट। जैसे - तैसे रावलपिंडी के यातना केंद्र में पहुंचने पर उन्हें फटे पुराने कपड़े, एक दिन में एक रोटी, आधा लीटर पानी दिया जाता। दस दिन यहां रखने के बाद किसी अज्ञात स्थान पर इन्हें ले जाया गया। सैनिकों को अलग - अलग तरीके से लालच देने पर भी इन्होंने भारतीय सेना के राज नहीं बताए तो यातनाएं शुरू हो गईं। रात - भर खटमल, मच्छर काटने के कारण नींद नहीं आती, सुबह गालियां और बंदूक के बट सोने नहीं देते।
इस यातना केंद्र का सूबेदार टीके खान पठान था। टीके खान ने हममज़हब होने के नाम पर उन्हें तोड़ने की खूब कोशिश की, पर इन कायमखानी जवानों का नारा "जिल्लत से पहले मौत"
इनके कानो में गूंज रहा था। इस तरह सात महीने बीत गए। इन बंदियों को यहां से वहां लाया ले जाया जाता रहा। पाकिस्तानी फौजियों में भी अच्छे इंसान थे, में से एक फौजी ने बताया कि प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और तुम्हारी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बंदी सैनिकों की रिहाई के लिए बातचीत कर रहे हैं। 2 जुलाई 1972 को भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हो गया। अब युद्ध बंदियों की सूचियों का आदान - प्रदान होने लगा।
इन साठ लोगों की सूची भी भारत सरकार को भिजवाई गई।
युद्ध में बॉडी नहीं मिलने वाले फौजियों को गुमशुदा दर्ज किया जाता है। घर वालों ने आस छोड़ दी थी। 1944 के विश्व युद्ध की तरह इन्हें भी शहीद मान लेने की तैयारी की जा रही थी।
दिसंबर ,1972 में वियना संधि के अनुसार इन्हें युद्ध बंदी माना गया। जुल्फिकार अली भुट्टो ने ऐलान किया कि पाकिस्तान में कैद सभी युद्ध बंदियों को वापस भारत सरकार को सौंप दिया जाएगा। इसके साथ ही भारत सरकार ने भी युद्ध बंदियों को रिहा करने का फैसला लिया।
12 दिसंबर की रात को सभी भारतीय सैनिकों को नए भारत सरकार की ओर से भेजे गए नए कपड़े, जूते और बैग दिए गए। पाक सेना ने सात रुपए प्रतिदिन की दर से उनका मेहनताना तय कर भुगतान किया।
14 दिसंबर 1972 को सुबह सभी को फजर की नमाज पढ़ने के बाद ट्रकों में बैठा कर बाघा बॉर्डर पर लाया गया।
यहां हजारों की संख्या में सैनिक इकट्ठे थे। आवश्यक जांच पड़ताल कर भारतीय सैनिक भारत की सीमा में और पाकिस्तानी सैनिक पाक सीमा में प्रवेश कर रहे थे।
भारतीय सेना ने सभी सैनिकों को दिल्ली के पास अस्थाई शिविरों में रोका। यहां से सात दिन की गहन पूछताछ एवं जांच पड़ताल के बाद दिल्ली छावनी में लाया गया। दिल्ली छावनी में तत्कालीन गृहमंत्री बाबू जगजीवनराम ने सैनिकों से भेंट की। सब ठीक होने पर इन्हें दो महीने की छुट्टी पर घर भेज दिया गया। यहीं पर उनके पास मिली पाकिस्तानी मुद्रा बदल दी गई साथ ही प्रति सैनिक पांच सौ रूपए खर्ची हेतु दिए गए।
फत्तू खां ट्रेन में बैठे घर के सपने देख रहे थे। तीन बेटियां एक बेटा उनकी राह देख रहे होंगे। उनके लिए क्या ले कर जाऊं। इसी स्थिति में आंख लग गई और सुबह पांच बजे चूरू जंक्शन पर उतरे।
जंक्शन के पास ही उनका ससुराल था, घर वालों को क्या खबर कि जिसे खोने का सब्र कर बैठे हो वो आपका दरवाजा खटखटाएगा।
उनके साले मोहम्मद अली खान ने दरवाजा खोला और मारे खुशी के जोर से चिल्लाए "बहनोई जी।" फत्तू खां की आंखों में आंसू बह रहे थे। यहां से पता चला उनके बच्चे तो झारिया में ही हैं। चाय पी और खान साहब ने पैदल ही गांव का रास्ता पकड़ लिया। भाई जी चौक चुरू से जलेबी, पेड़े और लड्डू ले कर झारिया मोरी, सहजूसर होते हुए दो घंटे में 17 किलोमीटर दूर स्थित झारिया गांव पहुंच गए।
गांव में हाका फट गया, फत्तू खां फौजी आ गया रे, फत्तू खां फौजी आ गया रे।
1983 में रिटायर हुए आज भी कड़क में फत्तू खां फौजी से मेरी बातचीत हुई, के आधार पर उनके आग्रह पर यह कहानी लिखी गई।
इसी दुर्घटनाग्रस्त विमान के पायलट की कहानी -
1971 की जंग के हीरो ग्रुप कैप्टन डीके पारुलकर, जिन्होंने पाकिस्तान की कैद से बहादुरी से निकलकर भारतीय वायु सेना के साहस, चतुराई और गौरव का परिचय दिया। वे 13 अगस्त, 1972 को साथी मलविंदर सिंह गरेवाल और हरीश सिंह के साथ रावलपिंडी के युद्धबंदी कैंप से भाग निकलने में सफल रहे। भारत सरकार ने उन्हें विशिष्ट सेना मेडल से नवाज़ा गया। पारुलकर का निधन 10.08.2025 के दिन हुआ।
जिगर चूरुवी(शमशेर भालू खां)
9587243963
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