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लघु कथा - गधा पहलवान

#लघुकथा - #गधा_पहलवान 
(#नोट - इस कहानी के सभी स्थान, घटनाएं एवं पात्र काल्पनिक हैं।जिनका किसी स्थान, कार्यालय, जीवित - मृत व्यक्ति से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है, फिर भी यदि पाठक को ऐसा लगता है तो यह मात्र एक संयोग होगा।
(#लेखक - #जिगर_चूरूवी)

छोरू नमक कस्बे में अरविंद और रसूल नाम के दो मित्र रहते थे। दोस्ती इतनी गहरी की लोग दोनों को अरविंद रसूल के नाम से जानते। बड़े बाल, हाथ में मोटा कड़ा, डोरी वाले बूट, मोटा लंबा शरीर, स्याह रंगत और भारी आवाज के साथ दोनों की शहर में धाक थी।
एक बुलट पर दोनों शोले के जय - विरु की तरह रहते। उस दौर में सिनेमा हॉल में सिनेमा देखना खूब प्रचलित था। दोनों दोस्त चारों शो के 20 - 30 टिकट पहले ले कर, एक दो - एक का पांच मौके और जरूरत के हिसाब से करते। कुछ समय बाद सिनेमा का शौक लोगों के दिलों से निकल गया, बेरोजगार अरविंद रसूल ने काम की खोज शुरू की। 
पीत्रम सिंह (चिट फंड कंपनी में काम करने वाला), बाक़ीर खान (कबूतर बाज), N. कूजर ( भू माफिया) करलाल सिंह (दूधिया, दूध कम पानी ज्यादा बेचने वाला), माइल खान (मोहल्ले का नेता) , पासू , अमल (ब्लेक में दारू बेचने वाला) जैसे लोगों से मिलकर दोनों ने ठेकेदारी का काम शुरू किया। फर्म का नाम ARRA कंस्ट्रक्शन कंपनी रखा। 
स्थानीय विधायक (अब मंत्री जी) का वरदहस्त पा कर ARRA कंस्ट्रक्शन कंपनी थोड़े ही समय में जानी - मानी फर्म बन गई। ईमानदारी की मिसाल यह कि मंत्री जी के लोगों, अधिकारियों के खर्चे पानी में कोई कमी नहीं आने दी।
इनकी बनाई सड़क एक साल में गड्ढों में बदल जाती, नालियां टूट जातीं, इमारत की छत पहली बारिश में टपकने लगती, दीवार ढह जाती। 
कंपनी की ईमानदार छवि जिसमें सौ का तीस काम पर, दस मंत्री जी के आदमियों में और बीस अधिकारियों में बांट देने के कारण किए गए काम की मरम्मत का बजट दूसरे साल पास हो जाता। समय आगे बढ़ता गया और कंपनी भी ऊंचाई छूती गई।
जैसे - जैसे कस्बा शहर बनता गया, काम बढ़ता गया। शहर में पहला ओवर ब्रिज बनाने हेतु करोड़ों का टेंडर हुआ। विधायक जी सत्ता में नहीं थे पर मजबूत पकड़ के कारण ARRA को टेंडर दिलवा दिया। इस इलाके के बड़े लोगों ने विधायक जी से मिलकर उनके घरों की अनुपयोगिता और समस्या से अवगत कराया।
नेताजी ने अधिकारियों को बुलाकर ब्रिज का पूरा डिजाइन बदलवा दिया। ब्रिज में घुमाव दे दिया जो ड्राफ्ट में नहीं था।
ARRA ने 30+10+20 का फार्मूला बरकरार रखा। पुल बनकर तैयार हुआ, जनता में खुशी की लहर थी। डेढ़ साल में ब्रिज का उद्घाटन कर चालू कर दिया गया। बड़े - बड़े ट्रक - बस बेहिचक ब्रिज से आने जाने लगे। दस पंद्रह दिन बाद ब्रिज का एक हिस्सा दरार आने से झुक गया। ब्रिज में टेक्निकल खामी बता कर बंद कर दिया गया। बड़े वाहनों हेतु नगरसेन क्रॉसिंग से हो कर रास्ता खोला गया, अधिक वाहनों की आवाजाही के कारण नगरसेन में भारी जाम लगने लगा। 
विधायक जी राज्य के बड़े नेता बन गए, उन्हें कंगना रनौत की तरह नाली, सड़क, गली के छोटे कामों से घिन आने लगी।
मास्टर से छोटे स्थानीय नेता बने प्रेम खान की मुख्यमंत्री से निकटता थी, ने बात कर नगरसेन ओवर ब्रिज हेतु बजट घोषणा करवाई। लंबी प्रक्रिया के बाद चार लेन ओवर ब्रिज का ड्राफ्ट तैयार हुआ, इतने में सत्ता परिवर्तन हो गया। विधायक जी खुद  टाटानगर से चुनाव हार गए पर सरकार उनकी बनी।
वही लोग फिर नेताजी के पास गए जो पहले ओवर ब्रिज के समय गए थे। आज भी नेताजी की उतनी ही चलती है जितनी एक मंत्री की भी नहीं! सत्ता की धौंस और जातिय अपनायत ने फिर जनता का अहित कर डाला। ओवर ब्रिज का ड्राफ्ट बदल कर दो ओर से फॉर लेन एक ओर से टू लेन कर दिया गया।
प्रेम खान ने इसका जमकर विरोध किया पर सुनता कौन। इसके बाद दूधिया नेता बने करलाल की मिलीभगत से पुराने ओवर ब्रिज का फिर से टेंडर हुआ, उसी ARRA के नाम।
चोरी - छुपे लोग कानाफूसी कर मिलीभगत की बात करते रहते हैं, पर मजाल गुर्गों से या खुद नेताजी से कुछ कह दें।
समय आया, ARRA का बनाया नगरसेन ओवर ब्रिज चालू हुआ और एक दिन दो तरफ से धरासाइ हो गया।
दोनों ओर से गिरे ब्रिज के पिलर पर खड़े ट्रक का ड्राइवर ऊपर आसमान की ओर एकटक देख रहा था।
शिक्षा - ऊपर वाला मेहरबान तो गधा पहलवान।
जिगर चूरूवी (शमशेर भालू खां)

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