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लघुकथा -अभी संसार में अच्छाई बाकी है

लघुकथा - संसार में अच्छाई बाकी है।

आज माधव को जरूरी काम से 20 किलोमीटर दूर ससुराल जा कर आना था। मोटर साइकल से आधा घंटे का रास्ता है, उसने सोचा थोड़े काम निपटा कर दस बजे चल पड़ूंगा।  चलने से पहले दो - तीन बाल्टी पानी से मोटर साइकल को खूब धो कर चमकाया, काम में कब ग्यारह बज गए पता ही नहीं चला अब वह फटाफट तैयार हुआ मोटर साइकल पर सवार चल पड़ा फर्राटे से ससुराल की ओर। जल्दबाजी में सर पर तौलिया और पानी की बोतल साथ लेना भूल गया।
जून का महीना, सर पर जलता सूरज और गर्म तपती सड़क। दो किलोमीटर चलते ही पिछला टायर फुस्स। सुनसान सड़क, ना आदमी ना जानवर ना कोई घर। अब क्या करे। जैसे तैसे हिम्मत जुटाई, मोटर साइकल को घसीटते हुए पंचर की दुकान ढूंढने आगे बढ़ा। जानलेवा गर्मी, ना पानी, ना सर पर तौलिया ना छाया। पसीने से तर - बतर आग उगलती सड़क पर पंचर मोटर साइकल को धक्का देते माधव पसीना - पसीना हो गया।
दो - तीन किलोमीटर चलने के बाद एक गांव में पहुंचा। वह थक चुका था, निढाल सड़क किनारे एक घर में लगे नीम के पेड़ की छांव जो सड़क तक आ रही थी, में सुस्ताने लगा, हवा का नाम नहीं और भयंकर प्यास से निकलती जान, सब कुछ असहनीय हो रहा था।
एकाएक उस घर की खिड़की खुली, अधेड़ उम्र के आदमी ने पूछा, पानी पिओगे। पानी का नाम सुनकर उसकी जान में जान आई, इशारे से हथेली मुंह की ओर कर हां कहा और इंतजार करने लगा। मन ही मन सोचने लगा - 
अभी संसार में अच्छे लोग बाकी हैं।
काफी समय निकल गया पानी नहीं आया। अब प्यास के मारे जान निकल रही थी, सड़क पर उसे पानी ही पानी दिखाई दे रहा था पर वो  आदमी नहीं आया। माधव ने मन में सोचा जब पानी नहीं पिलाना था तो पूछा क्यों - 
अब संसार में अच्छाई बाकी नहीं रही।
थोड़ी देर में अधेड़ जग और गिलास हाथ में थामे गेट से बाहर निकला। उसने क्षमा मांगते हुए कहा - भाई साहब, मैने सोचा आपको प्यास ज्यादा लगी है, गर्मी भी भयंकर है, इसलिए शिकंजी बना कर ले चलूं। 
माधव ने खुद की गलत सोच पर लज्जा का अनुभव करते हुए मन ही मन कहा - अभी संसार में अच्छाई बाकी है।
शिकंजी का गिलास मुंह से लगाया, यह तो फीकी है। अजीब कंजूस आदमी है, जब शिकंजी ही बनाई तो थोड़ी सी चीनी भी डाल देते। सच है - 
अब संसार में अच्छाई बाकी नहीं रही।
अधेड़ ने जेब से चीनी की पुड़िया निकालते हुए कहा, अरे भाई साहब, मैने सोचा आज कल लोग शुगर के मरीज हो रहे हैं, इसलिए क्या पता मीठी शिकंजी पीएंगे या नहीं, मैं यह चीनी पुड़िया में बांध लाया, आपके शुगर नहीं है तो चीनी मिला लीजिए।
माधव को फिर अपनी सोच पर लज्जा का अनुभव हुआ। चीनी मिलाते हुए उसने फिर कहा - 
अभी संसार में अच्छाई बाकी है।
थोड़ी देर में ताजगी आने से माधव ने चलने की तैयारी की। इस ठीठें (पंचर मोटर साइकल) को घसीटना जानलेवा हो जाएगा पर क्या किया जा सकता है, मन में सोचते हुए चलने लगा तो अधेड़ ने कहा - 20 रुपए दीजिए।
माधव मन ही मन गुस्से से लाल हो रहा था, एक गिलास शिकंजी के बीस रुपए, यह तो लूट है - 
वास्तव में संसार में अच्छाई बाकी नहीं रही। 
भारी मन से उसने दो दस - दस के नोट निकाले और अधेड़ की तरफ बढ़ा दिए।
अधेड़, माधव को पांच मिनिट रुकने का कह कर घर में चला गया। 
माधव ने मन ही मन उसे इतनी गालियां दीं जितनी पूरी जिंदगी में किसी ने किसी को नहीं दीं।
थोड़ी देर में गेट फिर से खुला, एक हाथ में थैला दूसरे हाथ में चाय का थर्मस लिए अधेड़ बाहर आया। आज सॉल्यूशन की ट्यूब खत्म हो गई थी, मेरे पास पैसे नहीं थे, मैं पास ही के गांव से सॉल्यूशन ट्यूब लाता हूं, तब तक आप चाय पीजिए।
माधव फिर मन में खुद को गलत समझते हुए कहने लगा -  
अभी संसार में अच्छाई बाकी है।
आधे घंटे में अधेड़ आया, मोटर साइकल की पंचर बनाते हुए कहने लगा, साहब मेरा नाम फतेह खान है, रिटायर्ड फौजी हूं, यहां गांव में पंचर की दुकान नहीं है,  कोई गाड़ी या मोटर साइकल पंचर होने पर मैं थोड़ी बहुत मदद कर देता हूं।
माधव खुद पर खूब लज्जित था, उसने मन में फिर कहा है -
अभी संसार में अच्छाई बाकी है।

जिगर चूरूवी 
(शमशेर भालू खां सहजूसर)

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