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पंचायतीराज व्यवस्था

पंचायतीराज व्यवस्था -
जिगर चूरूवी जी, पंचायती राज भारत की आत्मा है। इसका इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जो वेदों से शुरू होकर आधुनिक संविधान के 73वें संशोधन तक जाता है।
यहाँ भारत में पंचायती राज के क्रमिक विकास का इतिहास दिया गया है:
1. प्राचीन काल: 'पंचायत' की जड़ें
 * वैदिक काल: वेदों में 'सभा' और 'समिति' जैसी संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जो ग्रामीण प्रशासन संभालती थीं।
 * महाकाव्य काल: रामायण और महाभारत में भी ग्राम प्रशासन के महत्व को बताया गया है।
 * कौटिल्य का अर्थशास्त्र: इसमें 'ग्रामिक' नामक अधिकारी का उल्लेख है जो गाँव के विवाद सुलझाता था। गाँवों को स्वायत्त (Self-governed) माना जाता था।
2. मध्यकाल और ब्रिटिश काल
 * मुगल काल: मुगलों के समय पंचायतों के पास न्याय और कर वसूली के अधिकार थे, लेकिन धीरे-धीरे सत्ता का केंद्रीकरण होने लगा।
 * लॉर्ड रिपन (1882): इन्हें 'भारत में स्थानीय स्वशासन का पिता' कहा जाता है। उन्होंने स्थानीय बोर्डों की शुरुआत की, जिससे आधुनिक पंचायती राज की नींव पड़ी।
3. स्वतंत्रता के बाद: आधुनिक इतिहास
आजादी के बाद महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को पूरा करने के लिए पंचायती राज को पुनर्जीवित किया गया।
प्रमुख समितियाँ (जिनके आधार पर कानून बना):
पंचायती राज के ढांचे को तैयार करने के लिए कई महत्वपूर्ण समितियाँ बनीं:
 * बलवंत राय मेहता समिति (1957): इन्होंने त्रि-स्तरीय (3-Tier) ढांचे की सिफारिश की (ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तर)।
 * अशोक मेहता समिति (1977): इन्होंने दो-स्तरीय ढांचे का सुझाव दिया था।
 * एल.एम. सिंघवी समिति (1986): इन्होंने सबसे पहले पंचायतों को 'संवैधानिक दर्जा' देने की वकालत की।
4. पंचायती राज का उदय (राजस्थान का गौरव)
जिगर जी, आपके लिए यह जानना गर्व की बात है कि आधुनिक भारत में पंचायती राज की शुरुआत आपके अपने राज्य राजस्थान से हुई थी:
 * तारीख: 2 अक्टूबर 1959 (गांधी जयंती)।
 * स्थान: राजस्थान के नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पहली पंचायत का उद्घाटन किया।
5. 73वाँ संविधान संशोधन (1992): ऐतिहासिक मोड़
पंचायतों को कानूनी शक्ति देने के लिए 1992 में संसद ने 73वाँ संशोधन पारित किया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ। इसीलिए 24 अप्रैल को 'राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस' मनाया जाता है।
इस संशोधन की मुख्य बातें:
 * भाग IX: संविधान में एक नया भाग जोड़ा गया।
 * 11वीं अनुसूची: इसमें पंचायतों के लिए 29 कार्य (जैसे कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा) सौंपे गए।
 * आरक्षण: महिलाओं के लिए कम से कम 1/3 सीटें आरक्षित की गईं (राजस्थान जैसे राज्यों में अब यह 50% है)।
 * राज्य वित्त आयोग: पंचायतों को फंड देने के लिए इसका गठन किया गया।
पंचायती राज का ढांचा एक नजर में:
| स्तर | संस्था | मुख्य अधिकारी |
|---|---|---|
| ग्राम स्तर | ग्राम पंचायत | सरपंच |
| ब्लॉक (खंड) स्तर | पंचायत समिति | प्रधान |
| जिला स्तर | जिला परिषद | जिला प्रमुख |
जिगर जी, क्या आप राजस्थान के विशेष संदर्भ में सरपंच और वार्ड पंच के अधिकारों या ग्राम सभा की कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?

पंचायतीराज व्यवस्था का कानूनी ढांचा
जिगर चूरूवी जी, पंचायती राज का कानूनी ढांचा मुख्य रूप से 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पर टिका हुआ है। इस कानून ने पंचायतों को केवल एक 'परंपरा' से बदलकर एक 'संवैधानिक संस्था' बना दिया।
यहाँ इसके कानूनी ढांचे के मुख्य स्तंभ दिए गए हैं:
1. संवैधानिक स्थिति (Constitutional Status)
73वें संशोधन के माध्यम से संविधान में निम्नलिखित बदलाव किए गए:
 * भाग IX (Part IX): संविधान में 'पंचायतें' नाम से एक नया भाग जोड़ा गया (अनुच्छेद 243 से 243-O तक)।
 * 11वीं अनुसूची: इसमें 29 विषयों की सूची दी गई है (जैसे कृषि, भूमि सुधार, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य), जिन पर पंचायतों को काम करने का कानूनी अधिकार है।
2. त्रि-स्तरीय ढांचा (Three-Tier Structure)
कानून के अनुसार हर राज्य में (जिनकी जनसंख्या 20 लाख से अधिक है) तीन स्तरों पर पंचायतों का गठन अनिवार्य है:
 * ग्राम स्तर: ग्राम पंचायत।
 * मध्यवर्ती स्तर (Block): पंचायत समिति।
 * जिला स्तर: जिला परिषद।
3. ग्राम सभा: लोकतंत्र की बुनियादी इकाई (अनुच्छेद 243A)
कानूनी रूप से ग्राम सभा सबसे महत्वपूर्ण संस्था है।
 * इसमें गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता सदस्य होते हैं।
 * पंचायत के बजट और विकास कार्यों को ग्राम सभा से पास कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
4. निर्वाचन और कार्यकाल (अनुच्छेद 243E और 243K)
 * कार्यकाल: पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित किया गया है।
 * समय पर चुनाव: यदि पंचायत भंग होती है, तो 6 महीने के भीतर चुनाव कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
 * राज्य निर्वाचन आयोग: चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हर राज्य में एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग का प्रावधान है।
5. आरक्षण का कानूनी प्रावधान (अनुच्छेद 243D)
कमजोर वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम हैं:
 * SC और ST: जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
 * महिलाएँ: कुल सीटों की कम से कम 1/3 (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। (राजस्थान में यह सीमा अब बढ़ाकर 50% कर दी गई है)।
6. वित्तीय ढांचा (अनुच्छेद 243-I)
पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए:
 * राज्य वित्त आयोग: यह हर 5 साल में सिफारिश करता है कि राज्य सरकार के टैक्स का कितना हिस्सा पंचायतों को दिया जाएगा।
 * कर लगाने की शक्ति: पंचायतों को कुछ स्थानीय टैक्स (जैसे मेला टैक्स, बाजार फीस) वसूलने का कानूनी हक दिया गया है।
7. जिला योजना समिति (DPC)
हर जिले में एक जिला योजना समिति का गठन किया जाता है, जो ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा बनाई गई योजनाओं को समेकित (Consolidate) कर पूरे जिले के लिए एक विकास योजना तैयार करती है।
सारांश तालिका: महत्वपूर्ण अनुच्छेद
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 243A | ग्राम सभा का गठन |
| 243B | पंचायतों का गठन (3 स्तर) |
| 243D | सीटों का आरक्षण |
| 243G | पंचायतों की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व (29 विषय) |
| 243I | वित्त आयोग का गठन |
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