न्याय मित्र : न्याय की पहुँच का सेतु
भूमिका
भारतीय न्याय व्यवस्था में आम नागरिक तक न्याय पहुँचाना एक बड़ी चुनौती रही है। लंबी प्रक्रिया, कानूनी जटिलताएँ और आर्थिक असमर्थता के कारण अनेक लोग न्याय से वंचित रह जाते हैं। इसी चुनौती को कम करने के लिए “न्याय मित्र” की अवधारणा विकसित की गई, जो समाज के कमजोर, गरीब और वंचित वर्गों को न्याय व्यवस्था से जोड़ने का कार्य करती है।
न्याय मित्र कौन होता है -
न्याय मित्र वह व्यक्ति होता है जो विधिक सहायता प्रणाली के अंतर्गत कार्य करता है और उन लोगों को कानूनी मार्गदर्शन उपलब्ध कराता है जो स्वयं वकील करने में सक्षम नहीं होते। यह व्यक्ति वकील हो सकता है या विधि में प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता भी हो सकता है, जिसे राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा नियुक्त किया जाता है।
न्याय मित्र की नियुक्ति
न्याय मित्रों की नियुक्ति प्रायः—
1. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA)
2. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)
द्वारा की जाती है।
कार्य क्षेत्र -
इन्हें विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी अंचलों, जेलों, महिला व बाल संरक्षण गृहों तथा न्यायालयों से दूर रहने वाले नागरिकों के लिए नियुक्त किया जाता है।
न्याय मित्र के प्रमुख कार्य
न्याय मित्र की भूमिका केवल कानूनी सलाह तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह न्याय प्रक्रिया का मार्गदर्शक होता है—
1. निःशुल्क कानूनी सलाह देना
2. कानूनी अधिकारों की जानकारी देना
3. प्रार्थना-पत्र, आवेदन व शिकायत लिखने में सहायता
4. लोक अदालत और मध्यस्थता की प्रक्रिया से अवगत कराना
5. विधिक सहायता पाने योग्य व्यक्तियों की पहचान करना
6. न्यायालय व प्रशासन के बीच संवाद सेतु बनना
न्याय मित्र का सामाजिक महत्व
न्याय मित्र न्याय और समाज के बीच एक पुल (Bridge) की भूमिका निभाता है। यह—
1. न्याय को गरीब की दहलीज तक लाता है।
2. विधिक जागरूकता फैलाता है।
3. शोषण, अन्याय और भय को कम करता है।
4. संविधान के अनुच्छेद 39-A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता) को व्यवहार में लागू करता है
न्याय मित्र और विधिक सहायता
भारत सरकार की Legal Services Authorities Act, 1987 के अंतर्गत न्याय मित्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाएँ, बच्चे, दिव्यांग, वृद्ध और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक—इन सभी तक न्याय मित्र के माध्यम से कानूनी सहायता पहुँचाई जाती है।
चुनौतियाँ
हालाँकि न्याय मित्रों की भूमिका सराहनीय है, फिर भी—
1. सीमित संसाधन
2. मानदेय की समस्या
3. जागरूकता का अभाव
4. प्रशासनिक सहयोग की कमी की चुनौतियाँ उनके कार्य को प्रभावित करती हैं।
निष्कर्ष -
न्याय मित्र न्याय व्यवस्था का मूक प्रहरी नहीं, बल्कि जन-न्याय का सजीव माध्यम है।
जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय नहीं पहुँचेगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। न्याय मित्र इस अधूरेपन को पूर्ण करने की दिशा में एक सशक्त कदम है।
शमशेर खान
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