Dr. Bhimrao Ambedkar, Law University, Jaipur Constitutional Law 1
संवैधानिक विधि पेपर 1
पाठ्यक्रम
यूनिट I - संविधान की मुख्य विशेषताएं
1.1 भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं
1.2 भारतीय संघवाद की प्रकृति
1.3 प्रस्तावना - अर्थ और विषय-वस्तु, उद्देश्य, प्रयोजन, कार्यक्षेत्र; संविधान की व्याख्या में प्रस्तावना की उपयोगिता।
1.4 संघ और उसका राज्य क्षेत्र (अनुच्छेद 1 से 4) राष्ट्र की सीमाओं का निर्धारण।
1.5 नागरिकता (अनुच्छेद 5 से 11) नागरिकता अधिनियम 1955 (समय-समय पर संशोधित) सहित।
यूनिट II - मौलिक अधिकार
संविधान का भाग-III
(राज्य और समानता का सिद्धांत)
2.1 अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा।
2.2 न्यायिक समीक्षा पृथक्करणीयता का सिद्धांत, ग्रहण का सिद्धांत, और परित्याग का सिद्धांत - (अनुच्छेद 13)।
2.3 समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) अवधारणाएं, तर्कसंगत वर्गीकरण और मनमानेपन का निषेध।
2.4 अनुच्छेद 15 के तहत भेदभाव का निषेध।
2.5 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16) - अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17) और उपाधियों का अंत (अनुच्छेद 18)।
यूनिट-III: स्वतंत्रता का अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार
3.1 स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19) विचार और अभिव्यक्ति की आज़ादी सहित छह स्वतंत्रताएं।
3.2 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20) (दोहरे दंड और आत्म-दोषारोपण से मुक्ति)।
3.3 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण (अनुच्छेद 21), शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A)।
3.4 गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद 22)।
3.5 शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24) मानव तस्करी और बाल श्रम का निषेध।
यूनिट - IV - धार्मिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक अधिकार, संवैधानिक उपचार और नीति निदेशक तत्व
4.1 धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 से 28)
4.2 शैक्षिक और सांस्कृतिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30) अनुच्छेद 31A, 31B व 31C सहित।
4.3 संवैधानिक उपचार (अनुच्छेद 32- से 35) रिट के माध्यम से अधिकारों का प्रवर्तन।
4.4 राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 36 से 51) - मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A)।
4.5 संपत्ति का संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 300A)।
प्रमुख वाद (LEADING CASES) -
1. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1978) मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन।
2. मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) - अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या (विदेश जाने का अधिकार)।
3. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973), मूल ढांचे' (Basic Structure) का ऐतिहासिक सिद्धांत।
4. ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950), व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर शुरुआती संकुचित व्याख्या।
5. जस्टिस KS पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में।
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भारत का संविधान -
भारत के संविधान का इतिहास - भारत के संविधान का इतिहास कुछ वर्षों की मेहनत नहीं, बल्कि सदियों के संघर्ष और विकास का परिणाम है। इसका विकास दो चरणों में हुआ -
1. ब्रिटिश शासन के समय बनाए गए नियम
2. संविधान सभा द्वारा तैयार किया गया संविधान।
1. ब्रिटिश शासन के दौरान विकास (1773 से 1947) -
भारतीय संविधान की नींव ब्रिटिश काल के विभिन्न कानूनों में छिपी है, जिन्होंने धीरे-धीरे शासन का ढांचा तैयार किया। इस से पहले राज, नवाब, बादशाह, शासक अपने नियम अपनी मर्जी से चलाता था जो अलिखित होते थे। कुछ शासकों ने धर्म और मान्यताओं के आधार पर शासन किया।
सन 1757 में बंगाल पर और उसके बाद भारत पर अंग्रेजों का कब्जा हुआ जिससे 1947 में मुक्ति मिली। इन 190 वर्ष में अंग्रेजों ने भारत को आर्थिक रूप से कंगाल परन्तु सामाजिक और कानूनी रूप से धनवान बना दिया। इस अवधि में अंग्रेज भारत में सीपीसी,सीआरपीसी, एविडेंस एक्ट, संविदा अधिनियम सहित भिन्न - भिन्न तरह के 19 अधिनियम/चार्टर ले कर आए ।
यही चार्टर स्वतंत्र भारत के संविधान की नींव बने। इनमें से मुख्य नियम/चार्टर/अधिनियम निम्नानुसार हैं -
I. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 - यह एक्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार का पहला कदम था।
II. चार्टर अधिनियम, 1833 और 1853 - प्रशासन के केंद्रीकरण और सिविल सेवाओं की शुरुआत की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास।
III. भारत सरकार अधिनियम, 1858 - 1857 के विद्रोह के बाद शासन कंपनी से छीनकर सीधे ब्रिटिश क्राउन (महाराज/महारानी) के हाथों में चला गया।
IV. भारत शासन अधिनियम,1935 - भारत में संवैधानिक विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव भारत शासन अधिनियम 1935 था। हमारे वर्तमान संविधान का लगभग 60% से अधिक भाग इसी अधिनियम पर आधारित है। भारत सरकार अधिनियम में संघीय व्यवस्था और शक्तियों के विभाजन की रूपरेखा तय की गई।
V. कैबिनेट मिशन1946 - इसके बाद माउंटबेटन योजना के अनुसार भारत स्वतंत्रता अधिनियम लाया गया।
2. संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण, 1946 - 1950 - भारत की स्वंतत्रता से पहले ही यहां के नेताओं ने संविधान के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
I. संविधान सभा के गठन से पूर्व - इस हेतु वर्ष 1934 में एम.एन. रॉय ने संविधान सभा के द्वारा संविधान निर्माण का विचार कांग्रेस के समक्ष प्रतुत किया क्योंकि 26 जनवरी 1930 को जवाहरलाल नेहरू लाहौर में पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा कर चुके थे, जिसके अनुसार देश का शासन संचालित करने हेतु संविधान की आवश्यकता पर चर्चा होने लगी।
II. संविधान सभा के सदस्य - संविधान सभा के गठन के समय इसके 389 सदस्य थे, भारत विभाजन के बाद 90 सदस्य पाकिस्तान की संविधान सभा में चले गए, (भारत में विभाजन के बाद 299 सदस्य बचे)।
III. नेहरू समिति - एम.एन. रॉय के सुझावों के अनुसार मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में संविधान निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ जिसे बाद में नेहरू रिपोर्ट के नाम से जाना गया।
III. संविधान सभा का गठन - कैबिनेट मिशन योजना (1946) के तहत संविधान सभा का गठन हुआ। इसकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
IV. संविधान सभा में महत्वपूर्ण समितियाँ - संविधान सभा में प्रारूप समिति समिति सब से महत्वपूर्ण समिति थी, जिसके अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर को बनाया गया जो आगे चलकर भारतीय संविधान के जनक कहलाए।
V. संविधान निर्माण हेतु समय एवं धन की लागत - संविधान निर्माण का काम 65 लाख रुपए की लागत (मीटिंग, डिजाइन, लेखन सहित) से 9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक 2 वर्ष ग्यारह महीने और अट्ठारह दिन (2 Years, 11 Months & 18 Days) में पूर्ण हुआ जो बाद में 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
VI. भारत का संविधान कुछ तथ्य -
I. प्रथम बैठक - 9 दिसंबर 1946 को हुई बैठक की अध्यक्षता (अस्थाई)- सच्चिदानंद सिन्हा।
II. द्वितीय बैठक - 11 दिसंबर 1946 डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष चुने गए
III. तृतीय बैठक - 13 दिसंबर 1946 जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
IV. चतुर्थ बैठक - 26 नवंबर 1949 संविधान बनकर तैयार हुआ और अपनाया गया (संविधान दिवस)
V. पंचम बैठक - 24 जनवरी 1950 अंतिम बैठक और सदस्यों के हस्ताक्षर।
VI. 26 जनवरी 1950 भारत में संविधान पूर्ण रूप से लागू। (गणतंत्र दिवस)
हमारा संविधान -
हमारा संविधान विश्व का सबसे विस्तृत एवं अद्वितीय संविधान है जो सरकार के ढांचे को परिभाषित करते हुए नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का विस्तृत विवरण देता है।
संविधान की प्रमुख विशेषताएं -
1. सबसे लंबा - लिखित संविधान -
भारत का संविधान विश्व का सबसे विशाल लिखित संविधान है। मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं जिनमें वर्तमान हुए संशोधनों के बाद 470 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हो गईं। संविधान के इस विस्तृत रूप का कारण यहां की भौगोलिक विविधता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।
2. विभिन्न स्रोतों से निर्मित - संविधान निर्माताओं ने विश्व के लगभग 60 देशों के संविधानों का अध्ययन कर भारत की परिस्थितियों के अनुकूल प्रावधान उन्हें अपनाया -
I. ब्रिटेन - संसदीय प्रणाली एवं कानून का शासन।
II. अमेरिका - मौलिक अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता।
III. आयरलैंड - राज्य के नीति निर्देशक तत्व।
3. कठोरता और लचीलेपन का मिश्रण - भारतीय संविधान न तो बहुत कठोर है (जैसे अमेरिका का) और न ही बहुत लचीला (जैसे ब्रिटेन का)। इसके कुछ हिस्सों को संसद के साधारण बहुमत से बदला जा सकता है, जबकि कुछ हिस्सों के लिए विशेष बहुमत और आधे राज्यों की सहमति की आवश्यकता होती है।
4. एकात्मकता की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था - संविधान भारत को राज्यों का संघ घोषित करता है। इसमें संघीय विशेषताएं मौजूद हैं (जैसे दो स्तर की सरकारें, शक्तियों का विभाजन), लेकिन केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है, विशेषकर आपातकाल के दौरान।
5. संसदीय शासन प्रणाली - भारत ने ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय प्रणाली को अपनाया है। इसमें राष्ट्रपति नाममात्र का राजप्रमुख (महामहिम शून्य) होता है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के पास होती हैं, जो लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
6. मौलिक अधिकार और कर्तव्य -
I. मौलिक अधिकार - संविधान के भाग III के अनुच्छेद 12 से 35 में नागरिकों को 6 (पहले सात) मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जो न्यायसंगत हैं।
II. मौलिक कर्तव्य - 42वें संविधान संशोधन 1976 (मिनी संविधान) द्वारा नागरिकों के लिए 11 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
7. स्वतंत्र और एकीकृत न्यायपालिका - भारत में एकीकृत न्यायपालिका प्रणाली है। शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय जिसके अधीन उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय आते हैं। न्यायपालिका को कार्यपालिका के प्रभाव से स्वतंत्र रखा गया है।
8. धर्मनिरपेक्ष राज्य - संविधान के अनुसार भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। इसका अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों को समान संरक्षण प्रदान करता है।
9. एकल नागरिकता - अमेरिका जैसे देशों में दोहरी नागरिकता होती है परन्तु भारत में एकल नागरिकता है - भारत की नागरिकता। यह देश की एकता एवं अखंडता को मजबूत करने हेतु किया गया है।
भारत के संविधान की संघीय (Federal) प्रवृति -
भारतीय संविधान की संघीय प्रकृति को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दुनिया का अनूठा उदाहरण है जहाँ संघवाद और एकात्मकता का अद्भुत मिलन दिखता है। के.सी. ह्वियर ने इसे अर्ध - संघीय प्रवृति कहा है।
भारत के संविधान की संघीय विशेषताएं - यूनियन (Fadeation) शब्द कनाडा के संविधान से लिया गया।
इसमें राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं होता, संघ राज्यों के नाम सीमा और अन्य संशोधन कर सकता है।
1. शक्तियों का विभाजन - संघीय व्यवस्था की पहली शर्त शक्तियों का बँटवारा है। हमारे संविधान की सातवीं अनुसूची में शक्तियों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया है -
I. संघ सूची - रक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, बंदरगाह, बीमा, राज्यों का गठन एवं सीमा, रेल, वायु सेवा जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय।
II. राज्य सूची - पुलिस, कृषि, स्थानीय शासन जैसे क्षेत्रीय विषय।
III. समवर्ती सूची - शिक्षा, चिकित्सा, वन, विवाह जैसे विषय जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
2. संविधान में व्यवस्थाओं का लिखित प्रारूप -भारत का संविधान लिखित है, जो केंद्र व राज्यों के बीच किसी भी प्रकार के भ्रम को रोकता है। यह देश का सर्वोच्च कानून है जिसका केंद्र और राज्य सरकारें उल्लंघन नहीं कर सकती।
3. दोहरी सरकार - संविधान ने दो स्तरों पर सरकार की स्थापना की है -
1. केंद्र (संघ) सरकार
2. (राज्य) सरकार
दोनों सरकारों की अपनी सीमा और अपना क्षेत्राधिकार है। दोनों ही सरकार संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का उपयोग स्वतंत्रता पूर्वक करती हैं।
4. स्वतंत्र न्यायपालिका - संघीय ढांचे की रक्षा हेतु स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है। भारत का उच्चतम न्यायालय केंद्र और राज्यों के बीच होने वाले विवादों को सुलझाने हेतु अंतिम निर्णायक के रूप में कार्य करता है।
5. एकात्मकता की ओर झुकाव - यद्यपि भारत का संविधान संघीय प्रवृति का है, इसके कुछ प्रावधान केंद्र की ओर झुकाते हैं, इसीलिए इसे राज्यों का संघ कहा जाता है -
6. सशक्त केंद्र - अवशिष्ट शक्तियां केंद्र के पास हैं।
7. एकल नागरिकता - अमेरिका के विपरीत, भारत में राज्यों की अलग नागरिकता नहीं है।
8. राज्यपाल की नियुक्ति - केंद्र द्वारा राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है, जो केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
9 आपातकालीन प्रावधान - आपातकाल के समय पूरा ढांचा एकात्मक हो जाता है और केंद्र सर्वशक्तिमान बन जाता है।
10. अखिल भारतीय सेवाएँ - IAS/IPS केडर का चयन केंद्र (संघ लोक सेवा आयोग) करता है, लेकिन यह राज्यों के लिए कार्य करते हैं।
निष्कर्ष - डॉ. बी.आर. अंबेडकर के शब्दों में, भारतीय संविधान को समय और परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुसार संघीय और एकात्मक दोनों रूपों में ढाला जा सकता है। यह सहयोगी संघवाद (Cooperative Federalism) पर आधारित है।
भारत के संविधान की प्रस्तावना (Preamble) -
भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान का वह प्रवेश द्वार है, जो इसके आदर्शों, दर्शन और उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। इसे संविधान की आत्मा और कुंजी भी कहा जाता है।
1. अर्थ और विषय-वस्तु - प्रस्तावना संविधान के परिचय या भूमिका को कहते हैं। इसमें उस बुनियादी दर्शन और मूल्यों का संक्षिप्त विवरण होता है जिन पर संविधान टिका है।
प्रस्तावना की विषय-वस्तु के चार तत्व -
I. सत्ता का स्रोत - "हम भारत के लोग..." यह स्पष्ट करता है कि संविधान की शक्ति का अंतिम स्रोत भारत की जनता में निहित है।
II. भारतीय राज्य की प्रकृति - यह भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित करता है।
III. संविधान के उद्देश्य - न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व सुनिश्चित करना।
IV. अपनाने की तिथि - 26/11/ 1949
2. उद्देश्य और प्रयोजन - प्रस्तावना संविधान के उन महान लक्ष्यों को रेखांकित करती है जिन्हें हासिल करने के लिए पूरा संविधान बनाया गया है -
I. न्याय - सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करना।
II. स्वतंत्रता - विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की आजादी।
III. समता - प्रतिष्ठा और अवसर की समानता।
IV. बंधुत्व - व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली भाईचारे की भावना।
3. कार्यक्षेत्र - प्रस्तावना का कार्यक्षेत्र व्यापक है। यह केवल एक औपचारिक हिस्सा नहीं है, बल्कि -
I. यह शासन प्रणाली के बुनियादी ढांचे को परिभाषित करता है।
II. यह नीति-निर्माताओं हेतु मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में कार्य करता है।
III. यह विधायिका की शक्तियों पर नैतिक सीमाएं आरोपित करता है।
4. संविधान की व्याख्या में प्रस्तावना की उपयोगिता - न्यायपालिका ने विभिन्न मामलों में यह माना है कि संविधान की व्याख्या में प्रस्तावना की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है:
I. संविधान की व्याख्या की कुंजी - जब संविधान के किसी अनुच्छेद की भाषा अस्पष्ट या संदिग्ध हो, तो न्यायालय उसके वास्तविक अर्थ को समझने के लिए प्रस्तावना का सहारा लेते हैं।
II. संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा - केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और यह संविधान के बुनियादी ढांचे का प्रतिनिधित्व करती है।
III. आदर्शों का दर्पण - यह जजों को यह समझने में मदद करती है कि किसी कानून का उद्देश्य संविधान निर्माताओं की मूल भावना के अनुरूप है या नहीं।
IV. लोक कल्याणकारी राज्य की दिशा - प्रस्तावना न्यायालयों को मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन बनाने में मदद करती है ताकि 'सामाजिक न्याय' का उद्देश्य पूरा हो सके।
निष्कर्ष - यद्यपि प्रस्तावना स्वयं न्यायालय में लागू करने योग्य नहीं है, परन्तु यह संविधान का सबसे कीमती हिस्सा है। यह वह पैमाना है जिससे संविधान की शुद्धता और शासन की नैतिकता को मापा जाता है।
संघ और उसका राज्य क्षेत्र भाग 01 अनुच्छेद 01 से 04-
भारतीय संविधान का भाग-1 (अनुच्छेद 1 से 4) संघ और उसके राज्य क्षेत्र से संबंधित है। यह भाग भारत की भौगोलिक सीमाओं, राज्यों के गठन और संसद की सीमाओं के निर्धारण की शक्ति को परिभाषित करता है।
01. अनुच्छेद 1 - संघ का नाम और राज्य क्षेत्र - अनुच्छेद 1 स्पष्ट करता है कि भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ (Union of States) होगा।
नाम - देश के दो आधिकारिक नाम बताए गए हैं—भारत और INDIA.
राज्यों का संघ - डॉ. अंबेडकर के अनुसार, राज्यों का संघ शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है (जैसा कि अमेरिका में है), और किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।
राज्य क्षेत्र में शामिल हैं -
I. राज्यों के क्षेत्र
II. संघ राज्य क्षेत्र
III. ऐसे क्षेत्र जो भविष्य में भारत सरकार द्वारा अधिगृहीत किए जाएं।
अनुच्छेद 2 - नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना - यह अनुच्छेद संसद को दो प्रकार की शक्तियाँ देता है -
I. विलय - नए राज्यों को संघ में शामिल करने की शक्ति (जो पहले से मौजूद हैं लेकिन भारत का हिस्सा नहीं हैं)।
II. नव गठन - नए राज्यों को स्थापित करने की शक्ति (जो पहले से अस्तित्व में नहीं थे)।
उदाहरण - 36वें संविधान संशोधन (1975) द्वारा सिक्किम को भारतीय संघ का पूर्ण राज्य बनाया गया।
03. अनुच्छेद 3 - नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन की शक्ति - यह अनुच्छेद भारत के आंतरिक पुनर्गठन से संबंधित है। संसद विधि द्वारा -
I. किसी राज्य में से उसका राज्यक्षेत्र अलग करके या दो या अधिक राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है।
II. किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ा या घटा सकती है।
III. किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
IV. किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकती है।
V. किसी राज्य के नाम में परिवर्तन
इस हेतु राष्ट्रपति संसद को सिफारिश करने से पहले राज्य की विधानसभा से राय अवश्य मांगते हैं जो बाध्यकारी नहीं है।
प्रक्रिया - इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक है। राष्ट्रपति संबंधित राज्य के विधानमंडल को उनके विचार जानने के लिए विधेयक भेजते हैं, लेकिन संसद उन विचारों को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
अनुच्छेद 4 - पहली और चौथी अनुसूची के संशोधन के लिए अनुपूरक मामले - यह अनुच्छेद घोषित करता है कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत अनुच्छेद 2 या 3 के तहत बनाया गया कोई भी कानून संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा।
अर्थ - इसका मतलब है कि राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन या नए राज्यों का गठन संसद द्वारा साधारण बहुमत से किया जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती।
राष्ट्र की सीमाओं का निर्धारण - भारत की सीमाओं का निर्धारण ऐतिहासिक समझौतों और संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से होता है -
I. आंतरिक सीमाएं - अनुच्छेद 3 के तहत संसद को पूर्ण शक्ति है कि वह भारत का राजनीतिक मानचित्र बदल सके।
उदाहरण - वर्ष 2019 में जम्मू कश्मीर राज्य का विघटन कर जम्मू, कश्मीर एवं लद्दाख तीन पृथक - पृथक क्षेत्र बनाए गए।
II. बाहरी सीमाएं (अधिग्रहण) - भारत एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत विदेशी क्षेत्रों का अधिग्रहण कर सकता है (जैसे गोवा, पुदुचेरी का पुर्तगाल से अधिग्रहण।
III. क्षेत्र का हस्तांतरण - बेरुबारी यूनियन मामले (1960) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि भारत अपना कोई क्षेत्र किसी दूसरे देश को सौंपता है, तो इसके लिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन अनिवार्य है (जैसे 100वाँ संशोधन—भारत-बांग्लादेश सीमा समझौता)।
IV. अनुच्छेद 4(2) - के अनुसार संसद द्वारा बनाए गए ऐसे कानून पहली अनुसूची (राज्य व केंद्र शासित प्रदेश) चौथी अनुसूची (राज्यसभा में प्रतिनिधित्व) में आवश्यक संशोधन कर सकते हैं जो अनुच्छेद 368 के अनुसार संविधान में संशोधन नहीं माने जाएंगे। यह परिवर्तन साधारण बहुमत से किए जा सकेंगे।
भाग II
नागरिकता
भारत में नागरिकता - भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता के संबंध में प्रावधान दिए गए हैं। यह समझना जरूरी है कि संविधान केवल उन लोगों की पहचान करता है जो 26 जनवरी, 1950 (संविधान लागू होने के समय) भारत के नागरिक बने। भविष्य में नागरिकता के अधिग्रहण और समाप्ति के लिए कानून बनाने का अधिकार संसद को दिया गया है।
भारतीय नागरिकता - अनुच्छेदवार विवरण -
(05) अनुच्छेद 5, संविधान लागू होने तक अधिवास (Domicile) से नागरिकता - संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी, 1950), प्रत्येक व्यक्ति जिसका भारत के राज्यक्षेत्र में अधिवास था और जो निम्न तीन शर्तों में से कोई एक को पूरा करता था, वह भारत का नागरिक बना -
I. उसका जन्म भारत में हुआ हो।
II. उसके माता-पिता में से किसी एक का जन्म भारत में हुआ हो।
III. वह संविधान लागू होने से ठीक पहले कम से कम 5 वर्षों तक भारत में सामान्य रूप से निवासी रहा हो।
(06) अनुच्छेद 6 - पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता - यह उन लोगों के लिए है जो विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए। उन्हें दो श्रेणियों में बांटा गया -
I. 19 जुलाई, 1948 से पहले आने वाले - यदि वे तब से भारत में सामान्य रूप से निवास कर रहे हैं।
II. 19 जुलाई, 1948 को या उसके बाद आने वाले - उन्हें पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता मिल सकती थी, बशर्ते वे आवेदन से पहले 6 महीने भारत में रहे हों।
अनुच्छेद 7 - पाकिस्तान जाने वाले प्रवासियों की नागरिकता - यदि कोई व्यक्ति 1 मार्च, 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चला गया, तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो गई। हालाँकि, यदि वह व्यक्ति पुनर्वास परमिट के तहत वापस भारत लौट आया, तो वह अनुच्छेद 6 के तहत नागरिकता का पात्र बन गया।
अनुच्छेद 8 - भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों की नागरिकता - यह उन लोगों के लिए है जो भारत के बाहर (जैसे विदेश में) रह रहे थे, लेकिन जिनके माता-पिता या दादा-दादी अविभाजित भारत में पैदा हुए। वे भारतीय राजनयिक प्रतिनिधि के पास पंजीकरण कराकर भारत के नागरिक बन सकते थे।
नागरिकता की निरंतरता और संसद की शक्ति - संविधान ने संसद को नागरिकता संबंधी शक्तियां प्रदान की हैं -
अनुच्छेद 9. विदेशी नागरिकता स्वेच्छा से लेने पर नागरिकता का अंत - यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी। भारत एकल नागरिकता के सिद्धांत का पालन करता है।
अनुच्छेद 10. नागरिकता के अधिकारों की निरंतरता - प्रत्येक व्यक्ति, जो इस भाग के पूर्वगामी प्रावधानों के तहत भारत का नागरिक है, वह नागरिक बना रहेगा, बशर्ते संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन हो।
अनुच्छेद 11: संसद को नागरिकता के अधिकार को विनियमित करने की शक्ति - यह सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद है। यह संसद को नागरिकता के अधिग्रहण (Acquisition) और समाप्ति (Termination) के संबंध में कानून बनाने की पूर्ण शक्ति देता है। इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 पारित किया।
सारांश, नागरिकता -
5. अधिवास द्वारा संविधान लागू होने के समय पांच वर्ष तक भारत में निवास।
6. पाकिस्तान से भारत आने वाले व्यक्तियों के अधिकार।
7. पाकिस्तान जाकर वापस लौटने वाले व्यक्तियों के अधिकार।
8. भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIO) के अधिकार।
9. विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता का लोप।
10. नागरिकता अधिकारों का बना रहना।
11. संसद को नागरिकता पर कानून बनाने की शक्ति।
नागरिकता अधिनियम 1955 - संसद ने संविधान के अनुच्छेद 11 द्वारा मिली शक्ति का प्रयोग करते हुए नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया। इस अधिनियम के तहत भारत की नागरिकता प्राप्त करने के 5 प्रमुख तरीके बताए गए हैं -
1. जन्म के आधार पर (By Birth)
I. 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 - भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति भारतीय नागरिक माना जाएगा, चाहे उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी हो।
II. 1 जुलाई 1987 - 3 दिसंबर 2004 - जन्म के समय माता-पिता में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है।
III. 3 दिसंबर 2004 के बाद - माता-पिता दोनों भारतीय हों, या कम से कम एक भारतीय हो परन्तु दूसरा अवैध प्रवासी न हो।
2. वंश के आधार पर - (By Descent)
भारत के बाहर (अन्य देश में) जन्म लेने वाले व्यक्ति भारत के नागरिक होंगे यदि -
I. 26 जनवरी 1950 - 10 दिसंबर 1992 - यदि जन्म के समय उसका पिता भारत का नागरिक था।
II. 10 दिसंबर 1992 के बाद - यदि जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो।
III. 3 दिसंबर 2004 के बाद - विदेश में जन्म लेने वाले बच्चे का 1 वर्ष के भीतर भारतीय दूतावास (Consulate) में पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
3. पंजीकरण द्वारा - केंद्र सरकार आवेदन करने पर किसी व्यक्ति को नागरिक के रूप में पंजीकृत कर सकती है, यदि वह -
I. भारतीय मूल का व्यक्ति हो और आवेदन से पहले 7 वर्ष से भारत में रह रहा हो।
II. ऐसा व्यक्ति जिसने किसी भारतीय नागरिक से विवाह किया हो और वह पंजीकरण से पहले 7 वर्ष से भारत में रह रहा हो।
III. भारतीय नागरिकों के नाबालिग बच्चे।
4. प्राकृतिककरण या देशीयकरण द्वारा (By Naturalization) - यह विदेशी नागरिकों के लिए है। इसके लिए कुछ शर्तें हैं -
I. वह व्यक्ति अवैध प्रवासी न हो।
II. वह आवेदन से पहले कम से कम 12 साल (कुल मिलाकर) भारत में रहा हो।
III. वह संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्णित किसी एक भाषा का अच्छा ज्ञाता हो।
IV. उसका चरित्र अच्छा हो और वह अपनी पिछली नागरिकता त्यागने को तैयार हो।
5. क्षेत्र समावेश द्वारा - (By Incorporation of Territory)
यदि कोई नया विदेशी क्षेत्र भारत का हिस्सा बन जाता है, तो भारत सरकार यह निर्धारित करती है कि उस क्षेत्र के कौन से लोग भारत के नागरिक होंगे।
उदाहरण - पांडिचेरी भारत का हिस्सा बना, तो भारत सरकार ने नागरिकता (पांडिचेरी) आदेश, 1962 जारी किया।
नागरिकता की समाप्ति (Loss of Citizenship) - अधिनियम में नागरिकता खोने के भी तीन तरीके बताए गए हैं:
I. नागरिकता त्याग (Renunciation) - अपनी मर्जी से नागरिकता छोड़ देना।
II. समाप्ति (Termination) - यदि कोई स्वेच्छा से किसी दूसरे देश की नागरिकता ले ले तो भारत की नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
III. वंचना (Deprivation) - यदि सरकार को पता चले कि नागरिकता धोखाधड़ी से ली गई है या व्यक्ति ने संविधान के प्रति अनादर दिखाया है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (CAA) - भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 में किया गया एक महत्वपूर्ण बदलाव है। यह कानून नागरिकता देने की प्रक्रिया को आसान बनाता है, न कि किसी की नागरिकता छीनने की प्रक्रिया को।
CAA के प्रावधान -
1. लक्षित समूह (Target Group) - भारत के तीन पड़ोसी देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों-
I हिंदू
II. सिख
III. बौद्ध
IV. जैन
V. पारसी
VI. ईसाई
(सामान्य अर्थ में वह मुस्लिम न हो) भारत का नागरिक बन सकता है।
2. समय सीमा (Cut-off Date) - नागरिकता हेतु पात्रता बाबत इन समुदायों के व्यक्तियों को 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश किया होना चाहिए।
3. अवैध प्रवासी - अवैध प्रवासी की परिभाषा में ढील दी गई है। सामान्यतः, बिना वैध दस्तावेजों के भारत में रहने वाले लोगों को अवैध प्रवासी माना जाता है और उन्हें नागरिकता नहीं मिल सकती। लेकिन CAA के तहत, उपरोक्त देशों से आए उक्त धर्मों के लोगों को अब भारत में अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा, भले ही उनके पास पासपोर्ट या वीजा न हो।
4. प्राकृतिककरण की अवधि में कमी -
I. सामान्य नियम - किसी विदेशी को नागरिकता के लिए कम से कम 11 वर्ष भारत में रहना अनिवार्य है।
CAA के तहत - इन विशेष श्रेणियों के लिए इस अवधि को घटाकर केवल 5 वर्ष कर दिया गया है।
5. CAA के लागू होने के अपवाद -
यह कानून पूरे भारत में लागू है, लेकिन कुछ क्षेत्रों को इससे छूट दी गई है:
I. छठी अनुसूची के क्षेत्र - असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के वे आदिवासी क्षेत्र जो संविधान की छठी अनुसूची में शामिल हैं।
II. इनर लाइन परमिट (ILP) - जिन राज्यों में इनर लाइन परमिट लागू है (जैसे अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड और मणिपुर), वहाँ यह कानून लागू नहीं होता।
6. (OCI) कार्डधारकों के लिए प्रावधान - यदि कोई OCI (Overseas Citizen of India) कार्ड धारक भारत के किसी कानून का उल्लंघन करता है, तो केंद्र सरकार के पास उसका कार्ड रद्द करने की शक्ति होगी, हालांकि उसे अपनी बात रखने का मौका दिया जाएगा।
CAA और NRC में अंतर -
∆. CAA, National Citizenship act (राष्ट्रीय नागरिकता कानून) - यह उन लोगों को नागरिकता देने का कानून है जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हैं।
II. NRC - National Population Register (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) - यह भारत के वैध नागरिकों की पहचान करने की एक प्रक्रिया है ताकि अवैध रूप से रह रहे विदेशियों का पता लगाया जा सके।
नागरिकता से जुड़े वाद (Case Laws)
1. मोहम्मद रज़ा बनाम बॉम्बे स्टेट -
इस मामले में न्यायालय ने अधिवास'/ (Domicile) को स्पष्ट किया।
निर्णय - केवल भारत में रहने से कोई नागरिक नहीं बन जाता। नागरिकता के लिए अधिवास अनिवार्य है, जिसका अर्थ है भारत में रहने का पक्का इरादा। यदि कोई व्यक्ति किसी खास उद्देश्य (जैसे पढ़ाई या नौकरी) हेतु भारत आया है और वापस जाना चाहता है, तो उसे अनुच्छेद 5 के तहत नागरिकता नहीं मिल सकती।
2. लुईस डी रायड बनाम भारत संघ -
यह मामला अनुच्छेद 5 और 11 की व्याख्या करता है।
निर्णय - न्यायालय ने कहा कि विदेशी नागरिकों को भी भारत में रहने का अधिकार है, लेकिन उन्हें नागरिकता का मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार के पास किसी भी विदेशी को बिना कारण बताए देश से निकालने की पूर्ण शक्ति है।
3. इब्राहिम वज़ीर बनाम बॉम्बे राज्य -
यह मामला अनुच्छेद 7 (पाकिस्तान जाने वाले प्रवासियों) से संबंधित है।
निर्णय - कोर्ट ने व्यवस्था दी कि किसी भारतीय नागरिक को केवल इसलिए देश से बाहर नहीं निकाला जा सकता क्योंकि वह बिना परमिट के पाकिस्तान से लौटा है। कानून उसे दंडित कर सकता है, लेकिन उसकी नागरिकता नहीं छीन सकता, जब तक कि प्रक्रिया संवैधानिक न हो।
भारत में नागरिकता सिद्धांत -
विशेष कानूनी सिद्धांत, एकल नागरिकता - भारत में अमेरिका की तरह दोहरी नागरिकता (राज्य की अलग और केंद्र की अलग) नहीं है। चाहे आप राजस्थान के हों या केरल के, आप केवल भारत के नागरिक हैं। यह प्रावधान राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए कनाडा के संविधान से प्रेरित होकर लिया गया है।
नागरिकता अधिनियम, 1955 - भारत में नागरिकता के अर्जन और समाप्ति हेतु संवैधानिक प्रावधान बनाए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 11 ने संसद को यह शक्ति दी कि वह नागरिकता से जुड़े नियम बनाए। अब तक इस अधिनियम में 9 बार संशोधन (1957, 1960, 1985, 1986, 1992, 2003, 2005, 2015 और 2019) किए जा चुके हैं।
1. नागरिकता प्राप्त करने के 5 तरीके -
I. जन्म से नागरिकता संशोधन 1986 - (क)पहले भारत में जन्मा हर बच्चा नागरिक था। अब माता या पिता में से एक का भारतीय होना जरूरी है।
(ख) संशोधन 2003 - माता-पिता में से एक भारतीय हो और दूसरा 'अवैध प्रवासी' न हो। |
II. वंश से (By Descent) संशोधन 1992 - पहले केवल पिता के आधार पर नागरिकता मिलती थी, अब माता के भारतीय होने पर भी विदेश में जन्मा बच्चा नागरिक बन सकता है। |
III. पंजीकरण (Registration) - भारतीय मूल के लोग या भारतीय नागरिकों से विवाह करने वाले विदेशी आवेदन कर सकते हैं। |
IV. देशीयकरण (Naturalization) - कोई भी विदेशी जो 12 साल (CAA के बाद बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तानी अल्पसंख्यकों हेतु 5 वर्ष) से भारत में रह रहा हो। |
V. क्षेत्र समावेशन - यदि भारत किसी नए भू-भाग (जैसे सिक्किम, गोवा) को अपने में मिलाने पर प्रदत्त नागरिकता।
2. महत्वपूर्ण संशोधन और उनके बिंदु - I. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 - इसका मुख्य उद्देश्य अवैध घुसपैठ (विशेषकर असम में) को रोकना था। जिसके अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि भारत में जन्म लेने मात्र से नागरिकता नहीं मिलेगी; जन्म के समय माता या पिता में से किसी एक का भारत का नागरिक होना अनिवार्य है।
II. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1992 - यह संशोधन लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम था। अब विदेश में पैदा हुए बच्चे को नागरिकता मिल सकती थी यदि उसके माता या पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो (पहले केवल पिता का नागरिक होना आवश्यक था)।
III. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2003 - इसमें अवैध प्रवासी की परिभाषा दी गई। इसी संशोधन के माध्यम से OCI (Overseas Citizen of India, भारत के विदेशी नागरिक कार्ड) की अवधारणा पेश की गई (शुरुआत में केवल 16 देशों के भारतीय मूल के लोगों के लिए)।
IV. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2015 - इस संशोधन के जरिए PIO (Person of Indian Origin) और OCI कार्ड को मिला दिया गया। अब केवल OCI कार्ड ही प्रचलन में है, जो भारतीय मूल के विदेशियों को भारत में आजीवन बिना वीजा के रहने और काम करने की अनुमति देता है।
V. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (CAA) - यह सबसे चर्चित संशोधन है। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के 6 धार्मिक अल्पसंख्यकों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई) को नागरिकता देने के नियमों को सरल बनाया गया है। उनके लिए निवास की समय सीमा 11 साल से घटाकर 5 साल कर दी गई है।
3. नागरिकता की समाप्ति (अनुच्छेद 9 के अनुसार) -
I. स्वेच्छा से परित्याग।
II. समाप्ति - दूसरे देश की नागरिकता लेने पर।
IV. वंचना (Deprivation) - धोखाधड़ी से नागरिकता लेने या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त होने पर सरकार दी गई नागरिकता छीन सकती है।
4. विशेष -
I. धारा 6A - यह विशेष रूप से असम समझौते से संबंधित है, जो अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए एक समय सीमा (कट-ऑफ डेट) तय करती है।
II. अवैध प्रवासी - इस अधिनियम के तहत उन लोगों को नागरिकता नहीं दी जा सकती जो बिना वैध दस्तावेजों के भारत में घुसे हैं (CAA 2019 के अपवादों को छोड़कर)।
यूनिट II - मौलिक अधिकार
संविधान का भाग-III
(राज्य और समानता का सिद्धांत)
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा - अनुच्छेद 12 मौलिक अधिकारों के प्रयोजन हेतु राज्य शब्द की व्यापक परिभाषा प्रदान करता है।
राज्य में कौन-कौन शामिल हैं -
01. केंद्र सरकार
02. राज्य सरकारें
03. भारत की संसद
04. राज्य विधानमंडल
05. भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी स्थानीय प्राधिकरण
06. भारत सरकार के नियंत्रणाधीन अन्य प्राधिकरण
स्थानीय प्राधिकरण (Local Authorities)
01. नगर पालिका
02. नगर निगम
03. पंचायत
04. जिला परिषद
05. कैंटोनमेंट बोर्ड
अन्य प्राधिकरण (Other Authorities)
कानून द्वारा बनाई गई सभी सरकारी नियंत्रण या वित्तीय सहायता प्राप्त सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्थाएं जेसे-
LIC, ONGC, BHEL, AIIMS, UGC, SEBI आदि शामिल हैं।
अनुच्छेद 13 -
अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों से असंगत विधियों को शून्य घोषित करता है और उनकी सर्वोच्चता सुनिश्चित करता है जिसे
मौलिक अधिकारों का रक्षा-कवच कहा जाता है।
अनुच्छेद 13(1) -
पूर्व-संवैधानिक कानून - संविधान लागू होने से पहले बने कानून, यदि वे मौलिक अधिकारों से असंगत हैं, तो वे उस सीमा तक शून्य (Void) होंगे।
अनुच्छेद 13(2) -
राज्य कोई ऐसा कानून नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को घटाए या छीन ले यदि ऐसा कानून बनाया गया तो वह शून्य होगा।
अनुच्छेद13(3)
कानून की परिभाषा में शामिल हैं -
01. अध्यादेश (Ordinance)
02. आदेश (Order)
03. नियम (Rule)
04. अधिसूचना (Notification)
05. उपविधि (Bye-law)
06. प्रथा/रीति (Custom/Usage)
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
अनुच्छेद 13 ही न्यायिक समीक्षा का संवैधानिक आधार है जिसके अंतर्गत न्यायालय यह जाँच कर सकता है कि कोई कानून मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है या नहीं।
संविधान संशोधन और अनुच्छेद 13 में प्रारंभिक विवाद - विवाद यह था कि क्या संविधान संशोधन कानून है?
केशवानंद भारती प्रकरण (1973) के अनुसार संविधान संशोधन मौलिक अधिकारों को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता। संसद मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) के अनुसार संविधान की मूल भावना में परिवर्तन नहीं कर सकती।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पृथक्करणीयता (Doctrine of Severability) (Separation) का सिद्धांत -
न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत पृथक्करणीयता का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी कानून का कोई एक हिस्सा असंवैधानिक है, तो पूरा कानून रद्द नहीं किया जा सकता, केवल उसी हिस्से को हटाया जाए जो संविधान का उल्लंघन करता है।
1. पृथक्करणीयता - अंग्रेजी के Sever शब्द का अर्थ होता है अलग करना। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि किसी अधिनियम (Act) का एक हिस्सा मौलिक अधिकारों या संविधान के किसी प्रावधान के विरुद्ध है, तो न्यायालय उस अवैध हिस्से को वैध हिस्से से अलग कर देता है। यह ठीक उसी प्रकार से काम करता है जैसे शरीर के किसी अंग के खराब होने पर डॉक्टर ऑपरेशन द्वारा खराब अंग काट कर अलग कर देता है न कि पूरे शरीर को समाप्त किया जाता है।
परिणामस्वरूप - केवल वह विशिष्ट भाग शून्य घोषित किया जाता है, शेष कानून प्रभावी बना रहता है।
2. संवैधानिक आधार (Article 13) -
संविधान के अनुच्छेद 13 में इस सिद्धांत के बीज मिलते हैं। अनुच्छेद 13(1) और 13(2) कहते हैं कि कोई भी कानून उस सीमा तक (To the extent of) शून्य होगा जिस तक वह मौलिक अधिकारों के साथ असंगत है।
3. न्यायालय द्वारा लागू करने की शर्तें - न्यायालय किसी कानून को तब ही पृथक करता है जब वह निम्नलिखित शर्तों को पूरा करे -
I. स्वतंत्र अस्तित्व - अवैध हिस्से को हटाने के बाद भी शेष कानून का अपना अर्थ और अस्तित्व बना रहना चाहिए।
II. विधायिका की मंशा - यदि अवैध हिस्सा कानून का वह मुख्य भाग है जिसके बिना शेष कानून का कोई उद्देश्य ही न बचे, तो न्यायालय पूरे कानून को रद्द कर देता है।
4. ऐतिहासिक वाद (Case Laws) -
I. ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य - इस मामले में निवारक निरोध अधिनियम (Preventive Detention Act) की धारा 14 को असंवैधानिक पाया गया। न्यायालय ने पृथक्करणीयता के सिद्धांत का उपयोग करते हुए केवल धारा 14 को रद्द किया और बाकी पूरे अधिनियम को वैध रहने दिया।
II. आर.एम.डी. चमारबागवाला बनाम भारत संघ - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पृथक्करणीयता के लिए कुछ महत्वपूर्ण नियम तय किए। न्यायालय ने कहा कि यदि अवैध हिस्सा कानून के ढांचे से इतना जुड़ा हुआ है कि उन्हें अलग करना संभव नहीं है, तो पूरा कानून रद्द कर दिया जाना चाहिए।
5. पृथक्करणीयता का महत्व (Importance) -
I. विधायिका के कार्य का संरक्षण - यह सिद्धांत संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को पूरी तरह से नष्ट होने से बचाता है।
II. समय और संसाधन की बचत - पूरे कानून को दोबारा बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
III. संवैधानिक संतुलन - यह न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन बनाए रखता है।
न्यायिक ग्रहण(Doctrine of Eclipse) का सिद्धांत -
संविधान में ग्रहण का सिद्धांत रूप से अनुच्छेद 13(1) से जुड़ा है और पूर्व में बने कानूनों (Pre-Constitutional Laws) पर लागू होता है। इसका विस्तृत और सरल विश्लेषण इस प्रकार से है -
1. सिद्धांत का अर्थ - अंग्रेजी शब्द Eclipse का अर्थ होता है ग्रहण। जिस तरह ग्रहण के समय सूर्य या चंद्रमा पूरी तरह नष्ट नहीं होते बल्कि कुछ समय के लिए छिप जाते हैं, वैसे ही यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह पूरी तरह खत्म (Dead) नहीं होता। वह केवल सुषुप्त अवस्था (Dormant) में चला जाता है।
प्रभाव - वह कानून मौलिक अधिकारों द्वारा ढंक लिया जाता है और अप्रभावी हो जाता है।
2. यह कब लागू होता है? - यह सिद्धांत उन कानूनों पर लागू होता है जो संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) से पहले बने थे। यदि संविधान के लागू होने के बाद, कोई पुराना कानून किसी भी मौलिक अधिकार के विरुद्ध पाया जाता है, तो उसे रद्द नहीं किया जाता, बल्कि उस पर ग्रहण लग जाता है।
3. ग्रहण का हटना (Revival of the Law) - यदि भविष्य में संविधान में संशोधन करके उस मौलिक अधिकार को ही बदल दिया जाए या हटा दिया जाए, जिसके कारण कानून पर ग्रहण लगा था, तो वह कानून पुनः जीवित (Active) हो जाता है।
4. ऐतिहासिक वाद (Case Laws)
I. भीखाजी नारायण बनाम मध्य प्रदेश राज्य - यह इस सिद्धांत का सबसे प्रमुख मामला है।
तथ्य - मध्य प्रदेश सरकार ने परिवहन व्यवसाय के राष्ट्रीयकरण के लिए एक कानून बनाया। संविधान लागू होने पर यह कानून व्यापार की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) के विरुद्ध हो गया।
निर्णय - सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून मरा नहीं है, केवल उस पर मौलिक अधिकार का ग्रहण लगा है। बाद में जब संविधान संशोधन द्वारा सरकार को राष्ट्रीयकरण की शक्ति मिल गई, तो वह कानून स्वतः ही प्रभावी हो गया।
II. दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य - इस मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्रहण का सिद्धांत सामान्यतः संविधान लागू होने के बाद बने कानूनों (Post-Constitutional Laws) पर लागू नहीं होता, क्योंकि वे जन्म से ही शून्य (Void ab initio) होते हैं।
5. मुख्य बिंदु -
I. यह केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में लागू होता है।
II. यह कानून को पूरी तरह नष्ट होने से बचाता है।
III. यह मुख्य रूप से अनुच्छेद 13(1) की व्याख्या करता है।
परित्याग का सिद्धांत (Doctrine of Waiver) -
भारतीय संवैधानिक कानून में परित्याग का सिद्धांत एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो यह निर्धारित करती है कि क्या कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से स्वयं के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) को छोड़ सकता है या नहीं?
1. सिद्धांत का अर्थ - Waiver का अर्थ होता है—अपनी मर्जी से किसी अधिकार का त्याग करना। परित्याग का सिद्धांत यह सवाल उठाता है कि यदि कोई नागरिक सरकार के साथ किसी समझौते में यह लिख कर दे दे कि मुझे इस विशेष मौलिक अधिकार की आवश्यकता नहीं है तो क्या वह अधिकार समाप्त हो जाएगा?
2. भारतीय दृष्टिकोण - भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कोई भी नागरिक अपने मौलिक अधिकारों का परित्याग नहीं कर सकता। इसके पीछे तर्क यह है कि मौलिक अधिकार केवल व्यक्ति के फायदे के लिए नहीं हैं, बल्कि वे लोक नीति के आधार पर संविधान में शामिल किए गए हैं। समाज के व्यापक हित में इनका बना रहना अनिवार्य है।
3. संवैधानिक आधार (Article 13) -
अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करता है। न्यायालय का मानना है कि मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी संविधान द्वारा प्रदान की गई है, इसलिए व्यक्ति को इन्हें छोड़ने की अनुमति देना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध होगा।
4. ऐतिहासिक वाद (Case Laws) -
बहराम खुर्शीद बनाम बॉम्बे राज्य - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार संकेत दिया कि मौलिक अधिकार कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं हैं जिन्हें त्याग दिया जाए। यह अधिकार राज्य के ऊपर लगाए गए अंकुश हैं।
बशेश्वर नाथ बनाम आयकर आयुक्त -
निर्णय - संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि भारत में मौलिक अधिकारों के परित्याग का सिद्धांत लागू नहीं होता।
तर्क - भारत में बड़ी आबादी अशिक्षित और गरीब है। यदि अधिकारों के त्याग की अनुमति दी गई, तो शक्तिशाली लोग या सरकार कमजोर लोगों को डरा-धमका कर या लालच देकर उनके अधिकार छीन लेंगे। इसलिए, सुरक्षा हेतु यह अनिवार्य है कि इन्हें त्यागा न जा सके।
5. मौलिक अधिकार परित्याग अमेरिका बनाम भारत
I. अमेरिका - यहाँ नागरिक कुछ परिस्थितियों में अपने संवैधानिक अधिकारों का त्याग कर सकते हैं।
II. भारत - यहाँ लोक नीति और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है, इसलिए त्याग की अनुमति नहीं है।
सारांश -
I. मौलिक अधिकार अनिवार्य हैं, वैकल्पिक नहीं।
II. कोई भी समझौता या संविदा जो मौलिक अधिकारों को छोड़ता हो, वह शून्य माना जाएगा।
III. यह सिद्धांत नागरिकों को खुद की नासमझी या दूसरों के दबाव से बचाता है।
अनुच्छेद 14
अमेरिकी संविधान से लिए गए इस सिद्धांत के अनुसार कानून सबके लिए समान। राज्य किसी के साथ मनमाना व्यवहार न करे और कमजोर वर्गों को न्याय मिले। अलग परिस्थितियों में अलग व्यवहार संवैधानिक रूप से वैध हो सकता है। अनुच्छेद 14 पूर्ण समानता नहीं बल्कि न्यायसंगत समानता की बात करता है।राज्य न्याय हेतु दो शर्तों के आधार पर इस अनुच्छेद का उल्लंघन कर सकता है यदि -
बुद्धिगम्य भेद – वर्गों के बीच स्पष्ट और तार्किक अंतर हो
उद्देश्य से तार्किक संबंध – यह अंतर कानून के उद्देश्य से जुड़ा हो।
कानून के उद्देश्य से जुड़ अंतर्गत वैध अपवाद -
क. राष्ट्रपति व राज्यपाल का सीमित प्रतिरक्षण
ख.सांसदों को सदन में दिए गए वक्तव्यों पर संरक्षण
ग. महिलाओं, बच्चों, पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान
महत्वपूर्ण निर्णय -
I. ई.पी. रॉयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) - मनमानी अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
II. मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) - अनुच्छेद 14, 19 और 21 आपस में जुड़े हुए हैं।
समानता का अधिकार (Equality before Law) -
भारत के संविधान के भाग III में अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार (Right to Equality) दिया गया है। यह लोकतंत्र की आधारशिला है, जिसका उद्देश्य समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाकर हर नागरिक को समान अवसर प्रदान करना है। अनुच्छेद 14 के अनुसार विधि के समक्ष समानता यह ब्रिटिश अवधारणा है। इसका अर्थ है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं, चाहे वह अमीर हो या गरीब, अधिकारी हो या साधारण नागरिक। विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws) अमेरिकी अवधारणा को भारत के संविधान ने गृहित किया है। इसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
समानता के अधिकार की अवधारणा -
भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता के अधिकार की मुख्य अवधारणा को दो भागों में विभाजित किया गया है। ये दोनों अवधारणाएं मिलकर भारत में कानून के शासन (Rule of Law) को मजबूती प्रदान करती हैं।
1. विधि के समक्ष समानता (Equality Before Law) - यह अवधारणा ब्रिटिश मूल की है और इसे एक नकारात्मक अवधारणा माना जाता है क्योंकि यह किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशेष विशेषाधिकारों के अभाव पर जोर देती है।
अवधारणा के बिंदु -
I. कानून की नजर में सभी व्यक्ति समान हैं, चाहे वे अमीर हों या गरीब, ऊंचे हों या नीचे।
II. कोई भी व्यक्ति देश के कानून से ऊपर नहीं है।
III. किसी भी व्यक्ति को जन्म, पद या स्थिति के आधार पर विशेष छूट नहीं दी जाएगी।
IV. सभी व्यक्ति सामान्य न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
2. विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws) - यह अवधारणा अमेरिकी संविधान से ली गई है और इसे एक सकारात्मक अवधारणा माना जाता है। यह इस विचार पर आधारित है कि समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
अवधारणा के बिंदु -
I. समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ समान कानून लागू होना चाहिए।
II. यह अवधारणा तर्कसंगत वर्गीकरण की अनुमति देती है। इसका मतलब है कि समाज के पिछड़े या कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने के लिए उनके लिए विशेष कानून बनाए जा सकते हैं।
III. बिना किसी भेदभाव के समान परिस्थितियों में कानून को समान रूप से प्रशासित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष - सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, जहाँ विधि के समक्ष समानता एक व्यापक सिद्धांत है, वहीं विधियों का समान संरक्षण उसका एक उप-सिद्धांत है। इन दोनों का अंतिम उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना और किसी भी प्रकार की मनमानी को समाप्त करना है।
भारतीय संवैधानिक कानून में अनुच्छेद 14 के तहत तर्कसंगत वर्गीकरण -
पर्सनल क्लाफिसकेशन और मनमानेपन का निषेध दो ऐसी धुरियां हैं, जिन पर समानता का पूरा अधिकार टिका हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समानता का अर्थ गणितीय समानता नहीं है, बल्कि समान परिस्थितियों में समानता है।
1. तर्कसंगत वर्गीकरण का सिद्धांत -
अनुच्छेद 14 वर्ग-विधान (Class Legislation) का निषेध करता है, लेकिन वर्गीकरण (Classification) की अनुमति देता है। इसका अर्थ है कि राज्य अलग-अलग समूहों हेतु उनकी विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर अलग कानून बना सकता है (जैसे महिलाओं, बच्चों या पिछड़ों के लिए विशेष प्रावधान)।
वर्गीकरण को तर्कसंगत मानने के लिए न्यायालय ने दोहरी कसौटी (Twin Test) निर्धारित की है:
I. बोधगम्य अंतरक (Intelligible Differentia) - वर्गीकरण का आधार स्पष्ट होना चाहिए। यानी जिन लोगों को एक समूह में रखा गया है और जिन्हें बाहर रखा गया है, उनके बीच कोई ठोस और समझने योग्य अंतर होना चाहिए।
II. तर्कसंगत संबंध - उस अंतर का उस उद्देश्य से सीधा संबंध होना चाहिए जिसे कानून प्राप्त करना चाहता है।
उदाहरण - यदि सरकार केवल कम आय वाले लोगों को मुफ्त भोजन देती है, तो यह तर्कसंगत है क्योंकि आय' एक स्पष्ट आधार है और इसका उद्देश्य गरीबी मिटाना (Nexus) है।
2. मनमानेपन का निषेध - नया दृष्टिकोण (New Doctrine of Arbitrariness) - 1970 के दशक तक समानता को केवल वर्गीकरण के चश्मे से देखा जाता था। लेकिन ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) के मामले में जस्टिस भगवती ने एक नई अवधारणा दी।
सिद्धांत - समानता और मनमानापन एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं। जहाँ मनमानापन होगा, वहाँ समानता नहीं हो सकती।
व्याख्या - यदि राज्य का कोई कार्य तर्कहीन, अतार्किक या बिना किसी ठोस आधार के है, तो वह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना जाएगा, भले ही वह किसी वर्गीकरण में फिट बैठता हो।
3. केस लॉ -
एयर इंडिया बनाम नरगिस मिर्जा - इस मामले में एयर इंडिया का नियम था कि एयर होस्टेस को पहली गर्भावस्था पर इस्तीफा देना होगा। कोर्ट ने इसे मनमाना और अपमानजनक माना और रद्द कर दिया, क्योंकि इस नियम का सेवा की गुणवत्ता से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं था।
अनवर अली vs पश्चिम बंगाल राज्य -
इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य बिना किसी स्पष्ट आधार के कुछ मामलों को विशेष न्यायालय में भेजने का निर्णय लेता है, तो यह मनमाना होगा और समानता के अधिकार का हनन माना जाएगा।
4. निष्कर्ष - समानता एक गतिशील अवधारणा है। आज के समय में अनुच्छेद 14 केवल वर्गीकरण तक सीमित नहीं है। यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का हर निर्णय न्यायपूर्ण, उचित और तर्कसंगत (Just, Fair and Reasonable) हो। यदि सरकार का कोई आदेश विवेकहीन है, तो उसे मनमाना मानकर रद्द किया जा सकता है।
अनुच्छेद 15 भेदभाव का निषेध -
छुआछूत, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध मजबूत हथियार है।
राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
I. इसके तहत सार्वजनिक स्थानों जैसे दुकानों, होटलों, कुओं और सड़कों के उपयोग में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
II. अपवाद - राज्य महिलाओं, बच्चों और सामाजिक/शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC) के लिए विशेष प्रावधान (जैसे आरक्षण) बना सकता है।
अनुच्छेद 15 समानता के अधिकार को वास्तविक धरातल पर उतारने का प्रयास करता है। जहाँ अनुच्छेद 14 सामान्य सिद्धांत देता है, वहीं अनुच्छेद 15 विशिष्ट आधारों पर भेदभाव को रोकता है।
(I). भेदभाव के आधार, अनुच्छेद 15(1) - राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल इन 5 आधारों पर कोई भेदभाव नहीं करेगा -
I. धर्म (Religion)
II. मूलवंश (Race),
III. जाति (Caste)
IV. लिंग (Sex)
V. जन्म स्थान (Place of Birth)
विशेष - यहाँ केवल शब्द का अर्थ है कि इन पांच आधारों के अलावा अन्य आधारों (जैसे निवास स्थान या भाषा) के आधार पर उचित भेदभाव किया जा सकता है।
(II). सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच अनुच्छेद 15(2) - यह प्रावधान न केवल राज्य को रोकता है, बल्कि निजी व्यक्तियों को भी आदेश देता है कि वे उपरोक्त 5 आधारों पर किसी नागरिक को निम्नलिखित स्थानों के उपयोग से नहीं रोकेंगे -
I. व्यक्तिगत स्वामित्व वाले सार्वजनिक स्थान - दुकान,भोजनालय, होटल और मनोरंजन स्थल।
II. पूर्णत या अंशतः स्थान - पूर्ण या अंशत सरकारी निधि से संचालित कुएँ, तालाब, स्नानघाट, सड़कें और सार्वजनिक समागम के स्थान।
3. अनुच्छेद 15 के अपवाद (विशेष प्रावधान) - समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार हो। कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए अनुच्छेद 15 में कुछ सकारात्मक भेदभाव की अनुमति दी गई है -
I. अनुच्छेद 15(3), महिलाएँ व बच्चे - राज्य इनके लिए विशेष प्रावधान बना सकता है (जैसे पंचायतों में महिला आरक्षण या बच्चों हेतु मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा।
II. अनुच्छेद 15(4) पिछड़े वर्ग -(SC/ ST/ OBC) - प्रथम संविधान संशोधन (1951) द्वारा जोड़ा गया। राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष नियम बना सकता है।
III. अनुच्छेद 15(5) - शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण - 93वें संशोधन (2005) द्वारा जोड़ा गया। यह निजी और सरकारी (अल्पसंख्यक संस्थानों को छोड़कर) शिक्षण संस्थानों में पिछड़ों के लिए प्रवेश में आरक्षण की अनुमति देता है।
IV. अनुच्छेद 15(6) - EWS आरक्षण - 103वें संशोधन (2019) द्वारा जोड़ा गया। यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में 10% आरक्षण का प्रावधान करता है।
4. केस लॉ-
मद्रास राज्य vs चंपकम दोराईराजन (1951) -
यह अनुच्छेद 15 से जुड़ा पहला मामला था। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों में जाति-आधारित कोटा को रद्द कर दिया था, जिसके बाद संसद ने प्रथम संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 15(4) जोड़ा ताकि पिछड़ों को आरक्षण दिया जा सके।
डी.पी. जोशी vs मध्य प्रदेश राज्य -
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निवास स्थान के आधार पर मेडिकल कॉलेज की फीस में दी गई छूट अनुच्छेद 15 का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि निवास स्थान उन 5 प्रतिबंधित आधारों में शामिल नहीं है।
सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) अनुसूचित जाति (SC) अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए विशेष व्यवस्था कर सकता है।
अनुच्छेद 16
सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता भारतीय संविधान के भाग–III (मौलिक अधिकार) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुच्छेद है। यह अनुच्छेद नौकरी में समान अवसर और सामाजिक न्याय की संवैधानिक गारंटी देता है।
अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों (लोक नियोजन) में सभी नागरिकों को समान अवसर की गारंटी देता है। यह अनुच्छेद 14 और 15 के सिद्धांतों को रोजगार के क्षेत्र में लागू करता है।
मुख्य प्रावधान (अनुच्छेद 16(1) और 16(2)) -
I. अनुच्छेद 16(1) - राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।
II. अनुच्छेद 16(2) - राज्य के अधीन किसी भी रोजगार या पद के लिए केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, ( अनुच्छेद 15 के अतिरिक्त - उद्भव एवं जन्म या निवास स्थान) के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न ही उससे भेदभाव किया जाएगा।
महत्वपूर्ण - अनुच्छेद 15 में भेदभाव के 5 आधार थे, जबकि अनुच्छेद 16 में उद्भव और निवास को जोड़कर कुल 7 आधार दिए गए हैं।
01. समान अवसर
सभी नागरिकों को
समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।
02. बिना भेदभाव के अवसर
धर्म, मूलवंश (Race), जाति, लिंग, वंश, जन्म-स्थान और निवास के आधार पर सार्वजनिक नौकरी से वंचित नहीं किया का सकता।
03. विशेष प्रावधान -
संसद किसी विशेष राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में रोजगार के लिए निवास संबंधी योग्यता निर्धारित कर सकती है।
पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण
यदि किसी वर्ग का राज्य सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो राज्य—
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC), अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण प्रदान कर सकता है।
(4A) पदोन्नति में आरक्षण (77वां संशोधन, 1995)
राज्य SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण दे सकता है।
4B) बैकलॉग रिक्तियाँ (81वां संशोधन, 2000)
यदि आरक्षित पद खाली रह जाएँ तो
उन्हें आगे के वर्षों में जोड़कर भरा जा सकता है
50% सीमा लागू नहीं होगी (केवल बैकलॉग पर)
(6) आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) – 103वां संशोधन, 2019
राज्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 10% तक आरक्षण दे सकता है जो अन्य वर्गों के आरक्षण से अलग होगा।
अनुच्छेद 16 के अपवाद - समानता के अधिकार के बावजूद, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान कुछ विशेष परिस्थितियों में भेदभाव की अनुमति देता है -
I. निवास की शर्त (16(3)) - संसद कानून बनाकर किसी विशेष राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में सरकारी नौकरियों के लिए वहाँ का निवासी होना अनिवार्य शर्त रख सकती है (जैसे कुछ विशेष पिछड़े क्षेत्रों के लिए)।
II. पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण (16(4)) - यदि राज्य को लगता है कि किसी पिछड़े वर्ग का सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वह उनके लिए पदों के आरक्षण का प्रावधान कर सकता है।
III. पदोन्नति में आरक्षण (16(4A)) - यह 77वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया। राज्य SC और ST समुदायों को पदोन्नती में भी आरक्षण दे सकता है।
IV. बैकलॉग रिक्तियां (16(4B)) - यदि आरक्षित सीटें किसी वर्ष खाली रह जाती हैं, तो उन्हें अगले वर्ष अलग से भरा जा सकता है और वे 50% की सीमा का उल्लंघन नहीं मानी जाएंगी।
V. धार्मिक संस्थान (16(5)) - किसी धार्मिक या सांप्रदायिक संस्थान के प्रबंधन से जुड़े पद को उसी धर्म या संप्रदाय को मानने वाले व्यक्तियों के लिए आरक्षित रखा जा सकता है।
VI l. EWS आरक्षण (16(6)) - 103वें संशोधन (2019) द्वारा जोड़ा गया। यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण का प्रावधान करता है।
3. केस लॉ-
इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (मंडल आयोग केस, 1992)
यह अनुच्छेद 16 की व्याख्या का मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित नियम तय किए -
I. पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण को वैध माना गया।
II. कुल आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
III. क्रीमी लेयर (पिछड़ों में संपन्न लोग) को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाना चाहिए।
IV. केवल पिछड़ेपन का आधार जाति हो सकता है, लेकिन केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण (उस समय) मान्य नहीं था।
एम. नागराज बनाम भारत संघ (2006)
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य पदोन्नति में SC/ST को आरक्षण देना चाहता है, तो उसे उस वर्ग के पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में मात्रात्मक डेटा जुटाना होगा।
4. निष्कर्ष - अनुच्छेद 16 का मुख्य उद्देश्य केवल औपचारिक समानता देना नहीं है, बल्कि सार्थक समानता सुनिश्चित करना है। यह योग्य व्यक्तियों को अवसर भी देता है और साथ ही वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
अनुच्छेद 17
भारतीय संविधान की आत्मा कहा है - डॉ. आंबेडकर
छुआछूत - राज्य व्यक्ति, संस्थाएँ व समाज द्वारा स्कूल, संस्थान, रेल, बस, होटल, दुकान, मंदिर, पानी, सड़क,, कार्यस्थल, सामाजिक संपर्क—हर क्षेत्र में का अंत (पूर्ण निषेध)। यदि किसी ने छुआछूत का पालन किया तो दंडनीय अपराध होगा।
संसद द्वारा निर्धारित दंड कानून के अंतर्गत पीड़ित को न्याय हेतु सीधा न्यायालय में अभ्यावेदन देने का अधिकार।
यह एकमात्र ऐसा मौलिक अधिकार है जो पूर्ण (Absolute) है, जिसका अर्थ है कि इसके कोई अपवाद नहीं हैं। यह समाज से सदियों पुरानी 'छुआछूत' की कुप्रथा को जड़ से खत्म करने का संकल्प है।
I. न्यायिक प्रावधान - इस हेतु छुआछूत अपराध अधिनियम- 1955 बनाया गया, बाद में इसे सन 1976 में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 से संबंधित कर दिया गया।
II. अस्पृश्यता की परिभाषा - संविधान या किसी अधिनियम में अस्पृश्यता शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। हालाँकि, मैसूर उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ केवल शाब्दिक छूने से नहीं है, बल्कि यह उन ऐतिहासिक सामाजिक प्रथाओं से है जहाँ कुछ वर्गों को उनके जन्म के आधार पर नीचा माना जाता था और उनसे दूरी बनाई जाती थी।
III. छुआछूत से संबंधित अपराधों के लिए -
(क). छुआछूत दंडनीय अपराध - अस्पृश्यता से उपजी किसी भी अक्षमता को लागू करना कानून के अनुसार एक अपराध होगा, जिसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। सजा और जुर्माने पर विचार (ख). अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अंतर्गत गंभीर सामाजिक अत्याचारों की रोकथाम हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना की गई।
यह अनुच्छेद मानव गरिमा अविभाज्य है के सिद्धांत पर कार्य करता है।
IV. केस लॉ-
पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ -
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब भी अनुच्छेद 17 के तहत किसी के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो यह राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह दोषी को सजा दिलाए।
स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम अप्पा बालू इंगले
कोर्ट ने टिप्पणी की कि अस्पृश्यता मानवता के लिए एक कलंक है और इसे केवल कानून से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी खत्म करना होगा।
निष्कर्ष - अनुच्छेद 17 केवल एक कानूनी नियम नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज को "मानवीय गरिमा" और "समानता" के धरातल पर लाने का एक पवित्र संकल्प है। यह सुनिश्चित करता है कि जन्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति का अपमान न हो।
पहले किताबों पर लिखा होता था -
अस्पृश्यता -
पाप है।
अपराध है।
अवैधानिक है।
विवेक रहित है।
मानवीय कलंक है।
अनुच्छेद 18
जन्म, पद या कृपा से श्रेष्ठता का अंत।
सामंती और औपनिवेशिक मानसिकता का अंत।
वर्गहीन लोकतंत्र का आधार।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 18 समानता के अधिकार को पूर्णता प्रदान करने के लिए उपाधियों को समाप्त करता है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में कृत्रिम भेदभाव को खत्म करना और एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जहाँ सभी नागरिक समान गरिमा के साथ जिएं।
इस अनुच्छेद द्वारा समानता, नागरिक गरिमा और वर्गविहीन समाज की स्थापना हेतु भारत में उपाधियों का उन्मूलन किया गया।
(1) राज्य द्वारा उपाधियों पर प्रतिबंध जैसे - राजा, नवाब, सरदार, महाराजा आदि।
(2) सैन्य एवं शैक्षणिक उपाधियों पर अपवाद - सैन्य उपाधियाँ (जैसे, सेना सम्मान), शैक्षणिक उपाधियाँ (जैसे, डिग्री) जो योग्यता और सेवा पर आधारित हैं।
(3) विदेशी उपाधि पर प्रतिबंध
(4) विदेशी उपहार/उपाधि हेतु राष्ट्रपति की अनुमति - कोई नागरिक राज्य के अधीन पद पर है और उसे विदेशी राज्य से कोई उपहार या उपाधि मिले तो उसे राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होगी।
नागरिक सम्मान उपाधि नहीं -
भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री आदि। यह सम्मान संविधान के विरुद्ध नहीं यदि इन्हें नाम के साथ उपाधि की तरह न जोड़ा जाए।
केस लॉ-
बालाजी राघवन बनाम भारत संघ - सुप्रीम कोर्ट ने (1996) में निर्णय दिया -
1. पुरस्कार उपाधि नहीं हैं - न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय पुरस्कार उपाधि की श्रेणी में नहीं आते क्योंकि ये व्यक्ति की योग्यता और सेवा के लिए दिए जाते हैं, न कि जन्म या वंश के आधार पर।
2. नाम के साथ उपयोग पर प्रतिबंध - हालांकि ये पुरस्कार वैध हैं, लेकिन इनका उपयोग नाम के आगे (Prefix) या पीछे (Suffix) के रूप में नहीं किया जा सकता (जैसे, भारत रत्न [नाम] लिखना गलत है)। यदि कोई ऐसा करता है, तो उससे पुरस्कार वापस लिया जा सकता है।
UNIT III
स्वतंत्रता एवं शोषण के विरुद्ध अधिकार -
अनुच्छेद 19
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिक स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह नागरिकों को छह बुनियादी स्वतंत्रताएं प्रदान करता है, जो एक जीवंत लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं।
पहले संपत्ति का अधिकार भी मूल अधिकार था, लेकिन 44वें संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार को हटा दिया गया।
अब छह स्वतंत्रताएं शेष हैं - नागरिक को सोचने, बोलने, चलने, संगठित होने और कार्य करने की मूलभूत आज़ादी।
भारत का नागरिक -
01. भारत में भारत का नागरिक स्वतंत्र, सक्रिय और गरिमामय जीवन जी सकेगा। ये अधिकार सिर्फ भारत के नागरिकों को हैं विदेशियों को नहीं।
19(1) के अंतर्गत 6 स्वतंत्रताएँ -
(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - बोलने, लिखने, छापने, सोशल मीडिया, कला, विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता।
(b) शांतिपूर्वक सभा करने की स्वतंत्रता - बिना हथियार, शांतिपूर्ण ढंग से धरना, जुलूस, सभा का अधिकार।
(c) संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता - यूनियन, संस्था, ट्रस्ट, राजनीतिक दल व सहकारी समितियाँ बनाना।
(d) भारत में कहीं भी आवागमन की स्वतंत्रता - देश के किसी भी भाग में आने-जाने का अधिकार।
(e) भारत में निवास और बसने की स्वतंत्रता - कहीं भी रहने और बसने का अधिकार।
(f) कोई भी (वैध)नौकरी पेशा, व्यवसाय, व्यापार करने की स्वतंत्रता - (44वें संशोधन, 1978 से पुनर्गठित) ।कोई भी वैध पेशा या व्यवसाय अपनाने का अधिकार।
अनुच्छेद 19(2) से 19(6)
युक्तियुक्त प्रतिबंध - ये स्वतंत्रताएँ पूर्ण नहीं, बल्कि राज्य द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंधों के अधीन हैं। प्रतिबंध के आधार—
क राज्य की सुरक्षा
ख सार्वजनिक व्यवस्था
ग शालीनता व नैतिकता
घ भारत की संप्रभुता व अखंडता
च मानहानि
छ अपराध के लिए उकसावा
अनुच्छेद 19 का महत्व - अनुच्छेद 19 नागरिकों को वह शक्ति देता है जिससे वे सरकार की आलोचना कर सकें, अपने अधिकारों के लिए संगठन बना सकें और देश के विकास में सक्रिय भागीदारी निभा सकें। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है।
प्रमुख न्यायिक निर्णय -
रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भाषण की स्वतंत्रता में विचारों का प्रसार भी शामिल है और प्रेस की स्वतंत्रता इसी का अभिन्न अंग है।
बेनेट कोलमैन बनाम भारत संघ - इसमें न्यायालय ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता पर सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण (जैसे कागज के कोटे के माध्यम से) भी अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन है।
नवीन जिंदल बनाम भारत संघ - कोर्ट ने निर्णय दिया कि अपने घर या कार्यालय पर सम्मानपूर्वक राष्ट्रीय ध्वज फहराना अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
केशवानंद भारती बनाम केरल 1973 -
मौलिक अधिकार संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ केस (1978) - स्वतंत्रता का व्यापक अर्थ, प्रक्रिया न्यायसंगत होनी चाहिए।
अनुच्छेद 20 - आपराधिक न्याय की आत्मा –
यह अनुच्छेद अपराधों के संबंध में व्यक्ति को राज्य की मनमानी दंड शक्ति से सुरक्षा प्रदान करता है।
इसके अनुसार, कोई भी व्यक्ति कानून के बिना, दो बार, या स्वयं के विरुद्ध गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।अनुच्छेद 20 के उपखंड -
(1) पूर्वव्यापी दंड का निषेध (Ex-post facto law) - किसी व्यक्ति को उस कृत्य के लिए दंडित नहीं किया जाएगा जो अपराध के समय अपराध नहीं था। कानून पीछे की तारीख से लागू नहीं हो सकता।
(2) दोहरे दंड से संरक्षण (Double Jeopardy) - एक ही अपराध के लिए
एक व्यक्ति को दो बार दंडित नहीं किया जा सकता।
Nemo debet bis vexari सिद्धांत। (3) आत्म-अभियोग से संरक्षण - (Protection against Self-Incrimination) - किसी आरोपी को पुलिस ज़ोर-ज़बरदस्ती से स्वयं के विरुद्ध गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 20 की अन्य महत्वपूर्ण विशेषता -
I. कार्योत्तर विधि से संरक्षण - अनुच्छेद 20(1) में Ex-Post Facto Laws से सुरक्षा दी गई है। इसका मतलब है -
किसी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं माना जाएगा जब तक उसने उस समय लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।
II. निर्धारित दंड से अधिक दंड वर्जित - किसी को भी उस सजा से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता जो अपराध करने के समय कानून में निर्धारित थी।
प्रमुख न्यायिक निर्णय
केशवानंद भारती केस- मौलिक अधिकारों का संरक्षण
मौन रहने का अधिकार -
नंदिनी सत्पथी V.S. PL दानी (1978)
बिना अनुमति टेस्टिंग अवैधानिक -
नार्को, ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ बिना सहमति असंवैधानिक
सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010)
अनुच्छेद 20 की विशेष स्थिति -
यह अधिकार निरपेक्ष (Absolute) होते हैं। यह अनुच्छेद इतना शक्तिशाली है कि अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता। यह व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अंतिम रक्षा पंक्ति है।
अनुच्छेद 21
किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा। यह अनुच्छेद न केवल भारतीय नागरिकों को, बल्कि विदेशियों को भी प्राप्त है। इसकी शब्दावली बहुत संक्षिप्त है, लेकिन न्यायपालिका ने इसकी व्याख्या बहुत व्यापक की है।
किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
1. जीवन का अर्थ - जीवन केवल श्वास लेना नहीं, बल्कि गरिमामय जीवन स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, आवास, मानवीय सम्मान के साथ जीवन ही जीवन है।
2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता - शारीरिक स्वतंत्रता, मानसिक स्वतंत्रता, आवागमन
निजता, पसंद का जीवन स्वतंत्रता है।
3. विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया - प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए, मनमानी या दमनकारी नहीं।अनुच्छेद 21 से निकले मुख्य अधिकार
- गरिमा के साथ जीने का अधिकार
- निजता का अधिकार (पुट्टस्वामी केस, 2017)
- स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार
- मुफ्त कानूनी सहायता
- शीघ्र न्याय
- पुलिस अत्याचार से सुरक्षा
- भोजन का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार (21A)
- प्रमुख न्यायिक निर्णय -
1. SK गोपालन V मद्रास राज्य (1950) प्रारंभिक संकीर्ण व्याख्या
2. मेनका गांधी V भारत संघ (1978)
प्रक्रिया न्यायपूर्ण होनी चाहिए
3. ओल्गा टेलिस केस (1985)
आजीविका एवं जीवन
SK पुट्टस्वामी केस (2017)
निजता मौलिक अधिकार
44वें संशोधन (1978) के बाद -
I. अनुच्छेद 21 को आपातकाल में भी निलंबित नहीं किया जा सकता।
II. नकारात्मक निर्देश - यह राज्य (State) पर एक सीमा लगाता है कि वह बिना कानूनी आधार के किसी की निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करे।
केस लॉ-
I. मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) - इस केस ने अनुच्छेद 21 की परिभाषा बदल दी। कोर्ट ने कहा कि प्राण छीनने की प्रक्रिया 'उचित, न्यायपूर्ण और तर्कसंगत' होनी चाहिए।
II. शिक्षा का अधिकार - अनुच्छेद 21-A के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा।
III. निजता का अधिकार (Right to Privacy) - पुट्टस्वामी केस (2017) में इसे अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा माना गया।
IV. स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार -
A. प्रदूषण मुक्त हवा और पानी में जीने का अधिकार।
B. आश्रय और स्वास्थ्य का अधिकार - रहने की जगह और चिकित्सा सहायता प्राप्त करना।
अनुच्छेद 21 की विशेषता
आपातकाल - अनुच्छेद 20 और 21 ऐसे अधिकार हैं जिन्हें आपातकाल के दौरान भी राष्ट्रपति द्वारा निलंबित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 21A – शिक्षा का अधिकार
अनुच्छेद 21A का मूल पाठ -
राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को विधि के अनुसार निर्धारित तरीके से, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -
86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत पारित, 1 अप्रैल 2010 से लागू के द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया। इसके अनुसार अनुच्छेद 45 में संशोधन कर अनुच्छेद 51A(k) जोड़ा गया।
मुख्य विशेषताएँ
निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा - जिसमें सभी प्रकार की फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, लेखन सामग्री भी सम्मिलित है।
अनिवार्य शिक्षा - राज्य का कर्तव्य
अभिभावक - का नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व।
आयु सीमा - 6 से 14 वर्ष (प्राथमिक से उच्च प्राथमिक)
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान -
01. 25% सीटें EWS/वंचित वर्ग के लिए (निजी स्कूलों में)
02. बिना परीक्षा/फेल किए कक्षा 8 तक पदोन्नति
03. प्रशिक्षित शिक्षक अनिवार्य
04. छात्र–शिक्षक अनुपात निर्धारित
05. स्कूलों में भौतिक सुविधाएँ आवश्यक
संबंधित अन्य अनुच्छेद
अनुच्छेद 45 - 6 वर्ष के बच्चे की प्राथमिक शिक्षा
अनुच्छेद 51A(k) - अभिभावकों का कर्तव्य
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय -
01. उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993)
शिक्षा को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकार माना गया
02. सोसायटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स बनाम भारत संघ (2012)
RTE अधिनियम को संवैधानिक मान्यता।
अनुच्छेद 22
गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध संरक्षण - नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ा अनुच्छेद जो राज्य की पुलिस और निरोध शक्ति पर संवैधानिक अंकुश लगाता है।
किसी व्यक्ति को - मनमाने ढंग से गिरफ्तार नहीं किया जाए एवं बिना कारण और प्रक्रिया के निरुद्ध न रखा जाए।
इसके उपखंड -
(1) गिरफ्तारी के समय गिरफ्तार व्यक्ति को -
1. गिरफ्तारी के कारण की तुरंत सूचना दी जाएगी
2. अपनी पसंद के वकील से परामर्श का अधिकार होगा
(2) गिरफ्तार व्यक्ति का 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुतिकरण अनिवार्य। बिना मजिस्ट्रेट आदेश के आगे निरोध नहीं रखा जा सकता।
(3) अपवाद (किन पर लागू नहीं) - शत्रु विदेशी (Enemy Alien) पर लागू नहीं।
(4) निरोध की अवधि - 3 महीने से अधिक निरोध तभी जब सलाहकार बोर्ड अनुमति दे
(5) निरोध का कारण बताना - निरुद्ध व्यक्ति को कारणों की सूचना यथाशीघ्र दी जाएगी
(6) अपवाद - राज्य कुछ तथ्यों को सार्वजनिक हित में प्रकट न करने का अधिकार रखता है
(7) संसद की शक्ति - संसद निरोध की अधिकतम अवधि सलाहकार बोर्ड की संरचना निर्धारित कर सकती है।
⚖️ प्रमुख निवारक निरोध कानून
01. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA)
02. COFEPOSA
03. PITNDPS
अनुच्छेद 23
संदेश - श्रम हो शोषण नहीं।
मानव दुर्व्यापार व बलात श्रम का निषेध
अनुच्छेद 23 के अनुसार - सभी मानव दुर्व्यापार, बेगार और बलात श्रम का निषेध किया जाता है; तथा इनका उल्लंघन दंडनीय अपराध होगा।
(1) निषिद्ध कृत्य - किसी भी रूप में मानव दुर्व्यापार (Human Trafficking)
बेगार (बिना मजदूरी काम) बलात श्रम (Forced Labour) पूरी तरह निषिद्ध हैं।
आर्थिक दबाव, ऋण-बंधन के द्वारा भी यह कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है।
(2) सार्वजनिक सेवा हेतु अपवाद - राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए नागरिकों से सेवा ले सकता है, लेकिन धर्म, जाति, वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- यह अनुच्छेद
क. निजी व्यक्तियों पर भी लागू
ख. न्यायालय में सीधे प्रवर्तनीय
ग. आपातकाल में भी निलंबित नहीं
क्रियान्वयन हेतु प्रमुख कानून -
01. बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम, 1976
02. अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956
03. बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम
प्रमुख न्यायिक निर्णय
01. पीयूडीआर बनाम भारत संघ (1982)
न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान, बलात श्रम की श्रेणी में आता है।
02. संजित रॉय बनाम राजस्थान राज्य
अकाल राहत कार्य में भी मजदूरी आवश्यक।
अनुच्छेद 24
अनुच्छेद 24 – बाल श्रम का निषेध। बच्चों के बचपन, शिक्षा और गरिमा की संवैधानिक सुरक्षा करता है।
अनुच्छेद 24 का मूल पाठ
चौदह वर्ष से कम आयु के नागरिक या गैरनागरिक किसी भी बच्चे को किसी कारखाने, खदान या किसी अन्य खतरनाक रोजगार उपक्रम में नियोजित नहीं किया जाएगा। इसका उल्लंघन दंडनीय अपराध है।
क्रियान्वयन हेतु प्रमुख कानून -
1. बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986
2. बाल श्रम संशोधन अधिनियम, 2016
3. किशोर न्याय अधिनियम
प्रमुख न्यायिक निर्णय -
एम.सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996)
बाल श्रमिकों के पुनर्वास का निर्देश
पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स केस
बाल श्रम अनुच्छेद 24 का उल्लंघन
आपातकाल की स्थिति में यह artical निलंबित नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष - अनुच्छेद 24 का मूल संदेश -
बच्चे काम के नहीं, स्कूल के लिए हैं।
यह अनुच्छेद, कल्याणकारी राज्य, मानवीय संवेदनशीलता और भविष्य निर्माण
का संवैधानिक आधार है।
यूनिट - IV
धार्मिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक अधिकार, संवैधानिक उपचार और नीति निदेशक तत्व
धार्मिक स्वतंत्रता -
भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। यह भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाता है, जहाँ राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों को समान सम्मान देता है।
1. अनुच्छेद 25 - अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता -
सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए
प्रत्येक व्यक्ति को—धर्म को मानने, उसका आचरण करने, उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता होगी। यह अधिकार नागरिक और गैर-नागरिक सभी को प्राप्त है।
यह अनुच्छेद व्यक्तिगत स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता देता है। इसके तहत प्रत्येक व्यक्ति को निम्नलिखित अधिकार हैं -
I. अंतःकरण की स्वतंत्रता - व्यक्ति अपने मन में किसी भी भगवान या रूप को मानने के लिए स्वतंत्र है।
II. मान्यता का अधिकार - अपने धार्मिक विश्वासों को खुलेआम घोषित करने का अधिकार। इस अनुच्छेद के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी ईश्वर/भगवान को मानने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता।
III. आचरण का अधिकार - धार्मिक पूजा, परंपरा और समारोह करने की आजादी।
IV. प्रचार का अधिकार - अपने धार्मिक सिद्धांतों का दूसरों तक प्रसार करना (लेकिन जबरन धर्म परिवर्तन की अनुमति नहीं है)।
अनुच्छेद 25(2) के विशेष प्रावधान -
(a) धर्म से जुड़े आर्थिक/सामाजिक कार्यों का नियमन
राज्य - मंदिरों की आय, धार्मिक संपत्ति, प्रशासन को नियंत्रित कर सकता है।
2. अनुच्छेद 26, धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता - जहाँ अनुच्छेद 25 व्यक्ति की बात करता है, अनुच्छेद 26 धार्मिक समूहों या समुदायों को अधिकार देता है -
I. धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण करना।
II. अपने धर्म संबंधी कार्यों का स्वयं प्रबंधन करना।
III. चल और अचल संपत्ति (जैसे जमीन, इमारत) खरीदने और उसका स्वामित्व रखने का अधिकार।
IV. कानून के अनुसार ऐसी संपत्ति का प्रशासन करना।
3. अनुच्छेद 27 - किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों (Tax) के संदाय के बारे में स्वतंत्रता - यह अनुच्छेद राज्य की धर्मनिरपेक्षता को सुनिश्चित करता है -
∆ किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई कर देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिसका उपयोग किसी विशेष धर्म या संप्रदाय की उन्नति के लिए किया जाना हो।
इसका अर्थ है कि सरकार जनता से इकट्ठा किए गए पैसे को किसी एक धर्म को बढ़ावा देने के लिए खर्च नहीं करेगी।
4. अनुच्छेद 28 - कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता
यह शिक्षण संस्थानों में धर्म की स्थिति स्पष्ट करता है -
I. पूर्णतः राज्य निधि से चलने वाले संस्थान - यहाँ कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी (जैसे सरकारी स्कूल)।
II. राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त संस्थान - यहाँ धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है, लेकिन किसी भी छात्र को उसमें भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
III. धार्मिक ट्रस्ट द्वारा स्थापित संस्थान - यदि संस्थान किसी ऐसे ट्रस्ट द्वारा स्थापित है जिसका उद्देश्य ही धार्मिक शिक्षा देना है, तो वहां शिक्षा दी जा सकती है।
अपवाद एवं सीमाएँ - धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है। राज्य इन आधारों पर इस पर रोक लगा सकता है -
I. सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order)
II. नैतिकता (Morality)
III. स्वास्थ्य (Health)
IV. अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर।
प्रमुख न्यायिक निर्णय -
I. एस.आर. बोम्मई केस
पंथनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना
II. शिरूर मठ केस (1954)
आवश्यक धार्मिक आचरण सिद्धांत
III. रतीलाल बनाम महाराष्ट्र
धर्म और प्रशासन में अंतर
सारांश - अनुच्छेद 25–28 -
धर्म की स्वतंत्रता, राज्य की तटस्थता, धार्मिक शिक्षा का संतुलन स्थापित करते हैं।
अनुच्छेद 25 -
I. आस्था स्वतंत्र है, पर समाज से ऊपर नहीं।
II. धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार
के बीच संतुलन का संवैधानिक सूत्र है।
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार अनुच्छेद 29 से 30 -
अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों के संदर्भ में है। यह मुख्य रूप से समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर अल्पसंख्यकों को उनकी विशिष्ट पहचान बनाए रखने की गारंटी देता है।
अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण - यह अनुच्छेद दो प्रमुख भागों में विभाजित है
1. विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति का अधिकार (अनुच्छेद 29(1)) - भारत के किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को, जिनकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि, या संस्कृति है, उसे संरक्षित करने का अधिकार होगा।
उदाहरण - यदि कोई छोटा समुदाय अपनी लुप्त होती भाषा को बचाने के लिए लाइब्रेरी बनाना चाहता है या सांस्कृतिक कार्यक्रम करना चाहता है, तो संविधान उन्हें यह अधिकार देता है।
2. शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का अधिकार (अनुच्छेद 29(2)) - राज्य (सरकार) द्वारा संचालित या राज्य निधि से सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश के समय किसी भी नागरिक के साथ केवल निम्नलिखित चार आधारों पर भेदभाव नहीं किया जाएगा:
I. धर्म
II. मूलवंश
III. जाति
IV. भाषा
अनुच्छेद 29 की मुख्य विशेषताएँ -
I. केवल अल्पसंख्यक समाज के लिए नहीं - यह केवल अल्पसंख्यकों के लिए नहीं है, हालांकि इसे अल्पसंख्यक अधिकारों के तहत रखा गया है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि नागरिकों के वर्ग शब्द के कारण इसमें अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों वर्ग शामिल हैं।
II. सांस्कृतिक संरक्षण - यह राज्य को मजबूर नहीं करता कि वह संस्कृति बचाए, बल्कि नागरिकों को खुद अपनी संस्कृति बचाने का अधिकार देता है।
III. भेदभाव का निषेध - यह अनुच्छेद सुनिश्चित करता है कि शिक्षा के क्षेत्र में भाषा या धर्म के नाम पर किसी को बाहर न रखा जाए।
अनुच्छेद 30 - अल्पसंख्यकों को शिक्षा के क्षेत्र में सशक्त बनाने का विशेष अधिकार है। इसे अक्सर अल्पसंख्यकों का चार्टर भी कहा जाता है क्योंकि यह उन्हें अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने स्वयं के शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है।
यहां दो प्रकार के अल्पसंख्यकों की बात की गई है -
I. धार्मिक अल्पसंख्यक
II. भाषाई अल्पसंख्यक
1. शिक्षण संस्थान स्थापित करने का अधिकार (अनुच्छेद 30(1)) - सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार है।
इसका मतलब है कि वे अपने समुदाय के बच्चों को अपनी भाषा, धर्म और संस्कृति के अनुसार शिक्षा दे सकते हैं।
I.शिक्षण कार्य एवं स्टाफ - प्रशासन के अधिकार में शिक्षकों की नियुक्ति, पाठ्यक्रम तय करना और अनुशासन बनाए रखना शामिल है।
2. संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण (अनुच्छेद 30(1A)) - यदि सरकार किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की संपत्ति या जमीन को अधिग्रहित करती है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि संस्था को दिया जाने वाला मुआवजा इतना हो कि उनके शिक्षा के अधिकार में कोई बाधा न आए।
3. सरकारी सहायता में भेदभाव नहीं (अनुच्छेद 30(2)) - सरकार जब शिक्षण संस्थानों को आर्थिक सहायता देगी, तो वह किसी संस्थान के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगी कि वह किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा प्रबंधित है।
अनुच्छेद 30 की सीमाएँ और शर्तें -
यह अधिकार पूर्ण नहीं है। राज्य (सरकार) निम्नलिखित आधारों पर नियम बना सकती है -
I. शैक्षणिक मानक - स्कूल को शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की योग्यता और स्वास्थ्य मानकों का पालन करना होगा।
II. भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन - यदि किसी संस्थान में भ्रष्टाचार पाया जाता है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।
III. राष्ट्रीय सुरक्षा - शिक्षण संस्थानों का उपयोग राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 29 और 30 का संगम - जहाँ अनुच्छेद 29 नागरिकों को अपनी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 30 उस भाषा और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए संस्थान बनाने का साधन प्रदान करता है।
विशेष - यह केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि भाषाई अल्पसंख्यकों (जैसे हिंदी भाषी राज्यों में तमिल भाषी लोग) के लिए भी है। ये अनुच्छेद मुख्य रूप से भारत की विविधता को बनाए रखने और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने के लिए बनाए गए हैं।
अनुच्छेद 31, 31a, 31b और 31c संपत्ति का अधिकार -
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 से 31C तक की यात्रा संपत्ति के अधिकार और सामाजिक न्याय के बीच के संघर्ष की कहानी है। मूल संविधान में संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार था, लेकिन आज इसकी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।
1. अनुच्छेद 31 (Article 31): संपत्ति का अधिकार - मूल रूप से, यह अनुच्छेद हर नागरिक को संपत्ति रखने और उसे सुरक्षित रखने का मौलिक अधिकार देता था। इसमें दो मुख्य बातें थीं -
I. किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से कानून की प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जाएगा।
II. सरकार अगर सार्वजनिक हित के लिए संपत्ति लेती है, तो उसे मुआवजा देना होगा।
वर्तमान स्थिति - 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा इसे मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया है। अब यह अनुच्छेद 300A के तहत केवल कानूनी अधिकार (Legal Right) रह गया है।
2. अनुच्छेद 31A - संपदाओं के अधिग्रहण से सुरक्षा - इसे प्रथम संविधान संशोधन (1951) द्वारा जोड़ा गया था।
उद्देश्य: ज़मींदारी प्रथा को खत्म कर भूमि सुधार कानूनों को लागू करना।
प्रावधान - यदि सरकार सार्वजनिक हित में किसी संपदा (जैसे बड़ी ज़मीनें, जागीर आदि) का अधिग्रहण करती है, तो उस कानून को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह अनुच्छेद 14 (समानता) या अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करता है।
3. अनुच्छेद 31B - नौवीं अनुसूची में यह अनुच्छेद भी 1951 में जोड़ा गया जो अनुच्छेद 31A से अधिक शक्तिशाली है।
प्रावधान - इसके अंतर्गत नौवीं अनुसूची बनाई गई। यदि किसी कानून को इस अनुसूची में डाल दिया जाता है, तो उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। (न्यायिक समीक्षा से सुरक्षा)।
विशेष - हालांकि, 2007 में सुप्रीम कोर्ट (IR Coelho केस) ने फैसला दिया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की समीक्षा की जा सकती है यदि वे संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं तो।
4. अनुच्छेद 31C - नीति निर्देशक तत्वों को प्राथमिकता - इसे 25वें संशोधन (1971) द्वारा जोड़ा गया।
प्रावधान - यदि सरकार अनुच्छेद 39(b) (संसाधनों का समान वितरण) और अनुच्छेद 39(c) (धन के संकेंद्रण को रोकना) को लागू करने के लिए कोई कानून बनाती है, तो उसे अनुच्छेद 14 या 19 के उल्लंघन के आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
महत्व - यह अनुच्छेद व्यक्तिगत अधिकार के ऊपर सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता देता है।
संक्षिप्त सारांश -
I. 31 - संपत्ति का मौलिक अधिकार, अब समाप्त (अब अनुच्छेद 300A में संपति का अधिकार मौलिक अधिकार के स्थान पर कानूनी अधिकार है।)
II. 31A - भूमि सुधार कानूनों को सुरक्षा दी गई जो आज भी लागू है।
III. 31B - नौवीं अनुसूची के कानूनों को कवच सीमित न्यायिक समीक्षा यदि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं तो, यह आज भी लागू है।
IV. 31C - सामाजिक न्याय हेतु नीति निर्देशक तत्व (DPSP) को प्राथमिकता जो आज भी लागू है।
संवैधानिक उपचारों का अधिकार - अनुच्छेद 32 से 35 -
भारतीय संविधान में संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32 से 35 तक) आम नागरिक के लिए वह सुरक्षा कवच है जो अन्य सभी मौलिक अधिकारों को वास्तविक बनाता है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का हृदय कहा था, क्योंकि इसके बिना मौलिक अधिकार केवल कागजी बनकर रह जाते।
1. अनुच्छेद 32: संवैधानिक उपचारों का अधिकार - यह अनुच्छेद नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय अधिकारों के प्रवर्तन के लिए 5 प्रकार की याचिका (Writs) जारी कर सकता है -
याचिका के प्रकार -
I. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) - सशरीर प्रस्तुत करना। यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है, तो न्यायालय उसे रिहा करने का आदेश देता है।
II. परमादेश (Mandamus) - हम आदेश देते हैं। यह किसी सरकार, सार्वजनिक अधिकारी या संस्था को उसके कानूनी कर्तव्यों का पालन करने हेतु जारी किया जाता है।
III. प्रतिषेध (Prohibition) - रोकना। उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय को अपनी अधिकार सीमा (ज्यूरोडिक्शन) से बाहर काम करने से रोकने के लिए जारी करता है।
IV. उत्प्रेषण (Certiorari) - पूर्णतया सूचित करना। अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों को वरिष्ठ न्यायालय अपने पास मंगाने या उनके निर्णय को रद्द करने के लिए जारी करता है।
V. अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) - किस अधिकार से। यदि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर अवैध रूप से आसीन है, तो न्यायालय उससे उसकी योग्यता का आधार पूछता है।
2. अनुच्छेद 33 - सशस्त्र बलों के अधिकार - यह संसद को शक्ति देता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सके।
उद्देश्य - ताकि वे अपने कर्तव्यों का उचित निर्वहन कर सकें और उनमें अनुशासन बना रहे।
3. अनुच्छेद 34 मार्शल लॉ (सैन्य शासन) - जब देश के किसी हिस्से में सैन्य शासन लागू हो, तब यह अनुच्छेद वहां के नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करता है।
विशेष - यह अनुच्छेद संसद को उन कार्यों को वैध बनाने की शक्ति भी देता है जो व्यवस्था बहाल करने के दौरान सैन्य अधिकारियों द्वारा किए गए हों।
4. अनुच्छेद 35: कानून बनाने की शक्ति - यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं।
उदाहरण - अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता) या अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी) के विरुद्ध दंड तय करने का अधिकार केवल संसद को है।
तुलना अनुच्छेद 32 = अनुच्छेद 226
I. न्यायालय - सर्वोच्च न्यायालय = उच्य न्यायालय
II. क्षेत्राधिकार - केवल मौलिक अधिकारों के लिए = मौलिक अधिकारों के साथ कानूनी अधिकारों के लिए भी।
III. प्रकृति - यह स्वयं एक मौलिक अधिकार है = यह एक विवेकाधीन शक्ति है।
IV. सीमा - पूरे भारत पर प्रभावी = संबंधित राज्य की सीमा तक।
संविधान का भाग IV, राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP) Artical 36 से 51 तक -
संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy - DPSP) का वर्णन है। इन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया है।
DPSP वे आदर्श या निर्देश हैं जिन्हें राज्य (सरकार) को नीतियां बनाते और कानून लागू करते समय ध्यान में रखना चाहिए।
DPSP की विशेषताएँ -
I. गैर-न्यायोचित (Non Justiciable) - यदि सरकार इनका पालन नहीं करती है तो मौलिक अधिकारों की तरह इनके लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता।
DPSP के उद्देश्य (Welfare State) - भारत में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना और आर्थिक-सामाजिक लोकतंत्र लाना ही इसका मुख्य उद्देश्य है।
DPSP का आधार - अनुच्छेद 37 कहता है कि ये तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं।
अनुच्छेदों का विस्तृत वर्गीकरण
अध्ययन की सुविधा के लिए इन्हें तीन विचारधाराओं में बांटा जाता है:
1. समाजवादी सिद्धांत - इनका लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है। अनुच्छेद 38, 39, 39A, 41, 42 एवं 43।
2. गांधीवादी सिद्धांत - आत्मनिर्भरता के सपनों पर आधारित, शोषण मुक्त वास्तविक स्वराज की स्थापना। अनुच्छेद 40, 43, 46, 47 एवं 48।
3. उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal-Intellectual Principles)
ये आधुनिक और उदारवादी दृष्टिकोण पर आधारित हैं।
अनुच्छेद 44, 45, 48A, 49, 50 एवं 51।
मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक तत्व में पारंपरिक तुलना -
मौलिक अधिकार (FR = नीति निदेशक तत्व (DPSP)
I. FR नकारात्मक (राज्य को कुछ न करने के निर्देश) = DPSP सकारात्मक हैं (राज्य को कुछ करने का निर्देश देते हैं)।
II. न्यायालय में परिवर्तनीयता - Y = No
III. उद्देश्य - राजनीतिक लोकतंत्र = सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र।
IV. कल्याण का क्षेत्र - व्यक्तिगत = सामाजिक/सामुदायिक
केस लॉ-
मिनर्वा मिल्स केस (1980) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन की नींव पर खड़ा है।
संविधान का अनुच्छेद 35 - मौलिक अधिकारों (भाग III) को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की अनन्य शक्ति प्रदान करता है।
1. संसद की अनन्य शक्ति - अनुच्छेद 35 यह सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकारों से संबंधित कानून पूरे देश में एक समान हों। इसलिए, यह शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं। भले ही कोई विषय राज्य सूची में आता हो, लेकिन अगर वह मौलिक अधिकार को प्रभावी बनाने से जुड़ा है, तो कानून केवल संसद बनाएगी।
2. कानून के विषय -
अनुच्छेद 35 के तहत संसद निम्नलिखित मामलों में दंड या प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए कानून बनाती है:
I. अनुच्छेद 16(3) - किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में रोजगार के लिए निवास। की शर्त निर्धारित करना या हटाना।
II. अनुच्छेद 32(3) - सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अलावा अन्य निचली अदालतों को रिट जारी करने की शक्ति देना।
III. अनुच्छेद 33 - सशस्त्र बलों, पुलिस आदि के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करना।
III. अनुच्छेद 34 - मार्शल लॉ (सैन्य शासन) के दौरान किए गए कार्यों को क्षतिपूर्ति प्रदान करना।
दंडात्मक कानून - उन कृत्यों हेतु दंड निर्धारित करना जिन्हें मौलिक अधिकारों के तहत अपराध घोषित किया गया है, जैसे
1. अनुच्छेद 17 - अस्पृश्यता का उन्मूलन।
2. अनुच्छेद 23 - मानव तस्करी और जबरन श्रम पर रोक।
3. पहले से मौजूद कानूनों की निरंतरता - अनुच्छेद 35 यह भी प्रावधान करता है कि संविधान लागू होने से पहले मौजूद कोई भी कानून (जो इन विषयों से संबंधित है) तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि संसद उसमें बदलाव या उसे निरस्त न कर दे।
उदाहरण - संसद ने अनुच्छेद 35 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए ही निम्नलिखित कानून बनाए हैं -
1. अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 (अब नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कहा जाता है)।
2. बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976।
अनुच्छेद 35 का महत्व - यह अनुच्छेद संविधान की संघीय संरचना में भी मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए केंद्रीकरण सुनिश्चित करता है। यदि हर राज्य अपने अलग-अलग दंड या नियम बनाता, तो मौलिक अधिकारों की एकरूपता समाप्त हो जाती।
अनुच्छेद 36 नीति निर्देशक तत्व का प्रवेश द्वार - यह अनुच्छेद बहुत छोटा है लेकिन इसका कानूनी महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि यह परिभाषित करता है कि इन निर्देशों का पालन करने की जिम्मेदारी किसकी है।
अनुच्छेद 36 की परिभाषा - इस भाग (भाग IV) में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, राज्य का वही अर्थ है जो भाग III (मौलिक अधिकार) के अनुच्छेद 12 में है। - भारत का संविधान
यह अनुच्छेद 36 खुद कोई नीति बताने के स्थान पर नीति निदेशक तत्वों को लागू करने हेतु राज्य शब्द का अर्ध अनुच्छेद 12 के अनुसार है।
राज्य -
चूँकि यह अनुच्छेद 12 के अनुसार -
I. भारत सरकार और संसद - केंद्र सरकार के सभी विभाग, लोकसभा/राज्यसभा।
II. राज्य सरकार और विधानमंडल - सभी राज्यों की सरकारों के विभाग एवं विधानसभा/विधानपरिषद।
III. स्थानीय प्राधिकारी - नगरपालिकाएं, पंचायतें, जिला बोर्ड, सुधार न्यास आदि।
IV. अन्य प्राधिकारी - ऐसी वैधानिक या गैर-वैधानिक संस्थाएं जो सरकारी शक्तियों का प्रयोग करती हैं, जैसे LIC, ONGC, SAIL, विश्वविद्यालय आदि।
अनुच्छेद 36 का महत्व -
I. जवाबदेही तय करना - यह स्पष्ट करता है कि केवल केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि एक छोटे गांव की पंचायत भी अपनी नीतियां बनाते समय अनुच्छेद 36 से 51 तक दिए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखने हेतु बाध्य है।
II. एकरूपता - मौलिक अधिकारों (भाग III) और नीति निदेशक तत्वों (भाग IV) के बीच परिभाषा की एकरूपता बनाए रखता है।
III. व्यापकता - यह अनुच्छेद राज्य की परिभाषा को इतना व्यापक बनाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोई भी संस्था इन कल्याणकारी सिद्धांतों से बच नहीं सकती।
विशेष - संसाधनों का उचित वितरण (अनुच्छेद 39) या ग्राम पंचायतों का गठन (अनुच्छेद 40) करना इन सभी निकायों का सामूहिक संवैधानिक लक्ष्य है।
अनुच्छेद 37, DPSP लागू करने हेतु कानूनी प्रक्रिया का मार्गदर्शक - यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि इन सिद्धांतों की कानूनी प्रकृति क्या है और शासन में इनकी भूमिका क्या होगी।
1. गैर-न्यायोचित प्रकृति (Non-Justiciable) - अनुच्छेद 37 का पहला हिस्सा कहता है कि इस भाग में दिए गए प्रावधान किसी भी न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं होंगे। अर्थात यदि सरकार अनुच्छेद 38 (कल्याण) या अनुच्छेद 41 (काम का अधिकार) को लागू नहीं करती है, तो मौलिक अधिकारों की तरह अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सीधे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में वाद दायर नहीं किया जा सकता।
कारण - संविधान निर्माताओं का मानना था कि भारत के पास उस समय इतने वित्तीय संसाधन नहीं थे कि हर सामाजिक-आर्थिक अधिकार को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जा सके।
2. शासन में मूलभूत - अनुच्छेद 37 का दूसरा हिस्सा कहता है कि फिर भी, इसमें दिए गए तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं।
अर्थात भले ही कोई नागरिक कोर्ट न जा सकें परंतु सरकार का नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है कि वो जब भी कोई कानून या योजना बनाए DPSP के सिद्धांतों के आधार पर बनाए। यह राज्य के लिए गाइड की तरह काम करता है।
3. कानून बनाने का कर्तव्य - अनुच्छेद 37 का अंतिम हिस्सा कहता है कि कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। अर्थात संसद या विधानसभा जब भी कोई नया बिल लाती है, तो उसे यह देखना होता है कि वह DPSP (जैसे अनुच्छेद 44 - समान नागरिक संहिता या अनुच्छेद 47 - जन स्वास्थ्य) के उद्देश्यों को पूरा कर रहा है या नहीं।
विशेष - अनुच्छेद 37 को सरकार का घोषणापत्र कहा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों (जैसे केसवानंद भारती केस) में कहा है कि भले ही DPSP कोर्ट द्वारा लागू नहीं किए जा सकते, लेकिन किसी कानून की व्याख्या करते समय यह तत्व न्यायालय के लिए अति महत्वपूर्ण होते हैं।
अनुच्छेद 38 (लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का घोषणापत्र - अनुच्छेद 38 भारत को लोक कल्याणकारी राज्य घोषित करता है। यह अनुच्छेद राज्य को निर्देश देता है कि राज्य का काम केवल कानून व्यवस्था बनाना ही नहीं, जनता के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान हेतु सक्रिय रूप से काम करे।
1. अनुच्छेद 38(1) - सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा - यह राज्य को निर्देश देता है कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाए जिसमें
I. न्याय - सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक—जीवन की सभी संस्थाओं को सूचित करे।
II. लोक कल्याण - जनता के कल्याण की अभिवृद्धि करना राज्य का प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए।
अनुच्छेद 38(1) का महत्व - यह भाग प्रस्तावना में दिए गए न्याय के वादे को धरातल पर उतारने का प्रयास करता है।
2. अनुच्छेद 38(2) असमानताओं को कम करना - 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा जोड़ा गया। यह राज्य को विशेष रूप से निर्देश देता है कि वह -
I. आय की असमानता - अमीर और गरीब के बीच की खाई को कम करने का प्रयास करे।
II. प्रतिष्ठा और अवसर की असमानता - केवल व्यक्तियों के बीच ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को समाप्त करने का प्रयास करे।
अनुच्छेद 38 का व्यावहारिक प्रभाव - सरकार की कई योजनाएं इसी अनुच्छेद को लागू करने के लिए बनाई जाती हैं, जैसे -
I. आरक्षण प्रणाली - अवसरों की असमानता को कम करना
II. न्यूनतम मजदूरी कानून - आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना।
III. आयुष्मान भारत या राशन योजना - लोक कल्याण में अभिवृद्धि करना।
IV. सुविधाएं - चिकित्सा सुविधाएं, परिवहन आदि
केस लॉ-
भीम सिंह बनाम भारत संघ
इस मामले में कोर्ट ने माना कि सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों के जीवन स्तर को सुधारना है।
अनुच्छेद 39 आर्थिक समानता हेतु निर्देश - यह राज्य को कुछ ऐसी विशिष्ट नीतियों का पालन करने का निर्देश देता है जो देश में आर्थिक न्याय और संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करती हैं।
I. 39(a) आजीविका के साधन - राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का समान अवसर प्राप्त हों।
II. 39(b) संसाधनों का वितरण - देश में भौतिक संसाधनों पर स्वामित्व व नियंत्रण इस प्रकार से हो जिससे सामूहिक हित सबसे अच्छी तरह सध सके।
इसी अनुच्छेद के आधार पर सरकार ज़मींदारी उन्मूलन और राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठाती है।
III. 39(c) - धन के संकेंद्रण पर रोक - राज्य ऐसी आर्थिक व्यवस्था चलाएगा जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो।
IV. 39(d) - समान कार्य के लिए समान वेतन - पुरुषों और स्त्रियों दोनों को एक ही जैसे कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए। यह लैंगिक समानता की दिशा में बहुत बड़ा कदम है।
V. 39(e) - श्रमिकों और बच्चों का स्वास्थ्य - राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति का, तथा बच्चों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे कार्यों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों।
VI. 39(f) बच्चों का गरिमामय विकास - बच्चों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और उनका शोषण न हो। (इस अनुच्छेद में 42वें संशोधन, 1976 द्वारा सुधार किया गया)।
अनुच्छेद 39A, समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता - इसे 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा अलग से जोड़ा गया -
∆. यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित न रह जाए।
∆. राज्य गरीबों के लिए नि:शुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।
इसी के अधीन RALSA, DLSA, PLV, लोक अदालत आदि का गठन किया गया है।
कानूनी महत्व (केस लॉ)
अनुच्छेद 31C के अंतर्गत अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने हेतु बनाए गए कानूनों को अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 19 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
रणधीर सिंह बनाम भारत संघ
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि समान कार्य के लिए समान वेतन मौलिक अधिकार नहीं है परन्तु अनुच्छेद 14, 16 और 39(d) को मिलाकर यह संवैधानिक लक्ष्य और अधिकार बन जाता है।
अनुच्छेद 40 गांधी का ग्राम स्वराज - महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने हेतु राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश देता है।
1. अनुच्छेद 40 का प्रावधान - राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने हेतु कदम उठाएगा और उन्हें ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक हों।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -
I. गांधीवादी दर्शन - गांधीजी का मानना था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और जब तक गाँवों के पास अपनी शक्ति नहीं होगी, तब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं आएगा।
II. संविधान सभा में बहस - डॉ. बी.आर. अम्बेडकर शुरू में पंचायतों के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उन्हें डर था कि इससे स्थानीय स्तर पर जातिवाद बढ़ेगा। लेकिन गांधीवादी सदस्यों (के. संथानम) के आग्रह पर इसे अनुच्छेद 40 के रूप में नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया गया।
3. अनुच्छेद 40 से 73वें संशोधन तक का सफर - शुरुआत में अनुच्छेद 40 केवल एक निर्देश था, जिसे लागू करना सरकार के लिए अनिवार्य नहीं था। लेकिन इसे पूरी तरह प्रभावी बनाने हेतु 73वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992) लाया गया।
I. पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
II. संविधान में भाग IX और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
4. अनुच्छेद 40 का महत्व -
I. लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण - शक्ति को केंद्र और राज्य से निकालकर सीधे जनता (गाँव) के हाथों में पहुँचाना।
II. स्थानीय विकास - गाँव की समस्याओं का समाधान गाँव के लोग ही बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
III. नेतृत्व का विकास - निचले स्तर से नए राजनेताओं और नेतृत्व को उभरने का मौका मिलता है।
विशेष तथ्य - भारत में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत सबसे पहले 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई।
अनुच्छेद 41 आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा - राज्य को यह निर्देश देता है कि वह अपनी आर्थिक क्षमताओं के भीतर नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे। यह विशेष रूप से समाज के उन वर्गों की मदद करने की बात करता है जो परिस्थितियों के कारण स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं।
मुख्य बिंदु -
1. अनुच्छेद 41 के तहत तीन प्रमुख अधिकार - राज्य आर्थिक सीमा और विकास की मर्यादा के भीतर निम्नलिखित को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा -
I. काम पाने का अधिकार (Right to Work) - राज्य ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करेगा जिससे लोगों को रोजगार मिल सके।
II. शिक्षा पाने का अधिकार (Right to Education) - सभी नागरिकों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना।
III. लोक सहायता पाने का अधिकार (Right to Public Assistance) - यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो विशिष्ट स्थितियों में सरकारी मदद की बात करता है।
2. लोक सहायता के पात्रता - अनुच्छेद 41 स्पष्ट करता है कि निम्नलिखित स्थितियों में राज्य को नागरिक की मदद करनी चाहिए -
I. बेरोजगारी - यदि कोई व्यक्ति काम करने के योग्य है पर काम नहीं मिल रहा। (बेरोजगारी भत्ता)
II. बुढ़ापा - बुजुर्गों की देखभाल और उनकी आर्थिक सुरक्षा। (वृद्धावस्था पेंशन एवं वृद्धाश्रम)
III. बीमारी - स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में सहायता। (चिरंजीवी एवं आयुष्मान योजना)
IV. नि:शक्तता - दिव्यांग जनों को सहायता और अवसर प्रदान करना। (विकलांग पेंशन, पालनहार योजना एवं अन्य ऋण।
3. अनुच्छेद 41 का व्यावहारिक कार्यान्वयन - भारत सरकार ने इस अनुच्छेद को लागू करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं -
I. MGNREGA (मनरेगा) - काम पाने के अधिकार को कानूनी रूप देने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिन के रोजगार की गारंटी। अब यह योजना बदलकर VB GRAM G हो गई है।
II. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) - इसके तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, विधवा पेंशन योजना और विकलांगता पेंशन योजना चलाई जाती है।
III. शिक्षा का अधिकार (RTE) - 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा (अब अनुच्छेद 21A के तहत मौलिक अधिकार भी है)।
अनुच्छेद 41 का महत्व -
न्यायालयों ने माना है कि जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21) तब तक अधूरा है जब तक व्यक्ति के पास गरिमा के साथ जीने के लिए काम और बुनियादी सहायता न हो।
मनुभाई डोडिया बनाम गुजरात राज्य
के मामले में कहा गया कि राज्य को बुजुर्गों और बीमारों के लिए यथासंभव सहायता योजनाएं बनानी चाहिए।
अनुच्छेद 42 - कामकाजी लोगों के कार्यस्थल (विशेषकर महिला) पर स्थितियां - यह अनुच्छेद राज्य को निर्देश देता है कि वह नागरिकों को केवल रोजगार ही न दे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि दिया गया रोजगार मानवीय गरिमा के अनुकूल हो। इसके दो प्रावधान हैं -
1. काम की न्यायसंगत और मानवीय दशाएँ - राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा कि कार्यस्थल पर स्थितियाँ मनुष्य के काम करने के योग्य ऐसी हो।
I. सुरक्षित वातावरण - काम की जगह पर जान-माल का खतरा न हो।
II. उचित कार्य घंटे - काम के घंटे तय हों और बीच में आराम का समय मिले।
III. गरिमापूर्ण व्यवहार - कर्मचारी के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो।
2. प्रसूति सहायता - यह राज्य को निर्देश देता है कि वह गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसूति सहायता एवं के प्रावधान करे।
छः माह का प्रसूति अवकाश, 2 वर्ष चाइल्ड केयर अवकाश इसी के अंतर्गत देय हैं)
उद्देश्य - महिला की सेहत और उसके होने वाले बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
महत्व - यह पहचानता है कि मातृत्व एक सामाजिक जिम्मेदारी है और इसके दौरान महिला को आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।
अनुच्छेद 42 का व्यावहारिक कार्यान्वयन - सरकार ने इस अनुच्छेद को लागू करने के लिए कई ऐतिहासिक कानून बनाए हैं:
I. मातृत्व लाभ अधिनियम,1961 - इसके तहत कामकाजी महिलाओं को छः माह का सवेतन मातृत्व अवकाश दिया जाता है। (2017 में संशोधन के बाद इसे बढ़ाकर 26 हफ्ते कर दिया गया है)।
II. कारखाना अधिनियम, 1948 - यह कारखानों में काम करने की स्थितियों, स्वच्छता, सुरक्षा और काम के घंटों को नियंत्रित करता है।
III. ईएसआई (ESI) योजना - श्रमिकों को बीमारी और गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा सहायता प्रदान करना।
केस लॉ -
नगरपालिका परिषद, दिल्ली बनाम फीमेल वर्कर्स (मस्टर रोल), 2000
के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अनुच्छेद 42 के तहत प्रसूति सहायता का अधिकार केवल स्थायी कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि दिहाड़ी पर काम करने वाली महिलाओं को भी मिलना चाहिए। मातृत्व लाभ देना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है।
अनुच्छेद 43 श्रमिकों के आर्थिक और सामाजिक अधिकारों दस्तावेज - यह अनुच्छेद राज्य को निर्देश देता है कि वह केवल न्यूनतम वेतन तक सीमित न रहे, बल्कि श्रमिकों को निर्वाह मजदूरी दिलाने का प्रयास करे।
अनुच्छेद 43 के प्रावधान -
1. निर्वाह मजदूरी और शिष्ट जीवन स्तर - अनुच्छेद 43 कहता है कि राज्य कानून या आर्थिक संगठन के माध्यम से सभी श्रमिकों (खेतीहर, औद्योगिक या अन्य) हेतु सुनिश्चित करेगा -
I. निर्वाह मजदूरी - यह न्यूनतम मजदूरी से ऊपर की चीज़ है। इसमें न केवल भोजन और छत शामिल है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा भी शामिल है।
II. शिष्ट जीवन स्तर - श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले।
III. अवकाश का पूर्ण उपयोग - काम के बाद उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय और अवसर प्राप्त हो।
2. कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन - यह अनुच्छेद भी गांधी दर्शन पर आधारित है।
यह कहता है कि राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 43 के दो नए उप-भाग (43A और 43B) संविधान में संशोधनों के माध्यम से श्रमिकों और सहकारी संस्थाओं के लिए दो और महत्वपूर्ण निर्देश जोड़े गए -
I. अनुच्छेद 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी) - इसे 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए।
II. अनुच्छेद 43B (सहकारी समितियों का प्रोत्साहन) - इसे 97वें संशोधन (2011) द्वारा जोड़ा गया। यह राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन और लोकतांत्रिक नियंत्रण को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
अनुच्छेद 43 का व्यावहारिक कार्यान्वयन - सरकार ने इन अनुच्छेदों को लागू करने के लिए कई कदम उठाए हैं:
I. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम - विभिन्न क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन तय करना।
II. खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) - ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना।
III. श्रमिक संघ - श्रमिकों को प्रबंधन में अपनी बात रखने का अधिकार देना।
केस लॉ -
मैसर्स क्राउन एल्युमीनियम वर्क्स
उनके श्रमिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी उद्योग जो अपने श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी देने में सक्षम नहीं है, उसे अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 43 राज्य पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह धीरे-धीरे निर्वाह मजदूरी के लक्ष्य की ओर बढ़े।
अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता - यह अनुच्छेद समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) की बात करता है, अर्थात एक देश, एक कानून।
1. अनुच्छेद 44 के प्रावधान - राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
2. समान नागरिक संहिता का अर्थ -
वर्तमान में, भारत में दो तरह के कानून हैं -
I. आपराधिक और नागरिक कानून - जैसे IPC (अब भारतीय न्याय संहिता BNS) और अनुबंध कानून। ये सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।
II. व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) - विवाह, तलाक, गोद लेना, विरासत और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामले धर्म के आधार पर तय होते हैं (जैसे हिंदू पर्सनल लॉ, मुस्लिम पर्सनल लॉ आदि)।
अनुच्छेद 44 का लक्ष्य इन पर्सनल लॉ को हटाकर सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक समान पारिवारिक कानून बनाना है।
3. अनुच्छेद 44 विवाद के कारण -
पक्ष में तर्क - यह लैंगिक समानता सुनिश्चित करेगा, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करेगा और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगा।
विपक्ष में तर्क - आलोचकों का मानना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 से 28) का उल्लंघन कर सकता है और अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर सकता है।
4. केस लॉ -
I. शाह बानो केस (1985) - सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 44 केवल एक मृत पत्र बनकर रह गया है और सरकार को इसे लागू करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए।
II. सरला मुद्गल केस (1995) - कोर्ट ने दोहराया कि व्यक्तिगत कानूनों में विरोधाभास के कारण न्याय में बाधा आती है, इसलिए UCC की आवश्यकता है।
III. शायरा बानो केस 1984 - भरण पोषण, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भरण पोषण को पर्सनल लॉ से अलग रखा।
5. वर्तमान स्थिति -
I. गोवा - पूरे भारत में गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुर्तगाली शासन के समय से ही समान नागरिक संहिता (Goa Civil Code) लागू है।
II. उत्तराखंड - हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा ने समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया है, जिससे वह इसे लागू करने वाला स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बनने की राह पर है।
अनुच्छेद 45 बच्चों की शिक्षा और उनकी देखभाल - यह अनुच्छेद समय के साथ बदला है और भारत में शिक्षा के अधिकार की नींव रखने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका रही है।
अनुच्छेद 45 के प्रावधान -
1. अनुच्छेद 45 का वर्तमान स्वरूप
86वें संविधान संशोधन (2002) के बाद, अब यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य सभी बच्चों को, जब तक कि वे छह वर्ष की आयु पूरी नहीं कर लेते, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा देने के लिए प्रयास करेगा।
2. अनुच्छेद 45 में बदलाव का इतिहास -
I. मूल संविधान: शुरू में अनुच्छेद 45 में कहा गया था कि राज्य संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देगा।
II. 86वां संशोधन (2002) - इस संशोधन ने शिक्षा के अधिकार को दो भागों में बांट दिया
A. 0 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए - इनके लिए प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा को अनुच्छेद 45 (DPSP) में ही रहने दिया गया। (आंगनबाड़ी, बालवाड़ी एवं ECCE)
B. 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए - इसे अनुच्छेद 21A के तहत मौलिक अधिकार बना दिया गया। (RTE)
3. प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा (ECCE) की आवश्यकता - विद्वानों का मानना है कि बच्चे के मस्तिष्क का 85% विकास 6 वर्ष की आयु तक हो जाता है। इसलिए अनुच्छेद 45 राज्य को निर्देश देता है कि -
I. बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण का ध्यान रखा जाए ताकि वे स्वस्थ नागरिक बन सकें।
II. उन्हें स्कूल जाने से पहले की शिक्षा दी जाए।
4. व्यावहारिक कार्यान्वयन - सरकार ने इस अनुच्छेद को लागू करने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम चलाया है:
I. ICDS, एकीकृत बाल विकास योजना - इसके तहत आंगनवाड़ी एवं मातृत्व सुरक्षा केंद्र खोले गए हैं।
II. आंगनवाड़ी - यहाँ 0-6 वर्ष के बच्चों, धात्री एवं गर्भवती महिलाओं को पूरक पोषण, टीकाकरण और बच्चों के लिए स्कूल-पूर्व शिक्षा की व्यवस्था की गई है।
III. नई शिक्षा नीति (NEP 2020) - इसमें 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए औपचारिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है, जो सीधे अनुच्छेद 45 से प्रेरित है।
केस लॉ-
उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य,1993 - के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है। इसी फैसले ने सरकार को 86वां संशोधन करने और अनुच्छेद 45 की भाषा बदलने के लिए प्रेरित किया।
अनुच्छेद 46 कमजोर वर्ग के उत्थान हेतु - समाज के सबसे कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के शैक्षिक और आर्थिक उत्थान के लिए राज्य की विशेष जिम्मेदारी तय करता है।
यह अनुच्छेद सामाजिक न्याय की दिशा में शक्तिशाली निर्देश है।
1. अनुच्छेद 46 के मुख्य प्रावधान - राज्य समाज के कमजोर वर्गों )विशेष रूप से SC और ST) के हितों की रक्षा हेतु निम्नलिखित कार्य करेगा -
I. शैक्षिक हित - उनकी शिक्षा के लिए विशेष छात्रवृत्तियाँ, स्कूल और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना।
II. आर्थिक हित - उन्हें रोजगार के अवसर, वित्तीय सहायता और शोषण मुक्त व्यापार/कृषि के साधन उपलब्ध कराना।
III. सामाजिक न्याय - उन्हें हर प्रकार के सामाजिक अन्याय और शोषण (जैसे बेगार, भेदभाव) से बचाना।
2. कमजोर वर्ग का अर्थ - अनुच्छेद 46 में विशेष रूप से SC और ST का उल्लेख है, लेकिन इसमें अन्य कमजोर वर्ग भी शामिल हैं। इसमें OBC और आर्थिक रूप से पिछड़े लोग (EWS) भी आ सकते हैं।
3. व्यावहारिक कार्यान्वयन - सरकार ने इस अनुच्छेद को लागू करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं:
I. आरक्षण - शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में SC /ST को आरक्षण देना।
SC (अनुसूचित जाति) - 15%
ST (अनुसूचित जनजाति) - 7.5%
OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) 27%
EWS (आर्थिक पिछड़ा वर्ग) - 10%
SBC (विशेष पिछड़ा वर्ग) - राजस्थान में 5%
छात्रवृत्तियाँ - पोस्ट-मैट्रिक और प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजनाएं।
विशेष कानून -
I. SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 - यह कानून सीधे तौर पर अनुच्छेद 46 के सामाजिक अन्याय और शोषण से संरक्षण के निर्देश को पूरा करता है।
II. मुफ्त कोचिंग और लोन - प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सहायता और कम ब्याज पर ऋण।
III. अनुप्रीति योजना - अध्ययनरत छात्रों के लिए निजी हॉस्टल एवं कोचिंग शुल्क
केस लॉ - अनुच्छेद 46 का के कारण ही कोर्ट आरक्षण और विशेष सुविधाओं को अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन नहीं मानता।
चंपकम दोरईराजन बनाम मद्रास राज्य (1951)
के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 46) मौलिक अधिकारों को दरकिनार नहीं कर सकते। लेकिन बाद में प्रथम संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, ताकि राज्य SC/ST के लिए विशेष प्रावधान कर सके, जो सीधे तौर पर अनुच्छेद 46 के लक्ष्यों को पूरा करता है।
अनुच्छेद 47 लोक स्वस्थ - नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन स्तर को ऊपर उठाना। यह अनुच्छेद लोक स्वास्थ्य को शासन का अनिवार्य हिस्सा बनाता है।
अनुच्छेद 47 के प्रावधान -
1. राज्य के स्वास्थ्य संबंधी तीन कर्तव्य - अनुच्छेद 47 राज्य को निम्नलिखित लक्ष्यों को प्राप्त करने का निर्देश देता है -
I. पोषण स्तर - लोगों के खान-पान और पोषण की गुणवत्ता को बढ़ाना।
II. जीवन स्तर - नागरिकों के जीने की परिस्थितियों में सुधार करना।
III. लोक स्वास्थ्य का सुधार - स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और बेहतर बनाना।
2. नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध - इस अनुच्छेद का दूसरा भाग गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित है और सामाजिक सुधार की बात करता है - स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेयों (जैसे शराब) और औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा। अर्थात दवाओं के उपयोग के आलावा नशे पर रोक लगाई जाएगी।
3. अनुच्छेद 47 व्यावहारिक कार्यान्वयन - भारत में सरकार ने इस अनुच्छेद को लागू करने के लिए कई नीतियां बनाई हैं:
I. शराब बंदी - बिहार, गुजरात, और मिजोरम जैसे राज्यों में जो शराब बंदी लागू है, उसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 47 ही है।
II. मिड-डे मील - स्कूलों में बच्चों के पोषण स्तर को सुधारने के लिए।
III. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) - सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए।
IV. खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) - गरीबों को सस्ता अनाज देकर कुपोषण से लड़ने हेतु सहायता।
V. नशा मुक्ति अभियान - दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रम।
केस लॉ - सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
स्टेट ऑफ बॉम्बे बनाम एफ.एन. बलसारा
के मामले में कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 47 राज्य को शक्ति देता है कि वह नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध लगा सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि चूँकि यह लोक स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए राज्य इस पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है और इसे अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
अनुच्छेद 48 कृषि एवं पशुपालन - यह अनुच्छेद आधुनिक वैज्ञानिक ढंग से कृषि और पशुपालन के साथ सांस्कृतिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जड़ों (विशेषकर गोवंश संरक्षण) को जोड़ता है।
अनुच्छेद के दो मुख्य उद्देश्य -
1. कृषि और पशुपालन का आधुनिकरण - राज्य यह प्रयास करेगा कि कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों के आधार पर संगठित किया जाए। अर्थात नई तकनीकों का उपयोग, उन्नत बीजों का वितरण, और पशुओं की नस्ल सुधारने हेतु वैज्ञानिक तरीकों को बढ़ावा देना।
2. पशु नस्लों का संरक्षण और वध पर रोक - इस अनुच्छेद का दूसरा भाग गांधी दर्शन से प्रेरित है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था हेतु महत्वपूर्ण है। यह राज्य को निर्देश देता है कि -
I. पशु नस्ल सुधार - राज्य गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू या वाहक पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए विशेष कदम उठाएगा।
II. पशु वध पर रोक - राज्य दुधारू एवं वाहक पशुओं के वध का प्रतिषेध करने के लिए कानून बनाएगा।
अनुच्छेद 48A - पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा - इसे 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा अलग से जोड़ा गया।
I. वन एवं पर्यावरण संरक्षण - यह राज्य को निर्देश देता है कि वह देश के पर्यावरण के संरक्षण व संवर्धन का तथा वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करे।
अनुच्छेद 48 व्यावहारिक कार्यान्वयन -
1. गोवंश वध निषेध कानून - भारत के कई राज्यों (जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि) ने अनुच्छेद 48 की भावना को लागू करने के लिए गोवंश वध पर प्रतिबंध लगाने वाले कड़े कानून बनाए हैं।
2. श्वेत क्रांति - पशुओं की नस्ल सुधारने और दूध उत्पादन बढ़ाने के सरकारी प्रयास। डेयरी विकास कार्यक्रम।
3. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 - यह अनुच्छेद 48A को प्रभावी बनाने के लिए बनाया गया प्रमुख कानून है।
केस लॉ -
एम.एच. कुरैशी बनाम बिहार राज्य, 1958
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि
I. गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध संवैधानिक रूप से वैध है क्योंकि यह अनुच्छेद 48 के निर्देशों के अनुरूप है।
II. जो पशु अब दुधारू या काम के नहीं रहे उनके वध पर प्रतिबंध लगाने के आर्थिक पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए।
मिराजकर केस और अन्य फैसलों में कोर्ट ने गोवंश संरक्षण को और अधिक प्राथमिकता दी।
अनुच्छेद 49 सांस्कृतिक विरासत संरक्षण - यह अनुच्छेद भारत की सांस्कृतिक विरासत और इतिहास को सुरक्षित रखने हेतु राज्य की जिम्मेदारी तय करता है। भारत में, प्राचीन सभ्यता के अवशेष हर कोने में मौजूद हैं उनका संरक्षण सरकार का दायित्व है।
अनुच्छेद 49 के प्रावधान -
1. राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण - अनुच्छेद 49 के अनुसार संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत राष्ट्रीय महत्व के स्मारक घोषित किए गए प्रत्येक स्मारक, स्थान या वस्तु की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य होगा। राज्य को इन संपत्तियों को निम्नलिखित स्थितियों से बचाना होगा -
I. लुंठन - लूटपाट या नुकसान से बचाना।
II. विरूपण - उन्हें गंदा करने या उनकी बनावट बदलने से रोकना।
III. विनाश - उन्हें नष्ट होने से बचाना।
IV. अपसरण - उन्हें उनके मूल स्थान से हटाए जाने से रोकना।
V. निर्यात - ऐतिहासिक वस्तुओं को अवैध रूप से देश से बाहर ले जाने से रोकना।
2. राष्ट्रीय महत्व का क्या अर्थ - हर पुरानी इमारत अनुच्छेद 49 के दायरे में नहीं आती। इसके लिए संसद को कानून बनाकर उस स्थान या वस्तु को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करना होता है। एक बार घोषित होने के बाद, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार की हो जाती है।
3. व्यावहारिक कार्यान्वयन - इस अनुच्छेद को प्रभावी बनाने के लिए भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं -
I. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) - यह संस्था अनुच्छेद 49 के तहत स्मारकों के रखरखाव और सुरक्षा का कार्य करती है।
II. प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 - इस अधिनियम के माध्यम से सरकार किसी स्थल को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करती है और उसके संरक्षण के नियम तय करती है।
विरासत शहर विकास योजना (HRIDAY) - ऐतिहासिक शहरों की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए उनका विकास करना।
केस लॉ - न्यायालयों ने कई बार कहा है कि हमारी विरासत भावी पीढ़ियों की अमानत है।
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (ताज ट्रैपेज़ियम केस)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 49 और 48A का संदर्भ लेते हुए ताजमहल को प्रदूषण से बचाने हेतु कड़े निर्देश दिए। कोर्ट का मानना है कि राष्ट्रीय स्मारकों की रक्षा करना न केवल राज्य का कर्तव्य है, बल्कि यह नागरिकों के गरिमामय जीवन के अधिकार से भी जुड़ा है।
अनुच्छेद 50 न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं शक्तियों का पृथक्करण - यह अनुच्छेद सुनिश्चित करता है कि न्याय करने वाले लोग और कानून लागू करने वाले लोग एक-दूसरे से स्वतंत्र रहें।
1. अनुच्छेद 50 के प्रावधान - राज्य की लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा। अर्थात अदालतों के कामकाज में सरकार (संसद, मंत्रियों या अधिकारियों) का कोई हस्तक्षेप न हो।
2. पृथक्करण क्यों -
I. निष्पक्ष न्याय - यदि न्याय करने वाला व्यक्ति सरकार के अधीन होगा, तो वह सरकार के खिलाफ फैसला सुनाने में डरेगा।
II. भ्रष्टाचार पर रोक - शक्तियों के बंटवारे से सत्ता का दुरुपयोग कम होता है।
III. व्यक्तिगत स्वतंत्रता - नागरिकों के अधिकारों की रक्षा तभी हो सकती है जब अदालतें स्वतंत्र और निडर हों।
3. ऐतिहासिक बदलाव और कार्यान्वयन - आजादी से पहले और संविधान लागू होने के कुछ समय बाद तक कई मामलों में जिला कलेक्टर (DM) के पास न्यायिक शक्तियाँ भी होती थीं (वे दंड भी दे सकते थे)। लेकिन अनुच्छेद 50 की भावना को लागू करने के लिए -
I. दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC, 1973) - CPC के माध्यम से न्यायिक मजिस्ट्रेटों (JM) को पूरी तरह से उच्च न्यायालय के अधीन कर दिया गया और उन्हें कार्यपालिका (जैसे कलेक्टर या पुलिस) से अलग कर दिया गया।
II. वर्तमान स्थिति - अब जिले में न्याय का काम न्यायिक मजिस्ट्रेट देखते हैं और कानून-व्यवस्था का काम कार्यकारी मजिस्ट्रेट (जैसे DM/SDM) देखते हैं।
केस लॉ - सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 50 को संविधान का मूल ढांचा माना है।
केसवानंद भारती और बाद में चंद्र कुमार बनाम भारत संघ
के मामलों में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को किसी भी कानून द्वारा छीना नहीं जा सकता। यदि सरकार जजों की नियुक्ति या उनके फैसलों में हस्तक्षेप करती है, तो वह अनुच्छेद 50 और लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ होगा।
अनुच्छेद 51 विदेश नीति - यह भारत की विदेश नीति का संवैधानिक आधार है और पूरी दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत एक शांतिप्रिय राष्ट्र है जो वसुधैव कुटुम्बकम् (पूरी दुनिया एक परिवार है) के सिद्धांत में विश्वास रखता है।
अनुच्छेद 51 के चार स्तंभ (प्रावधान) - राज्य निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करेगा -
I. अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि - भारत दुनिया में शांति बनाए रखने और युद्धों को रोकने के प्रयासों का समर्थन करेगा।
II. राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानजनक संबंध - अलग-अलग देशों के बीच संबंध आपसी सम्मान और न्याय पर आधारित होने चाहिए, न कि ताकत के जोर पर।
III. अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधियों के प्रति आदर - भारत अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और विभिन्न देशों के बीच हुई संधियों का सम्मान करेगा।
IV. मध्यस्थता द्वारा विवादों का निपटारा - यदि दो देशों के बीच कोई विवाद होता है, तो भारत उसे युद्ध के बजाय बातचीत और मध्यस्थता से सुलझाने को प्राथमिकता देगा।
अनुच्छेद 51 का व्यावहारिक कार्यान्वयन -
I. पंचशील सिद्धांत - 1954 में भारत और चीन के बीच हुए समझौते के पांच सिद्धांत (जैसे एक-दूसरे की अखंडता का सम्मान और अहस्तक्षेप) अनुच्छेद 51 की ही भावना पर आधारित थे।
II. संयुक्त राष्ट्र (UN) - भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में से एक है, जो अनुच्छेद 51(a) के प्रति हमारी प्रतिबद्धता दिखाता है।
III. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) - शीत युद्ध के दौरान किसी भी गुट में शामिल न होकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना इसी अनुच्छेद से प्रेरित है।
केस लॉ-
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी विषय पर हमारे देश में कोई घरेलू कानून नहीं है, तो अंतर्राष्ट्रीय संधियों को तब तक कानून माना जा सकता है जब तक कि वे हमारे मौलिक अधिकारों के विरुद्ध न हों।
अनुच्छेद 51A मूल कर्तव्य - यह अनुच्छेद संविधान के भाग IV-A में स्थित है, जो नागरिकों के मूल कर्तव्यों का विवरण देता है। यह अनुच्छेद हमें याद दिलाता है कि यदि हमारे पास अधिकार हैं, तो देश के प्रति कुछ जिम्मेदारियाँ भी हैं।
अनुच्छेद 51A का विश्लेषण -
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -
I. मूल संविधान में अभाव - जब 1950 में संविधान लागू हुआ तब इसमें मूल कर्तव्य शामिल नहीं थे।
II. स्वर्ण सिंह समिति - आपातकाल के दौरान सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर इन्हें जोड़ने का निर्णय लिया गया।
III. 42वां संशोधन (1976) - इसके माध्यम से संविधान में अनुच्छेद 51A जोड़ा गया। शुरू में केवल 10 कर्तव्य थे।
IV. 86वां संशोधन (2002) - इसके द्वारा 11वां कर्तव्य (शिक्षा का कर्तव्य) जोड़ा गया।
2. 11 मूल कर्तव्यों की सूची - अनुच्छेद 51A के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह -
01. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
02. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
03. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
04. देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
05. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित भेदभाव से परे हो; ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं।
06. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे।
07. प्राकृतिक पर्यावरण की (जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं) रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे।
08. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।
09. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे।
10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।
11. शिक्षा का अवसर: 6 से 14 वर्ष तक की आयु के अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करे (यह अभिभावकों का कर्तव्य है)।
3. मूल कर्तव्यों की प्रकृति -
I. गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) - नीति निदेशक तत्वों की तरह, इन्हें भी सीधे तौर पर अदालत द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। अर्थात किसी नागरिक द्वारा इनका पालन न करने पर उसे सीधे जेल नहीं भेजा जा सकता (जब तक कि उस कर्तव्य से जुड़ा कोई अलग कानून न हो)।
II. केवल भारत के नागरिकों पर लागू - ये कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशियों पर नहीं।
4. केस लॉ -
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 51A(g) के तहत पर्यावरण की रक्षा करना न केवल राज्य का, बल्कि हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है।
व्यवहारिक कार्यान्वयन - भले ही ये सीधे तौर पर दंडनीय नहीं हैं, लेकिन संसद ने इनमें से कई कर्तव्यों को लागू करने के लिए कानून बनाए हैं -
I. राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 - राष्ट्रध्वज या संविधान का अपमान करने पर दंड का प्रावधान।
II. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 - पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए।
एक विधिक विचार - कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अनुच्छेद 300A संपत्ति का कानूनी अधिकार - संपत्ति को अनुच्छेद 31 के मौलिक अधिकारों की सूची से हटा कर अनुच्छेद 300A में कानूनी अधिकार की श्रेणी में रखा गया। यह अनुच्छेद हमें बताता है कि कैसे एक मौलिक अधिकार समय के साथ बदलकर केवल कानूनी अधिकार बन गया।
1. अनुच्छेद 300A के प्रावधान - किसी भी व्यक्ति को कानून के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। अर्थात सरकार किसी की ज़मीन या संपत्ति बिना उचित कारण के, जब तक कि उसके पास ऐसा करने के लिए कोई वैध कानून न हो छीन नहीं सकती। केवल एक कार्यकारी आदेश से संपत्ति नहीं ली जा सकती।
2. यह बदलाव क्यों -
I. 44वां संविधान संशोधन (1978) - मोरारजी देसाई (जनता पार्टी) की सरकार ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची (भाग III) से हटा दिया और इसे भाग XII में अनुच्छेद 300A के रूप में शामिल किया।
कारण - सरकार को भूमि सुधार लागू करने और विकास कार्य (जैसे सड़क, बांध बनाना) करने में कठिनाई हो रही थी, क्योंकि लोग मौलिक अधिकार का हवाला देकर हर बार कोर्ट चले जाते थे।
4. क्या अब सरकार कभी भी संपत्ति ले सकती है - नहीं, अनुच्छेद 300A अभी भी नागरिकों को सुरक्षा देता है। सरकार संपत्ति तभी ले सकती है जब -
I. कानूनी आधार हो - संसद या विधानसभा ने उस संबंध में कोई कानून बनाया हो।
II. सार्वजनिक प्रयोजन - संपत्ति निजी फायदे हेतु नहीं, जनता की भलाई (जैसे स्कूल, अस्पताल या हाईवे) हेतु ली जा रही हो।
III. मुआवजा - अनुच्छेद 300A में मुआवजा शब्द स्पष्ट नहीं है, अदालतों ने बार-बार कहा है कि संपत्ति लेने पर व्यक्ति को उचित मुआवजा मिलना ही चाहिए।
केस लॉ-
के.टी. प्लांटेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2011)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन यह अभी भी मानवाधिकार और संवैधानिक अधिकार बना हुआ है। इसे बिना किसी ठोस आधार के नहीं छीना जा सकता।
भाग V
केस लॉज -
01. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980 -
यह केस न केवल मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के बीच संतुलन को परिभाषित करता है, बल्कि संविधान के मूल ढांचे को भी मजबूत करता है।
केस के तथ्य पृष्ठभूमि- यह मामला 42वें संविधान संशोधन (1976) की वैधता को चुनौती देने के लिए लाया गया था।आपातकाल के दौरान किए गए इस संशोधन के माध्यम से तत्कालीन सरकार ने अनुच्छेद 31C का विस्तार कर दिया।
सरकार का तर्क - सरकार ने प्रावधान किया कि सभी नीति निदेशक तत्वों (DPSP) को लागू करने हेतु बनाए गए कानूनों को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 19 और 31) का उल्लंघन करते हैं।
विवाद - क्या संसद के पास यह शक्ति है कि वह मौलिक अधिकारों को पूरी तरह से निदेशक तत्वों के अधीन कर दे?
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला -
सुप्रीम कोर्ट ने 42वें संशोधन के उन हिस्सों को असंवैधानिक घोषित कर दिया जो निदेशक तत्वों को मौलिक अधिकारों पर पूर्ण प्राथमिकता देते थे। कोर्ट के अनुसार
I. मौलिक अधिकार और DPSP का संतुलन - कोर्ट ने कहा कि संविधान मौलिक अधिकारों (भाग III) और नीति निदेशक तत्वों (भाग IV) के बीच समन्वय और संतुलन की नींव पर खड़ा है। ये दोनों एक ही रथ के दो पहिए हैं। एक को दूसरे पर पूर्ण प्राथमिकता देना संविधान के सामंजस्य को नष्ट करना है।
II. संविधान का मूल ढांचा - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा और मौलिक अधिकारों तथा DPSP के बीच संतुलन संविधान का मूल ढांचा है। संसद संशोधन के माध्यम से इस संतुलन को बिगाड़ नहीं सकती।
III. साध्य और साधन (Ends and Means) - न्यायालय के अनुसार, नीति निदेशक तत्व वे लक्ष्य (Ends) हैं जिन्हें प्राप्त करना है, और मौलिक अधिकार वे साधन (Means) हैं जिनके माध्यम से उन्हें प्राप्त किया जाना चाहिए। आप अच्छे लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु गलत साधनों (अधिकारों का हनन) का उपयोग नहीं कर सकते।
इस केस का निष्कर्ष और प्रभाव - मिनर्वा मिल्स केस के बाद वर्तमान स्थिति
I. प्राथमिकता - सामान्य तौर पर मौलिक अधिकार श्रेष्ठ हैं, लेकिन अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कानून अनुच्छेद 14 और 19 पर हावी हो सकते हैं।
II. सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन - अदालतों को कानून की व्याख्या इस तरह करनी चाहिए कि दोनों (अधिकार और निर्देश) के बीच टकराव न हो और दोनों का उद्देश्य पूरा हो सके।
सारांश - मिनर्वा मिल्स केस ने यह सुनिश्चित किया कि भारत में संसद की सर्वोच्चता नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता है। इसने सरकार को यह चेतावनी दी कि सामाजिक कल्याण (DPSP) के नाम पर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (FR) को पूरी तरह कुचला नहीं जा सकता।
इस केस ने अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया।मामले की पृष्ठभूमि -
घटना - 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने मेनका गांधी का पासपोर्ट सार्वजनिक हित का हवाला देते हुए जब्त कर लिया।
विवाद - जब मेनका गांधी ने इसका कारण पूछा, तो सरकार ने कारण बताने से इनकार कर दिया।
चुनौती - उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर याचिका दायर की कि पासपोर्ट जब्त करना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख सिद्धांत - इस मामले में न्यायालय ने तीन अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों का प्रतिपादन किया -
I. विदेश जाने का अधिकार - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक व्यापक शब्द है। इसमें विदेश जाने का अधिकार भी शामिल है। इसलिए, किसी व्यक्ति को बिना किसी ठोस कानूनी आधार के विदेश जाने से रोकना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
II. सुनहरा त्रिभुज - सुप्रीम कोर्ट ने एक नया दृष्टिकोण दिया कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। इन्हें स्वर्ण त्रिभुज कहा जाता है। इसका अर्थ है कि यदि कोई कानून अनुच्छेद 21 के तहत किसी की स्वतंत्रता छीनता है, तो उसे अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता) की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।
III. कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया बनाम कानून की उचित प्रक्रिया - संविधान में लिखा है कि किसी को उसकी स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जाएगा।
मेनका गांधी केस से पहले, कोर्ट केवल यह देखता था कि क्या कोई कानून मौजूद है।
इस केस के बाद, कोर्ट ने कहा कि वह प्रक्रिया उचित, न्यायसंगत और तर्कसंगत होनी चाहिए। इसे ही कानून की उचित प्रक्रिया का भारतीय संस्करण माना गया।
फैसले का प्रभाव -
प्राकृतिक न्याय - कोर्ट ने कहा कि
I. दूसरे पक्ष की सुनवाई - पासपोर्ट जब्त करने से पहले मेनका गांधी को अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए था।
II. अनुच्छेद 21 का विस्तार - इस फैसले के बाद ही अनुच्छेद 21 में गरिमा के साथ जीने का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार और कानूनी सहायता का अधिकार जैसे कई नए अधिकार जुड़ते चले गए।
III. मनमानी शक्ति पर रोक - अब सरकार किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को केवल कानून' बनाकर नहीं छीन सकती, उसे यह साबित करना होगा कि वह कानून निष्पक्ष है।
4. निष्कर्ष - मेनका गांधी केस ने भारत में प्रक्रियात्मक न्याय की स्थापना की। इसने यह सुनिश्चित किया कि लोकतंत्र में प्रशासन अपनी शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं कर सकता। इस केस के माध्यम से ही सुनवाई का अधिकार को प्रशासनिक कानूनों का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 -
इसे मौलिक अधिकारों का मामला भी कहा जाता है। इस केस ने भारत में लोकतंत्र को उस समय बचाया जब संसद संविधान को बदलने की असीमित शक्ति का दावा कर रही थी।
1. मामले की पृष्ठभूमि -
विवाद - यह मामला केरल सरकार द्वारा भूमि सुधार कानूनों के तहत एडनीर मठ की संपत्ति के अधिग्रहण से शुरू हुआ। मठ के स्वामी केशवानंद भारती ने इसे अपने मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25, 26 और 31) का उल्लंघन बताते हुए कोर्ट में चुनौती दी।
13 जज की बड़ी बेंच - इस केस की सुनवाई अब तक की सबसे बड़ी 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने 68 तक सुनवाई की।
2. मूल ढांचे का सिद्धांत - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7:6 के बहुमत से ऐसा सिद्धांत दिया जिसने संसद की शक्तियों पर लगाम लगा दी।
मुख्य बिंदु -
संसद की शक्ति एवं अंकुश - कोर्ट ने स्वीकार किया कि संसद को संविधान के किसी भी हिस्से (यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों) में संशोधन करने का अधिकार है। लेकिन संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जो संविधान के मूल ढांचे को नष्ट या विरूपित करता हो।
3. संविधान का मूल ढांचा - सुप्रीम कोर्ट ने मूल ढांचे की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी, लेकिन समय-समय पर इसके उदाहरण दिए हैं -
I. संविधान की सर्वोच्चता।
II. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता।
III. गणतंत्रात्मक और लोकतांत्रिक सरकार।
IV. शक्तियों का पृथक्करण।
V. धर्मनिरपेक्षता।
VI. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव।
VII. न्यायिक समीक्षा।
4. फैसले का महत्व और प्रभाव -
I. संविधान की सर्वोच्चता - इस फैसले ने साबित किया कि संसद संविधान की रचयिता नहीं बल्कि संतान है। वह संविधान को बदल सकती है, खत्म नहीं कर सकती।
II. लोकतंत्र की रक्षा - आपातकाल के दौरान और उसके बाद भी, इस सिद्धांत ने सरकार को तानाशाही से रोकने में मदद की।
III. न्यायपालिका की शक्ति - इसने न्यायिक समीक्षा को और अधिक मजबूती दी।
5. निष्कर्ष - केशवानंद भारती केस ने भारत में सीमित संवैधानिक सरकार की अवधारणा को स्थापित किया। इसने यह सुनिश्चित किया कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संविधान की बुनियादी आत्मा सुरक्षित रहे। दिलचस्प बात यह है कि केशवानंद भारती मंदिर की भूमि नहीं बचा पाए पर उनके नाम से जुड़ा यह फैसला भारत के संविधान की आत्मा को बचाने वाला बन गया।
ए.के. गोपालन vs मद्रास राज्य,1950
1. मामले की पृष्ठभूमि -
घटना - A.K. गोपालन कम्युनिस्ट नेता थे, जिन्हें निवारक निरोध अधिनियम 1950 के तहत हिरासत में लिया गया था।
चुनौती - उन्होंने अपनी हिरासत को इस आधार पर चुनौती दी कि यह अनुच्छेद 13, 19 और 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मुख्य तर्क - गोपालन का तर्क था कि अनुच्छेद 21 के तहत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया केवल कोई भी कानून नहीं, बल्कि वह कानून न्यायसंगत भी होना चाहिए।
2. सुप्रीम कोर्ट का फैसला (संकुचित व्याख्या) - इस मामले में कोर्ट ने बहुमत से गोपालन की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट की व्याख्या के मुख्य बिंदु -
I. अनुच्छेद 21 की शाब्दिक व्याख्या -
कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त शब्द कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का अर्थ केवल वही है जो संसद द्वारा लिखित कानून में दिया गया है।
II. प्रक्रिया का पालन - यदि राज्य ने कोई कानून बनाया है और उस कानून की प्रक्रिया का पालन करते हुए किसी को जेल भेजा है, तो कोर्ट उस कानून की उचितता की जाँच नहीं कर सकता।
III. अनुच्छेदों का अलगाव - कोर्ट ने माना कि मौलिक अधिकार एक-दूसरे से अलग हैं।
IV. स्वतंत्रता के उल्लंघन - कोर्ट के अनुसार, यदि किसी को अनुच्छेद 21 के तहत वैध रूप से हिरासत में लिया गया है, तो वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी अनुच्छेद 19 (घूमने-फिरने की स्वतंत्रता) का उल्लंघन हुआ है।
V. प्राकृतिक न्याय का अभाव - उस समय कोर्ट ने 'कानून की उचित प्रक्रिया' (Due Process of Law) के सिद्धांत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट का मानना था कि संविधान सभा ने जानबूझकर 'Due Process' शब्द का प्रयोग नहीं किया है, इसलिए न्यायपालिका अपनी मर्जी से कानून को 'अनुचित' नहीं ठहरा सकती।
3. केस का महत्व और प्रभाव -
I. संसद की सर्वोच्चता - इस फैसले ने शुरुआती वर्षों में संसद को बहुत अधिक शक्ति दे दी। सरकार केवल एक कानून बनाकर किसी की भी स्वतंत्रता छीन सकती थी।
II. न्यायपालिका की सीमित भूमिका - कोर्ट ने खुद को केवल यह देखने तक सीमित कर लिया कि क्या कानून मौजूद है? और क्या प्रक्रिया का पालन हुआ है?
III. मेनका गांधी केस तक प्रभाव - यह संकुचित व्याख्या 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले तक बनी रही, जहाँ अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपनी इस गलती को सुधारा।
4. निष्कर्ष - A.K. गोपालन केस को अक्सर भारतीय न्यायपालिका का रूढ़िवादी दौर कहा जाता है। यह केस यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि कैसे हमारा संविधान समय के साथ विकसित हुआ। एक ऐसे समय से जहाँ कानून ही सब कुछ था, से लेकर आज तक जहाँ न्याय और तर्कसंगतता सर्वोपरि है।
न्यायमूर्ति फज़ल अली इस बेंच में एकमात्र ऐसे जज थे जिन्होंने असहमति जताई थी। उनका मानना था कि मौलिक अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसे 28 साल बाद मेनका गांधी केस में सही माना गया।
जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ, 2017
यह मामला न्याय इतिहास में निजता के अधिकार का निर्णायक मोड़ है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि निजता कोई विलासिता नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी हक है।
1. मामले की पृष्ठभूमि -
विवाद - यह मामला सरकार की आधार योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि बायोमेट्रिक डेटा इकट्ठा करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
संवैधानिक पीठ - इसकी गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की विशाल पीठ का गठन किया गया ताकि यह तय किया जा सके कि क्या निजता वास्तव में मौलिक अधिकार है।
पिछला संदर्भ - सरकार ने पुराने केसों (M.P. शर्मा और खड़क सिंह) का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि संविधान में निजता को लेकर कोई स्पष्ट मौलिक अधिकार नहीं दिया गया है।
2. सुप्रीम कोर्ट का फैसला - सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति (9-0) से फैसला सुनाते हुए कहा कि - निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न भाग है।
फैसले के मुख्य बिंदु -
I. मौलिक अधिकार - निजता कानूनी अधिकार नहीं, मौलिक अधिकार है जो संविधान के भाग III के तहत संरक्षित है।
II. गरिमापूर्ण जीवन - निजता के बिना व्यक्ति अपनी गरिमा और स्वायत्तता को बनाए नहीं रख सकता। इसमें आपके शरीर पर आपका अधिकार, आपकी पसंद (भोजन, साथी, लिंग) और आपकी व्यक्तिगत जानकारी शामिल है।
III. नेगेटिव और पॉजिटिव दायित्व - राज्य को न केवल नागरिक की निजता में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के हस्तक्षेप से बचाने के लिए कानून भी बनाने चाहिए।
3. निजता के उल्लंघन की कसौटी - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है, लेकिन सरकार इसे केवल तभी प्रतिबंधित कर सकती है जब वह तीन शर्तें पूरी करे -
I. कानून - हस्तक्षेप करने के लिए एक वैध कानून होना चाहिए।
II. आवश्यकता - उस हस्तक्षेप के पीछे एक ठोस सार्वजनिक उद्देश्य या राज्य का हित होना चाहिए।
III. आनुपातिकता - हस्तक्षेप उतना ही होना चाहिए जितना उद्देश्य के लिए अनिवार्य हो, उससे अधिक नहीं।
4. फैसले का दूरगामी प्रभाव - इस केस के बाद भारत में कई ऐतिहासिक बदलाव और फैसले आए -
I. धारा 377 का हटना -
II. Navtej Singh Johar Case
कोर्ट ने माना कि किसी का यौन रुझान उसकी निजता का हिस्सा है।
III. व्यभिचार का अपराध मुक्त होना
Joseph Shine Case
वैवाहिक संबंधों में निजता और व्यक्तिगत पसंद को महत्व दिया गया।
डेटा संरक्षण कानून - इस फैसले ने सरकार को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act) बनाने के लिए मजबूर किया।
5. निष्कर्ष - पुट्टस्वामी फैसले ने 21वीं सदी के डिजिटल युग में भारतीय नागरिकों को अकेले रहने के अधिकार की संवैधानिक गारंटी दी। इसने सरकार की असीमित शक्तियों पर डिजिटल दीवार खड़ी कर दी है।
तथ्य - दिलचस्प बात यह है कि 9 जजों की बेंच में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने ही पिता (जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़) द्वारा 1976 के ADM जबलपुर केस में दिए गए फैसले को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए पलट दिया था।
Maxims -
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नोट्स - LLB प्रथम सेमेस्टर
द्वारा - शमशेर भालू खां
छात्र - LLB प्रथम सेमेस्टर 2026
पता - राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू
296, सदफ आशियाना कायमखानी बस्ती सहजूसर, चूरू
9587243963
संदर्भ एवं स्त्रोत
I. पुस्तक - भारत का संविधान, लेखक Dr. जय नारायण पाण्डेय, प्रकाशक -सेंट्रल लॉ एजेंसी, प्रयागराज
II. Dr. श्रवण कुमार सैनी, प्राचार्य राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू (संविधान)
III. विभिन्न आलेख एवं पत्रिकाएं
IV. कानून.ऑर्ग
V. भारत के संविधान
VI. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म एवं
VII. गूगल जैमिनाई
VIII. एडवोकेट अंजलि
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