केशवानंद भारती का परिचय :-
जन्म - 9 दिसम्बर 1940
मृत्यु - 6 सितम्बर 2020
कार्य - हिन्दू महंत (वर्ष 1961 से 2020 तक, केरल के कासरगोड जिले में के एडनीर मठ के शंकराचार्य/प्रमुख)
याचिकाकर्ता - केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
परिणाम - भारतीय संविधान के आधारभूत लक्षण के सिद्धान्त की स्थापना हुई। इस अनुसार संसद को यह अधिकार नहीं है कि वो संविधान की आधारभूत संरचना में बदलाव कर सके। वो हिन्दू दर्शन के स्मार्त भागवत परम्परा और अद्वैत वेदान्त के अनुयायी थे।
-------------- मामला :- ------------
केशवानंद भारती v/s स्टेट ऑफ केरला 1973 :-
अदालत - भारत का उच्चतम न्यायालय
निर्णय - अप्रैल 24, 1973
(1973) 4 SCC 225; AIR 1973 SC 1461
Holding - भारतीय संविधान के ढाँचे के भीतर कुछ ऐसे सिद्धांत हैं जो अनुल्लंघनीय हैं, इसलिए संसद द्वारा उनमें संशोधन नहीं किया जा सकता। इन सिद्धांतों को आम तौर पर मूल संरचना कहा जाता है।
मामले में राय -
Majority -
न्यायपालक सर्वमित्र सिकरी (मुख्य न्यायधीश)
न्यायपालक कौदूर सदानंद हेगड़े एवं मुखर्जी
न्यायपालक जयशंकर मणिलाल शेलत एवं ग्रोवर
न्यायपालक जगनमोहन रेड्डी
न्यायपालक हंसराज खन्ना
Dissent -
न्यायपालक अजीत नाथ राय
न्यायपालक पालेकर
न्यायपालक मैथ्यू
न्यायपालक बेग
न्यायपालक द्विवेदी
न्यायपालक यश्वंत विष्णु चंद्रचूड़
अपील - Laws applied
भारत का संविधान, दण्ड प्रक्रिया संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, भारतीय संविदा अधिनियम 1872
संविधान सरंचना के कुछ प्रमुख मूलभूत तत्व जिनमे अनुछेद 368 के तहत संसोधन नही किया जा सकता है निम्नलिखित हैं:-
1. संविधान की सर्वोच्चता।
2. विधायिका,कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच शक्ति का बंटवारा।
3. गणराज्यात्मक एवं लोकतांत्रिक स्वरूप वाली सरकार।
4. संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र।
5. राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता।
6. संसदीय प्रणाली।
7. व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा।
8. मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक। तत्वों के बीच सौहार्द और संतुलन।
9. न्याय तक प्रभावकारी पहुँच।
10. एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का जनादेश।
मुख्य प्रश्न :-
सभी प्रयास सिर्फ इस एक मुख्य सवाल के जवाब के लिए थे कि क्या संसद की शक्ति संविधान का असीमित संशोधन करने के लिए थी?
दूसरे शब्दों में, क्या संसद संविधान के किसी भी हिस्से को रद्द, संशोधित और बदल सकती है चाहे वो सभी मौलिक अधिकार छीन लेने का ही क्यों ना हो? अनुच्छेद 368 में, उसको साधारण रूप से पढ़ने पर, संविधान के किसी भी भाग में संशोधन के लिए संसद की शक्ति पर कोई सीमा नहीं थी इस अनुच्छेद में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे संसद को एक नागरिक के भाषण की स्वतंत्रता या उसकी धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार छीन लेने से रोका जा सके।
703 पृष्ठ का यह फैसला अत्यंत विभाजित मतो वाला था और अंत में 7:6 के मामूली बहुमत से यह माना गया कि -
संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन उस हद तक ही कर सकती है जहाँ तक कि वो संसोधन संविधान के बुनियादी ढांचे और आवश्यक विशेषताओं में परिवर्तन या संशोधन नहीं करे।
केशवानंद भारती मामले की पूरी जानकारी एवं पृष्ठभूमि :-
केशवानंद भारती मामले की उत्पत्ति 1950 और 1960 के दशक में भारतीय राज्य केरल में लागू किए गए भूमि सुधारों से जुड़ी है। इन सुधारों का उद्देश्य बड़े भूस्वामियों से भूमि को भूमिहीनों और गरीबों में पुनर्वितरित करना था। 1963 में, केरल सरकार ने केरल भूमि सुधार अधिनियम पारित किया, जिसने एक व्यक्ति के पास भूमि की मात्रा को सीमित कर दिया। इस अधिनियम में भूस्वामियों से अतिरिक्त भूमि का अधिग्रहण करके उसे भूमिहीनों और गरीबों में वितरित करने का प्रावधान था।
श्री केशवानंद भारती, भारत के केरल में एक हिंदू धार्मिक संस्था, एडनीर मठ के प्रमुख या मठाधीश थे। 1970 में, केरल सरकार ने धार्मिक संस्थाओं द्वारा धारित भूमि के स्वामित्व पर प्रतिबंध लगा दिए। श्री केशवानंद भारती की अध्यक्षता वाले एडनीर मठ ने केरल उच्च न्यायालय में इस अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती दी। अंततः मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जिसने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया।
इस बीच, भारतीय संसद ने संविधान में 24वाँ संशोधन पारित किया, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करना और न्यायिक समीक्षा के दायरे को सीमित करना था। 25वाँ और 29वाँ संशोधन भी पारित किया गया, जिसका उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित करना और संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति प्रदान करना था।
श्री केशवानंद भारती ने इन संशोधनों की वैधता को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि ये संशोधन संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक केशवानंद भारती निर्णय आया, जिसने मूल ढाँचे के सिद्धांत को बरकरार रखा और संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति पर सीमाएँ लगा दीं।
यह मामला भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मुकदमों में से एक बन गया, और श्री केशवानंद भारती को भारत में लोकतंत्र और कानून के शासन के सिद्धांतों को बनाए रखने की लड़ाई में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है।
निर्णय का परिचय :-
24 अप्रैल 1973 को दिया गया केशवानंद भारती निर्णय भारत के सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय है। यह मामला केरल के एक हिंदू धार्मिक मठ के प्रमुख श्री केशवानंद भारती द्वारा दायर किया गया था, जिसमें भारतीय संविधान के 24वें, 25वें और 29वें संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें न्यायपालिका की शक्तियों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कम करने की मांग की गई थी।
केशवानंद भारती मामले की सुनवाई भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 13 न्यायाधीशों की पीठ ने की, जिससे यह भारतीय कानूनी इतिहास की सबसे बड़ी पीठों में से एक बन गई।
पीठ में
1.मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी
2. न्यायमूर्ति जेएम शेलत
3. न्यायमूर्ति केएस हेगड़े,
4. न्यायमूर्ति एएन ग्रोवर,
5. न्यायमूर्ति एएन रे,
6. न्यायमूर्ति पी. जगनमोहन रेड्डी
7. न्यायमूर्ति डीजी पालेकर,
8. न्यायमूर्ति एचआर खन्ना,
9न्यायमूर्ति केके मैथ्यू,
10. न्यायमूर्ति एमएच बेग,
11. न्यायमूर्ति एसएन द्विवेदी,
12. न्यायमूर्ति एके मुखर्जी और
13 . न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचूड़
शामिल थे।
इस मामले की सुनवाई के लिए पीठ का गठन किया गया था क्योंकि इसमें संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्तियों से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल थे। पीठ को दलीलें सुनने और अंतिम निर्णय देने में छह महीने लगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने 7:6 के ऐतिहासिक बहुमत वाले फैसले में संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को प्रतिपादित किया। इसके अनुसार संविधान की कुछ मूलभूत विशेषताएं -
1. लोकतंत्र
2. धर्मनिरपेक्षता
3. संघवाद
4. कानून का शासन
संसद द्वारा संशोधित नहीं की जा सकतीं। न्यायालय ने यह भी माना कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान के मूल ढांचे का एक अभिन्न अंग है और इसे संसद संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नहीं छीन सकती।
केशवानंद भारती मामले का महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसने भारतीय संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को स्थापित किया। मूल ढांचे के सिद्धांत के अनुसार संविधान की कुछ मूलभूत विशेषताएं, जैसे संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संसद द्वारा संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संशोधित या निरस्त नहीं की जा सकतीं।
इस सिद्धांत ने संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर अंकुश लगाया है और यह सुनिश्चित किया है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ बना रहे जो अपने मूलभूत मूल्यों और सिद्धांतों को संरक्षित रखते हुए बदलते समय के अनुरूप हो। इस प्रकार, केशवानंद भारती मामले के भारत के संवैधानिक विकास पर दूरगामी प्रभाव पड़े हैं, जिससे यह भारतीय संवैधानिक विधि के सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक बन गया है।
केशवानंद भारती मामले के उद्धहरण -
ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य -
श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य, सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, और आई.सी. गोलक नाथ एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य, ये सभी भारतीय संवैधानिक कानून के इतिहास में ऐतिहासिक मामले और महत्वपूर्ण मिसाल हैं।
ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) -
मामले में निवारक निरोध कानूनों की संवैधानिकता पर विचार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे कानूनों की संवैधानिकता को बरकरार रखते हुए कहा कि भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार, जिनमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी शामिल है, पूर्ण नहीं हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों से राज्य द्वारा उनमें कटौती की जा सकती है।
श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ एवं बिहार राज्य (1951) -
मामले में संविधान संशोधन की संसद की शक्ति पर विचार किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की शक्ति पूर्ण और अप्रतिबंधित है, और किसी भी संविधान संशोधन की वैधता पर इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965) -
मामले में 17वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता पर विचार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 17वें संशोधन की वैधता को बरकरार रखते हुए यह माना कि संसद को संविधान के किसी भी भाग, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं, में संशोधन करने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि संविधान निर्माताओं का इरादा मौलिक अधिकार को संशोधन शक्ति के दायरे से बाहर रखने का था, तो उन्होंने इस संबंध में स्पष्ट प्रावधान किया होता।
आईसी गोलक नाथ एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य (1967) -
मामले में संविधान संशोधन की संसद की शक्ति पर विचार किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की शक्ति असीमित नहीं है और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को किसी संवैधानिक संशोधन द्वारा निरस्त या सीमित नहीं किया जा सकता।
ये मामले महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्होंने भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की व्याख्या और संसद की संविधान संशोधन की शक्ति को आकार देने में मदद की। इन्होंने केशवानंद भारती सहित बाद के मामलों के लिए आधार भी तैयार किया, जिसका भारतीय न्याय व्यवस्था पर स्थायी प्रभाव पड़ा।
केशवानंद भारती मामले के कानूनी मुद्दे -
केशवानंद भारती मामले में कई प्रमुख कानूनी मुद्दे शामिल थे, जिनमें केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता और संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति की सीमा शामिल थी।
केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता: -
इस मामले में मुख्य कानूनी मुद्दा केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता थी, जो किसी व्यक्ति के पास ज़मीन की मात्रा पर एक सीमा निर्धारित करता था और भूस्वामियों से अतिरिक्त ज़मीन के अधिग्रहण का प्रावधान करता था। केशवानंद भारती ने तर्क दिया कि यह अधिनियम उनके संपत्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है, जिसकी गारंटी भारत के संविधान द्वारा दी गई है।
संविधान संशोधन की संसद की शक्ति की सीमा: -
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा संविधान संशोधन की संसद की शक्ति की सीमा का था। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या संविधान संशोधन की संसद की शक्ति असीमित है या इस शक्ति की कोई सीमाएँ हैं।
संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत: -
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को स्थापित किया, जिसके अनुसार संविधान की कुछ मूलभूत विशेषताएँ, जैसे संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संसद द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से संशोधित या निरस्त नहीं की जा सकतीं। न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या यह सिद्धांत संविधान का अंग है और क्या संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति इस सिद्धांत तक विस्तारित है।
केशवानंद भारती मामले में प्रमुख कानूनी मुद्दे केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता, संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति की सीमा और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत की स्थापना थे।
मामले में बहस -
केशवानंद भारती मामले में कई पक्ष शामिल थे, जिनमें याचिकाकर्ता केशवानंद भारती और केरल राज्य शामिल थे, जिन्होंने केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिकता का बचाव किया। इसके अतिरिक्त, कई हस्तक्षेपकर्ता भी थे जिन्होंने मामले में एक या दूसरे पक्ष का समर्थन किया।
याचिकाकर्ता के तर्क: -
धार्मिक नेता और भूस्वामी केशवानंद भारती ने तर्क दिया कि केरल भूमि सुधार अधिनियम उनके संपत्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है, जिसकी गारंटी भारत के संविधान द्वारा दी गई है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति असीमित नहीं है और संविधान के कुछ मूलभूत तत्व, जैसे संपत्ति का अधिकार, संशोधन के दायरे से बाहर हैं।
लिखित तर्क -
याचिकाकर्ता की विनम्र याचिका
याचिकाकर्ता का हलफनामा
याचिकाकर्ता के प्रस्ताव
याचिकाकर्ता और हस्तक्षेपकर्ता- सामान्य प्रस्तुतिकरण
प्रतिवादी के तर्क: केरल राज्य ने केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिकता का बचाव करते हुए तर्क दिया कि यह अधिनियम संपत्ति के अधिकार पर एक उचित प्रतिबंध है और इसका उद्देश्य सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना और गरीबी कम करना है। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति असीमित है और इस शक्ति की कोई सीमा नहीं है।
प्रतिपक्ष के लिखित तर्क -
भारत संघ
प्रस्तुतियाँ - भारत संघ
प्रतिवादी के तर्क की जांच
हस्तक्षेपकर्ताओं के तर्क: इस मामले में कई हस्तक्षेपकर्ता थे जिन्होंने एक या दूसरे पक्ष का समर्थन किया। कुछ हस्तक्षेपकर्ताओं ने तर्क दिया कि केरल भूमि सुधार अधिनियम सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने और गरीबी कम करने के लिए एक आवश्यक उपाय था, जबकि अन्य ने तर्क दिया कि यह अधिनियम संपत्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। कुछ हस्तक्षेपकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति असीमित नहीं है और संविधान की कुछ मूलभूत विशेषताएँ, जैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संशोधन के दायरे से बाहर हैं।
हस्तक्षेपकर्ताओं के प्रस्ताव और तर्क -
लिखित तर्क/प्रस्तुतियाँ - हस्तक्षेपकर्ता
श्री सी.के.रमन
श्री चाको वर्ली
श्री मोतीलाल गंगाराम दोशी
जम्मू और कश्मीर राज्य की ओर से श्री आर.के. गर्ग
श्री सुनील कुमार रॉय
हस्तक्षेपकर्ता के रूप में महाधिवक्ता -
आंध्र प्रदेश राज्य
असम और नागालैंड राज्य
जम्मू और कश्मीर राज्य
मध्य प्रदेश राज्य
महाराष्ट्र राज्य
मेघालय राज्य
उड़ीसा राज्य
राजस्थान राज्य
तमिलनाडु राज्य
उत्तर प्रदेश राज्य
श्री नानी पाखीवाला की संक्षिप्त प्रस्तुति 23 मार्च 1973 को दूसरे अंतिम दिन यानी सुनवाई के 69वें दिन
केशवानंद भारती मामले में पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत तर्क केरल भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिकता, संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति की सीमा, तथा संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के इर्द-गिर्द घूमते रहे।
निर्णय -
केशवानंद भारती मामले को भारतीय संवैधानिक कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है क्योंकि इसने संविधान की सर्वोच्चता और संविधान के मूल ढांचे की रक्षा में न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पुष्टि की। इस फैसले ने कई सिद्धांत निर्धारित किए जो भारत में संवैधानिक कानून की आधारशिला बन गए हैं। इनमें कानून का शासन, शक्तियों का पृथक्करण और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत शामिल हैं। इसने संवैधानिक व्याख्या के प्रति भारतीय न्यायपालिका के दृष्टिकोण और संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति की सीमाओं को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 7-6 के बहुमत से दिए गए फैसले में कहा कि भारत के संविधान का एक मूल ढांचा है जिसे संविधान संशोधन द्वारा भी नहीं बदला जा सकता है। न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन करने की शक्ति असीमित नहीं है और वह संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती। इसने संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर एक महत्वपूर्ण अंकुश के रूप में काम किया है।
बहुमत के निर्णयों से निष्कर्ष 7 न्यायाधीश
मुख्य न्यायाधीश एस.एम.एस.सिकरी
न्यायमूर्ति जेएम शेलाट और न्यायमूर्ति एएनग्रोवर
न्यायमूर्ति केएस हेगड़े और न्यायमूर्ति एके मुखर्जी
न्यायमूर्ति पी. जगनमोहन रेड्डी
न्यायमूर्ति एचआर खन्ना
असहमतिपूर्ण निर्णयों से निष्कर्ष 6 न्यायाधीश -
न्यायमूर्ति ए.एन. रे
न्यायमूर्ति डीजी पालेकर
न्यायमूर्ति के.के.मैथ्यू
न्यायमूर्ति एमएचबेग
न्यायमूर्ति एसएन द्विवेदी
न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचूड़
निर्णय की संदर्भ लेखन सामग्री -
1. केशवानंद मामले का न्यायिक नृवंशविज्ञान
लेखक - राजीव धवन, (1977), 19 जर्नल ऑफ इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, 489-97.
2. संशोधन में संशोधन: संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1978 लेखक - राजीव धवन 1978', 20 जर्नल ऑफ इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, 249-72.
3. संविधान के मूल ढांचे का प्रेत - केशवानंद मामले का आलोचनात्मक मूल्यांकन
लेखक - गर्ग, रमेश डी. (1974), 16 जर्नल ऑफ इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, 243-69.
वीडियो - केशवानंद भारती मामला
मूल लेख - e court
निर्णय की प्रति -
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तथ्य समस्याएँ
याचिकाकर्ता के तर्क प्रतिवादी के तर्क
कानून का विश्लेषण मिसाल विश्लेषण
न्यायालय का तर्क निष्कर्ष
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पार्टी द्वारा भरोसा किया गया न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया
न्यायालय द्वारा नकारात्मक दृष्टिकोण कोई स्पष्ट भावना नहीं
[उद्धरण 573 , उद्धृत 999 ]
उपयोगकर्ता प्रश्न
केशवानंद भारती
केरल भूमि सुधार अधिनियम
प्रमोशन फ़िल्टर: उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921
संविधान की प्रस्तावना
अनुच्छेद 32
अनुच्छेद 368
मानव अधिकार
संघवाद संविधान
समानता का अधिकार
अनुच्छेद 25
निर्देशक सिद्धांत
संविधान अनुच्छेद 13
शंकरी प्रसाद
अनुच्छेद 13
छठी अनुसूची
अनुच्छेद 73
संविधान में संशोधन करने की शक्ति
धर्म
आर्थिक न्याय
न्यायशास्र सा
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
केशवानंद भारती श्रीपदगलवरु ... बनाम केरल राज्य और अन्य, 24 अप्रैल, 1973
समतुल्य उद्धरण: AIR 1973 सुप्रीम कोर्ट 1461, 1973 4 SCC 225
बेंच: एसएम सीकरी , एएन ग्रोवर , एएन रे , डीजी पालेकर , एचआर खन्ना , जेएम शेलट , केके मैथ्यू , केएस हेगड़े , एमएच बेग , पी. जगनमोहन रेड्डी , एसएन द्विवेदी , वाईवीचंद्रचूड़
मामला संख्या:
रिट याचिका (सिविल) 135/1970
याचिकाकर्ता:
केशवानंद भारती श्रीपदगलवरु और अन्य
प्रतिवादी:
केरल राज्य और अन्य
निर्णय की तिथि: 24/04/1973
बेंच:
एसएम सीकरी और एएन ग्रोवर और एएन रे और डीजी पालेकर और एचआर खन्ना और जेएम शेलट और केके मैथ्यू और केएस हेगड़े और एमएच बेग और पी. जगनमोहन रेड्डी और एसएन द्विवेदी और वाईवीचंद्रचूड़
निर्णय:
निर्णय WP(C) 135/1970 अपीलकर्ता: परम पावन केशवानंद भारती श्रीपदागलवारु एवं अन्य बनाम प्रतिवादी: केरल राज्य एवं अन्य
निर्णय दिनांक: 24.04.1973 माननीय न्यायाधीश:
एसएम सीकरी, सीजे, एएन ग्रोवर, एएन रे, डीजी पालेकर, एचआर खन्ना, जेएम शेलट, केके मैथ्यू, केएस हेगड़े एमएच बेग, पी. जगनमोहन रेड्डी, एसएन द्विवेदी और वाईवी चंद्रचूड़, जेजे।
निर्णय एस.एम. सीकरी, मुख्य न्यायाधीश
1. मैं अपने निर्णय को आठ भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव करता हूँ -
भाग I में परिचय पर चर्चा होगी;
भाग II में गोलखनाथ मामले की व्याख्या भाग III में मूल अनुच्छेद 368 की व्याख्या
जैसा कि वह संशोधन से पूर्व विद्यमान था। भाग IV में संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम की वैधता।
भाग V में संविधान (पच्चीसवाँ संशोधन) अधिनियम की धारा 2 की वैधता।
भाग VI में संविधान (पच्चीसवाँ संशोधन) अधिनियम की धारा 3 की वैधता
भाग VII में संविधान (उनतीसवाँ संशोधन) अधिनियम।
भाग VIII में निष्कर्ष शामिल हैं।
भाग I- परिचय
2. सभी छह रिट याचिकाओं में संविधान के चौबीसवें, पच्चीसवें और उनतीसवें संशोधन की वैधता के बारे में सामान्य प्रश्न शामिल हैं। मैं रिट याचिका संख्या 135/1970 में कुछ तथ्य दे सकता हूं ताकि यह दिखाया जा सके कि इस याचिका में प्रश्न कैसे उठता है। रिट याचिका संख्या 135/1970 याचिकाकर्ता द्वारा 21 मार्च, 1970 को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत संविधान के अनुच्छेद 25 , 26 , 14 , 19(1)(एफ) और 31 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए दायर की गई थी। उन्होंने प्रार्थना की कि केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 (1964 का अधिनियम 1) के प्रावधानों को केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1969 (1969 का अधिनियम 35) द्वारा संशोधित किया जाए, जो असंवैधानिक, अधिकारहीन और शून्य घोषित किया जाए। उन्होंने याचिका के लंबित रहने के दौरान एक उचित रिट या आदेश जारी करने का भी अनुरोध किया। इस न्यायालय ने 25 मार्च, 1970 को नियम निसी जारी किया।
3. रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान, केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 (केरल अधिनियम संख्या 25, 1971) पारित किया गया, जिसे 7 अगस्त, 1971 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करने और केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 (केरल अधिनियम संख्या 25, 1971) की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठाने की अनुमति के लिए आवेदन दायर किया।
4. इस बीच, सर्वोच्च न्यायालय ने 26 अप्रैल, 1971 को कुंजुकुट्टी साहिब बनाम केरल राज्य [1972] एससीसी 364 (सिविल अपील संख्या 143, 203-242, 274 और 309, 1971) में अपने निर्णय द्वारा, 26 अप्रैल, 1971 को वीएन नारायणन नायर बनाम केरल राज्य एआईआर 1971 केरल 98 में केरल उच्च न्यायालय के बहुमत के निर्णय को बरकरार रखा, जिसके तहत अधिनियम की कुछ धाराओं को रद्द कर दिया गया था।
5. संविधान (पच्चीसवां संशोधन) अधिनियम 5 नवंबर, 1971 को लागू हुआ, संविधान (पच्चीसवां संशोधन) अधिनियम 20 अप्रैल, 1972 को लागू हुआ और संविधान (उनतीसवां संशोधन) अधिनियम 9 जून, 1972 को लागू हुआ। संविधान के उनतीसवें संशोधन का प्रभाव यह था कि इसने संविधान की नौवीं अनुसूची में निम्नलिखित अधिनियमों को सम्मिलित किया।
65. केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 (1969 का केरल अधिनियम 35)।
66. केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1971 (केरल अधिनियम 25, 1971)।
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याचिकाकर्ता के तर्क प्रतिवादी के तर्क
कानून का विश्लेषण मिसाल विश्लेषण
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पार्टी द्वारा भरोसा किया गया न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया
न्यायालय द्वारा नकारात्मक दृष्टिकोण कोई स्पष्ट भावना नहीं
[उद्धरण 573 , उद्धृत 999 ]
उपयोगकर्ता प्रश्न
केशवानंद भारती
केरल भूमि सुधार अधिनियम
प्रमोशन फ़िल्टर: उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921
संविधान की प्रस्तावना
अनुच्छेद 32
अनुच्छेद 368
मानव अधिकार
संघवाद संविधान
समानता का अधिकार
अनुच्छेद 25
निर्देशक सिद्धांत
संविधान अनुच्छेद 13
शंकरी प्रसाद
अनुच्छेद 13
छठी अनुसूची
अनुच्छेद 73
संविधान में संशोधन करने की शक्ति
धर्म
आर्थिक न्याय
न्यायशास्र सा
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
केशवानंद भारती श्रीपदगलवरु ... बनाम केरल राज्य और अन्य, 24 अप्रैल, 1973
समतुल्य उद्धरण: AIR 1973 सुप्रीम कोर्ट 1461, 1973 4 SCC 225
बेंच: एसएम सीकरी , एएन ग्रोवर , एएन रे , डीजी पालेकर , एचआर खन्ना , जेएम शेलट , केके मैथ्यू , केएस हेगड़े , एमएच बेग , पी. जगनमोहन रेड्डी , एसएन द्विवेदी , वाईवीचंद्रचूड़
मामला संख्या:
रिट याचिका (सिविल) 135/1970
याचिकाकर्ता:
केशवानंद भारती श्रीपदागलवारु और अन्य
प्रतिवादी:
केरल राज्य और अन्य
फैसले की तारीख: 24/04/1973
पीठ:
एसएम सीकरी और एएन ग्रोवर और एएन रे और डीजी पालेकर और एचआर खन्ना और जेएम शेलाट और केके मैथ्यू और केएस हेगड़े और एमएच बेग और पी. जगनमोहन रेड्डी और एसएन द्विवेदी और वाईवीचंद्रचूड़
फैसला:
निर्णय WP(C) 135/1970 अपीलकर्ता: परम पावन केशवानंद भारती श्रीपदागलवारु एवं अन्य बनाम प्रतिवादी: केरल राज्य एवं अन्य
निर्णय दिनांक: 24.04.1973 माननीय न्यायाधीश:
एसएम सीकरी, सीजे, एएन ग्रोवर, एएन रे, डीजी पालेकर, एचआर खन्ना, जेएम शेलट, केके मैथ्यू, केएस हेगड़े एमएच बेग, पी. जगनमोहन रेड्डी, एसएन द्विवेदी और वाईवी चंद्रचूड़, जेजे।
निर्णय एस.एम. सीकरी, मुख्य न्यायाधीश
1. मैं अपने निर्णय को आठ भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव करता हूँ। भाग I में परिचय पर चर्चा होगी;
भाग II में गोलखनाथ मामले की व्याख्या; भाग III में मूल अनुच्छेद 368 की व्याख्या , जैसा कि वह संशोधन से पूर्व विद्यमान था; भाग IV में संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम की वैधता ; भाग V में संविधान (पच्चीसवाँ संशोधन) अधिनियम की धारा 2 की वैधता ; भाग VI में संविधान (पच्चीसवाँ संशोधन) अधिनियम की धारा 3 की वैधता ; भाग VII में संविधान (उनतीसवाँ संशोधन) अधिनियम; तथा भाग VIII में निष्कर्ष शामिल हैं।
भाग I- परिचय -
2. सभी छह रिट याचिकाओं में संविधान के चौबीसवें, पच्चीसवें और उनतीसवें संशोधन की वैधता के बारे में सामान्य प्रश्न शामिल हैं। मैं रिट याचिका संख्या 135/1970 में कुछ तथ्य दे सकता हूं ताकि यह दिखाया जा सके कि इस याचिका में प्रश्न कैसे उठता है। रिट याचिका संख्या 135/1970 याचिकाकर्ता द्वारा 21 मार्च, 1970 को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत संविधान के अनुच्छेद 25 , 26 , 14 , 19(1)(एफ) और 31 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए दायर की गई थी। उन्होंने प्रार्थना की कि केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 (1964 का अधिनियम 1) के प्रावधानों को केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1969 (1969 का अधिनियम 35) द्वारा संशोधित किया जाए, जो असंवैधानिक, अधिकारहीन और शून्य घोषित किया जाए। उन्होंने याचिका के लंबित रहने के दौरान एक उचित रिट या आदेश जारी करने का भी अनुरोध किया। इस न्यायालय ने 25 मार्च, 1970 को नियम निसी जारी किया।
3. रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान, केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 (केरल अधिनियम संख्या 25, 1971) पारित किया गया, जिसे 7 अगस्त, 1971 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करने और केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 (केरल अधिनियम संख्या 25, 1971) की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठाने की अनुमति के लिए आवेदन दायर किया।
4. इस बीच, सर्वोच्च न्यायालय ने 26 अप्रैल, 1971 को कुंजुकुट्टी साहिब बनाम केरल राज्य [1972] एससीसी 364 (सिविल अपील संख्या 143, 203-242, 274 और 309, 1971) में अपने निर्णय द्वारा, 26 अप्रैल, 1971 को वीएन नारायणन नायर बनाम केरल राज्य एआईआर 1971 केरल 98 में केरल उच्च न्यायालय के बहुमत के निर्णय को बरकरार रखा, जिसके तहत अधिनियम की कुछ धाराओं को रद्द कर दिया गया था।
5. संविधान (पच्चीसवां संशोधन) अधिनियम 5 नवंबर, 1971 को लागू हुआ, संविधान (पच्चीसवां संशोधन) अधिनियम 20 अप्रैल, 1972 को लागू हुआ और संविधान (उनतीसवां संशोधन) अधिनियम 9 जून, 1972 को लागू हुआ। संविधान के उनतीसवें संशोधन का प्रभाव यह था कि इसने संविधान की नौवीं अनुसूची में निम्नलिखित अधिनियमों को सम्मिलित किया:
65. केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 (1969 का केरल अधिनियम 35)।
66. केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1971 (केरल अधिनियम 25, 1971)।
6. इसके बाद याचिकाकर्ता ने उपरोक्त संवैधानिक संशोधनों को चुनौती देने के लिए अतिरिक्त आधारों का आग्रह करने तथा रिट याचिका में संशोधन के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।
7. न्यायालय ने 10 अगस्त, 1972 को अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करने तथा रिट याचिका में संशोधन के लिए आवेदन स्वीकार कर लिया तथा महाधिवक्ता को इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने तथा कार्यवाही में भाग लेने के लिए नोटिस जारी किया, जैसा कि उन्हें सलाह दी जाए।
8. जब मामला संवैधानिक पीठ के समक्ष रखा गया तो उसने विवादित संवैधानिक संशोधनों की वैधता निर्धारित करने के लिए इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया।
9. अन्य रिट याचिकाओं में भी इसी प्रकार के आदेश पारित किये गये।
10. तदनुसार एक बड़ी पीठ का गठन किया गया। तब यह महसूस किया गया कि यह तय करना आवश्यक होगा कि आईसी गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य [1967] 2 एससीआर 762 का निर्णय सही था या नहीं। हालाँकि, जैसा कि मैं देखता हूँ, यह प्रश्न कि गोलक नाथ [1967] 2 एससीआर 762 मामले का निर्णय सही था या नहीं, कोई मायने नहीं रखता क्योंकि असली मुद्दा अलग और कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह है: संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अलावा, अनुच्छेद 368 द्वारा संसद को प्रदत्त संशोधन शक्ति की सीमा क्या है?
11. प्रतिवादियों का दावा है कि संसद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघ या यूनियन बनाने की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का हनन कर सकती है। उनका दावा है कि लोकतंत्र को हटाकर एकदलीय शासन भी स्थापित किया जा सकता है। वास्तव में, संविधान को निरस्त किए बिना, संसद अनुच्छेद 134 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करके नागरिकों को स्वतंत्रता से वंचित करने वाली किसी भी प्रकार की सरकार स्थापित कर सकती है।
368.
12. याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया है कि संसद की शक्तियाँ कहीं अधिक सीमित हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संविधान ने भारतीय नागरिकों को ऐसी स्वतंत्रताएँ प्रदान की हैं जो सदैव बनी रहेंगी और संविधान का निर्माण राष्ट्र को जनप्रतिनिधियों के भविष्य के किसी भी अत्याचार से मुक्त करने के लिए किया गया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अत्याचार से यही स्वतंत्रता, पच्चीसवें संशोधन द्वारा जोड़े गए विवादित अनुच्छेद 31C द्वारा छीन ली गई है। उनका कहना है कि यदि अनुच्छेद 31C वैध है, तो इसके बाद संविधान नहीं, बल्कि संसद और राज्य विधानमंडल यह निर्धारित करेंगे कि नागरिकों के लिए कितनी स्वतंत्रता उचित है।
13. ये मामले गंभीर मुद्दे उठाते हैं। लेकिन मुद्दे चाहे कितने भी गंभीर क्यों न हों, इनका उत्तर अनुच्छेद 368 के शब्दों की व्याख्या पर निर्भर करेगा , जिसे व्याख्या के उन सिद्धांतों के अनुसार पढ़ा जाएगा जो जनता द्वारा स्वयं दिए गए संविधान की व्याख्या पर लागू होते हैं।
14. मुझे अनुच्छेद 368 की व्याख्या हमारे संविधान की पृष्ठभूमि, हमारे इतिहास की पृष्ठभूमि और हमारी आकांक्षाओं व आशाओं, तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों के आलोक में करनी होगी। दुनिया का कोई भी संविधान हमारे संविधान जैसा नहीं है। कोई भी अन्य संविधान अपने अंतर्गत इतने विविध लोगों को, जिनकी संख्या अब 55 करोड़ से भी अधिक है, विभिन्न भाषाओं और धर्मों वाले और आर्थिक विकास के विभिन्न चरणों वाले, एक राष्ट्र के रूप में नहीं जोड़ता है, और कोई भी अन्य राष्ट्र इतनी विशाल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सामना नहीं कर रहा है।
15. मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं किसी साधारण क़ानून की व्याख्या नहीं कर रहा हूँ, बल्कि एक ऐसे संविधान की व्याख्या कर रहा हूँ जो शासन-व्यवस्था स्थापित करने के अलावा, एक महान और विशाल दृष्टिकोण रखता है। इस दृष्टिकोण को प्रस्तावना में शब्दों में व्यक्त किया गया है और लोगों को मौलिक अधिकार प्रदान करके आंशिक रूप से क्रियान्वित किया गया है। इस दृष्टिकोण को नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुप्रयोग द्वारा और आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया है।
भाग II- गोलक नाथ के मामले की व्याख्या।
16. मुख्य कार्य पर आगे बढ़ने से पहले, यह पूछना ज़रूरी है: आईसी गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य [1967] 2 एससीआर 762 में क्या निर्णय लिया गया था? उस मामले को ठीक से समझने के लिए, सबसे पहले श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य [1952] एससीआर 89 और सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य [1965] 1 एससीआर 933 पर एक नज़र डालना ज़रूरी है।
17. संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 , जिसने संविधान में अन्य बातों के साथ-साथ अनुच्छेद 31ए और 31बी को शामिल किया , शंकरी प्रसाद [1952] एससीआर 89 मामले में निर्णय का विषय था। इस न्यायालय के समक्ष याचिका के समर्थन में प्रस्तुत वर्तमान मामले से संबंधित मुख्य तर्कों का सारांश न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री ने, जो उस समय न्यायमूर्ति थे, इस प्रकार दिया:
प्रथम, अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति संसद को नहीं, बल्कि संसद के दोनों सदनों को निर्दिष्ट निकाय के रूप में प्रदान की गई थी, और इसलिए, अनंतिम संसद अनुच्छेद 379 के तहत उस शक्ति का प्रयोग करने के लिए सक्षम नहीं थी।
चौथा, किसी भी स्थिति में अनुच्छेद 368 अपने आप में एक पूर्ण संहिता है और सदन में विधेयक प्रस्तुत किए जाने के बाद उसमें किसी संशोधन का प्रावधान नहीं करता। वर्तमान मामले में विधेयक को सदन में पारित होने के दौरान कई विशिष्टियों में संशोधित किया गया था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि संशोधन अधिनियम अनुच्छेद 368 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप पारित किया गया है।
पांचवें, संशोधन अधिनियम, जहां तक इसका उद्देश्य संविधान के भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनना या कम करना है, अनुच्छेद 13(2) के निषेध के अंतर्गत आता है।
XXX
18. जैसा कि मुख्य नोट में कहा गया है, इस न्यायालय ने माना:
अनंतिम संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति का प्रयोग करने के लिए सक्षम है। तथ्य यह है कि उक्त अनुच्छेद संसद के दोनों सदनों और राष्ट्रपति को अलग-अलग संदर्भित करता है, न कि संसद को, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि जिस निकाय को संशोधन करने की शक्ति प्रदान की गई है वह संसद नहीं है, बल्कि दोनों सदनों से मिलकर बनी एक अलग संस्था है।
अनुच्छेद 379 में "इस संविधान के उपबंधों द्वारा संसद को प्रदत्त सभी शक्तियां" शब्द केवल उन शक्तियों तक सीमित नहीं हैं, जिनका प्रयोग एकल सदन वाली अनंतिम संसद द्वारा किया जा सकता है, बल्कि वे इतने व्यापक हैं कि उनमें अनुच्छेद 368 द्वारा प्रदत्त संविधान में संशोधन करने की शक्ति भी शामिल है।
19. मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि श्री सीरवाई का तर्क है कि अभी उल्लिखित निष्कर्ष गलत था और अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने वाली संस्था संसद नहीं है।
20. न्यायालय ने आगे कहा:
यह विचार कि अनुच्छेद 368 अपने द्वारा प्रदान की गई प्रक्रिया के संबंध में अपने आप में एक पूर्ण संहिता है और संविधान में संशोधन के लिए विधेयक को प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् उसमें किसी संशोधन की परिकल्पना नहीं करता है, तथा यदि विधेयक को सदन में पारित होने के दौरान संशोधित किया जाता है, तो संशोधन अधिनियम को अनुच्छेद 368 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप पारित नहीं कहा जा सकता है और वह अवैध होगा, गलत है।
यद्यपि "कानून" में सामान्यतः संवैधानिक कानून भी शामिल होना चाहिए, फिर भी विधायी शक्ति के प्रयोग में बनाए गए साधारण कानून और संवैधानिक शक्ति के प्रयोग में बनाए गए संवैधानिक कानून के बीच एक स्पष्ट अंतर है। अनुच्छेद 13 के संदर्भ में , "कानून" का अर्थ साधारण विधायी शक्ति के प्रयोग में बनाए गए नियमों या विनियमों से लिया जाना चाहिए, न कि संवैधानिक शक्ति के प्रयोग में किए गए संविधान संशोधनों से। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 13(2) अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किए गए संशोधनों को प्रभावित नहीं करता है ।
21. यद्यपि शंकरी प्रसाद [1952] एससीआर 89 मामले में निर्णय को सज्जन सिंह [1965] 1 एससीआर 933 मामले में चुनौती नहीं दी गई थी, लेकिन मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्रगढ़कर ने उस निर्णय के साथ पूर्ण सहमति व्यक्त करने के लिए कारण बताना उचित समझा।
22. न्यायालय के समक्ष एकमात्र तर्क यह था कि "चूँकि ऐसा प्रतीत होता है कि अनुच्छेद 226 द्वारा निर्धारित शक्तियाँ भाग III में निहित उपबंधों के प्रस्तावित संशोधन से प्रभावित होने की संभावना है, इसलिए ऐसा संशोधन करने के उद्देश्य से प्रस्तुत विधेयक पर उपबंध लागू होना चाहिए, और चूँकि विवादित अधिनियम ने निश्चित रूप से उपबंध द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, इसलिए यह अवैध है"। मुख्य न्यायाधीश गजेंद्रगढ़कर के अनुसार, "इससे अनुच्छेद 368 में निहित उपबंधों की व्याख्या और अनुच्छेद 368 के मूल भाग और उसके उपबंध के बीच संबंध के बारे में प्रश्न उठा।
23. मुख्य न्यायाधीश इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि "निर्माण के मामले में, इस निष्कर्ष से कोई बच नहीं सकता है कि अनुच्छेद 368 संसद पर परंतुक द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को अपनाने का दायित्व डाले बिना भाग III में निहित प्रावधानों में संशोधन का प्रावधान करता है।
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तथ्य समस्याएँ
याचिकाकर्ता के तर्क प्रतिवादी के तर्क
कानून का विश्लेषण मिसाल विश्लेषण
न्यायालय का तर्क निष्कर्ष
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देखें कि इस दस्तावेज़ में उदाहरणों का उल्लेख कैसे किया गया है
न्यायालय की राय के अनुसार पूर्व उदाहरणों को फ़िल्टर करें
पार्टी द्वारा भरोसा किया गया न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया
न्यायालय द्वारा नकारात्मक दृष्टिकोण कोई स्पष्ट भावना नहीं
[उद्धरण 573 , उद्धृत 999 ]
उपयोगकर्ता प्रश्न
केशवानंद भारती
केरल भूमि सुधार अधिनियम
प्रमोशन फ़िल्टर: उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921
संविधान की प्रस्तावना
अनुच्छेद 32
अनुच्छेद 368
मानव अधिकार
संघवाद संविधान
समानता का अधिकार
अनुच्छेद 25
निर्देशक सिद्धांत
संविधान अनुच्छेद 13
शंकरी प्रसाद
अनुच्छेद 13
छठी अनुसूची
अनुच्छेद 73
संविधान में संशोधन करने की शक्ति
धर्म
आर्थिक न्याय
न्यायशास्र सा
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
केशवानंद भारती श्रीपदगलवरु ... बनाम केरल राज्य और अन्य, 24 अप्रैल, 1973
समतुल्य उद्धरण: AIR 1973 सुप्रीम कोर्ट 1461, 1973 4 SCC 225
बेंच: एसएम सीकरी , एएन ग्रोवर , एएन रे , डीजी पालेकर , एचआर खन्ना , जेएम शेलट , केके मैथ्यू , केएस हेगड़े , एमएच बेग , पी. जगनमोहन रेड्डी , एसएन द्विवेदी , वाईवीचंद्रचूड़
मामला संख्या:
रिट याचिका (सिविल) 135/1970
याचिकाकर्ता:
केशवानंद भारती श्रीपदागलवारु और अन्य
प्रतिवादी:
केरल राज्य और अन्य
फैसले की तारीख: 24/04/1973
पीठ:
एसएम सीकरी और एएन ग्रोवर और एएन रे और डीजी पालेकर और एचआर खन्ना और जेएम शेलाट और केके मैथ्यू और केएस हेगड़े और एमएच बेग और पी. जगनमोहन रेड्डी और एसएन द्विवेदी और वाईवीचंद्रचूड़
फैसला:
निर्णय WP(C) 135/1970 अपीलकर्ता: परम पावन केशवानंद भारती श्रीपदागलवारु एवं अन्य बनाम प्रतिवादी: केरल राज्य एवं अन्य
निर्णय दिनांक: 24.04.1973 माननीय न्यायाधीश:
एसएम सीकरी, सीजे, एएन ग्रोवर, एएन रे, डीजी पालेकर, एचआर खन्ना, जेएम शेलट, केके मैथ्यू, केएस हेगड़े एमएच बेग, पी. जगनमोहन रेड्डी, एसएन द्विवेदी और वाईवी चंद्रचूड़, जेजे।
निर्णय एस.एम. सीकरी, मुख्य न्यायाधीश
1. मैं अपने निर्णय को आठ भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव करता हूँ। भाग I में परिचय पर चर्चा होगी;
भाग II में गोलखनाथ मामले की व्याख्या; भाग III में मूल अनुच्छेद 368 की व्याख्या , जैसा कि वह संशोधन से पूर्व विद्यमान था; भाग IV में संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम की वैधता ; भाग V में संविधान (पच्चीसवाँ संशोधन) अधिनियम की धारा 2 की वैधता ; भाग VI में संविधान (पच्चीसवाँ संशोधन) अधिनियम की धारा 3 की वैधता ; भाग VII में संविधान (उनतीसवाँ संशोधन) अधिनियम; तथा भाग VIII में निष्कर्ष शामिल हैं।
भाग I- परिचय
2. सभी छह रिट याचिकाओं में संविधान के चौबीसवें, पच्चीसवें और उनतीसवें संशोधन की वैधता के बारे में सामान्य प्रश्न शामिल हैं। मैं रिट याचिका संख्या 135/1970 में कुछ तथ्य दे सकता हूं ताकि यह दिखाया जा सके कि इस याचिका में प्रश्न कैसे उठता है। रिट याचिका संख्या 135/1970 याचिकाकर्ता द्वारा 21 मार्च, 1970 को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत संविधान के अनुच्छेद 25 , 26 , 14 , 19(1)(एफ) और 31 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए दायर की गई थी। उन्होंने प्रार्थना की कि केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 (1964 का अधिनियम 1) के प्रावधानों को केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1969 (1969 का अधिनियम 35) द्वारा संशोधित किया जाए, जो असंवैधानिक, अधिकारहीन और शून्य घोषित किया जाए। उन्होंने याचिका के लंबित रहने के दौरान एक उचित रिट या आदेश जारी करने का भी अनुरोध किया। इस न्यायालय ने 25 मार्च, 1970 को नियम निसी जारी किया।
3. रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान, केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 (केरल अधिनियम संख्या 25, 1971) पारित किया गया, जिसे 7 अगस्त, 1971 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करने और केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1971 (केरल अधिनियम संख्या 25, 1971) की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठाने की अनुमति के लिए आवेदन दायर किया।
4. इस बीच, सर्वोच्च न्यायालय ने 26 अप्रैल, 1971 को कुंजुकुट्टी साहिब बनाम केरल राज्य [1972] एससीसी 364 (सिविल अपील संख्या 143, 203-242, 274 और 309, 1971) में अपने निर्णय द्वारा, 26 अप्रैल, 1971 को वीएन नारायणन नायर बनाम केरल राज्य एआईआर 1971 केरल 98 में केरल उच्च न्यायालय के बहुमत के निर्णय को बरकरार रखा, जिसके तहत अधिनियम की कुछ धाराओं को रद्द कर दिया गया था।
5. संविधान (पच्चीसवां संशोधन) अधिनियम 5 नवंबर, 1971 को लागू हुआ, संविधान (पच्चीसवां संशोधन) अधिनियम 20 अप्रैल, 1972 को लागू हुआ और संविधान (उनतीसवां संशोधन) अधिनियम 9 जून, 1972 को लागू हुआ। संविधान के उनतीसवें संशोधन का प्रभाव यह था कि इसने संविधान की नौवीं अनुसूची में निम्नलिखित अधिनियमों को सम्मिलित किया:
65. केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 (1969 का केरल अधिनियम 35)।
66. केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1971 (केरल अधिनियम 25, 1971)।
6. इसके बाद याचिकाकर्ता ने उपरोक्त संवैधानिक संशोधनों को चुनौती देने के लिए अतिरिक्त आधारों का आग्रह करने तथा रिट याचिका में संशोधन के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।
7. न्यायालय ने 10 अगस्त, 1972 को अतिरिक्त आधार प्रस्तुत करने तथा रिट याचिका में संशोधन के लिए आवेदन स्वीकार कर लिया तथा महाधिवक्ता को इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने तथा कार्यवाही में भाग लेने के लिए नोटिस जारी किया, जैसा कि उन्हें सलाह दी जाए।
8. जब मामला संवैधानिक पीठ के समक्ष रखा गया तो उसने विवादित संवैधानिक संशोधनों की वैधता निर्धारित करने के लिए इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया।
9. अन्य रिट याचिकाओं में भी इसी प्रकार के आदेश पारित किये गये।
10. तदनुसार एक बड़ी पीठ का गठन किया गया। तब यह महसूस किया गया कि यह तय करना आवश्यक होगा कि आईसी गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य [1967] 2 एससीआर 762 का निर्णय सही था या नहीं। हालाँकि, जैसा कि मैं देखता हूँ, यह प्रश्न कि गोलक नाथ [1967] 2 एससीआर 762 मामले का निर्णय सही था या नहीं, कोई मायने नहीं रखता क्योंकि असली मुद्दा अलग और कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह है: संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अलावा, अनुच्छेद 368 द्वारा संसद को प्रदत्त संशोधन शक्ति की सीमा क्या है?
11. प्रतिवादियों का दावा है कि संसद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघ या यूनियन बनाने की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का हनन कर सकती है। उनका दावा है कि लोकतंत्र को हटाकर एकदलीय शासन भी स्थापित किया जा सकता है। वास्तव में, संविधान को निरस्त किए बिना, संसद अनुच्छेद 134 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करके नागरिकों को स्वतंत्रता से वंचित करने वाली किसी भी प्रकार की सरकार स्थापित कर सकती है।
368.
12. याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया है कि संसद की शक्तियाँ कहीं अधिक सीमित हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संविधान ने भारतीय नागरिकों को ऐसी स्वतंत्रताएँ प्रदान की हैं जो सदैव बनी रहेंगी और संविधान का निर्माण राष्ट्र को जनप्रतिनिधियों के भविष्य के किसी भी अत्याचार से मुक्त करने के लिए किया गया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अत्याचार से यही स्वतंत्रता, पच्चीसवें संशोधन द्वारा जोड़े गए विवादित अनुच्छेद 31C द्वारा छीन ली गई है। उनका कहना है कि यदि अनुच्छेद 31C वैध है, तो इसके बाद संविधान नहीं, बल्कि संसद और राज्य विधानमंडल यह निर्धारित करेंगे कि नागरिकों के लिए कितनी स्वतंत्रता उचित है।
13. ये मामले गंभीर मुद्दे उठाते हैं। लेकिन मुद्दे चाहे कितने भी गंभीर क्यों न हों, इनका उत्तर अनुच्छेद 368 के शब्दों की व्याख्या पर निर्भर करेगा , जिसे व्याख्या के उन सिद्धांतों के अनुसार पढ़ा जाएगा जो जनता द्वारा स्वयं दिए गए संविधान की व्याख्या पर लागू होते हैं।
14. मुझे अनुच्छेद 368 की व्याख्या हमारे संविधान की पृष्ठभूमि, हमारे इतिहास की पृष्ठभूमि और हमारी आकांक्षाओं व आशाओं, तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों के आलोक में करनी होगी। दुनिया का कोई भी संविधान हमारे संविधान जैसा नहीं है। कोई भी अन्य संविधान अपने अंतर्गत इतने विविध लोगों को, जिनकी संख्या अब 55 करोड़ से भी अधिक है, विभिन्न भाषाओं और धर्मों वाले और आर्थिक विकास के विभिन्न चरणों वाले, एक राष्ट्र के रूप में नहीं जोड़ता है, और कोई भी अन्य राष्ट्र इतनी विशाल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सामना नहीं कर रहा है।
15. मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं किसी साधारण क़ानून की व्याख्या नहीं कर रहा हूँ, बल्कि एक ऐसे संविधान की व्याख्या कर रहा हूँ जो शासन-व्यवस्था स्थापित करने के अलावा, एक महान और विशाल दृष्टिकोण रखता है। इस दृष्टिकोण को प्रस्तावना में शब्दों में व्यक्त किया गया है और लोगों को मौलिक अधिकार प्रदान करके आंशिक रूप से क्रियान्वित किया गया है। इस दृष्टिकोण को नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुप्रयोग द्वारा और आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया है।
भाग II- गोलक नाथ के मामले की व्याख्या।
16. मुख्य कार्य पर आगे बढ़ने से पहले, यह पूछना ज़रूरी है: आईसी गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य [1967] 2 एससीआर 762 में क्या निर्णय लिया गया था? उस मामले को ठीक से समझने के लिए, सबसे पहले श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य [1952] एससीआर 89 और सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य [1965] 1 एससीआर 933 पर एक नज़र डालना ज़रूरी है।
17. संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 , जिसने संविधान में अन्य बातों के साथ-साथ अनुच्छेद 31ए और 31बी को शामिल किया , शंकरी प्रसाद [1952] एससीआर 89 मामले में निर्णय का विषय था। इस न्यायालय के समक्ष याचिका के समर्थन में प्रस्तुत वर्तमान मामले से संबंधित मुख्य तर्कों का सारांश न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री ने, जो उस समय न्यायमूर्ति थे, इस प्रकार दिया:
प्रथम, अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति संसद को नहीं, बल्कि संसद के दोनों सदनों को निर्दिष्ट निकाय के रूप में प्रदान की गई थी, और इसलिए, अनंतिम संसद अनुच्छेद 379 के तहत उस शक्ति का प्रयोग करने के लिए सक्षम नहीं थी।
चौथा, किसी भी स्थिति में अनुच्छेद 368 अपने आप में एक पूर्ण संहिता है और सदन में विधेयक प्रस्तुत किए जाने के बाद उसमें किसी संशोधन का प्रावधान नहीं करता। वर्तमान मामले में विधेयक को सदन में पारित होने के दौरान कई विशिष्टियों में संशोधित किया गया था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि संशोधन अधिनियम अनुच्छेद 368 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप पारित किया गया है।
पांचवें, संशोधन अधिनियम, जहां तक इसका उद्देश्य संविधान के भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनना या कम करना है, अनुच्छेद 13(2) के निषेध के अंतर्गत आता है।
XXX
18. जैसा कि मुख्य नोट में कहा गया है, इस न्यायालय ने माना:
अनंतिम संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति का प्रयोग करने के लिए सक्षम है। तथ्य यह है कि उक्त अनुच्छेद संसद के दोनों सदनों और राष्ट्रपति को अलग-अलग संदर्भित करता है, न कि संसद को, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि जिस निकाय को संशोधन करने की शक्ति प्रदान की गई है वह संसद नहीं है, बल्कि दोनों सदनों से मिलकर बनी एक अलग संस्था है।
अनुच्छेद 379 में "इस संविधान के उपबंधों द्वारा संसद को प्रदत्त सभी शक्तियां" शब्द केवल उन शक्तियों तक सीमित नहीं हैं, जिनका प्रयोग एकल सदन वाली अनंतिम संसद द्वारा किया जा सकता है, बल्कि वे इतने व्यापक हैं कि उनमें अनुच्छेद 368 द्वारा प्रदत्त संविधान में संशोधन करने की शक्ति भी शामिल है।
19. मैं यह उल्लेख करना चाहूंगा कि श्री सीरवाई का तर्क है कि अभी उल्लिखित निष्कर्ष गलत था और अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने वाली संस्था संसद नहीं है।
20. न्यायालय ने आगे कहा:
यह विचार कि अनुच्छेद 368 अपने द्वारा प्रदान की गई प्रक्रिया के संबंध में अपने आप में एक पूर्ण संहिता है और संविधान में संशोधन के लिए विधेयक को प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् उसमें किसी संशोधन की परिकल्पना नहीं करता है, तथा यदि विधेयक को सदन में पारित होने के दौरान संशोधित किया जाता है, तो संशोधन अधिनियम को अनुच्छेद 368 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप पारित नहीं कहा जा सकता है और वह अवैध होगा, गलत है।
यद्यपि "कानून" में सामान्यतः संवैधानिक कानून भी शामिल होना चाहिए, फिर भी विधायी शक्ति के प्रयोग में बनाए गए साधारण कानून और संवैधानिक शक्ति के प्रयोग में बनाए गए संवैधानिक कानून के बीच एक स्पष्ट अंतर है। अनुच्छेद 13 के संदर्भ में , "कानून" का अर्थ साधारण विधायी शक्ति के प्रयोग में बनाए गए नियमों या विनियमों से लिया जाना चाहिए, न कि संवैधानिक शक्ति के प्रयोग में किए गए संविधान संशोधनों से। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 13(2) अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किए गए संशोधनों को प्रभावित नहीं करता है ।
21. यद्यपि शंकरी प्रसाद [1952] एससीआर 89 मामले में निर्णय को सज्जन सिंह [1965] 1 एससीआर 933 मामले में चुनौती नहीं दी गई थी, लेकिन मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्रगढ़कर ने उस निर्णय के साथ पूर्ण सहमति व्यक्त करने के लिए कारण बताना उचित समझा।
22. न्यायालय के समक्ष एकमात्र तर्क यह था कि "चूँकि ऐसा प्रतीत होता है कि अनुच्छेद 226 द्वारा निर्धारित शक्तियाँ भाग III में निहित उपबंधों के प्रस्तावित संशोधन से प्रभावित होने की संभावना है, इसलिए ऐसा संशोधन करने के उद्देश्य से प्रस्तुत विधेयक पर उपबंध लागू होना चाहिए, और चूँकि विवादित अधिनियम ने निश्चित रूप से उपबंध द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, इसलिए यह अवैध है"। मुख्य न्यायाधीश गजेंद्रगढ़कर के अनुसार, "इससे अनुच्छेद 368 में निहित उपबंधों की व्याख्या और अनुच्छेद 368 के मूल भाग और उसके उपबंध के बीच संबंध के बारे में प्रश्न उठा।
23. मुख्य न्यायाधीश इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि "निर्माण के मामले में, इस निष्कर्ष से कोई बच नहीं सकता है कि अनुच्छेद 368 संसद पर परंतुक द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को अपनाने का दायित्व डाले बिना भाग III में निहित प्रावधानों में संशोधन का प्रावधान करता है।
24. विद्वान मुख्य न्यायाधीश ने विचार किया कि इस संदर्भ में संशोधन करने की शक्ति अत्यंत व्यापक है और इसे "संशोधन" शब्द के शाब्दिक अर्थ से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत पारित संविधान संशोधन अधिनियमों पर अनुच्छेद 13(2) की प्रयोज्यता के संबंध में न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री के तर्क से अपनी सहमति व्यक्त की।
368. उन्होंने आगे कहा कि जब अनुच्छेद 368 संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार प्रदान करता है, तो इसका प्रयोग संविधान के सभी प्रावधानों पर किया जा सकता है। उनका मानना था कि "यदि संविधान निर्माताओं का यह इरादा होता कि भविष्य में मौलिक अधिकारों से संबंधित प्रावधानों में कोई भी संशोधन अनुच्छेद 13(2) के अधीन होना चाहिए , तो उन्होंने इस संबंध में एक स्पष्ट प्रावधान करने की सावधानी बरती होती।"
25. वह ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य [1950] एस.सी.आर. 88 के पृष्ठ 100 में मुख्य न्यायाधीश कनिया की निम्नलिखित टिप्पणियों से सहमत प्रतीत हुए :
संविधान में अनुच्छेद 13(1) और (2) को शामिल करना अत्यधिक सावधानी का विषय प्रतीत होता है। इनके अभाव में भी, यदि किसी विधायी अधिनियम द्वारा किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ हो, तो न्यायालय को हमेशा यह अधिकार है कि वह उस अधिनियम को, जहाँ तक वह सीमाओं का उल्लंघन करता है, अमान्य घोषित कर दे।
26. उनका विचार था कि यद्यपि भाग III के प्रासंगिक प्रावधानों को संविधान द्वारा इस देश में शुरू की गई लोकतांत्रिक जीवन शैली की नींव और आधारशिला के रूप में वर्णित किया जा सकता है, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि नागरिकों को गारंटीकृत मौलिक अधिकार शाश्वत और इस अर्थ में अनुल्लंघनीय हैं कि उन्हें कभी भी कम या संशोधित नहीं किया जा सकता है।
27. उनके अनुसार, यह मानना उचित था कि संविधान निर्माताओं ने यह कल्पना की थी कि संसद इन अधिकारों में संशोधन करने के लिए सक्षम होगी ताकि देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति और विकास के दौरान उत्पन्न होने वाली समस्याओं की चुनौती का सामना किया जा सके।
28. न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह, जो उस समय मुख्य न्यायाधीश थे, इस बात से सहमत थे कि 17वाँ संशोधन वैध था, भले ही अनुच्छेद 368 के प्रावधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। लेकिन उन्होंने शंकरी प्रसाद [1952] एससीआर 89 मामले में दिए गए तर्क के हिस्से को स्वीकार करने में अपनी कठिनाई व्यक्त की।
29. उन्होंने निम्नलिखित टिप्पणी की:
यह सच है कि अनुच्छेद में "कानून" शब्द की कोई पूर्ण परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि परिभाषा में संवैधानिक संशोधनों को बाहर करने का प्रयास नहीं किया गया है, जिसे परिभाषा में "लेकिन इसमें संविधान का संशोधन शामिल नहीं होगा" जोड़कर इंगित करना आसान होता।
30. उन्होंने आगे कहा:
इस प्रकार, अनुच्छेद 13 का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि अनुच्छेद 13(2) में "कानून" शब्द को किस अर्थ में समझा जाए। यदि किसी संशोधन को "कानून" शब्द के अंतर्गत माना जा सकता है, तो जापानी संविधान की भाषा में कहें तो मौलिक अधिकार "शाश्वत और अनुल्लंघनीय" हो जाते हैं। अनुच्छेद 13 तब तक अपने अपरिवर्तनीय निषेध के संदर्भ में अमेरिकी संघीय संविधान के अनुच्छेद 5 के समतुल्य है जब तक वह कायम है।
31. उनके अनुसार "हमारी प्रस्तावना संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की प्रस्तावना की तुलना में अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा (4 जुलाई, 1776) के अधिक समान है। यह किसी प्रकार की शक्ति प्रदान नहीं करती, बल्कि यह संविधान को एक दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है, जो भाग III और IV में परिलक्षित होता है। क्या यह कल्पना की जा सकती है कि किसी भी समय दोनों सदनों का दो-तिहाई बहुमत ही राज्यों से परामर्श किए बिना इसे बदलने के लिए पर्याप्त है? यह अनुच्छेद 368 के परंतुक में भी शामिल नहीं है और यह सोचना कठिन है कि चूँकि इसे परंतुक का संरक्षण प्राप्त नहीं है, इसलिए यह अनुच्छेद 368 के मुख्य भाग के अंतर्गत ही होना चाहिए ।
32. उन्होंने आगे कहा:
मुझे यह विचार स्वीकार करने के लिए शंकरी प्रसाद के मामले में दिए गए तर्क से अधिक मजबूत तर्क की आवश्यकता होगी कि मौलिक अधिकार वास्तव में मौलिक नहीं थे, बल्कि संविधान के अन्य भागों के साथ ही संशोधन की शक्तियों के अंतर्गत तथा राज्यों की सहमति के बिना थे।
33. उन्होंने कहा:
अनुच्छेद 368 संशोधन की प्रक्रिया और संशोधन की प्रभावशीलता के लिए आवश्यक शर्तें निर्धारित करता है... संविधान भाग III में इतने सारे आश्वासन देता है कि यह सोचना मुश्किल होगा कि वे किसी विशेष बहुमत के हाथों की कठपुतली थे। ऐसा मानने का अर्थ प्रथम दृष्टया यह होगा कि हमारे संविधान के सबसे गंभीर भाग किसी भी अन्य प्रावधान के समान ही हैं, और यहाँ तक कि परंतुक में उल्लिखित अनुच्छेदों की तुलना में कम ठोस आधार पर भी।
34. न्यायमूर्ति मुधोलकर ने इस बात पर सहमति जताते हुए कि रिट याचिका खारिज कर दी जानी चाहिए, कई शंकाएँ उठाईं और कहा कि वे इस प्रश्न पर अपनी राय सुरक्षित रखते हैं कि क्या शंकरी प्रसाद के मामले का निर्णय सही था। उनका विचार था:
अनुच्छेद 368 की भाषा यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि संविधान में संशोधन करने में संसद की कार्रवाई एक विधायी कार्य है, जैसा कि अपनी सामान्य विधायी शक्ति के प्रयोग में होता है। संविधान संशोधन के संबंध में एकमात्र अंतर यह है कि संविधान संशोधन विधेयक को विशेष बहुमत से पारित किया जाना होता है (यहाँ मेरे मन में केवल वे संशोधन हैं जो अनुच्छेद 368 के प्रावधान को लागू नहीं करते हैं )। किसी विधायिका की विधायी कार्रवाई का परिणाम 'कानून' के अलावा और कुछ नहीं हो सकता और इसलिए, मुझे ऐसा लगता है कि यह तथ्य कि कानून संविधान के किसी प्रावधान में संशोधन से संबंधित है, उसके परिणाम को 'कानून' से कम नहीं बनाता।
35. उन्होंने कहा:
यह सच है कि संविधान भाग III में संशोधन पर सीधे तौर पर रोक नहीं लगाता। लेकिन यह वाकई अजीब होगा कि जिन अधिकारों को मौलिक माना जाता है और जिनमें संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकार ( अनुच्छेद 32 के अनुसार) शामिल हैं, उन्हें अनुच्छेद 368 के परंतुक में उल्लिखित किसी भी विषय की तुलना में अधिक आसानी से संक्षिप्त या प्रतिबंधित किया जा सकता है - जिनमें से कुछ शायद मौलिक अधिकारों से कम महत्वपूर्ण हैं। यह संभव है, जैसा कि मेरे विद्वान भाई ने सुझाव दिया है, कि अनुच्छेद 368 केवल संविधान में संशोधन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निर्धारित करता है और संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्रदान नहीं करता है, जो मुझे लगता है कि संशोधित किए जाने वाले प्रावधान या अन्य प्रासंगिक प्रावधानों या प्रस्तावना से पता लगाया जाना चाहिए।
36. बाद में उन्होंने कहा:
सबसे बढ़कर, इसने एक गंभीर और गरिमापूर्ण प्रस्तावना तैयार की जो संविधान की मूल विशेषताओं का सार प्रतीत होती है। क्या यह नहीं कहा जा सकता कि ये संविधान सभा की संविधान की मूल विशेषताओं को स्थायित्व प्रदान करने की मंशा के संकेत हैं?
37. उन्होंने आगे एक प्रश्न पूछा:
यह भी विचारणीय विषय है कि क्या संविधान की किसी आधारभूत विशेषता में परिवर्तन करना मात्र संशोधन माना जा सकता है या यह वस्तुतः संविधान के किसी भाग का पुनर्लेखन होगा; और यदि ऐसा है तो क्या यह अनुच्छेद 368 के दायरे में आएगा?
38. इसके बाद उन्होंने प्रस्तावना के प्रमुख महत्व पर जोर दिया:
संविधान में संशोधन के तीन तरीके बताए गए हैं और यह मानते हुए कि अनुच्छेद 368 के प्रावधान संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्रदान करते हैं, फिर भी इस बात पर विचार करना होगा कि जब तक प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया जाता, तब तक संविधान की किसी भी मूल विशेषता के संबंध में उस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है या नहीं।
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए, जब तक 'संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य' शब्द मौजूद हैं, क्या संविधान में संशोधन करके सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप या उसके गणतांत्रिक स्वरूप को बदला जा सकता है? अगर ऐसा नहीं किया जा सकता, तो जब तक "न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि" शब्द मौजूद हैं, क्या अनुच्छेद 14 से 19, 21, 25, 31 और 32 में उल्लिखित अधिकारों में से किसी को भी छीना जा सकता है? अगर ऐसा नहीं किया जा सकता, तो यह विचारणीय होगा कि क्या उन्हें संशोधित किया जा सकता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रस्तावना हमारे संविधान का अंग नहीं है। लेकिन, मेरा मानना है कि यदि प्रस्तावना की तुलना संविधान की व्यापक विशेषताओं से की जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रस्तावना उन विशेषताओं का सार है, या दूसरे शब्दों में कहें तो, यदि ये विशेषताएँ प्रस्तावना में उल्लिखित अवधारणाओं का विस्तार या ठोस रूप हैं, तो इस पर विचार करना होगा कि क्या प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। इस प्रश्न पर विचार करते समय यह ध्यान रखना प्रासंगिक होगा कि प्रस्तावना विधायिका के अधिनियम जैसी सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इस पर गहन विचार-विमर्श की छाप है और यह सटीकता से चिह्नित है। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि संविधान निर्माताओं ने इसे विशेष महत्व दिया था?
39. अब गोलक नाथ के मामले पर आते हैं, याचिकाकर्ता ने संविधान (सत्र
अब गोलक नाथ के मामले पर आते हैं, याचिकाकर्ता ने संविधान (सत्रहवां संशोधन) अधिनियम, 1964 की वैधता को चुनौती दी थी , जिसमें अन्य अधिनियमों के साथ-साथ नौवीं अनुसूची में पंजाब भूमि अधिग्रहण सुरक्षा अधिनियम, 1953 (1953 का अधिनियम 10) और 1965 के अधिनियम 14 द्वारा संशोधित मैसूर भूमि सुधार अधिनियम (1962 का अधिनियम 10) भी शामिल थे।
40. न्यायालय के समक्ष यह आग्रह किया गया कि शंकरी प्रसाद [1952] एससीआर 89 मामला जिसमें संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 की वैधता और सज्जन सिंह [1965] 1 एससीआर 933 मामला जिसमें संविधान (सत्रहवां संशोधन) अधिनियम की वैधता प्रश्नगत थी, इस न्यायालय द्वारा गलत तरीके से निर्णय दिया गया था।
41. मुख्य न्यायाधीश सुब्बा राव ने स्वयं तथा चार अन्य न्यायाधीशों की ओर से बोलते हुए पृष्ठ 815 पर निष्कर्षों का सारांश इस प्रकार दिया:
उपर्युक्त चर्चा से निम्नलिखित परिणाम निकलते हैं:
(1) संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 245 , 246 और 248 से प्राप्त होती है, न कि अनुच्छेद 368 से , जो केवल प्रक्रिया से संबंधित है। संशोधन एक विधायी प्रक्रिया है।
(2) संशोधन संविधान के अनुच्छेद 13 के अर्थ में 'कानून' है और इसलिए, यदि यह इसके भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनता है या कम करता है, तो यह शून्य है।
(3) संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 , संविधान (चतुर्थ संशोधन) अधिनियम, 1955 और संविधान (सत्रहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1964 , मौलिक अधिकारों के दायरे को सीमित करते हैं। लेकिन, इस न्यायालय के पूर्व निर्णयों के आधार पर, ये वैध थे।
(4) 'संभावित ओवर-' के सिद्धांत के अनुप्रयोग पर
जैसा कि हमने पहले स्पष्ट किया है, 'हमारे निर्णय का केवल भावी प्रभाव होगा और इसलिए, उक्त संशोधन वैध बने रहेंगे।
(5) हम घोषणा करते हैं कि इस निर्णय की तिथि से संसद को संविधान के भाग III के किसी भी प्रावधान को संशोधित करने की कोई शक्ति नहीं होगी, जिससे उसमें निहित मौलिक अधिकारों को छीना या कम किया जा सके।
(6) जैसा कि संविधान (सत्रहवां संशोधन) अधिनियम लागू है, दो विवादित अधिनियमों अर्थात् पंजाब भूमि अधिग्रहण सुरक्षा अधिनियम X, 1953 और मैसूर भूमि सुधार अधिनियम X, 1962, जिसे 1965 के अधिनियम XIV द्वारा संशोधित किया गया था, की वैधता पर इस आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि वे संविधान के अनुच्छेद 13 , 14 या 31 का उल्लंघन करते हैं।
42. यह ध्यान में रखना होगा कि ये निष्कर्ष तत्कालीन संविधान के आलोक में दिए गए थे, अर्थात जब संविधान में अनुच्छेद 13(2) विद्यमान था। तब अनुच्छेद 13(2) में संशोधन करने या स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन करने की संसद की शक्तियों के संबंध में अनुच्छेद 368 के दायरे का निर्धारण करना आवश्यक नहीं था । अब इन्हीं बिंदुओं पर निर्णय लिया जाना है।
43. यह भी देखा जा सकता है कि मुख्य न्यायाधीश ने इस तर्क पर कोई राय व्यक्त करने से इनकार कर दिया कि संशोधन की शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद संविधान के मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती, बल्कि इसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए मूल दस्तावेज के ढांचे के भीतर इसके प्रावधानों को संशोधित कर सकती है।
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