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पेपर 1.2 अपकृत्य विधि, उपभोक्ता संरक्षण एवं मोटर वाहन अधिनियम.

अपकृत्य विधि (Law of Torts) - Seeking Justice For Wrong
DR. BHIMRAO AMBEDKAR LAW UNIVERSITY, JAIPUR
SYLLABUS, SEMESTER FIRST
                PAPER 1.1
1. अपकृत्य विधि Law Of Torts
2.  उपभोक्ता संरक्षण Consumer protection Act, 1988
3. मोटर वाहन अधिनियम Motor Vehicle Act, 2019


UNIT - I  अपकृत्य विधि का परिचय, परिभाषा, प्रकृति एवं महत्व।
1.1. अपकृत्य विधि का अर्थ,उद्भव एवं विकास 
1.2. अपकृत्य के घटक दोषपूर्ण कार्य, कानूनी क्षति और उपचार।
1.3. अपराध, और संविदा भंग के साथ अपकृत्य की तुलना।
1.4. अपकृत्य कानून में मानसिक तत्व
मंशा, द्वेष और लापरवाही।
1.5. अपकृत्यपूर्ण दायित्व के विरुद्ध बचाव सहमति, दैवीय घटना (भूकंप, बाढ़, अतिवृष्टि)।

    UNIT II - विशिष्ट अपकृत्य 
2.1. लापरवाही अर्थ, परिभाषा और आवश्यक तत्व,  अंशदायी लापरवाही
2.2. क्षति की दूरस्थता
2.3. उपताप एवं उसके प्रकार
2.4. मानहानि लिखित मानहानि (Libel) और मौखिक मानहानि (Slander), मानहानि के आवश्यक तत्व।
2.5. तंत्रिका आघात, मानसिक या मनोवैज्ञानिक सदमे के कारण हुई क्षति।

         UNIT - III  दायित्व
3.1. कठोर दायित्व का नियम रायलैंड्स बनाम फ्लेचर के मामले का नियम - इसकी उत्पत्ति और कार्यक्षेत्र एवं अपवाद 
3.2. एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ में पूर्ण दायित्व का नियम
3.3. प्रतिस्थानिक दायित्व - जब एक व्यक्ति के गलत कार्य के लिए दूसरा व्यक्ति जिम्मेदार ठहराया जाए
3.4. राज्य का दायित्व - इंग्लैंड और भारत में स्थिति - सरकारी दायित्व, संवैधानिक प्रावधान, संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्य,  मौलिक अधिकारों का उल्लंघन और संप्रभु उन्मुक्ति (संवैधानिक अपकृत्य)
3.5. पशुओं के लिए दायित्व

इकाई IV - उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और मोटर वाहन अधिनियम, 1988
4.1. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की परिभाषाएं, उपभोक्ता संरक्षण परिषदें
4.2. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) और उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (कमीशन)।
4.3. उत्पाद उत्तरदायित्व (Product Liability) - मध्यस्थता (Mediation), अपराध और दंड।
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 - (संशोधन अधिनियम 2019 और जन विश्वास संशोधन अधिनियम 2023 सहित)
4.4. परिभाषाएं - संशोधनों की मुख्य विशेषताएं, हिट एंड रन (टक्कर मारकर भागना) मामलों में चालक और मालिक का दोष और बिना दोष दायित्व, तृतीय पक्ष से संबंधित अवधारणाएं, ड्राइविंग लाइसेंस, ड्राइविंग लाइसेंस का राष्ट्रीय और राज्य रजिस्टर।
4.5. राष्ट्रीय परिवहन नीति: अपराध और दंड; मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) की शक्तियां और क्षेत्राधिकार।

 प्रमुख वाद केस लॉज - 
5.1.डोनोघ बनाम स्टीवेन्सन (1932) - (आधुनिक लापरवाही के कानून की जननी - जिंजर बियर केस)।
5.2 इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम PP शांता (1996) - (इस केस में तय हुआ कि चिकित्सा सेवाएं भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में आती हैं)।
5.3 म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम श्रीमती सुभगवती (1966) (लापरवाही और 'घटना स्वयं बोलती है' के सिद्धांत पर आधारित - चांदनी चौक घंटाघर केस)।
5.4 N.नागेंद्र राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1994) - (राज्य की संप्रभु उन्मुक्ति और लोक अधिकारियों की लापरवाही के लिए सरकार के दायित्व पर महत्वपूर्ण फैसला)।
5.5 रायलैंड्स बनाम फ्लेचर (1868) (कठोर दायित्व के सिद्धांत का प्रतिपादन)।

                  UNIT I. 
अपकृत्य का अर्थ - अपकृत्य एक ऐसा दीवानी दोष है, जिसके लिए पीड़ित व्यक्ति अदालत में हर्जाने (मुआवजे) की मांग कर सकता है। कानून की भाषा में अपकृत्य समाज में संतुलन बनाए रखने का एक साधन है। अपकृत्य नागरिक गलत है जिसकी भरपाई हर्जाना है।
अपकृत्य शब्द Tort का हिंदी अनुवाद है। Tort  लैटिन भाषा के शब्द Tortum से आया है, जिसका अर्थ है मरोड़ना। यानी ऐसा आचरण जो सीधा या कानूनी नहीं है, बल्कि टेढ़ा या दोषपूर्ण है।
शाब्दिक अर्थ - 
हिंदी - अपकृत्य, दुष्कृत्य
अंग्रेजी - Wrongful act 
रोमन - Delict
फारसी - गलत
अरबी - गुनाह
फ्रेंच - Tort
लेटिन - Torts (अपराधिक आचरण)
TORTUM (मरोड़ना)
अपकृत्य शब्द का उद्भव आंग्ल विधि से प्रारंभ हुआ। इसको दुष्कृत्य भी कहा जाता है। साधारण शब्दों में किसी व्यक्ति/संस्था का वह आचरण जो प्रचलित विधि के विपरीत आचरण/व्यवहार जिसका किसी अन्य के जीवन/रहन - सहन/आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो अपकृत्य कहलाता है। अर्थात अपकृत्य वह नागरिक (Civil) गलत कार्य है, जिसमें किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन होता है और जिसके लिए क्षतिपूर्ति (Damages) का प्रावधान होता है। सामान्य शब्दों में कानूनी गलत के विरुद्ध हर्जाना ही लॉ ऑफ टॉर्ट्स है।
अपकृत्य की परिभाषाएं - अपकृत्य की परिभाषा देने के अनेक प्रयास किये गये हैं लेकिन आज तक कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं दी जा सकी है। - रतनलाल धीरजलाल
01- फ्रेजर (Fraser) - अपकृत्य ऐसा अवैधानिक कृत्य या चूक है, जिससे किसी अन्य को हानि पहुँचे और जिसके लिए विधि क्षतिपूर्ति का प्रदान करती है।
02 - सलामंड (Salmond) - अपकृत्य एक ऐसा नागरिक गलत है, जो अनुबंध के उल्लंघन से उत्पन्न नहीं होता और जिसके लिए क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सकता है।
03. विनफील्ड (Winfield) - 
. अपकृत्य वह नागरिक गलत है, जिसमें व्यक्ति के किसी पूर्ण अधिकार का उल्लंघन होता है और जिसका उपचार क्षतिपूर्ति द्वारा किया जाता है।
. अपकृत्य की कोई सारवान, सार्वभौम अथवा संतोषप्रद परिभाषा दिया जाना कठिन है।
. अपकृत्य का दायित्व ऐसे कर्त्तव्य के उल्लंघन से है जिसे प्राथमिक रूप से विधि द्वारा सुनिश्चित किया जाता है और जो जनसाधारण के प्रति होता है तथा इस उल्लंघन का निवारण अधिनिर्धारित नुकसान के लिए कार्यवाही द्वारा किया जाता है।
04. पोलॉक (Pollock) - अपकृत्य वह नागरिक गलत है, जो किसी व्यक्ति के अधिकारों के उल्लंघन से उत्पन्न होता है और जिसके लिए कानून क्षतिपूर्ति का उपाय प्रदान करता है।
05.अंडरहिल (Underhill) - अपकृत्य ऐसा कार्य है, जो बिना विधिक औचित्य के किया गया हो और जिससे किसी व्यक्ति को क्षति पहुँचे।
06. सामंड (samand) - अपकृत्य एक सिविल दोष है जिसके लिए उपचार अनिर्धारित नुकसानी हेतु सामान्य विधि के अन्तर्गत कार्यवाही है जो अबाध रूप से न तो संविदा भंग है, न न्यास भंग है और न किसी अन्य साम्यिक दायित्व का उल्लंघन है।
07. चैम्बर्स शब्दकोष- अपकृत्य वह अनुचित या क्षतिकारक कृत्य है जिसका उद्भव संविदा भंग से नहीं होता है, जिसका उपचार क्षतिपूर्ति या हर्जाना है।
08 अपकृत्य की सामान्य परिभाषा - 
अपकृत्य वह असंविदात्मक नागरिक गलत है, जिसमें अधिकार का उल्लंघन होता है और जिसका उपचार न्यायालय द्वारा क्षतिपूर्ति के रूप में किया जाता है।
भारत में अपकृत्य विधि का उद्भव एवं विकास - भारत में अपकृत्य विधि (Law of Torts) का विकास एक दिलचस्प यात्रा है। भारत में इस हेतु कोई संहिताबद्ध (Codified) कानून नहीं है। मुख्य रूप से न्यायिक निर्णयों व अंग्रेज सरकार की सामान्य विधि (English Common Law) पर आधारित है।
भारत में इसके उद्भव और विकास के मुख्य चरण - 
1. प्राचीन भारत की स्थिति - प्राचीन भारत में अपकृत्य जैसा कोई अलग शब्द नहीं था, लेकिन धर्मशास्त्रों और मनुस्मृति में नागरिक दोषों (Civil Wrongs) के लिए दंड और क्षतिपूर्ति का प्रावधान था। चोरी, मारपीट या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने पर हर्जाना देने का नियम था। हालांकि आधुनिक अर्थों में अपकृत्य विधि की शुरुआत ब्रिटिश काल से हुई।
2. ब्रिटिश शासन का न्याय, साम्य एवं सदविवेक - अंग्रेज सरकार के निर्देश अनुसार जहां भारतीय कानून न हो वहाँ (न्याय, साम्य और सदविवेक) के सिद्धांत का पालन किया जावे।
भारत में आधुनिक अपकृत्य विधि की नींव अंग्रेजों ने रखी। इस विधि के उद्भव का इतिहास सन् 1776 के चार्टर से जुड़ा हुआ है। सन् 1776 के चार्टर के अन्तर्गत कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास के प्रेसीडेन्सी नगरों में अंग्रेजी न्यायालयों की स्थापना की गई, जिन्हे मेयर कोर्ट्स के नाम से जाना जाता था। ये न्यायालय कॉमन लॉ के अधीन कार्य करते थे। भारत में भी कॉमन लॉ को ही लागू करते हुए न्यायालयों को यह निर्देश दिए गए, कि भारत की परिस्थितियों के अनुकूल ही कॉमन लॉ को लागू किया जाए। कॉमन लॉ लागू करने में साम्य, न्याय एवं शुद्ध अन्तःकरण के सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाता था।
अपकृत्य विधि भी कॉमन लॉ का एक अभिन्न अंग मानी जाती रही है। भारत में भी इसे इसी संदर्भ में लागू किया गया पर इतना अवश्य ध्यान रखा गया कि यह भारतीय परिवेश में यहां की परिस्थितियों, रीति-रिवाजों व परम्पराओं के अनुरूप लागू हो।
केस - बाघेला बनाम मसेदीन (1887) 11 बम्बई 551 के मामले यह निर्धारित किया गया कि साम्य, न्याय एवं शुद्ध अन्तःकरण के सिद्धान्तों का अर्थ इंग्लैण्ड की सामान्य विधि के नियमों के अनुसार लगाया जाये परन्तु भारत की परिस्थितियों एवं रीति रिवाजों के अनुरूप हो।
आगे चलकर नवल किशोर बनाम रामेश्वर AIR 1955 इलाहाबाद, 594 के मामले में यह कहा गया कि इंग्लैण्ड की अपकृत्य विधि के नियमों को भारतीय परिवेश में यहाँ के रीति- रिवाजों एवं परम्पराओं के अनुरूप लागू किया जाना चाहिये। इस प्रकार भारत में अपकृत्य विधि की प्रयोज्यता अंग्रेजी विधि की देन है। यही कारण है कि आज भी भारत में अपकृत्य विधि काफी हद तक ब्रिटिश कानूनों से मेल खाती है।
3.भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन - भारतीय अदालतों ने अंग्रेजी कानूनों को आँख बंद करके नहीं अपनाया गया। यहां
समाज की आवश्यकताओं के अनुसार उनमें बदलाव किए।
जैसे संप्रभु उन्मुक्ति (Sovereign Immunity) का सिद्धांत इंग्लैंड में बहुत कठोर था जिसका अर्थ है कि (राजा कोई गलती नहीं कर सकता), लेकिन भारत की अदालतों ने इसे सीमित कर दिया ताकि सरकार की लापरवाही पर भी आम आदमी को न्याय मिल सके।
4. स्वतंत्रता के बाद का विकास (न्यायिक सक्रियता) - स्वतंत्रता के बाद, भारतीय न्यायपालिका ने अपकृत्य विधि को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। भारत ने कुछ ऐसे सिद्धांत विकसित किए गए जो इंग्लैंड में भी वजूद में नहीं थे।
Aपूर्ण दायित्व का सिद्धांत (Absolute Liability) - 
केस - MC मेहता बनाम भारत संघ -(ओलियम गैस रिसाव मामला) में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण दायित्व का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इंग्लैंड के रायलेंड्स बनाम फ्लेचर के नियम में कई अपवाद थे, लेकिन भारत में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई खतरनाक उद्योग चला रहा है और उससे कोई नुकसान होता है, तो वह बिना किसी अपवाद के पूर्ण रूप से जिम्मेदार होगा।
B. संवैधानिक अपकृत्य  (Constitutional Torts) -
भारत में अब यदि राज्य किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो उसे मुआवजा देना पड़ता है। रुदल साह बनाम बिहार राज्य इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
अपकृत्य की मुख्य विशेषताएं - 
01. असंहिताबद्ध (Uncodified) - यह संसद द्वारा पारित कानून नहीं है बल्कि जज-मेड लॉ है।
02. क्षतिपूर्ति पर आधारित - इसका मुख्य उद्देश्य सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई करना है।
03. निरंतर विकासशील - उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और मोटर वाहन अधिनियम जैसे कानून इसी विधि की कोख से निकले हैं।
निष्कर्ष - भारत में अपकृत्य विधि का विकास उधार लिए गए सिद्धांतों से शुरू हुआ, जो आज  न्यायिक निर्णयों के माध्यम से स्वतंत्र और सशक्त रूप ले चुका है।
अपकृत्य व संविदाभंग में अन्तर है - 
1. कर्ता एवं कर्म का अंतर - 
. अपकृत्य में किसी व्यक्ति द्वारा उन कर्तव्यों का उल्लंघन किया जाता है 
. संविदा में एक पक्ष द्वारा शर्तों का उल्लंघन।
2. संबंध का अंतर - 
. अपकृत्य में पीड़ित और उत्पीड़क के मध्य सीधा परिचय/संबंध नहीं भी हो सकता है।
. संविदा भंग में किसी भी माध्यम से संबंध/परिचय अवश्य होता है।
3. अतिक्रमण का अंतर - 
. अपकृत्य में लोक लक्षी अधिकारों (right in rem) का
. संविदा भंग में व्यक्तिलक्षी अधिकारों (right in personam) का अतिक्रमण किया जाता है।
4. वाद का प्रकार का अंतर - 
. अपकृत्य में अभिनिर्धारित क्षतिपूर्ति (liquidated damages) 
. संविदा-भंग में निर्धारित नुकसान के लिए वाद लाया जाता है।
5. आशय का अंतर - 
. अपकृत्य में आशय/हेतुक (intention or motive) महत्त्वपूर्ण (यदि कोई कार्य दुराशय से नहीं किया जाकर सद्भावना पूर्वक किया जाता है तो वह अपकृत्य की श्रेणी में नहीं आता)
. संविदा-भंग में आशय/हेतुक अर्थहीन होता है।
6. नुकसान का उद्देश्य - 
. अपकृत्य में नुकसान का उद्देश्य दण्डात्मक 
. संविदा-भंग में उद्देश्य प्रतिकारात्मक
होता है।
7.  शर्त या कर्तव्यों का अंतर - 
. अपकृत्य में किसी व्यक्ति द्वारा उन कर्तव्यों का उल्लंघन किया जाता है जो विधि द्वारा पूर्व निर्धारित होते हैं, 
. जबकि संविदा-भंग में किसी पक्ष द्वारा उन शर्तों का उल्लंघन किया जाता है जो दोनों पक्षकारों में करार द्वारा तय की गईं।
अपकृत्य एवं अपराध में अन्तरकहने देखने और सामान्य अर्थ में अपकृत्य एवं अपराध समान ही लगते है परन्तु दोनों में मूलभूत अंतर है - 
1. वैयक्तिकता का अंतर - 
. अपकृत्य एक वैयक्तिक दोष है जिसमें किसी व्यक्ति को हानि/क्षति होती है और वह ऐसी क्षति की पूर्ति के लिए वाद ला सकता है।
. अपराध सम्पूर्ण समाज के विरुद्ध कृत्य माना जाता है और इसमें कार्यवाही राज्य द्वारा की जाती है।
2. न्यायालय में दण्ड का अंतर - 
. अपकृत्य सिविल दोष (civil wrong) है। इस हेतु सिविल न्यायालय में वाद लाया जाता है।
. अपराध दण्डनीय कृत्य है जिसमें अभियुक्त को कारावास से दण्डित किया जाता है।
3. न्यायालय का अंतर - 
. अपकृत्य की कार्यवाही सिविल (दिवानी) न्यायालय में की जाती है
. अपराध के लिए दाण्डिक (फौजदारी) न्यायालय में अभियोजन चलाया जाता है।
4. उद्देश्य का अंतर - 
. अपकृत्य के मामलों में पीड़ित पक्षकार को दोषी पक्षकार से क्षतिपूर्ति दिलाया जाता है।
. अपराध विषयक मामलों में अभियुक्त को दण्डित कर समाज में अपराध की रोकथाम कर अपराधियों से उत्पन्न भय समाप्त करना है।
5. वैयक्तिकता का अंतर - 
.अपकृत्य एक वैयक्तिक दोष होता है। इसमें किसी व्यक्ति को हानि अथवा क्षति होने पर वह ऐसी क्षति की पूर्ति के लिए वाद ला सकता है, 
. जबकि अपराध सम्पूर्ण समाज के विरुद्ध अपराध माना जाता है और इसमें कार्यवाही राज्य द्वारा की जाती है।
6. दंड का अंतर - 
क. अपकृत्य में क्षतिपूर्ति का विधान है
ख. अपराध में कारावास या शारीरिक दंड।
(आमजन में विश्वास-अपराधियों में डर)
अपकृत्य और अपराध में समानता -
केशव बनाम मनीउद्दीन (1908) 13 सी डब्ल्यू एन.50 के मामले में कहा गया है कि आक्रमण, प्रहार मान हानि न्यूसेन्स, उपेक्षा अनवधानता आदि अपकृत्य एवं अपराध दोनों कोटि में आते हैं। इनमें दोनों प्रकार की कार्यवाही, की जा सवाती है।
01. आक्रमण
02. हमला/प्रहार
03. मान-हानि
04. न्यूसेन्स
05. उपेक्षा
06. अनवधानता 
अपकृत्य के आवश्यक तत्व (घटक) - विधि शास्त्र के अनुसार, अपकृत्य एक दीवानी दोष है जिसका उपचार अनिर्धारित क्षतिपूर्ति होता है। किसी कार्य को एक अपकृत्य की श्रेणी में रखने के लिए कुछ मूलभूत तत्वों का होना अनिवार्य है।अपकृत्य के तीन (03) आवश्यक तत्व माने जाते हैं - 
1. दोषपूर्ण कार्य या लोप (Wrongful Act or Omission) - किसी भी अपकृत्य के लिए पहली शर्त यह है कि प्रतिवादी (Defendant) ने कोई ऐसा कार्य किया हो जो कानून की दृष्टि में गलत हो, या उसने वह कार्य न किया हो जिसे करने की उसकी कानूनी जिम्मेदारी थी (Omission)।
सकारात्मक कार्य - जैसे किसी के घर में बिना अनुमति घुसना (Trespass) या किसी की मानहानि करना।
∆ लोप (Omission) - जैसे नगरपालिका का सड़क पर गड्ढे को खुला छोड़ देना, जिससे किसी को चोट लग जाए। यहाँ कार्य न करना दोषपूर्ण है।
2. कानूनी क्षति (Legal Damage) -
यह अपकृत्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। यहाँ क्षति का अर्थ शारीरिक चोट या धन की हानि मात्र नहीं, बल्कि कानूनी अधिकारों का उल्लंघन है। इसे दो कानूनी सूत्रों से समझा जा सकता है - 
 A. Injuria Sine Damno (बिना हानि के कानूनी क्षति) - इसमें व्यक्ति को कोई वास्तविक आर्थिक हानि नहीं होती, लेकिन उसके कानूनी अधिकार का उल्लंघन होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति मुकदमा कर सकता है।
उदाहरण - एशबी बनाम व्हाइट - (Ashby vs White) केस में वादी को वोट डालने से रोका गया, हालांकि उसका प्रत्याशी चुनाव जीत गया था और उसे कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ, फिर भी चीफ जस्टिस लॉर्ड होल्ट की कोर्ट ने इसे अपकृत्य माना क्योंकि उसके वोट देने के कानूनी अधिकार का हनन हुआ था।
B. Damnum Sine Injuria (बिना कानूनी क्षति के हानि) - इसमें व्यक्ति को नुकसान (पैसों या संपत्ति का) तो होता है, लेकिन उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता। ऐसी स्थिति में कोई केस नहीं बनता।
उदाहरण - यदि आपके घर के पास कोई नई दुकान खुलती है और इस प्रतिस्पर्धा के कारण आपके व्यापार में घाटा होता है, तो यह अपकृत्य नहीं है क्योंकि आपको व्यापार करने का अधिकार है, पर घाटे से बचने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

3. अपकृत्य के कानूनी उपचार (Legal Remedy)अपकृत्य कानून इस सिद्धांत पर आधारित है: Ubi jus ibi remedium (जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है)। यदि किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है, तो कानून उसे उपचार प्रदान करता है। अपकृत्य में मुख्य रूप से निम्नलिखित उपचार मिलते हैं:
. क्षतिपूर्ति (Damages) - आर्थिक मुआवजा।
. व्यादेश (Injunction): कोर्ट द्वारा किसी कार्य को रोकने का आदेश देना
अपकृत्य के तत्वों का सारांश - 
1. दोषपूर्ण कार्य - कानून द्वारा निषिद्ध कार्य करना या अनिवार्य कर्तव्य न करना।
2. कानूनी उल्लंघन - अधिकार का हनन (भले ही भौतिक नुकसान न हुआ हो)।
3.मुआवजा - नुकसान की भरपाई के लिए कानूनी कार्रवाई की उपलब्धता।
अपकृत्य विधि में कार्य और हेतु (कारण) की सुस्पष्ट व्याख्या - 
कानून (Law of Torts) की दृष्टि से यह कथन अपकृत्य विधि के एक आधारभूत सिद्धांत को रेखांकित करता है। सामान्यत  अपकृत्य के दायित्व में हेतु (Motive) अप्रासंगिक होता है।
अपकृत्य विधि में कार्य को महत्व दिया जाता है हेतु (कारण) को नहीं।
उदाहरण - यदि किसी कार्य से किसी व्यक्ति के विधिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो ऐसे कार्य को अनुयोज्य (वाद योग्य) माना जायेगा, चाहे उसका हेतु कुछ भी रहा हो। आपराधिक विधि का यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त अथवा सूत्र है कि अपराध के लिए दुषित मन होना आवश्यक है अर्थात् स्वयं किसी कृत्य से अपराध नहीं होता है, इसके लिए आपराधिक मनःस्थिति का होना आवश्यक है। (Actus non facit reum nisi mens sit rea) इस सूत्र से स्पष्ट है कि मानसिक तत्त्व अर्थात हेतु दुराशय, आशय उद्देश्य, लक्ष्य, प्रेरणा आदि केवल अपराध के गठन के लिए सारभूत है, अपकृत्य के लिए नहीं। अपकृत्य के लिए मुख्य रूप से आवश्यक है विधिक अधिकारों का उल्लंघन।
सरल शब्दों में, यदि किसी व्यक्ति का कार्य कानूनी रूप से गलत है, तो उसका नेक इरादा उसे बचा नहीं सकता। इसके विपरीत, यदि कार्य कानूनी रूप से सही है और बुरी नीयत (Malice) उसे अवैध नहीं बना देती।
निर्णय विधि (Case Laws) के आधार पर इसकी विवेचना निम्नलिखित है - 
1.जब हेतु (Motive) अप्रासंगिक होता है - अधिकांश अपकृत्यों में न्यायालय केवल यह देखता है कि वादी (Plaintiff) के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।
ब्रैडफोर्ड कॉर्पोरेशन v पिकल्स 1985 - इस मामले में पिकल्स ने अपनी जमीन पर एक गड्ढा खोदा जिससे नगर निगम के जलाशय में जाने वाला पानी रुक गया। पिकल्स का उद्देश्य नगर निगम को आर्थिक नुकसान पहुँचाना था ताकि वे उसकी जमीन महंगे दाम पर खरीदें।
निर्णय - कोर्ट ने कहा कि पिकल्स का कार्य कानूनी था (अपनी जमीन पर गड्ढा खोदना), इसलिए उसकी बुरी नीयत (Bad Motive) ने उस कार्य को अवैध नहीं बनाया।
एशबी बनाम व्हाइट - यहाँ चुनाव अधिकारी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से वादी को वोट देने से रोका। हालांकि वादी का उम्मीदवार जीत गया, फिर भी कोर्ट ने अधिकारी को दोषी माना। यहाँ कार्य (अधिकार रोकना) महत्वपूर्ण था, हेतु नहीं।
2. अपवाद - जहाँ हेतु महत्वपूर्ण हो जाता है - कानून में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं जहाँ कार्य के पीछे का इरादा या हेतु देखना अनिवार्य हो जाता है। इनके बिना अपकृत्य सिद्ध नहीं होता - 
A. विद्वेषपूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) - यदि कोई व्यक्ति किसी निर्दोष पर जान बूझकर और बुरी नीयत से मुकदमा करता है, तो यहाँ हेतु ही केस का आधार बनता है।
B. असावधानी (Nuisance) - 
कभी-कभी यह देखने के लिए कि कोई कार्य पड़ोसी की शांति भंग कर रहा है या नहीं, कर्ता के इरादे को देखा जाता है। उदाहरण - 
. परेशान करना - यदि कोई संगीत केवल पड़ोसी को परेशान करने के लिए तेज बजा रहा है (जैसे Christie vs. Davey का मामला)।
ख. साजिश (Conspiracy) - जहाँ दो या दो से अधिक लोग किसी को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से मिलते हैं।
ग. इरादा बनाम हेतु (Intention vs. Motive) विधि शास्त्र में इन दोनों के बीच बारीक अंतर है 
∆A.इरादा (Intention) - कार्य करने की इच्छा (जैसे- किसी को थप्पड़ मारना)। अपकृत्य में यह अक्सर महत्वपूर्ण होता है।
∆B. हेतु (Motive) - उस कार्य को करने के पीछे का कारण (जैसे- थप्पड़ इसलिए मारा ताकि उसे सुधारा जा सके)। कानून अक्सर इस दूसरे भाग (हेतु) को नजरअंदाज कर देता है।
निष्कर्षआड़ में लड़े वो तेरे नाम पर कानून भी अक्सर बाहरी आवरण या हेतु के बजाय किए गए वास्तविक कार्य और उसके प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करता है। अपकृत्य विधि का मुख्य लक्ष्य क्षति की पूर्ति है, न कि अपराधी के मन की शुद्धि।
तुलनात्मक चार्ट - 
1. कानूनी कार्य - बुरी नीयत से नहीं किया ओर अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ।
2. अवैध कार्य - नेक नीयत से किया अधिकार का उल्लंघन हुआ।
वो अपवाद जहां अपकृत्य अभियोज्य नहीं होता अपकृत्य विधि में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जहाँ प्रतिवादी (Defendant) ने कोई कार्य किया हो और उससे हानि भी हुई हो, फिर भी उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता, इन्हें सामान्य अपवाद (General Defences) कहा जाता है।
मुख्य सामान्य अपवाद हैं - 
1 सहमति से दी गई क्षति  (Volenti Non Fit Injuria) - यदि कोई व्यक्ति जानते हुए और स्वेच्छा से किसी जोखिम के लिए अपनी सहमति देता है, तो वह बाद में क्षतिपूर्ति की मांग नहीं कर सकता।
उदाहरण क्रिकेट मैच देखने गए दर्शक को गेंद लगने पर वह खिलाड़ी पर मुकदमा नहीं कर सकता, क्योंकि वह जोखिम जानते हुए वहाँ गया था।
2. अनिवार्य दुर्घटना - (Inevitable Accident) ऐसी दुर्घटना जिसे उचित सावधानी और कौशल बरतने के बाद भी टाला नहीं जा सकता था।
निर्णय विधि - मामला - Stanley v. Powell में पक्षियों का शिकार करते समय एक गोली पेड़ से टकराकर वापस आई और दूसरे व्यक्ति को लग गई। इसे अनिवार्य दुर्घटना माना गया।
3. दैवीय घटना (Act of God / Vis Major) - यह अनिवार्य दुर्घटना का ही एक रूप है, लेकिन इसमें केवल प्राकृतिक शक्तियों का हाथ होता है, मनुष्य का नहीं।
∆शर्त- घटना असाधारण होनी चाहिए (जैसे भारी वर्षा, भूकंप, बिजली गिरना)।
निर्णय विधि - मामला - Nichols vs. Marsland में अत्यधिक वर्षा से कृत्रिम झील का बांध टूट गया। कोर्ट ने इसे Act of God माना।
4. निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) - अपने शरीर या संपत्ति की रक्षा के लिए किया गया कार्य अपकृत्य नहीं है, बशर्ते बल का प्रयोग खतरे के अनुपात में हो।
उदाहरण - यदि कोई आप पर लाठी से हमला करे, तो आप उसे रोकने के लिए धक्का दे सकते हैं, लेकिन उसे गोली नहीं मार सकते।
5. आवश्यकता (Necessity) - बड़ी हानि को रोकने के लिए जानबूझकर की गई छोटी हानि अपकृत्य नहीं मानी जाती।
उदाहरण - किसी मोहल्ले को आग से बचाने के लिए एक घर को गिरा देना ताकि आग आगे न फैले। यहाँ इरादा नेक होता है और उद्देश्य सुरक्षा होता है।
6.. वैधानिक अधिकार (Statutory Authority) - यदि संसद द्वारा पारित किसी कानून के तहत कोई कार्य किया जा रहा है, तो उससे होने वाली क्षति के लिए मुकदमा नहीं किया जा सकता।
उदाहरण - रेलवे लाइन के पास के घरों को शोर या धुएं से परेशानी होती है, लेकिन चूंकि रेलवे सरकारी कानून के तहत चलती है, इसलिए यह अपकृत्य नहीं है।
7. तुच्छ कार्य (De Minimis Non Curat Lex) - कानून छोटी-मोटी बातों पर ध्यान नहीं देता। यदि किसी के कार्य से बहुत ही मामूली नुकसान हुआ है जिसे समाज में सहन किया जा सकता है, तो उसके लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
8. भूल के अधीन किये गये कार्य।
9. न्यायिक एवं न्यायिक कल्प कार्य।
10. कार्य पालक कार्य।
11. पैतृक अथवा पैतृक-कल्प अधिकार।
12. सामान्य अधिकारों का प्रयोग।
13. राज-कार्य।
अपकृत्य के दायित्व से उन्मोचित होने की अवस्थाएं - 
क. पक्षकारों की मृत्यु हो जाने पर
ख. अधिकार त्याग कर दिये जाने पर
ग. समझौता हो जाने पर
घ. संतुष्टि ही जाने पर
ङ. निर्मुक्ति अथवा मोचन पर
च. मौन स्वीकृति पर
छ. न्यायालय के निर्णय पर
ज. परिसीमा काल समाप्त हो जाने पर।
कानून की भाषा में अपकृत्य के दायित्व से उन्मुक्ति (Discharge of Torts) का अर्थ उन स्थितियों से है, जहाँ एक बार अपकृत्य होने के बाद भी प्रतिवादी का कानूनी उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है। सरल शब्दों में, इसका मतलब है कि वादी (पीड़ित) का मुकदमा करने का अधिकार खत्म हो जाता है। इसके मुख्य आधार निम्नलिखित हैं - 
क. पक्षकारों की मृत्यु (Death of the Parties) - सूत्र (Actio personalis moritur cum persona व्यक्तिगत अधिकार व्यक्ति के साथ ही समाप्त हो जाते हैं)। यदि वादी या प्रतिवादी में से किसी की मृत्यु हो जाए, तो मानहानि जैसे व्यक्तिगत अपकृत्यों में मुकदमा समाप्त हो जाता है। हालांकि, अब आधुनिक कानूनों (जैसे Motor Vehicles Act) के तहत संपत्ति की क्षति या शारीरिक चोट के मामलों में कानूनी उत्तराधिकारी केस लड़ सकते हैं।
ख. समझौता और तुष्टि (Accord and Satisfaction) - जब दोनों पक्ष कोर्ट के बाहर आपस में समझौता कर लेते हैं।
∆. Accord (समझौता) - हर्जाने के बदले किसी बात पर सहमत होना।
∆. Satisfaction (तुष्टि) - उस समझौते के तहत तय की गई राशि या कार्य का भुगतान कर देना। 
इसके बाद वादी दोबारा उसी मामले पर केस नहीं कर सकता।
ग. अधित्यजन या माफी (Waiver) -
यदि पीड़ित व्यक्ति के पास एक से अधिक कानूनी उपचार उपलब्ध हों और वह उनमें से किसी एक को चुन ले या अपने अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दे, तो वह बाद में अपकृत्य का दावा नहीं कर सकता।
घ. निर्मुक्ति (Release) - जब पीड़ित व्यक्ति स्वेच्छा से प्रतिवादी को उसके दायित्व से मुक्त कर देता है। यह लिखित या मौखिक हो सकता है, बशर्ते यह बिना किसी दबाव के किया गया हो।
च. समय सीमा (Statute of Limitation) - कानून के अनुसार, हर अपराध या अपकृत्य के खिलाफ मुकदमा करने की एक निश्चित समय सीमा होती है। यदि वादी उस निर्धारित समय (भारत में सामान्यत एक से तीन वर्ष) के भीतर कोर्ट नहीं जाता है तो उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। कानून सोते हुए व्यक्ति की मदद नहीं करता।
छ. सक्षम न्यायालय का निर्णय (Judgment Recovered) - यदि किसी मामले में कोर्ट एक बार फैसला सुना चुका है और डिक्री पारित हो चुकी है तो उसी घटना पर दोबारा मुकदमा नहीं किया जा सकता। इसे प्राड्विवाद (Res Judicata) का सिद्धांत भी कहते हैं।
कानून में 'मुकदमा करने का अधिकार' अमर नहीं है; वह समय और परिस्थितियों के साथ समाप्त हो जाता है।
दोषपूर्ण कार्य/कानूनी क्षति का उपचार - कानून में एक मशहूर कहावत है - Ubi jus, ibi remedium, जिसका अर्थ है - जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है।
अगर किसी के दोषपूर्ण कार्य से किसी को कानूनी क्षति हुई, तो कानून कानून पीड़ित की जो मदद देता है, उसे उपचार कहते हैं। अपकृत्य विधि में उपचारों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है - 
1. न्यायिक उपचार - ये वे उपचार हैं जो अदालत के माध्यम से मिलते हैं। जो तीन प्रकार के होते हैं - 
I. अनिर्धारित हर्जाना - यह अपकृत्य का सबसे मुख्य उपचार है। अनिर्धारित का मतलब है कि हर्जाने की राशि पहले से तय नहीं होती (जैसे कॉन्ट्रैक्ट में होती है)। कोर्ट नुकसान की गंभीरता देख कर तय करता है कि कितना नुकसान मिलना चाहिए।
II. व्यादेश (Injunction/stay order) - जब हम चाहते हैं कि कोर्ट सामने वाले को कोई गलत काम करने से रोके।
उदाहरण - यदि एक पड़ोसी दूसरे की दीवार के पास अवैध निर्माण कर रहा है, तो आप कोर्ट से Injunction (स्टे ऑर्डर) ले सकते हैं।
III. संपत्ति की वापसी (Restitution of Property) - यदि किसी ने किसी की जमीन या सामान पर अवैध कब्जा कर लिया है, तो कोर्ट उसे वापस दिलाने का आदेश देता है।
2. न्यायेतर उपचार (Extra-Judicial Remedies) - ये वे उपचार हैं जिन्हें व्यक्ति बिना कोर्ट गए खुद कानून के दायरे में रहकर ले सकता है। इन्हें स्वयं सहायता (Self-help) भी कहते हैं:
I. आत्मरक्षा (Self-Defense) - अपने शरीर या संपत्ति को बचाने के लिए उचित बल (Reasonable Force) का प्रयोग करना।
II. पुनः प्रवेश (Re-entry on Land) - यदि किसी ने आपकी जमीन पर कब्जा कर लिया है, तो उसे शांतिपूर्वक वहां से हटाकर दोबारा प्रवेश करना।
III. माल वापस लेना (Recaption of Goods) - अपनी छीनी गई वस्तु को वापस लेना।
IV. उपताप हटाना (Abatement of Nuisance) - जैसे यदि पड़ोसी के पेड़ की टहनियाँ आपके घर में घुसकर नुकसान कर रही हैं, तो उन्हें काट देना (बशर्ते आप पड़ोसी को पहले सूचित करें)।
V. पशु-क्षति निरोध (Distress Damage Feasant) - यदि किसी का जानवर आपके खेत में घुसकर फसल चर रहा है, तो आप उस जानवर को तब तक अपने पास रोक (Detain) सकते हैं जब तक उसका मालिक नुकसान की भरपाई न कर दे।
विशेष - न्यायेतर उपचार (Extra-judicial) के समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि उचित बल का ही प्रयोग करें। जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल करने पर दोष खुद पर आ सकता हैं।
सारांश - 
दोषपूर्ण कार्य हुआ? 
अपकृत्य - पड़ोसी ने किसी का रस्ता रोका
कानूनी क्षति हुई? 
क्षति - उसके रास्ते के अधिकार का हनन।
उपचार क्या है? 
उपचार - कोर्ट जाकर हर्जाना मांगना या रास्ता खुलवाने का व्यादेश (आदेश) लेना।
सूत्र जहां अधिकार है, वहाँ उपचार है - (maxim Ubi jus ibi remedium) - कानून की दुनिया का यह सबसे प्रसिद्ध और बुनियादी सूत्र है। इसे लैटिन भाषा में Ubi jus ibi remedium कहा जाता है।
यह सूत्र इस विचार पर आधारित है कि कानून केवल कागजों पर अधिकारों की घोषणा नहीं करता, बल्कि उन्हें लागू करने की शक्ति भी देता है।
अर्थ और परिभाषा - सरल अर्थ में जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है। यदि कानून ने किसी व्यक्ति को कोई अधिकार दिया है तो उस अधिकार का उल्लंघन होने पर उसे न्याय पाने या मुआवजा लेने का रास्ता भी प्रदान किया है। अधिकार और उपचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
Jus (अधिकार) - वह कानूनी शक्ति जो किसी व्यक्ति को प्राप्त है।
Remedium (उपचार) - वह माध्यम जिसके द्वारा अधिकार को पुनः प्राप्त किया जाता है या क्षतिपूर्ति ली जाती है। इसका प्रमुख वाद - SB vs. व्हाइट (1703) एक उत्तम उदाहरण है।
इस सूत्र की आवश्यकता - बिना उपचार के अधिकार वैसा ही है जैसे बिना स्याही की कलम। यह सूत्र निश्चित करता है कि - 
∆. कोई भी कानूनी उल्लंघन दंडहीन न रहे।
. समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला नियम न चले।
. अदालतें उन मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकें जहाँ शारीरिक चोट नहीं, बल्कि केवल कानूनी हक छीना गया हो।
इस सूत्र की सीमाएँ (Limitations) - यह सूत्र हर स्थिति में लागू नहीं होता इसकी कुछ मर्यादाएँ हैं - 
. नैतिक अधिकार - यदि आपका कोई नैतिक अधिकार टूटता है (जैसे किसी का आपसे बात न करना), तो कानून उपचार नहीं देगा।
. कानूनी बाध्यता - जहाँ कानून ने स्पष्ट रूप से किसी उपचार को रोक दिया हो।
. Damnum Sine Injuria - यदि हानि हुई है पर कोई कानूनी अधिकार नहीं टूटा है, तो यह सूत्र काम नहीं करेगा।
निष्कर्ष - यह सिद्धांत न्यायपालिका की नींव है। यह आम आदमी को भरोसा दिलाता है कि यदि उसके साथ गलत हुआ है, तो कानून की चौखट पर उसके लिए कोई न कोई रास्ता (Remedy) जरूर खुला है यही विश्वास सूत्र बनकर सबको बांधता है। कानून में उपचार ही वह सूत्र है जो अधिकार की रक्षा करता है।
A. बिना हानि के क्षति (injuria sine damnum) - 
B. बिना क्षति के हानि (demnum sine injuria) 
A. बिना हानि के क्षति (injuria sine damnum) - यही सूत्र अपकृत्य का आधार एवं वाद योग्य है अपकृत्य विधि का यह सामान्य सिद्धान्त है कि किसी व्यक्ति के विधिक अधिका का उल्लंघन अथवा अतिलंघन वाद योग्य होता है। जिस व्यक्ति के विधिक अधिकार का उल्लंघन होता है वह व्यक्ति, उस व्यक्ति के विरुद्ध नुकसानी अर्थात क्षतिपूर्तिक वाद ला सकता है जिसके द्वारा अधिकारों का उल्लंघन किया गया है, चाहे ऐसे उल्लंघन से कोई आर्थिक क्षति हुई हो या नहीं। यही बिना हानि के क्षति (injuria sine damnum) के सूत्र का सार है। सरलत्तम शब्दों में यह कहा जा सकता है कि यह सूत्र ऐसे व्यक्ति को नुकसानी का बाद लाने का अधिकार प्रदान करता है जिसके विधिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। इसमें आर्थिक क्षति का होना आवश्यक नहीं है
∆ Injuria कानूनी अधिकार का उल्लंघन।
∆ Sine बिना।
∆ Damnum वास्तविक हानि (पैसा, स्वास्थ्य आदि)।
अर्थ - यदि आपका कानूनी अधिकार छीना गया है, तो आप मुकदमा कर सकते हैं, भले ही आपको एक पैसे का भी नुकसान न हुआ हो। यह सूत्र कानून के दो सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत स्तंभ हैं। दोनों सूत्र यह तय करते हैं कि कब किसी व्यक्ति को अदालत से मुआवजा मिलेगा और कब नहीं। 
कानूनी क्षति - वास्तविक हानि में अंतर 
Aबिना हानि के क्षति (Injuria Sine Damnum) (कानूनी हानि)  - यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति को कोई आर्थिक या शारीरिक नुकसान नहीं होता, लेकिन उसके कानूनी अधिकार का उल्लंघन (Legal Injury) हो जाता है।
उदाहरण - एशबी vs.व्हाइट
B. बिना क्षति के हानि (demnum sine injuria) (शरीर,संपत्ति या अन्य प्रत्यक्ष हानि) - इसमे बिना क्षति के हानि को अर्थात वाद योग्य नहीं माना गया है। इसका मुख्य कारण है कि मामलों में किसी व्यक्ति के विधिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं होता है। किसी व्यक्ति के विधिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं होता है तब तक यह प्र विधि के अधीन नुक्सानी का वाद नहीं ला सकता है। ऐसे मामलों में हानि महत्वपूर्ण नहीं है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 एवं मोटर वाहन अधिनियम, 1988।
इस प्रकार से किसी व्यक्ति को कितनी ही आर्थिक हानि होने पर भी यदि उसके किसी विधिक अधिकार का अतिक्रमण नहीं होता है तो वह नुकसानी का वाद नहीं चला सकता। वहीं इस सूत्र का सार एवं अर्थ है।
Damnum वास्तविक हानि या नुकसान।
Sine: बिना।
Injuria: कानूनी अधिकार का उल्लंघन।
अर्थ - बिना क्षति के हानि, यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति को बहुत बड़ी हानि (नुकसान) तो होता है, लेकिन उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।
इसमें नुकसान तो हुआ है पर सामने वाले ने कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया है अतः आप कोई मुआवजा नहीं पा सकते।
उदाहरण - ग्लोसेस्टर ग्रामर स्कूल - एक स्कूल के बगल में दूसरे व्यक्ति ने अपना नया स्कूल खोल लिया और फीस कम कर दी। पहले स्कूल को बहुत घाटा हुआ और उसे अपनी फीस भी घटानी पड़ी।
निर्णय - कोर्ट ने कहा कि व्यापार करना सबका अधिकार है। हानि (Damnum) तो हुआ, लेकिन किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन (Injuria) नहीं हुआ। इसलिए कोई हर्जाना नहीं मिला।
इसे जीवन के दर्शन से जोड़ें तो कभी-कभी सम्मान को ठेस (हानि/Injuria) पहुँचती है चाहे जेब से कुछ न गया हो, और कभी-कभी व्यापार में घाटा (Damnum) होता है पर वह किसी का दोष नहीं होता।
स्वेच्छा से खतरा मोल लेना अपकृत्य की कार्यवाही में एक बचाव है (Volenti non fit injuria is a good defence)यह सूत्र Volenti non fit injuria तीन शब्दों से मिलकर बना है - 
(i) Volenti (Voluntarily) स्वेच्छापूर्वक
(ii) non fit योग्य नहीं
(iii) injuria विधिक क्षति अथवा हानि।
इन तीनों का अर्थ है - स्वेच्छापूर्वक किये गये कार्य से कारित क्षति अभियोज्य (वाद योग्य) नहीं होती है।
विधिक भाषा में इस सिद्धांत को स्वेच्छा से खतरा मोल लेना, लैटिन में Volenti non fit injuria कहा जाता है। इसका सरल अर्थ है - जो व्यक्ति सहमति से जोखिम स्वीकार करने वाले को क्षति होने पर कानूनी उपचार नहीं मिलता।
यह सूत्र अपकृत्य विधि का सशक्त बचाव है। स्वेच्छा से उठाई गई हानि या स्वेच्छा से उठाया गया खतरा अपकृत्य का बचाव माना जाता है। जहाँ कोई कार्य किसी व्यक्ति की सहमति से किया जाता है तब ऐसे कार्य से कारित क्षति अथवा हानि अभियोज्य नहीं होती है। दूसरे शब्दों में जब कोई व्यक्ति अपनी सहमति अथवा सम्मति से स्वयं को हानि पहुँचाता है तो अपकृत्य विधि के अन्तर्गत उसके लिए कोई उपचार उपलब्ध नहीं है अर्थात् ऐसा व्यक्ति अन्य व्यक्ति से नुकसानी पाने का हकदार नहीं होता है।
सम्मति - अभिव्यक्त (expressed) विवक्षित (implied) या आचरण से (by conduct) हो सकती है।
सिद्धांत का आधार - जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी ऐसे कार्य के लिए तैयार हो जाता है जिसमें खतरे की संभावना है, तो वह अपने उस अधिकार को त्याग देता है जिसके तहत वह बाद में मुआवजा मांग सके। यहाँ वादी (पीड़ित) की सहमति ही प्रतिवादी का सबसे बड़ा बचाव होती है।
उदाहरण - 
खेल के मैदान में - यदि आप क्रिकेट या फुटबॉल मैच देखने/खेलने स्टेडियम जाते हैं और गेंद से चोट लग जाती है, तो आप खिलाड़ी या आयोजक पर मुकदमा नहीं कर सकते। आपने वहाँ जाकर खेल के सामान्य जोखिमों को स्वीकार किया है।
सर्जरी या चिकित्सा - एक मरीज जब ऑपरेशन के लिए कन्सेंट फॉर्म पर हस्ताक्षर करता है, तो वह सर्जरी से जुड़े जोखिमों को स्वीकार करता है। यदि डॉक्टर ने लापरवाही नहीं की है और फिर भी कोई जटिलता आती है, तो डॉक्टर उत्तरदायी नहीं होगा।
अतिचार (Trespass) - यदि किसी ने अपने बगीचे के बाहर बोर्ड लगा रखा है कि अंदर आना मना है, हिंसक कुत्ता है (Be aware of Dog) आप फिर भी अंदर जाते हैं, तो कुत्ता काटने पर आप मालिक को दोषी नहीं ठहरा सकते।
आवश्यक शर्तें (Essentials) - 
इस बचाव का लाभ लेने के लिए दो बातें सिद्ध करना अनिवार्य है - 
ज्ञान (Knowledge) - वादी को खतरे की जानकारी थी।
सहमति (Consent)- वादी ने उस खतरे को उठाने की स्वेच्छा से सहमति दी थी।
महत्वपूर्ण सूत्र - Scienti non fit injuria (केवल ज्ञान होना सहमति नहीं है)। यदि मुझे पता है कि सड़क पर गड्ढा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं गिरने के लिए तैयार हूँ। बचाव के लिए सहमति अनिवार्य है।
प्रमुख वाद (Case Law) - 
हॉल बनाम ब्रुकलैंड्स ऑटो रेसिंग क्लब - इस मामले में एक दर्शक कार रेसिंग देखने गया। रेस के दौरान दो कारें टकरा गईं और एक कार उछलकर दर्शकों के बीच आ गई जिससे वह व्यक्ति घायल हो गया।
निर्णय - न्यायालय ने कहा कि रेसिंग जैसे खेलों में इस तरह के हादसों का जोखिम अंतर्निहित होता है और दर्शक ने टिकट खरीदकर स्वेच्छा से वह जोखिम स्वीकार किया था। अतः उसे कोई मुआवजा नहीं मिला।
इस बचाव के अपवाद (Exceptions)
कुछ स्थितियों में यह बचाव काम नहीं करता - 
बचाव कार्य (Rescue Cases) - यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे की जान बचाने के लिए जानबूझकर खतरा मोल लेता है, तो वहां यह सिद्धांत लागू नहीं होता। (जैसे आग में कूदकर किसी को बचाना)।
लापरवाही (Negligence) - यदि आयोजक की लापरवाही से कोई अतिरिक्त खतरा पैदा हुआ हो, तो वह इस बचाव का सहारा नहीं ले सकता।
निष्कर्ष - यह सिद्धांत व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाता है। जैसा कि हम अपनी दुविधाओं और निर्णयों के स्वयं उत्तरदायी हैं, कानून भी यही कहता है कि आपकी सहमति आपके कानूनी उपचार का अंत कर सकती है।
केस लॉ  - स्मिथ बनाम बेकर एण्ड सन्स (1891 ए.सी. 329) के मामले में लार्ड हरशैल द्वारा इस सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि यह नियम (सिद्धान्त) सत् बोध तथा न्याय पर आधारित है। वह व्यक्ति जो किसी कृत्य को आमंत्रित करता है या अपने प्रति किये जाने के लिए सम्मति देता है तो ऐसे कृत्य से कारित क्षति के लिए वह दोष के रूप में परिवाद (शिकायत) नहीं कर सकता है।

व्यक्तिगत कार्यवाही व्यक्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है  Actio personalis moritur cum persona. - यह सूत्र अपकृत्य विधि के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन सिद्धांत को दर्शाता है। इसे लैटिन भाषा में Actio Personalis Moritur Cum Persona कहा जाता है जिसका सीधा और सरल अर्थ है व्यक्तिगत कानूनी कार्यवाही, व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही मर जाती है।
Actio - कार्यवाही
Personalis - व्यक्तिगत
Moritur - समाप्त
Cum - के साथ
Persona - व्यक्ति
सूत्र की विस्तृत व्याख्या - यदि किसी व्यक्ति के साथ कोई कानूनी अन्याय होता है, तो वह अदालत जा सकता है, लेकिन यह सूत्र कहता है कि कुछ विशेष व्यक्तिगत मामलों में, यदि पीड़ित (वादी) या अपराधी (प्रतिवादी) की मृत्यु हो जाती है, तो मुकदमा करने का अधिकार भी समाप्त हो जाता है।
परिस्थितियां - 
A. वादी की मृत्यु पर - यदि वह व्यक्ति मर गया जिसके साथ गलत हुआ था, तो उसके उत्तराधिकारी उस व्यक्तिगत अपमान के लिए मुकदमा जारी नहीं रख सकते।
B.प्रतिवादी की मृत्यु पर - यदि वह व्यक्ति मर गया जिसने गलत किया था, तो उसकी संपत्ति या वारिसों से उस व्यक्तिगत कृत्य का हर्जाना नहीं मांगा जा सकता।
लागू होने के मामले - यह सूत्र मुख्य रूप से उन अपकृत्यों पर लागू होता है जो व्यक्ति की गरिमा या भावना से जुड़े होते हैं, न कि संपत्ति से जैसे - 
A. मानहानि (Defamation) - यदि किसी की इज्जत को ठेस पहुँची है, तो उसकी मृत्यु के बाद उसके वारिस मानहानि का केस नहीं लड़ सकते (जब तक कि उनकी खुद की प्रतिष्ठा प्रभावित न हो)।
B. हमला (Assault) - शारीरिक हमले या डराने-धमकाने के मामले।
C. विद्वेषपूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) - गलत तरीके से जेल भिजवाना।
अपवाद (जहाँ कार्यवाही समाप्त नहीं होती) - आधुनिक समय में इस सूत्र की कठोरता को कम करने के लिए कई कानून बनाए गए हैं, क्योंकि यह अक्सर अन्यायपूर्ण साबित होता था। निम्नलिखित स्थितियों में मृत्यु के बाद भी मुकदमा चल सकता है - 
A. संपत्ति का नुकसान - यदि अपकृत्य के कारण किसी की संपत्ति को नुकसान पहुँचा है, तो मरने वाले के उत्तराधिकारी हर्जाना मांग सकते हैं।
B. विधि द्वारा छूट (Statutory Exceptions): *Fatal Accidents Act (घातक दुर्घटना अधिनियम) - यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु लापरवाही (जैसे रोड एक्सीडेंट) से हुई है, तो उसके आश्रित (पत्नी, बच्चे, माता-पिता) अपराधी से मुआवजे का दावा कर सकते हैं।
C. Law Reform Act (1934) -
(मिसलेनियम प्रोविजन्स) एक्ट, 1934 द्वारा तो इसे समाप्त ही कर दिया गया है)। इंग्लैंड और कई अन्य देशों में इस कानून ने अधिकांश अपकृत्यों के लिए इस सूत्र को समाप्त कर दिया है।
आलोचना - इस सूत्र की अक्सर आलोचना की जाती है क्योंकि यह अपराधी को केवल इसलिए बचने का मौका दे देता है क्योंकि पीड़ित की मृत्यु हो गई। जजों ने भी इसे असभ्य और अन्यायपूर्ण नियम कहा है।
निष्कर्ष - यह कानूनी सूत्र नश्वरता की बात करता है। यह मानता है कि कुछ व्यक्तिगत आघात और अधिकार मनुष्य की देह के साथ ही भस्म हो जाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह अवधारणा बदलने लगी। जैसे-जैसे उत्तराधिकार एवं प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त विकसित होता गया वैसे-वैसे यह सिद्धान्त अथवा सूत्र भी शिथिल होने लगा। आज यह सिद्धान्त मृत प्रायः सा हो गया है। आज स्थिति यह है कि यदि पक्षकारों के जीवन काल में कोई वाद हेतुक (cause of action) उत्पन्न हो जाता है तो उनमें से किसी एक की या सब की मृत्यु हो जाने पर भी वाद हेतुक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है अर्थात् एक बार हेतुक के अस्तित्त्व में आ जाने पर वह पक्षकारों की मृत्यु हो जाने पर भी बचा रहता है।
उदाहरण - यदि ने की सार्वजनिक बेइज्जती की, और की मृत्यु हो गई, तो का बेटा पर मानहानि का केस नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपमान का व्यक्तिगत अधिकार था।
अपकृत्यकर्ता अथवा पीड़ित व्यक्ति दोनों में से किसी एक की या दोनों की मृत्यु हो जाने पर अपकृत्यपूर्ण दायित्व से मुक्ति मिल जाती है। विस्तृत भाव में यह कहा सकता है कि व्यक्तिगत कार्यवाही व्यक्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है।
      आदमी खत्म बात खत्म
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UNIT II विशिष्ट अपकृत्य - विशिष्ट अपकृत्य (Specific Torts) का अर्थ उन विशेष गलत कार्यों से है जिनके लिए कानून में अलग-अलग नाम और नियम निर्धारित किए गए हैं। अभी तक हमने जो पढ़ा (लापरवाही, कर्तव्य आदि) वे सामान्य सिद्धांत थे, लेकिन विशिष्ट अपकृत्य वे अपराध जैसी श्रेणियां हैं जो दीवानी (Civil) प्रकृति की होती हैं।
1. हमला (Assault)
2. आघात (Battery)
3. लापरवाही (Negligence)
4. दोषपूर्ण कारावास
5. मानहानि
6. उपताप (परेशान करना)
I. सार्वजनिक उपताप 
II. निजी उपताप
7. अतिचार (Trespass)
8. तंत्रिका आघात (Nervous Shock)
1. हमला -  अपकृत्य विधि में हमला शब्द का अर्थ सामान्य बोलचाल की तुलना में थोड़ा अलग और तकनीकी है। कानून की नज़र में, किसी को मारना हमला नहीं है, बल्कि मारने की धमकी देना या मन में डर पैदा करना हमला है।
A. हमले की परिभाषा - जब कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक चेष्टा (Gesture) या व्यवहार से किसी दूसरे व्यक्ति के मन में यह उचित डर (Reasonable Apprehension) पैदा कर देता है कि वह उस पर बल प्रयोग (प्रहार) करने वाला है, तो इसे हमला माना जाता है।
विशेष - हमले में शरीर का स्पर्श (Touch) होना जरूरी नहीं है। केवल यह महसूस कराना काफी है कि अब पिटाई होने वाली है।
B. हमले के आवश्यक तत्व (घटक) - 
किसी भी कार्य को हमला' मानने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए - 
. इरादा (Intention) - सामने वाले व्यक्ति का इरादा आपको डराने का हो।
ख. शारीरिक चेष्टा (Gesture) - व्यक्ति ने ऐसा कोई इशारा किया हो (जैसे मुक्का तानना, हाथ उठाना, या पत्थर उठाने के लिए झुकना)।
C. आसन्न भय (Apprehension of Force) - पीड़ित के मन में यह डर बैठना  कि उस पर हमला अभी (तुरंत) होने वाला है।
D. क्षमता (Ability) - हमला करने वाले के पास उस समय हमला करने की क्षमता होनी चाहिए।
उदाहरण - यदि कोई व्यक्ति ट्रेन की खिड़की से बाहर खड़े व्यक्ति को मुक्का दिखाता है जबकि ट्रेन चल रही है, तो यह हमला' नहीं है क्योंकि वह तुरंत मार नहीं सकता। लेकिन अगर वह पास खड़ा होकर मुक्का ताने, तो यह हमला है।
E. हमले के उदाहरण (है या नहीं) - 
यदि कोई किसी की ओर लाठी लेकर दौड़े, भले ही वह उसे छुए बिना रुक जाए।
किसी की ओर भरी हुई पिस्तौल तानना (भले ही वह नकली हो, पर सामने वाले को असली लग रही हो)।
केवल शब्दों में धमकी देना, जैसे कोई दूर बैठा चिल्लाए मैं तुम्हें देख लूँगा, लेकिन कोई शारीरिक हरकत न करे।
बचाव (Defenses) - यदि किसी पर हमले का आरोप लगा है, तो वह ये तर्क दे सकता है कि - 
आत्मरक्षा - खुद को बचाने के लिए हाथ उठाना पड़ा।
सहमति - खेल-कूद (जैसे बॉक्सिंग) के दौरान डर पैदा होना सामान्य है।
हमले के विरुद्ध वैधानिक अधिकार - पुलिस द्वारा कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई कार्रवाई।
2. प्रहार/आघात (Battery) प्रहार जिसे कानून की भाषा में आघात कहा जाता है, हमले का अगला चरण है। जहाँ हमला केवल एक डर है, वहीं प्रहार उस डर का हकीकत में बदल जाना है।
A. प्रहार की परिभाषा - जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर को उसकी सहमति के बिना, जानबूझकर और गलत इरादे से शारीरिक बल द्वारा छूता है, तो उसे प्रहार या आघात कहा जाता है। यहाँ बल का मतलब केवल जोर से मारना नहीं है, कानून की नज़र में किसी को उसकी मर्जी के बिना छूना भी बल का प्रयोग माना जा सकता है।
B. प्रहार के आवश्यक तत्व (घटक) - किसी कार्य को प्रहार/आघात सिद्ध करने के लिए इन तीन शर्तों का होना जरूरी है - 
I. शारीरिक स्पर्श - प्रतिवादी का वादी के शरीर से सीधा या किसी वस्तु के जरिए संपर्क होना चाहिए।
उदाहरण - हाथ से मारना, किसी पर पानी फेंकना, किसी के हाथ से छड़ी छीन लेना, या किसी की कुर्सी हटा देना जिससे वह गिर जाए।
II. इरादा - संपर्क जानबूझकर किया गया हो। यदि भीड़भाड़ वाली बस में अचानक धक्का लग जाए, तो वह प्रहार नहीं है क्योंकि वहां इरादा गलत नहीं था।
III. सहमति का अभाव - वह स्पर्श पीड़ित की मर्जी के खिलाफ होना चाहिए।
C. हमला और प्रहार में मुख्य अंतर - 
इसे अक्सर एक साथ Assault and Battery कहा जाता है, लेकिन इनमें स्पर्श का महत्वपूर्ण अंतर है जिसे समझना जरूरी है - 
स्पर्श - हमला में मारने की धमकी या इशारा (जैसे हाथ उठाना) यहाँ शरीर को छुआ नहीं जाता = प्रहार में वास्तव में मार देना या छू लेना। यहाँ शारीरिक संपर्क अनिवार्य है।
उदाहरण - यदि A पत्थर उठाकर B की तरफ फेंकने का इशारा करता है, तो यह हमला है। लेकिन अगर वह पत्थर B को लग जाता है, तो यह प्रहार है।
D. प्रहार के विरुद्ध बचाव - यदि किसी पर प्रहार का आरोप है, तो वह इन आधारों पर बच सकता है - 
क. आत्मरक्षा - खुद को बचाने के लिए हल्का बल प्रयोग करना।
ख. सहमति - खेल के मैदान में (जैसे फुटबॉल या कुश्ती) खिलाड़ियों का एक-दूसरे से टकराना प्रहार नहीं है क्योंकि वहां सहमति होती है।
ग. कानूनी अधिकार - पुलिस द्वारा अपराधी को पकड़ने के लिए बल का प्रयोग करना।
घ. अनिवार्य आवश्यकता - किसी डूबते हुए व्यक्ति को बचाने के लिए उसे जोर से पकड़कर खींचना।
निष्कर्ष - प्रहार का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की शारीरिक अखंडता की रक्षा करना है। कानून कहता है कि किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे के शरीर को उसकी मर्जी के बिना छुए, चाहे वह स्पर्श कितना ही हल्का क्यों न हो।
3. लापरवाहीअपकृत्य विधि में लापरवाही सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला और महत्वपूर्ण विषय है। सरल शब्दों में, जब कोई व्यक्ति वह सावधानी नहीं बरतता है जो उसे कानूनन बरतनी चाहिए थी, और उसकी इस चूक से किसी और को नुकसान होता है, तो इसे लापरवाही कहते हैं।
A. लापरवाही कब - लापरवाही को सिद्ध करने हेतु तीन तथ्य - 
I. सावधानी बरतने का कानूनी कर्तव्य - पहली शर्त यह है कि प्रतिवादी (जिसने गलती की) का वादी (पीड़ित) के प्रति एक कानूनी कर्तव्य होना चाहिए था कि वह सावधानी बरते। यह कर्तव्य केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी होना चाहिए, यहां पड़ोसी का सिद्धांत - डोनोघ बनाम स्टीवेन्सन केस में यह तय हुआ कि पड़ोसी वह हर व्यक्ति है जो उसके काम से प्रभावित हो सकता है, उन सभी कामों के प्रति सावधानी बरतनी होगी।
उदाहरण - डॉक्टर का मरीज के प्रति, या ड्राइवर का सड़क पर चलने वालों के प्रति सावधानी बरतने का कर्तव्य होता है।
II. कर्तव्य का उल्लंघन - दूसरी शर्त यह है कि व्यक्ति उस सावधानी को बरतने में असफल रहा हो जिसकी उम्मीद एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति (Reasonable Man) से की जाती है। इसमें कोर्ट यह देखता है कि क्या जोखिम इतना बड़ा था कि सावधानी बरतना जरूरी था?
उदाहरण - यदि कोई कार चालक लाल बत्ती पार करता है, तो उसने अपने सावधानी बरतने के कर्तव्य का उल्लंघन किया है।
III. वास्तविक क्षति - तीसरी शर्त यह है कि प्रतिवादी की उस लापरवाही की वजह से वादी को वास्तविक नुकसान पहुँचना चाहिए। अगर लापरवाही तो हुई लेकिन कोई चोट या नुकसान नहीं हुआ, तो अपकृत्य का मामला नहीं बनता। नुकसान शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हो सकता है।
B. लापरवाही के सिद्धांत - 
क. रेस इप्सा लोक्विटुर (Res Ipsa Loquitur) - इसका अर्थ है - घटना स्वयं बोलती है। कभी-कभी लापरवाही इतनी साफ होती है कि पीड़ित को सबूत देने की जरूरत नहीं पड़ती।
उदाहरण - यदि किसी अस्पताल में ऑपरेशन के बाद मरीज के पेट में कैंची छूट जाए, तो यह Res Ipsa Loquitur का मामला है। यहाँ लापरवाही खुद दिख रही है।
ख. अंशदायी लापरवाही (पीड़ित की भी थोड़ी बहुत गलती थी) - दुर्घटना के समय पीड़ित की भी कुछ गलती होती है। ऐसे मामलों में कोर्ट हर्जाने की राशि को पीड़ित की गलती के अनुपात में कम कर देता है।
उदाहरण - A सड़क पर गलत दिशा में गाड़ी चला रहा था, B ने सामने लापरवाही से टक्कर मार दी। यहाँ A भी अंशदायी लापरवाही मानी जाएगी।
4. दोषपूर्ण कारावास - इसका अर्थ किसी अपराधी को जेल में डालना नहीं है, बल्कि किसी व्यक्ति की आजादी को पूरी तरह से रोक देना है। अपकृत्य विधि में यह व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन से जुड़ा मामला है।
इसे आसान भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है - 
1. परिभाषा - जब किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध, बिना किसी कानूनी आधार के, एक निश्चित सीमा (जेल,कमरा,घर) के भीतर पूरी तरह से कैद कर दिया जाता है, तो उसे दोषपूर्ण कारावास कहते हैं।
विशेष - इसके लिए जेल की चारदीवारी होना जरूरी नहीं है; अगर आप किसी को बीच सड़क पर भी चारों तरफ से घेर कर खड़े हो जाएं कि वह कहीं जा न सके, तो वह भी दोषपूर्ण कारावास है।
2. दोषपूर्ण कारावास के आवश्यक तत्व- किसी कार्य को दोषपूर्ण कारावास सिद्ध करने के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए:
I. पूर्ण अवरोध - व्यक्ति की आजादी पर रोक पूरी तरह से होनी चाहिए। अर्थात उसे किसी भी दिशा में जाने की अनुमति न हो।
उदाहरण - यदि आपने एक रास्ते को बंद कर दिया है लेकिन व्यक्ति दूसरे रास्ते से बाहर जा सकता है, तो यह दोषपूर्ण कारावास नहीं है। इसे केवल दोषपूर्ण बाधा (Wrongful Restraint) कहा जाएगा।
II. बिना कानूनी औचित्य के (Without Legal Justification) - उसे रोकने का कोई कानूनी कारण नहीं होना चाहिए।
उदाहरण - यदि पुलिस किसी अपराधी को वारंट के साथ गिरफ्तार करती है, तो वह दोषपूर्ण नहीं है। लेकिन यदि कोई सामान्य व्यक्ति आपको बिना वजह कमरे में बंद कर दे, तो वह दोषपूर्ण है।
3. दोषपूर्ण कारावास का पीड़ित को पता होना जरूरी है या नहीं - कानून कहता है कि दोषपूर्ण कारावास के लिए यह जरूरी नहीं है कि पीड़ित को उस समय पता हो कि वह कैद है।
उदाहरण - यदि कोई व्यक्ति गहरी नींद में सो रहा है और आप बाहर से कुंडी लगा देते हैं और उसके जागने से पहले खोल देते हैं, तो तकनीकी रूप से वह भी दोषपूर्ण कारावास माना जा सकता है।
4. दोषपूर्ण कारावास के बचाव - यदि किसी पर यह आरोप है, तो वह तर्क दे सकता है कि उक्त कृत्य - 
∆ सहमति - सहमति से उसकी मर्जी से किया गया या वह अपनी मर्जी से वहां रुका था।
∆ कानूनी गिरफ्तारी - पुलिस द्वारा अधिकार क्षेत्र में रहकर की गई गिरफ्तारी।
∆ माता-पिता का अधिकार - बच्चों को उनकी सुरक्षा के लिए कमरे में कुछ समय के लिए रोकना।
∆ अनिवार्य आवश्यकता - किसी पागल या खतरनाक व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने से रोकने के लिए बंद करना।
केस लॉ - भीम सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (1985) - भीम सिंह विधायक को पुलिस ने जानबूझकर रास्ते में गिरफ्तार कर लिया ताकि वे विधानसभा सत्र में शामिल न हो सकें। सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोषपूर्ण कारावास माना और उनके मौलिक अधिकारों के हनन के लिए सरकार को 50,000 रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया।
5. मानहानि (Defamation) - यह ऐसा अपकृत्य है जो व्यक्ति के सबसे कीमती गहने, प्रतिष्ठा (Reputation) की रक्षा करता है। कानून की नज़र में किसी व्यक्ति की संपत्ति चुराना जितना दोष है, उसकी इज्जत को नुकसान पहुँचाना उससे भी बड़ा दोष है।
1. मानहानि की परिभाषा - जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में कोई झूठा बयान बोलकर या लिखकर करता है, जिससे समाज के सामान्य और समझदार लोगों की नज़र में उस व्यक्ति की इज्जत कम हो जाती है, तो इसे मानहानि कहते हैं।
2. मानहानि के दो प्रकार - 
I. लेख्य/प्रकाशित (Libel) - यह स्थायी रूप में होती है। जैसे—अखबार में लिखना, किताब, कार्टून, पुतला बनाना या सोशल मीडिया पर पोस्ट करना। (यह अधिक गंभीर माना जाता है)।
II. वचन/मौखिक (Slander) - यह अस्थायी या मौखिक रूप में होती है। जैसे बोलकर या इशारों से किसी का अपमान करना।
3. मानहानि सिद्ध करने हेतु आवश्यक तत्व - किसी पर मानहानि का केस जीतने हेतु ये तीन बातें साबित करनी होंगी - 
I. कथन अपमानजनक होना चाहिए - वह बात ऐसी होनी चाहिए जिससे व्यक्ति का सम्मान कम हो या लोग उससे दूर भागने लगें।
II. कथन वादी से संबंधित होना चाहिए - यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह बात वादी बारे में ही कही गई है। (भले ही नाम न लिया गया हो, लेकिन साफ इशारा उसकी तरफ हो)।
III. प्रकाशन - वह अपमानजनक बात किसी तीसरे व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए। अगर कोई बंद कमरे में आपको गाली देता है, तो वह मानहानि नहीं है क्योंकि आपकी इज्जत दूसरों की नज़र में कम नहीं हुई। लेकिन अगर वह बात किसी और ने सुन ली या पढ़ ली, तो वह मानहानि है।
4. मानहानि के विरुद्ध बचाव - हर अपमानजनक बात मानहानि नहीं होती। कानून में इसके कुछ मजबूत बचाव हैं - 
A. सत्यता - अगर कही गई बात सच है, तो वह मानहानि नहीं है। कानून सच बोलने से किसी को नहीं रोकता।
B. उचित आलोचना - सार्वजनिक हितों से जुड़े मामलों (जैसे फिल्म रिव्यू, राजनेताओं के कार्य) पर ईमानदारी से दी गई राय मानहानि नहीं होती।
C. विशेषाधिकार - कुछ जगहों पर बोलने की पूरी आजादी होती है, जैसे संसद में नेताओं का भाषण या अदालत में जज और वकीलों की बहस।
5. उदाहरण - 
. स्थिति एक - A ने B को अकेले में चोर कहा। (यह मानहानि नहीं है, क्योंकि किसी तीसरे को पता नहीं चला)।
. स्थिति दो - A ने सोशल मीडिया पर लिखा कि B चोर है जबकि B ने कभी चोरी नहीं की। (यह मानहानि है, क्योंकि यह झूठ है और इसे दुनिया ने देखा परन्तु यदि जांच में सिद्ध हुआ हो कि B ने चोरी की है तो भी मानहानि नहीं है)।
निष्कर्ष - मानहानि का कानून आपकी अभिव्यक्ति की आजादी और दूसरे के सम्मान के बीच एक संतुलन बनाता है। आपको बोलने का हक है, लेकिन किसी की इज्जत उछालने का नहीं।
6 उपताप/अशांति/शांतिभंग/ परेशान करना - अपकृत्य विधि का वह भाग जो नागरिक के सुकून और शांति से जीवन के अधिकार की रक्षा करता है। साधारण शब्दों में, जब कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का इस तरह से उपयोग करता है कि उससे आपके जीवन में बाधा आए या आपकी शांति भंग हो, तो उसे उपताप कहते हैं।
1. उपताप के प्रकार - कानून में उपताप को दो श्रेणियों में रखा गया है - 
I. सार्वजनिक उपताप - यह एक ऐसा कार्य है जिससे पूरे समाज या मोहल्ले को परेशानी होती है। यह केवल एक नागरिक दोष नहीं, बल्कि अपराध भी है।
उदाहरण - मुख्य सड़क पर गड्ढा खोदना, सार्वजनिक कुएं में जहर मिलाना, या सड़क पर कचरा फैलाना।
II. निजी उपताप - यह तब होता है जब किसी व्यक्ति के कार्य से किसी विशेष व्यक्ति के अपने घर या संपत्ति के आनंद लेने के अधिकार में बाधा आती है।
उदाहरण - पड़ोसी का रात भर बहुत तेज आवाज में म्यूजिक बजाना, या उसके घर का गंदा पानी आपकी दीवार पर गिरना।
2. उपताप सिद्ध के घटक (तत्व) - किसी कार्य को निजी उपताप मानने हेतु इन तीन शर्तों का पूरा होना जरूरी है - 
I. अनुचित हस्तक्षेप - वह बाधा मामूली नहीं होनी चाहिए। कानून कहता है कि समाज में रहने के लिए हमें थोड़ी-बहुत परेशानी सहन करनी पड़ती है, लेकिन अगर वह हद से ज्यादा है, तभी वह उपताप है।
II. संपत्ति के आनंद में बाधा - वह हस्तक्षेप आपकी जमीन के उपयोग या आपके स्वास्थ्य/सुकून से जुड़ा होना चाहिए।
III. वास्तविक क्षति - वादी को वास्तव में कोई नुकसान या भारी परेशानी होनी चाहिए।
3. उपताप के विरुद्ध उपलब्ध बचाव -
I. नुस्खे का अधिकार - यदि कोई व्यक्ति पिछले 20 वर्षों से वही काम शांतिपूर्वक (जैसे शोर करना) कर रहा है और किसी ने आपत्ति नहीं की, तो अब यह उसका अधिकार बन गया।
II. वैधानिक अधिकार - यदि वह कार्य सरकार या किसी कानून के आदेश पर किया जा रहा है (जैसे रेलवे की पटरियों का शोर, बस स्टेंड पर माइक से सूचना) तो उसे उपताप नहीं माना जाएगा।
विशेष - यह कोई बचाव नहीं है कि वादी खुद चलकर उपताप के पास आया है। उदाहरण - अगर A ने ऐसी जगह पर घर खरीदा जहाँ पहले से ही शोर करने वाली फैक्ट्री थी, तो भी A उस फैक्ट्री के खिलाफ उपताप का केस कर सकते हैं।
4. उपताप के उपचार - 
∆ व्यादेश (कोर्ट स्टे) - कोर्ट से उस काम को रुकवाना।
∆ हर्जाना - हुए नुकसान के लिए पैसा मांगना।
5. उपताप को हटाना - बिना कोर्ट जाए खुद उस बाधा को दूर करना (जैसे पड़ोसी के पेड़ की लटकी हुई टहनियाँ काट देना)।
7. अतिचार - (बिना अनुमति संपत्ति/सामान/शरीर में प्रवेश/छूना/उपयोग लेना या व्यवधान) - अतिचार का सीधा संबंध हस्तक्षेप से है। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति, शरीर या सामान में उसकी अनुमति के बिना सीधा दखल देता है, तो उसे अतिचार कहा जाता है। अतिचार की सबसे खास बात यह है कि इसमें हानि होना जरूरी नहीं है, केवल अधिकार का उल्लंघन ही काफी है। अतिचार को तीन मुख्य भागों में बांटा जाता है - 
I. भूमि पर अतिचार - जब कोई व्यक्ति बिना किसी कानूनी अधिकार के किसी दूसरे की जमीन या घर में प्रवेश करता है, तो उसे भूमि पर अतिचार कहते हैं।
. किसी की जमीन पर चलना, वहां कोई सामान फेंक देना, या अनुमति खत्म होने के बाद भी वहां रुके रहना।
. हवा और पाताल तक अधिकार - कानून मानता है कि जमीन के मालिक का अधिकार उस जमीन के ऊपर की हवा (एक निश्चित ऊंचाई तक) और जमीन के नीचे की गहराई तक भी होता है।
उदाहरण - बिना पूछे पड़ोसी के आंगन में क्रिकेट की गेंद लेने जाना भी तकनीकी रूप से अतिचार है।
II. शरीर पर अतिचार - इसमें व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता और सुरक्षा का उल्लंघन शामिल है। इसके तीन प्रकार पर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं - 
∆ . हमला - मारने का डर पैदा करना।
∆ . प्रहार - वास्तव में शारीरिक बल का प्रयोग करना।
∆. दोषपूर्ण कारावास - किसी को गलत तरीके से कैद करना।
III. माल/सामान पर अतिचार - जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के सामान (जैसे कार, लैपटॉप, पालतू जानवर) को बिना अनुमति के छूता है, उसे हटाता है या उसे नुकसान पहुँचाता है।
उदाहरण - किसी की खड़ी कार पर जानबूझकर खरोंच मारना या किसी का पालतू कुत्ता बिना वजह उठा ले जाना।
अतिचार के आवश्यक के घटक (तत्व) 
I. प्रत्यक्ष हस्तक्षेप - हस्तक्षेप सीधा होना चाहिए। (जैसे: किसी के घर में कूड़ा फेंकना अतिचार है, लेकिन आपके पेड़ की टहनियां खुद बढ़कर पड़ोसी के घर चली जाएं, तो वह उपताप है, अतिचार नहीं)।
II. इरादा - व्यक्ति का वहां जाना या छूना स्वैच्छिक होना चाहिए। (यदि कोई आपको धक्का दे दे और आप पड़ोसी के बगीचे में गिर जाएं, तो आप दोषी नहीं हैं)।
III. कब्जा - अतिचार का केस वही कर सकता है जिसके पास उस समय उस चीज का कब्जा हो (जरूरी नहीं कि वह मालिक ही हो)।
अतिचार से बचाव - 
I. अनुमति - यदि मालिक ने खुद बुलाया हो।
कानूनी अधिकार - जैसे पुलिस का तलाशी के लिए घर में घुसना।
II. अनिवार्य आवश्यकता - किसी के घर में आग लगी हो और उसे बुझाने के लिए बिना पूछे घुसना।
III. आत्मरक्षा - हमलावर से बचने के लिए किसी की संपत्ति का उपयोग करना।
निष्कर्ष - अतिचार का कानून हमें अपनी संपत्ति और शरीर पर पूर्ण नियंत्रण का अधिकार देता है। कोई भी बाहरी व्यक्ति आपकी मर्जी के बिना आपकी सीमा में कदम नहीं रख सकता।
8. तंत्रिका आघात/सदमा - अपकृत्य विधि का एक आधुनिक और संवेदनशील हिस्सा है। यह उस स्थिति से संबंधित है जहाँ किसी व्यक्ति को कोई शारीरिक चोट तो नहीं लगती, लेकिन किसी की लापरवाही के कारण उसे इतना गहरा मानसिक या मनोवैज्ञानिक सदमा पहुँचता है कि उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता है।
1. परिभाषा - जब प्रतिवादी की लापरवाही के कारण वादी को अचानक कोई मानसिक आघात या सदमा पहुँचता है, जिससे उसे कोई बीमारी (जैसे दिल का दौरा, मानसिक असंतुलन, या गर्भपात) हो जाती है, तो इसे तंत्रिका आघात कहते हैं।
2. आवश्यक शर्तें (घटक/तत्व) - किसी मामले को तंत्रिका आघात मानने के लिए कोर्ट ये चीजें देखता है - 
I. सदमा प्रत्यक्ष होना चाहिए - व्यक्ति को सदमा किसी घटना को अपनी आँखों से देखने या कानों से सुनने के कारण लगना चाहिए।
II. बीमारी या शारीरिक हानि - केवल दुख होना या डर जाना काफी नहीं है। उस सदमे के कारण कोई न कोई शारीरिक या मानसिक बीमारी होनी चाहिए।
III. पूर्वानुमान - क्या एक सामान्य व्यक्ति यह अंदाजा लगा सकता था कि ऐसी घटना से किसी को सदमा पहुँच सकता है?
3. तंत्रिका आघात के प्रमुख प्रकार - 
I. स्वयं की सुरक्षा का डर - जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी अपनी जान खतरे में है।
उदाहरण - एक ड्राइवर की लापरवाही से कार आपके बहुत करीब से गुजरती है। आपको चोट नहीं लगी, लेकिन डर के मारे आपको दिल का दौरा पड़ गया।
II. अपनों की सुरक्षा का डर - जब कोई व्यक्ति अपने किसी प्रियजन (बच्चे, पति/पत्नी) को अपनी आँखों के सामने दुर्घटना का शिकार होते देखता है।
उदाहरण - एक माँ खिड़की से अपने बच्चे का भयानक एक्सीडेंट होते देखती है और सदमे के कारण बीमार हो जाती है।
4. महत्वपूर्ण केस लॉ - 
I. हैब्रुक बनाम स्टोक्स, 1925) - इस केस में एक माँ ने देखा कि एक बेकाबू ट्रक उस गली की ओर जा रहा है जहाँ उसके बच्चे खेल रहे थे। उसे डर लगा कि बच्चों को कुछ हो गया होगा। बाद में सदमे के कारण उसकी मृत्यु हो गई। कोर्ट ने इसे तंत्रिका आघात माना और मुआवजा दिलवाया।
II. मैकलोघलिन बनाम ओब्रायन, 1983) - एक महिला को एक्सीडेंट के दो घंटे बाद अस्पताल में अपने परिवार की हालत देख कर सदमा लगा। कोर्ट ने कहा कि भले ही वह घटना स्थल पर नहीं थी, लेकिन उसने तत्काल परिणाम देखे, इसलिए वह मुआवजे की हकदार है।
5. बचाव और सीमाएं - कोर्ट हर किसी को सदमे के लिए हर्जाना नहीं दिलवाता। यदि कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा संवेदनशील है (जैसे छोटी सी आवाज से भी डर जाने वाला), तो उसे मुआवजा मिलना मुश्किल होता है। कानून सामान्य सहन शक्ति वाले व्यक्ति (Person of ordinary fortitude) को आधार मानता है।
निष्कर्ष - तंत्रिका आघात यह स्वीकार करता है कि मनुष्य का मन भी उसके शरीर का हिस्सा है। जैसे शरीर पर घाव होने पर हर्जाना मिलता है, वैसे ही मन पर लगे गहरे जख्म के लिए भी कानून न्याय करता है।
तंत्रिका आघात के कारण हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति - मानसिक आघात के मामले में उपचार मिलना अन्य अपकृत्यों की तुलना में थोड़ा जटिल होता है, क्योंकि यहाँ चोट शरीर पर नहीं, बल्कि मन पर होती है। अपकृत्य विधि के तहत इसके उपचार और हर्जाने के सिद्धांतों को इस प्रकार समझा जा सकता है - 
1. मुख्य उपचार (अनिर्धारित हर्जाना) - 
मानसिक आघात के लिए सबसे प्रमुख उपचार मौद्रिक मुआवजा है। चूंकि मानसिक पीड़ा को मापना कठिन है, इसलिए इसे अनिर्धारित कहा जाता है। कोर्ट हर्जाना तय करते समय निम्नलिखित पहलुओं को देखता है - 
I. चिकित्सा व्यय - सदमे के कारण हुए मानसिक रोग के इलाज, थेरेपी और दवाओं का खर्च।
II. आय की हानि - यदि व्यक्ति सदमे के कारण काम करने में असमर्थ हो गया है, तो उसकी भविष्य की कमाई का नुकसान।
III. पीड़ा और कष्ट - मानसिक यंत्रणा और जीवन के आनंद में आई कमी के लिए मुआवजा।
2. उपचार मिलने की अनिवार्य शर्तें - 
कोर्ट केवल दुखी होने या भावुक होने के लिए उपचार नहीं देता। उपचार पाने के लिए वादी को ये तीन बातें साबित करनी पड़ती हैं - 
A. पहचान योग्य मानसिक बीमारी - केवल सामान्य तनाव या डर काफी नहीं है। डॉक्टर द्वारा प्रमाणित कोई बीमारी जैसे डिप्रेशन, PTSD (Post-Traumatic Stress Disorder) या सदमे के कारण हुआ शारीरिक विकार होना चाहिए।
II आसन्नता(संबंधित)(Proximity) - 
क. समय और स्थान की निकटता -वादी ने दुर्घटना को अपनी आँखों से देखा हो या उसके तुरंत बाद वहां पहुँचा हो।
ख. संबंधों की निकटता - पीड़ित और वादी के बीच गहरा प्रेम संबंध (जैसे माता-पिता, पति-पत्नी) होना चाहिए।
ग. उचित पूर्वानुमान - क्या प्रतिवादी यह अंदाजा लगा सकता था कि उसकी लापरवाही से किसी सामान्य व्यक्ति को ऐसा गहरा सदमा लग सकता है?
3. प्राथमिक और द्वितीयक पीड़ित (Primary vs Secondary Victims) - हर्जाने की मात्रा और उपचार इस पर निर्भर करता है कि पीड़ित कौन है - 
I. प्राथमिक पीड़ित - वह जो खुद दुर्घटना के खतरे के दायरे में था। इन्हें उपचार आसानी से मिल जाता है।
II. द्वितीयक पीड़ित - वह जो खुद खतरे में नहीं था, लेकिन उसने अपनों को चोटिल होते देखा। इन्हें उपचार तभी मिलता है जब वे ऊपर दी गई आसन्नता की शर्तों को पूरा करते हों।
4. क्षति की दूरस्थता (Remoteness of Damage) - उपचार के लिए यह जरूरी है कि मानसिक आघात सीधा परिणाम हो। यदि कोई व्यक्ति घटना के कई दिनों बाद टीवी पर खबर देखकर सदमे में आता है, तो आमतौर पर कानून उसे उपचार नहीं देता क्योंकि यह दूरस्थ (Remote) माना जाता है।
निष्कर्ष - मानसिक आघात का उपचार दिलाने में भारतीय अदालतें अब काफी उदार हो गई हैं। एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ जैसे मामलों के बाद, कोर्ट अब 'मानसिक स्वास्थ्य' को भी 'जीवन के अधिकार' (अनुच्छेद 21) का हिस्सा मानता है और गंभीर मानसिक क्षति के लिए भारी मुआवजे का आदेश दे सकता है।
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UNIT III - दायित्व (Liability)
कठोर दायित्व (Strict Liability) का सिद्धांत - अपकृत्य विधि का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और कड़ा नियम है। सामान्यतः, किसी व्यक्ति को तभी जिम्मेदार माना जाता है जब उसकी कोई गलती (Fault) या लापरवाही (Negligence) हो। लेकिन कठोर दायित्व का नियम कहता है कि भले ही आपकी कोई गलती न हो, फिर भी आप नुकसान के लिए जिम्मेदार होंगे।
इस नियम का जन्म 1868 में इंग्लैंड के प्रसिद्ध केस रायलैंड्स बनाम फ्लेचर से हुआ।
1. कठोर दायित्व का अर्थ - यदि कोई व्यक्ति अपनी जमीन पर कोई ऐसी खतरनाक चीज लाता है, जिसके बाहर निकलने से दूसरों को नुकसान होने की संभावना हो, तो वह व्यक्ति उस चीज को सुरक्षित रखने के लिए बाध्य है। यदि वह चीज बाहर निकलकर किसी को नुकसान पहुँचाती है, तो मालिक यह नहीं कह सकता कि मैंने तो पूरी सावधानी बरती थी।
2. कठोर दायित्व के 3 आवश्यक तत्व -
रायलैंड्स बनाम फ्लेचर के अनुसार, इस नियम को लागू करने के लिए ये तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए - 
I. खतरनाक वस्तु - व्यक्ति ने अपनी जमीन पर कोई ऐसी चीज जमा की हो जो बाहर निकलने पर नुकसान कर सकती हो (जैसे—पानी, गैस, बिजली, जंगली जानवर या जहरीले रसायन)।
II. वस्तु का पलायन - वह वस्तु मालिक के नियंत्रण वाले क्षेत्र से बाहर निकलनी चाहिए। यदि नुकसान मालिक की जमीन के अंदर ही होता है, तो यह नियम लागू नहीं होगा।
III. जमीन का गैर-प्राकृतिक उपयोग - वह चीज वहां प्राकृतिक रूप से नहीं होनी चाहिए। जैसे—पीने के लिए टैंक में पानी रखना सामान्य है, पर व्यवसाय के लिए बहुत बड़ा जलाशय बनाना गैर-प्राकृतिक उपयोग माना जा सकता है।
4. कठोर दायित्व के अपवाद (बचाव के उपाय) - इस नियम से बचने के कुछ रास्ते भी हैं। मालिक जिम्मेदार नहीं होगा यदि - 
I. वादी की अपनी गलती (Plaintiff's own fault) - यदि वादी खुद उस खतरनाक चीज से छेड़छाड़ करे।
II. दैवीय घटना (Act of God) - बहुत भारी बाढ़ या भूकंप जैसी अनहोनी घटना।
III. तृतीय पक्ष का कार्य - यदि किसी अजनबी ने शरारत से वह चीज बाहर निकाल दी हो।
IV. संवैधानिक प्राधिकरण - यदि सरकार ने किसी कानून के तहत वह काम किया हो।
V. साझा लाभ - यदि वह चीज वादी और प्रतिवादी दोनों के फायदे के लिए रखी गई थी।
5. कठोर दायित्व बनाम पूर्ण दायित्व - 
भारत में 1987 में MC मेहता (ओलियम गैस लीक) केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण दायित्व का नया नियम बनाया, जो कठोर दायित्व से भी ज्यादा सख्त है। इसमें ऊपर दिए गए अपवाद (Exceptions) भी काम नहीं करते।
पूर्ण दायित्व का सिद्धांत - पूर्ण दायित्व (Absolute Liability) का सिद्धांत भारतीय कानून की एक ऐसी देन है जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। यह सिद्धांत कठोर दायित्व (Strict Liability) का सख्त और आधुनिक रूप है।
1. सिद्धांत की उत्पत्ति (Origin) - इस सिद्धांत का प्रतिपादन भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा MC मेहता बनाम भारत संघ (1987), जिसे ओलियम गैस लीक केस के अंतर्गत किया। जस्टिस पी.एन. भगवती ने महसूस किया कि इंग्लैंड का पुराना 'रायलैंड्स बनाम फ्लेचर' का नियम (Strict Liability) आधुनिक उद्योगों की जटिलता और खतरनाक प्रकृति से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है।
2. पूर्ण दायित्व' का अर्थ (Meaning) - यदि कोई उद्योग किसी बेहद खतरनाक (Hazardous) या जोखिमपूर्ण गतिविधि में लगा है और उस गतिविधि से किसी भी प्रकार का नुकसान होता है, तो वह उद्योग उस नुकसान की भरपाई के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी होगा। इसमें मालिक यह नहीं कह सकता कि मेरी कोई गलती नहीं थी या मैंने बहुत सावधानी बरती थी।
3. पूर्ण दायित्व की मुख्य विशेषताएं - 
I. कोई अपवाद नहीं (No Exceptions) - कठोर दायित्व में मालिक दैवीय घटना या तीसरे पक्ष की शरारत जैसे बहाने बना सकता था। लेकिन पूर्ण दायित्व में ऐसा कोई बचाव उपलब्ध नहीं है।
II. पलायन (Escape) अनिवार्य नहीं - कठोर दायित्व के लिए खतरनाक वस्तु का आपके परिसर से बाहर निकलना जरूरी था। पूर्ण दायित्व में यदि फैक्ट्री के अंदर भी किसी कर्मचारी या व्यक्ति को नुकसान होता है, तो भी कंपनी जिम्मेदार होगी।
III. क्षमता आधारित मुआवजा (Deep Pocket Theory) - हर्जाने की राशि कंपनी की वित्तीय क्षमता पर निर्भर करती है। कंपनी जितनी बड़ी और समृद्ध होगी, उसे उतना ही बड़ा हर्जाना देना होगा ताकि वह अन्य उद्योगों के लिए एक उदाहरण (Deterrent) बन सके।
4. यह कब लागू होता है - पूर्ण दायित्व केवल तभी लागू होता है जब - 
. उद्यम किसी खतरनाक या अंतर्निहित रूप से असुरक्षित गतिविधि में लगा हो।
. उस गतिविधि के कारण किसी को क्षति पहुँची हो।
5. उदाहरण - मान लीजिए एक केमिकल फैक्ट्री है। बहुत भारी भूकंप आता है और गैस लीक हो जाती है जिससे गाँव वाले बीमार पड़ जाते हैं।
∆. कठोर दायित्व (इंग्लैंड का नियम) - फैक्ट्री बच सकती है यह कहकर कि यह Act of God (भूकंप) था।
∆ पूर्ण दायित्व (भारत का नियम) - फैक्ट्री को हर हाल में हर्जाना देना होगा। कानून कहता है कि चूंकि आपने खतरनाक काम से मुनाफा कमाया है, तो जोखिम भी पूरी तरह आपका ही होगा।
निष्कर्ष - पूर्ण दायित्व का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि बड़े उद्योग अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को गंभीरता से लें और जनता की सुरक्षा से समझौता न करें।
कठोर दायित्व व पूर्ण दायित्व में अंतर
आधार - कठोर दायित्व = पूर्ण दायित्व
स्त्रोत - रायलैंड्स बनाम फ्लेचर (1868) = एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987)
बचाव/अपवाद |- इसमें 5 अपवाद (जैसे दैवीय घटना, तृतीय पक्ष) मिलते हैं = इसमें कोई अपवाद या बचाव नहीं मिलता।
पलायन (Escape) - वस्तु का परिसर से बाहर निकलना जरूरी है = परिसर से बाहर निकलना जरूरी नहीं है।
लागू होना - व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों पर = केवल खतरनाक उद्योगों (Hazardous Industries) पर।
4. सुप्रीम कोर्ट के दो तर्क - 
जो उद्योग दूसरों की जान जोखिम में डालकर मुनाफा कमाता है, उसे उस जोखिम से होने वाले नुकसान की भरपाई भी करनी होगी।
उद्योग के पास ही वह संसाधन और तकनीक होती है जिससे वह नुकसान को रोक सके या उसके परिणामों से निपट सके।
निष्कर्ष - पूर्ण दायित्व का यह सिद्धांत भारत के पर्यावरण कानून और औद्योगिक सुरक्षा की रीढ़ है। यह सुनिश्चित करता है कि बड़े उद्योग अपनी जिम्मेदारी से बच न सकें।
प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व (Vicarious Liability) - अपकृत्य विधि का यह सिद्धांत सामान्य नियम का अपवाद है। सामान्य नियम के अनुसार जो व्यक्ति गलती करता है, वही जिम्मेदार होता है। लेकिन प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व कहता है कि एक व्यक्ति के गलत कार्य के लिए दूसरे व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
यह सिद्धांत दो महत्वपूर्ण कानूनी सूत्रों पर आधारित है - 
∆ Qui facit per alium facit per se - जो व्यक्ति दूसरों के माध्यम से कार्य करता है तो कानूनी रूप से वह कार्य स्वयं करता हुआ माना जाएगा।
∆ Respondeat Superior - वरिष्ठ (मालिक) को उत्तरदायी होने दो।
1. प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व के लिए आवश्यक शर्तें - किसी व्यक्ति को दूसरे की गलती के लिए जिम्मेदार ठहराने हेतु दो चीजें होनी जरूरी हैं - 
I. संबन्धता - उन दोनों के बीच एक विशेष संबंध होना चाहिए (जैसे मालिक और नौकर)।
(क) स्वामी और सेवक - यह सबसे आम उदाहरण है। यदि कोई नौकर काम के दौरान किसी के साथ गलत करता है, तो उसका मालिक जिम्मेदार होता है।
उदाहरण - कोई ड्राइवर गाड़ी चलाते समय लापरवाही से किसी को टक्कर मार देता है, तो हर्जाना मालिक भरेगा।
(ख) मालिक और एजेंट - यदि कोई एजेंट अपने मालिक द्वारा दिए गए काम को करते समय अपकृत्य करता है, तो मालिक जिम्मेदार होगा।
(ग) साझेदार - एक फर्म के सभी साझेदार एक-दूसरे के गलत कार्यों के लिए जिम्मेदार होते हैं, बशर्ते वह कार्य व्यापार के सामान्य संचालन के दौरान किया गया हो।
II. कार्यरतता - वह गलत कार्य रोजगार के दौरान (On duty) किया गया होना चाहिए। इसमें मालिक तभी जिम्मेदार होता है जब नौकर वह काम कर रहा हो जिसके लिए उसे रखा गया है
यदि ड्राइवर ऑफिस के काम से जा रहा है और एक्सीडेंट करता है, तो मालिक जिम्मेदार है।
∆ व्यक्तिगत कार्य के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी - ( Frolic of his own) - यदि ड्राइवर बिना बताए गाड़ी लेकर अपने किसी निजी काम (जैसे फिल्म देखने) चला जाता है और वहां एक्सीडेंट करता है, तो मालिक जिम्मेदार नहीं होगा।
स्वतंत्र ठेकेदार और सेवक में अंतर - 
∆ सेवक - मालिक उसे बताता है कि क्या करना है और कैसे करना है। (मालिक जिम्मेदार)।
∆ स्वतंत्र ठेकेदार - मालिक केवल बताता है कि क्या करना है, कैसे करना है यह नहीं बताता। यहां वह व्यक्ति अपने तरीके से काम करता है। यहां ठेकेदार की गलती का मालिक जिम्मेदार नहीं होता है।
राज्य (सरकार) का प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व - भारत में सरकार अपने कर्मचारियों की गलती के लिए जिम्मेदार होती है, बशर्ते वे गैर-संप्रभु कार्य कर रहे हों। जैसे यदि सरकारी बस का ड्राइवर किसी को टक्कर मार दे, तो सरकार को मुआवजा देना होगा।
प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व के तहत राज्य का दायित्व कानूनी विषय है जिसका अर्थ यह है कि क्या भारत सरकार या राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों द्वारा किए गए गलत कार्यों (अपकृत्यों) के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती हैं?
भारत में इसकी स्थिति इंग्लैंड से थोड़ी अलग रही है और समय के साथ बदलती रही है। इसे समझने के लिए हमें दो मुख्य श्रेणियों को समझना होगा:
1. संवैधानिक आधार - भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300 यह स्पष्ट करता है कि भारत सरकार या राज्य सरकार के खिलाफ उसी प्रकार से मुक़दमा चलाया जा सकता है, जैसे ब्रिटिश शासन के समय ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ चलाया जा सकता था।
2. संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्य - राज्य के दायित्व को समझने के लिए कार्यों को दो भागों में बांटा गया है:
I. संप्रभु कार्य - ये वे कार्य हैं जो केवल सरकार ही कर सकती है आम नागरिक नहीं कर सकता। जैसे - युद्ध करना, सेना का संचालन, न्याय प्रशासन, या कानून-व्यवस्था बनाए रखना।
नियम: परंपरागत रूप से, इन कार्यों के दौरान हुई गलती हेतु सरकार जिम्मेदार नहीं होती है।
II. गैर-संप्रभु कार्य - ये वे कार्य हैं जिन्हें निजी व्यक्ति भी कर सकते हैं। जैसे - सरकारी बसें चलाना, व्यापार करना, निर्माण कार्य या अस्पताल चलाना।
नियम - इन कार्यों के दौरान यदि कोई कर्मचारी लापरवाही करता है, तो सरकार  निजी मालिक की तरह जिम्मेदार होती है।
3. महत्वपूर्ण केस लॉ - 
I. P&O स्टीम नेविगेशन कंपनी केस (1861) - इसमें पहली बार संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्यों के बीच अंतर बताया गया। यदि कर्मचारी गैर-संप्रभु कार्य कर रहा है, तो राज्य उत्तरदायी होगा।
II. कस्तूरी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1965) - इस केस में पुलिस ने एक व्यक्ति का सोना जब्त किया जो बाद में पुलिसकर्मी की लापरवाही से चोरी हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि पुलिस संप्रभु शक्ति का प्रयोग कर रही थी, इसलिए सरकार जिम्मेदार नहीं है। (इस फैसले की काफी आलोचना हुई)।
III. N नागेंद्र राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1994) - यहाँ कोर्ट ने रुख बदलते हुए कहा कि संप्रभु उन्मुक्ति का पुराना सिद्धांत अब लोकतंत्र में कमजोर पड़ रहा है। यदि राज्य की लापरवाही से किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है, तो राज्य को मुआवजा देना होगा।
4. वर्तमान स्थिति - आज के समय में भारतीय अदालतें संवैधानिक अपकृत्य की अवधारणा को प्राथमिकता देती हैं। यदि राज्य का कोई कर्मचारी किसी नागरिक के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है, तो सरकार संप्रभुता का बहाना बना कर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
उदाहरण - पुलिस कस्टडी में किसी की हत्या हो जाए या सेना का वाहन लापरवाही से किसी नागरिक को टक्कर मार दे, तो सरकार को हर्जाना देना ही होगा।
निष्कर्ष -  संक्षेप में कहें तो अब भारत में सरकार और आम आदमी के बीच का अंतर कम हो गया है। सरकार अपने कर्मचारियों की हर उस लापरवाही के लिए जिम्मेदार है जो उसके व्यावसायिक या कल्याणकारी कार्यों के दौरान होती है।
प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व के संबंध में इंग्लैंड के कानून इंग्लैंड में प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत अत्यंत विकसित है। वहाँ यह माना जाता है कि भले ही गलती कर्मचारी की हो, आर्थिक बोझ मालिक को उठाना चाहिए क्योंकि मालिक के पास कर्मचारी की तुलना में अधिक संसाधन होते हैं।
इंग्लैंड में इस स्थिति को मुख्य रूप से दो भागों में समझा जा सकता है।
1. सामान्य सिद्धांत - इंग्लैंड में प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व के लिए दो सूत्रों का सख्ती से पालन किया जाता है:
I. Respondeat Superior (वरिष्ठ को उत्तरदायी होने दो)।
II. Qui facit per alium facit per se (जो दूसरों के माध्यम से कार्य करता है, वह स्वयं वह कार्य करता माना जाता है)।
वहाँ मालिक को तभी जिम्मेदार माना जाता है जब
I. दोनों के बीच मालिक-नौकर का संबंध।
II. कार्य On duty किया गया हो।
2. 'रोजगार के दौरान' का विस्तार 
2. समंड का टेस्ट - इंग्लैंड में प्रसिद्ध विधिवेत्ता सामण्ड (Salmond) ने एक परीक्षण दिया, जिसे ब्रिटिश कोर्ट आज भी मानते हैं। उनके अनुसार मालिक तब जिम्मेदार है जब - 
नौकर को दिया गया कार्य गलत तरीके से किया गया हो।
या  (Authorized act done in unauthorized way) नौकर को कार्य करने हेतु गलत तरीका दिया गया हो।
3. राज्य (क्राउन) की स्थिति - इंग्लैंड में 1947 से पहले स्थिति भारत से बिल्कुल अलग थी। वहाँ एक प्रसिद्ध कानूनी सूत्र था, The King can do no wrong (राजा कभी गलती नहीं कर सकता)।
1947 से पहले - सरकार (Crown) को उसके कर्मचारियों की गलती हेतु जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पीड़ित उस कर्मचारी पर निजी तौर पर ही केस कर सकता था।
क्राउन प्रोसीडिंग्स एक्ट, 1947 - इस कानून ने इंग्लैंड में इतिहास बदल दिया। अब वहाँ क्राउन (सरकार) को भी एक निजी व्यक्ति की तरह ही अपने कर्मचारियों के अपकृत्यों के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
4. आधुनिक दृष्टिकोण (Close Connection Test) - हाल के वर्षों में इंग्लैंड के हाउस ऑफ लॉर्ड्स (अब सुप्रीम कोर्ट) ने लिस्टर बनाम हेसली हॉल  2001 - केस में Close Connection Test नाम का नया सिद्धांत दिया - यदि कर्मचारी का गलत कार्य उसके रोजगार के साथ इतनी गहराई से जुड़ा है कि उसे रोजगार का हिस्सा माना जा सके, तो मालिक जिम्मेदार होगा, भले ही मालिक ने वह काम करने से मना किया हो।
प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत में भारत और इंग्लैंड की तुलना - 
इंग्लैंड में राजा/सरकार का दायित्व 1947 के कानून के बाद सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। भारत में अभी भी संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्यों का विवाद बना हुआ है।
इंग्लैंड के सिद्धांत अत्यधिक विस्तृत हैं जबकि भारत में यह परंपरागत हैं।
संप्रभु उन्मुक्ति छूट का सिद्धांत -  पुराना और विवादित कानूनी सिद्धांत है। सरल भाषा में इसका अर्थ है - सरकार या राज्य को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा।
यह सिद्धांत इस धारणा पर टिका है कि सरकार अपने उन कार्यों के लिए अदालत के प्रति उत्तरदायी नहीं है जो वह देश के राजा या संप्रभु होने के नाते करती है।
1. ऐतिहासिक आधार  - इंग्लैंड के पुराने कानूनी सूत्र के अनुसार, राजा कभी गलती नहीं कर सकता।
चूंकि राजा ही कानून बनाता है और वह खुद को सजा नहीं दे सकता, इसलिए माना जाता था कि राज्य के खिलाफ कोई मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता।
2. संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्यों में अंतर
भारतीय अदालतों ने उन्मुक्ति (छूट) को समझने के लिए कार्यों को दो भागों में बांटा है:
संप्रभु कार्य - वे कार्य जो केवल राज्य ही कर सकता है (जैसे—सेना का संचालन, युद्ध, न्याय प्रशासन, कानून-व्यवस्था, कर वसूलना), इन कार्यों में हुई गलती के लिए सरकार को उन्मुक्ति प्राप्त है, यानी आप सरकार पर केस नहीं कर सकते।
गैर-संप्रभु कार्य - वे कार्य जो एक निजी व्यक्ति भी कर सकता है (जैसे, ट्रेन चलाना, व्यापार करना, निर्माण कार्य)। इन कार्यों के लिए सरकार को कोई विशेष छूट नहीं है, वह एक आम मालिक की तरह जिम्मेदार है।
3. भारत में संवैधानिक स्थिति - भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300 के तहत सरकार पर मुक़दमा चलाया जा सकता है, लेकिन यह कानून के अधीन है। भारत में कस्तूरी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1965) के मामले में संप्रभु उन्मुक्ति का कड़ाई से पालन किया गया, जहाँ पुलिस की लापरवाही के बावजूद सरकार को जिम्मेदार नहीं माना गया।
4. आधुनिक बदलाव और संकुचन -
आज के लोकतांत्रिक युग में संप्रभु उन्मुक्ति का दायरा छोटा होता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों, जैसे नीलाबती बेहरा या N. नागेंद्र राव केस में कहा कि - 
∆ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन - यदि राज्य का कोई कर्मचारी किसी नागरिक के जीवन के अधिकार (Article 21) को चोट पहुँचाता है, तो सरकार संप्रभुता का बहाना बनाकर नहीं बच सकती।
मुआवजा - अब पुलिस कस्टडी में मौत या सेना के वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं के लिए सरकार को संवैधानिक अपकृत्य के तहत मुआवजा देना पड़ता है।
निष्कर्ष - संक्षेप में संप्रभु उन्मुक्ति वह ढाल है जिसका उपयोग सरकार अपनी गलतियों को छिपाने के लिए करती थी। लेकिन अब यह ढाल कमजोर हो गई है, और नागरिक अधिकारों को सरकार की शक्ति से ऊपर रखा जाता है।
मौलिक अधिकारों के संदर्भ में प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत - यह आधुनिक कानून की क्रांतिकारी अवधारणा है। इसे कानून की भाषा में संवैधानिक अपकृत्य कहा जाता है।
सामान्य अपकृत्य में मालिक केवल नागरिक कानून के तहत जिम्मेदार होता है, लेकिन जब राज्य (सरकार) का कोई कर्मचारी किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों को छीनता है, तो राज्य का उत्तरदायित्व संवैधानिक हो जाता है।
1. अनुच्छेद 21 और राज्य का दायित्व - भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यदि पुलिस या कोई सरकारी अधिकारी इस अधिकार का उल्लंघन करता है, तो राज्य अपने संप्रभु होने का बहाना बनाकर बच नहीं सकता।
उदाहरण - यदि पुलिस कस्टडी में किसी व्यक्ति की पिटाई से मौत हो जाती है, तो राज्य यह नहीं कह सकता कि पुलिस तो अपना कर्तव्य कर रही थी। यहाँ राज्य प्रतिस्थानिक रूप से जिम्मेदार होगा क्योंकि उसके कर्मचारी ने मौलिक अधिकार का हनन किया है।
2. संप्रभु उन्मुक्ति का अंत - मौलिक अधिकारों के मामले में अब संप्रभु उन्मुक्ति  का पुराना सिद्धांत काम नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मौलिक अधिकारों की रक्षा करना राज्य का सर्वोच्च कर्तव्य है।
केस लॉ - रुदल शाह बनाम बिहार राज्य (1983) - इस मामले में एक व्यक्ति को जेल से रिहा होने का आदेश मिलने के बाद भी 14 साल तक अवैध रूप से कैद रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार कहा कि केवल रिहा करना काफी नहीं है, राज्य को उसके अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व निभाते हुए मुआवजा भी देना होगा।
3. महत्वपूर्ण केस लॉ - 
1. रुदल शाह बनाम बिहार राज्य - अवैध हिरासत (Illegal Detention) राज्य को मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
2. भीम सिंह बनाम J&K राज्य - विधायक को सत्र में जाने से रोकना - व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन पर 50,000/- मुआवजा।
3. नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य - कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) | कोर्ट ने कहा कि मुआवजे का अधिकार एक संवैधानिक उपचार है।
4. सहेली बनाम पुलिस कमिश्नर, दिल्ली - पुलिस की पिटाई से बच्चे की मौत - राज्य को प्रतिस्थानिक रूप से जिम्मेदार ठहराया गया।
4. मुआवजे का सिद्धांत - 
मौलिक अधिकारों के संदर्भ में - प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को उपचार देना है।
कानून के तहत मुआवजा।
यह मुआवजा उस हर्जाने से अलग है जिसका दावा दीवानी अदालत में किया गया है।
5. संवैधानिक अपकृत्य - जब राज्य का कर्मचारी पद का दुरुपयोग कर किसी के अधिकारों को कुचलता है, तो इसे संवैधानिक अपकृत्य कहते हैं। इसमें पीड़ित सीधे हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) जाकर सरकार से हर्जाना मांग सकता है।
निष्कर्ष - मौलिक अधिकारों के संदर्भ में प्रतिस्थानिक उत्तरदायित्व यह सुनिश्चित करता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं। यह सरकार को कल्याणकारी राज्य के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए मजबूर करता है।
अपकृत्य विधि में पशुओं के लिए दायित्व - अपकृत्य विधि में पशुओं के लिए दायित्व का मूल सिद्धांत यह है कि यदि किसी के पालतू पशु किसी दूसरे को नुकसान पहुँचाते हैं, तो उसके मालिक होने के नाते आप जिम्मेदार होंगे, इसके दो नियम हैं - 
I. साइन्तिर नियम - यह नियम पशुओं को उनकी प्रकृति के आधार पर दो वर्गों में बांटता है - 
A. खतरनाक पशु (Ferae Naturae) - ये वे जानवर हैं जो स्वभाव से ही जंगली और हिंसक होते हैं (जैसे—शेर, बाघ, भालू, सांप)।
नियम - ऐसा जानवर पालने वाले को कठोर दायित्व के सिद्धांत का पालन करना होगा। यदि वे किसी को चोट पहुँचाते हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि मैंने पिंजरा मजबूत बनाया था, पशु ने तोड़ दिया। आप किसी हर हाल में इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
B. पालतू/शांत पशु (Mansuetae Naturae) - वो जानवर पालना जो इंसानों के साथ रहने के आदी हैं (जैसे—कुत्ता, बिल्ली, गाय, घोड़ा)।
नियम - इनके मामले में मालिक तभी जिम्मेदार होगा जब उसे यह पता हो कि उसके जानवर की प्रकृति खतरनाक है।
उदाहरण - यदि आपका कुत्ता पहली बार किसी को काटता है और आपको नहीं पता था कि वह काट सकता है, तो आप बच सकते हैं। लेकिन यदि उसने पहले भी किसी को काटा है और आपको पता है, तो अगली बार आप जिम्मेदार होंगे।
2. पशु अतिचार - यह नियम विशेष रूप से खेती और जमीन से जुड़ा है।
यदि आपके मवेशी (गाय, भैंस, घोड़ा आदि) किसी दूसरे की जमीन में बिना अनुमति घुस जाते हैं और वहां की फसल या संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं, तो आप अतिचार के लिए जिम्मेदार होंगे।
इसके लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि आप लापरवाह थे; पशु का दूसरी की जमीन पर जाना ही जिम्मेदारी तय करने के लिए काफी है।
3. पशु-क्षति निरोध - यह पीड़ित व्यक्ति को मिलने वाला एक विशेष उपचार है - 
∆ यदि किसी का जानवर आपके खेत में घुसकर नुकसान कर रहा है, तो कानून आपको अधिकार देता है कि आप उस जानवर को पकड़कर अपने पास तब तक रख सकें जब तक कि उसका मालिक आपके नुकसान की भरपाई न कर दे।
4. बचाव - पशु का मालिक इन स्थितियों में जिम्मेदारी से बच सकता जब - 
A. वादी की अपनी गलती - यदि कोई व्यक्ति खुद किसी जानवर को चिढ़ा रहा था या पत्थर मार रहा था और घटना घटी तो बचाव है।
B. दैवीय घटना - बिजली कड़कने से डरकर जानवर खूंटा तोड़कर भाग जाए।
C. तीसरे पक्ष का कार्य - किसी अजनबी ने जान बूझकर आपके अस्तबल का दरवाजा खोल दिया हो।
निष्कर्ष - पशुओं के मामले में कानून का मानना है कि मालिक को अपने जानवर के स्वभाव पर नियंत्रण रखना चाहिए। यदि जानवर बाहर निकलता है और नुकसान करता है, तो दोष जानवर का नहीं, मालिक की निगरानी का माना जाता है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act), 1986 अब 2019 - यह कानून पुराने 1986 के अधिनियम की जगह लाया गया है ताकि आज के डिजिटल युग में उपभोक्ताओं को बेहतर सुरक्षा मिल सके।  1. उपभोक्ता संरक्षण की परिभाषा -इस अधिनियम की धारा 2 के अनुसार - 
(क) उपभोक्ता (Consumer) - धारा 2(7) - उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो - 
प्रतिफल (Price) देकर कोई वस्तु खरीदता है या सेवा प्राप्त करता है।
इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह की खरीदारी शामिल है।
∆ विशेष - वह व्यक्ति उपभोक्ता नहीं है जो सामान को पुनर्विक्रय या वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए खरीदता है।
(ख) शिकायत (Complaint) - धारा 2(6) - शिकायत का अर्थ है किसी उपभोक्ता द्वारा लिखित में लगाया गया आरोप - 
व्यापारी ने अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) किया हो।
सामान में कोई दोष (Defect) हो।
सेवा में कोई कमी (Deficiency) हो।
तय कीमत से अधिक दाम वसूला गया हो।
(ग) सेवा में कमी (Deficiency) - धारा 2(11) - सेवा की गुणवत्ता, प्रकृति या तरीके में कोई भी कमी, जो कानून या अनुबंध के अनुसार आवश्यक थी (जैसे अस्पताल की लापरवाही या बैंक की गलत सेवा)।
2. उपभोक्ता संरक्षण परिषद - 
अधिनियम का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देना और उनकी रक्षा करना है। इसके लिए तीन स्तरीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया है - I. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद  धारा 3 - 
अध्यक्ष - केंद्र सरकार का उपभोक्ता मामलों का प्रभारी मंत्री।
उद्देश्य - उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार को सलाह देना।
बैठक - वर्ष में कम से कम एक बैठक अनिवार्य है।
II. राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद  धारा 6 - 
अध्यक्ष - राज्य सरकार का उपभोक्ता मामलों का मंत्री।
उद्देश्य - राज्य के भीतर उपभोक्ता अधिकारों को बढ़ावा देना।
बैठक - वर्ष में कम से कम दो बैठकें होनी चाहिए।
III. जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद  धारा 8 - 
अध्यक्ष - जिला कलक्टर
उद्देश्य - जिला स्तर पर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना।
बैठक - वर्ष में कम से कम दो बैठकें अनिवार्य हैं।
3. उपभोक्ता अधिकार (Consumer Rights) - धारा 2(9)
अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को 6 मुख्य अधिकार दिए गए हैं - 
सुरक्षा का अधिकार - खतरनाक वस्तुओं से बचाव।
सूचना का अधिकार - वस्तु की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता और कीमत जानना।
चयन का अधिकार - प्रतिस्पर्धी कीमतों पर विभिन्न वस्तुओं तक पहुंच।
सुनवाई का अधिकार - शिकायतों पर उचित विचार किया जाना।
निवारण का अधिकार - अनुचित व्यापार व्यवहार के खिलाफ हर्जाना पाना।
उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार - जागरूक होने का अधिकार।
संक्षेप में - परिषदों का काम सलाह देना और जागरूकता फैलाना है, जबकि शिकायतों का निपटारा उपभोक्ता विवाद का निवारण आयोग करते हैं।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत गठित उपभोक्ता संरक्षण परिषदो  मुख्य रूप से सलाहकार प्रकृति की संस्थाएँ हैं। इनका मुख्य कार्य न्याय देना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देना और उनके संरक्षण के लिए नीतियां बनाना है।
A. उपभोक्ता अधिकारों का संरक्षण और संवर्धन - परिषदों की सबसे बड़ी शक्ति और जिम्मेदारी उपभोक्ताओं के 6 मूल अधिकारों की रक्षा करना है। ये परिषदें सुनिश्चित करती हैं कि उपभोक्ताओं को खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षा मिले।
I. उन्हें वस्तुओं की गुणवत्ता, शुद्धता और मानक के बारे में सही जानकारी मिले।
II. बाजार में एकाधिकार (Monopoly) न हो और उपभोक्ता को चयन का अवसर मिले।
2. नीति निर्धारण में भूमिका - ये परिषदें सरकार के लिए एक थिंक टैंक के रूप में कार्य करती हैं - 
I. केंद्रीय परिषद - केंद्र सरकार को उपभोक्ता हितों से जुड़ी राष्ट्रीय नीतियों पर सलाह देती है।
II. राज्य और जिला परिषद - क्षेत्रीय समस्याओं के आधार पर राज्य सरकार और जिला प्रशासन को उपभोक्ताओं के शोषण को रोकने के लिए सुझाव देती हैं।
3. जांच और अनुसंधान की शक्ति - 
हालांकि इनके पास अदालत जैसी सजा देने की शक्ति नहीं है, लेकिन ये परिषदें:
I. बाजार में प्रचलित अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practices) का अध्ययन कर सकती हैं।
II. उपभोक्ता जागरूकता के लिए डेटा और जानकारी एकत्र कर सकती हैं।
III. उपभोक्ता शिक्षा (Consumer Education) के लिए कार्यक्रम चला सकती हैं।
4. परिषदों की बैठकों का आयोजन - 
अधिनियम इन परिषदों को अपनी कार्यप्रणाली खुद तय करने की शक्ति देता है - 
I. बैठक की शक्ति - ये परिषदें तय समय और स्थान पर बैठकें बुला सकती हैं ताकि उपभोक्ताओं की समस्याओं पर चर्चा की जा सके।
II. सदस्यों की नियुक्ति - परिषद में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की शक्ति होती है ताकि समाज के हर वर्ग की आवाज सुनी जा सके।
5. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों से भिन्नता - यहाँ एक बारीक अंतर समझना बहुत जरूरी है जो अक्सर छात्र परीक्षा में गलती करते हैं - 
परिषदें - ये केवल सलाह देती हैं और नीतियां बनाती हैं। इनके पास जुर्माना लगाने या आदेश देने की शक्ति नहीं होती।
आयोग (Commissions/Courts) - जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोगों के पास न्यायिक शक्ति होती है। वे मुआवजे का आदेश देते हैं और दोषियों को सजा सुना सकते हैं।
निष्कर्ष - उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की शक्ति उनके सुझावों और जागरूकता अभियानों में निहित है। ये एक पुल का काम करती हैं—एक तरफ आम उपभोक्ता है और दूसरी तरफ सरकार।
उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग -  यह वास्तविक अदालतें हैं जहाँ उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज कराता है और हर्जाना प्राप्त करता है। 2019 के नए अधिनियम ने इन आयोगों की शक्तियों और आर्थिक सीमा में बड़े बदलाव किए हैं।
अधिनियम के तहत त्रि-स्तरीय न्यायिक व्यवस्था की गई है - 
. जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग - यह जिला स्तर पर काम करता है।
© संरचना - इसमें एक अध्यक्ष (जो जिला न्यायाधीश रहा हो) और कम से कम दो सदस्य होते हैं।
© आर्थिक सीमा - नए नियमों के अनुसार, अब जिला आयोग उन मामलों की सुनवाई करता है जहाँ वस्तुओं या सेवाओं का मूल्य 50 लाख रुपये तक हो।
© शिकायत कहाँ - उपभोक्ता अब वहां भी शिकायत कर सकता है जहाँ वह खुद रहता है या काम करता है (पहले केवल वहां कर सकता था जहाँ विपक्षी का ऑफिस हो)।
2. राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग - यह राज्य स्तर पर काम करता है और आमतौर पर राज्य की राजधानी में होता है।
© संरचना - इसमें एक अध्यक्ष (जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो) और कम से कम चार सदस्य होते हैं।
© आर्थिक सीमा - यह उन मामलों को सुनता है जहाँ मूल्य 50 लाख से 2 करोड़ रुपये तक हो।
© अपीलीय शक्ति - जिला आयोग के आदेश के खिलाफ 45 दिनों के भीतर यहाँ अपील की जा सकती है।
3. राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग - यह पूरे भारत के लिए सर्वोच्च निकाय है, जो नई दिल्ली में स्थित है।
© संरचना - इसमें एक अध्यक्ष (जो सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश रहा हो) और कम से कम चार सदस्य होते हैं।
© आर्थिक सीमा - 2 करोड़ रुपये से अधिक के मामले।
∆ सर्वोच्च अपील - राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ अंतिम अपील सीधे सुप्रीम कोर्ट में की जा सकती है।
4. उपभोक्ता आयोगों की विशेष शक्तियां - 
इन आयोगों के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां होती हैं - 
I. गवाहों को समन भेजना - किसी को भी गवाही के लिए बुलाना।
II. दस्तावेज मंगवाना - किसी भी विभाग से सबूत के तौर पर फाइलें मंगवाना।
III. नमूने की जांच - यदि सामान खराब है, तो उसे लैब में जांच के लिए भेजने का आदेश देना।
IV. अंतरिम आदेश - केस चलने के दौरान भी राहत देना।
V. मध्यस्थता - नए कानून के तहत आयोग दोनों पक्षों को आपसी सहमति से मामला सुलझाने के लिए मध्यस्थता कक्ष में भेज सकते हैं।
5. शिकायत दर्ज करने की समय सीमा - उपभोक्ता को कारण उत्पन्न होने (जैसे सामान खराब निकलने) के 2 वर्ष के भीतर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। 
ई-दाखिल  - उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 में E-daakhil) पोर्टल की सुविधा दी गई है, जिससे आप घर बैठे ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) और उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (कमीशन) - 
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत ये दोनों संस्थाएं अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाई गई हैं।
CCPA एक पुलिस या रेगुलेटर की तरह है जो पूरे बाजार पर नजर रखता है, जबकि आयोग एक अदालत की तरह है जहाँ आप अपना निजी मामला लेकर जाते हैं।
1. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) - यह 2019 के अधिनियम द्वारा स्थापित एक नई नियामक संस्था (Regulatory Body) है। इसका मुख्य काम उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देना, सुरक्षा देना और लागू करना है।
© उद्देश्य - यह व्यक्तिगत शिकायतों के बजाय सभी उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है।
∆ मुख्य शक्तियां - 
© जांच - इसके पास एक अपनी इनवेस्टिगेशन विंग होती है जिसका नेतृत्व महानिदेशक (DG) करते हैं। यह उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन की खुद (Sua Sponte) जांच कर सकता है।
© भ्रामक विज्ञापन - यदि कोई विज्ञापन झूठा या भ्रामक है, तो CCPA उसे हटाने का आदेश दे सकता है और निर्माता पर 10 लाख से 50 लाख रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है।
© सामान वापस मंगवाना (Recall) - यदि कोई उत्पाद खतरनाक है, तो CCPA उसे बाजार से वापस मंगवाने और ग्राहकों के पैसे लौटाने का आदेश दे सकता है।
© केस दर्ज करना - उपभोक्ता आयोग के पास जाकर बड़े स्तर पर हो रही धोखाधड़ी के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है।
2. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग - 
ये अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) निकाय हैं जो उपभोक्ताओं के विवादों का निपटारा करते हैं। यहाँ उपभोक्ता अपनी निजी समस्या (जैसे खराब फ्रिज या बैंक की गलत सेवा) के लिए न्याय मांगने जाता है। यह तीन स्तरीय - जिला आयोग, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग होता है जिसके मुख्य कार्य हैं - 
© मुआवजा दिलाना - आपकी शिकायत सही पाए जाने पर यह विपक्ष को हर्जाना भरने का आदेश देता है।
© फैसला सुनाना - यह दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर जज की तरह फैसला देता है।
© मध्यस्थता - यह दोनों पक्षों को आपसी समझौते के लिए भी भेज सकता है।
3. CCPA और आयोग के बीच मुख्य अंतर - 
नाम का अंतर एक प्राधिकरण है दूसरा आयोग।
प्राधिकरण का काम निगरानी और आयोग का न्यायिक काम है।
प्राधिकरण स्वतः संज्ञान ले सकता है आयोग में अपील दायर करनी होती है।
प्राधिकरण बाजार में खुद जाता है वृहत स्तर पर निगरानी, आयोग के पास पीड़ित विशेष मामले को लेकर आता है।
प्राधिकरण सभी उपभोक्ताओ के हितों को देखता है, आयोग व्यक्तिगत विवादों का निपटारा करता है।
प्राधिकरण के पास अपनी जांच विंग (पुलिस की तरह) होती है आयोग दलीलों और सबूतों के आधा पर फैसला देता है।
प्राधिकरण जुर्माना लगा सकता है और लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश कर सकता है आयोग व्यक्तिगत रूप से हर्जाना और नुकसान की भरपाई कराता है।
निष्कर्ष - अगर किसी कंपनी का विज्ञापन गलत है जिससे लाखों लोग गुमराह हो रहे हैं, तो वहां CCPA एक्शन लेगा। लेकिन अगर आपने कोई सामान खरीदा और वह खराब निकला, तो आप अपना पैसा वापस पाने के लिए आयोग जाएंगे।
उत्पाद उत्तरदायित्व (Product Liability) - उत्पाद यह सुनिश्चित करती है कि यदि कोई उत्पाद दोषपूर्ण है और उससे उपभोक्ता को कोई नुकसान या चोट पहुँचती है, तो उसका जिम्मेदार निर्माता या विक्रेता होगा। सरल शब्दों में, यदि आप बाजार से कोई सामान खरीदते हैं और वह सामान खराब होने के कारण आपको शारीरिक या आर्थिक नुकसान पहुँचाता है, तो आप उस कंपनी पर दावा कर सकते हैं।
उत्पाद उत्तरदायित्व के  - 
I. उत्तरदायित्व के मुख्य प्रकार (Types of Defects) - किसी उत्पाद को तीन आधारों पर दोषपूर्ण माना जा सकता है - 
A. विनिर्माण दोष (Manufacturing Defect) - किसी उत्पाद को बनाते समय कोई गलती हो जाए। जैसे- कार के ब्रेक का ठीक से न जुड़ना।
B. डिजाइन दोष (design defec) - जब उत्पाद का पूरा डिजाइन ही असुरक्षित हो। भले ही उसे कितनी भी सावधानी से बनाया गया हो, वह खतरनाक ही रहेगा।
C. चेतावनी या निर्देश की कमी - (Marketing Defect) - यदि उत्पाद के साथ सही निर्देश या खतरों की चेतावनी (जैसे- बच्चों से दूर रखें, या ज्वलनशील है) नहीं दी गई है।
2. उत्तरदायित्व का निर्धारण - उत्पाद उत्तरदायित्व के दायरे में पूरी सप्लाई चेन आ सकती है:
I. निर्माता (Manufacturer) - जिसने सामान बनाया है।
II. थोक विक्रेता (Wholesaler) - जिसने बड़ी मात्रा में स्टॉक रखा।
III. खुदरा विक्रेता (Retailer) - वह दुकानदार जिससे आपने सामान खरीदा।
3. कानूनी सिद्धांत - 
 I. कठोर दायित्व - इसमें उपभोक्ता को यह साबित करने की जरूरत नहीं होती कि निर्माता लापरवाह था। बस यह साबित करना काफी है कि उत्पाद दोषपूर्ण था और उससे चोट/ नुकसान हुआ है।
II. लापरवाही - जहाँ यह साबित करना होता है कि कंपनी ने सुरक्षा मानकों का पालन करने में लापरवाही बरती।
भारत में कानून (Consumer Protection Act, (CPA)2019) के तहत उत्पाद उत्तरदायित्व के लिए एक पूरा अध्याय जोड़ा गया है। अब उपभोक्ता सीधे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म या निर्माता के खिलाफ मुआवजे की मांग कर सकते हैं।
उदाहरण - यदि किसी स्मार्टफोन की बैटरी खराब डिजाइन के कारण फट जाती है और उससे यूजर का हाथ जल जाता है, तो कंपनी को इलाज का खर्च और हर्जाना दोनों देना होगा।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (CPA) 2019 - इस अधिनियम के तहत उत्पाद उत्तरदायित्व न केवल मुआवजे के बारे में है, बल्कि यह गंभीर लापरवाही के मामलों में दंडात्मक कार्रवाई और अपराधों को भी परिभाषित करता है।
दंड प्रक्रिया - 
I. भ्रामक विज्ञापन - यदि कोई निर्माता या सेवा प्रदाता अपने उत्पाद के बारे में गलत दावे करता है, तो केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) निम्नलिखित दंड दे सकता है - 
A. पहला अपराध - ₹10 लाख तक का जुर्माना और 2 साल तक की जेल।
B. दोबारा अपराध - ₹50 लाख तक का जुर्माना और 5 साल तक की जेल।
II. मिलावटी सामान बनाना या बेचना -
यदि कोई उत्पाद मिलावटी है और उससे उपभोक्ता को नुकसान होता है, तो दंड नुकसान की गंभीरता पर निर्भर करता है - 
A. बिना चोट के (No Injury) - ₹1 लाख तक का जुर्माना और 6 महीने की जेल।
B. हल्की चोट लगने पर (Injury) - ₹3 लाख तक का जुर्माना और 1 साल की जेल।
C. गंभीर चोट (Grievous Hurt) -₹5 लाख तक का जुर्माना और 7 साल तक की जेल।
मृत्यु होने पर (Death) - कम से कम ₹10 लाख का जुर्माना और 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा।
III. नकली सामान (Spurious Goods) - नकली सामान बनाने या बेचने पर भी इसी तरह के कड़े दंड दिए जाते हैं। दोबारा अपराध करने पर व्यक्ति का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।
IV. आदेशों का उल्लंघन - यदि कोई कंपनी या व्यक्ति उपभोक्ता आयोग के आदेशों का पालन नहीं करता है, तो - 
I. कम से कम 1 महीने से लेकर 3 साल तक की कैद।
II. ₹25,000 से लेकर ₹1 लाख तक का जुर्माना (या दोनों)।
उत्पाद उत्तरदायित्व दावा प्रक्रिया - 
नए कानून के तहत मुआवजा पाने के लिए आप निम्न स्तरों पर जा सकते हैं - 
जिला आयोग - ₹50 लाख तक के मामलों के लिए।
राज्य आयोग - ₹50 लाख से ₹2 करोड़ तक के लिए।
राष्ट्रीय आयोग - ₹2 करोड़ से अधिक के दावों के लिए।
विशेष - इस कानून में मध्यस्थता का भी प्रावधान है। यदि दोनों पक्ष सहमत हों, तो वे अदालती कार्रवाई के बजाय मध्यस्थता केंद्र में मामले को जल्दी सुलझा सकते हैं (CPA 2019 की धारा 74-80 के तहत)।
मोटर वाहन अधिनियम 1988 का, (संशोधन) 2019 - सड़क सुरक्षा को मजबूत करने और यातायात नियमों के उल्लंघन पर लगाम लगाने हेतु 1988 में मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन कर लाया गया यह अधिनियम ऐतिहासिक कदम है।
अधिनियम की धाराएं - मोटर वाहन अधिनियम 1988 (संशोधित 2019) में 14 अध्याय और 217 धाराएं हैं।
अध्याय 1 - प्रारंभिक (नाम, परिभाषाएं) 1 से 2।
अध्याय 2 - चालक लाइसेंस  3 से 28
अध्याय 3 - कंडक्टर लाइसेंस 29 से 38
अध्याय 4 - वाहन पंजीकरण 39 से 65 
अध्याय 5 - परिवहन वाहन परमिट 66 से 96
अध्याय 6 - राज्य परिवहन उपक्रमों के विशेष प्रावधान - 97 से 108
अध्याय 7 - वाहन निर्माण, उपकरण और रखरखाव - 109 से 111
अध्याय 8 - यातायात नियंत्रण 112 से 138
अध्याय 10 देयता - (2019 में संशोधित) 140 - 144 |
अध्याय 11 - तीसरे पक्ष का बीमा 145 से 164
अध्याय 12 - दावा अधिकरण 165 से 176
अध्याय 13 - अपराध, दंड और प्रक्रिया  177 से 210
सबसे महत्वपूर्ण धाराएं - वे धाराएं जो एक नागरिक और कानून के विद्यार्थी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं - 
1. लाइसेंस और पंजीकरण - 
धारा 3 - ड्राइविंग लाइसेंस के बिना वाहन चलाना वर्जित है।
धारा 39- बिना पंजीकरण (RC) के वाहन चलाना अपराध है।
2. यातायात नियम और सुरक्षा - 
धारा 112 - गति सीमा का पालन करना।
धारा 122 - सड़क पर वाहन को खतरनाक स्थिति में छोड़ना।
धारा 128 (Riding pillion) - दुपहिया वाहन पर दो से अधिक व्यक्तियों का बैठना ।
धारा 129 - हेलमेट पहनना अनिवार्य।
धारा 134 - दुर्घटना होने पर पीड़ित को अस्पताल ले जाना ड्राइवर का कर्तव्य।
3. प्रमुख अपराध और दंड (अध्याय 13) - 
धारा 177 - सामान्य अपराधों के लिए दंड (जहाँ कोई विशेष दंड न हो)।
धारा 181- बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने पर दंड।
धारा 184 - खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना (जैसे रेड लाइट जंप करना, फोन का प्रयोग)।
धारा 185 - (Drunken Driving) शराब पीकर गाड़ी चलाना।
धारा 194A - ओवरलोडिंग (क्षमता से अधिक यात्री बैठाना/ सामान)।
धारा 194D - बिना हेलमेट के वाहन चलाने पर जुर्माना।
धारा 194E - आपातकालीन वाहनों (एम्बुलेंस) को रास्ता न देने पर दंड।
धारा 199A - नाबालिगों द्वारा किए गए अपराधों से संबंधित प्रावधान।
4. बीमा और मुआवजा - 
धारा 146 - अनिवार्य थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के बिना वाहन चलाना प्रतिबंधित।
धारा 161 - हिट एंड रन' दुर्घटनाओं के लिए विशेष मुआवजा योजना।
धारा 165 - सड़क दुर्घटना दावों के निपटारे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) की स्थापना।
जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2023इसका मुख्य उद्देश्य Ease of Doing Business (व्यापार करने में सुगमता) और Ease of Living (जीवन जीने में सुगमता) को बढ़ावा देना है। सरल भाषा में कहें तो, इस कानून के जरिए सरकार ने कई छोटे-मोटे और तकनीकी अपराधों के लिए जेल की सजा को खत्म कर जुर्माने में बदल दिया है।
इस अधिनियम की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं - 
1. मुख्य उद्देश्य - 
I. समाज को अपराधमुक्त करना - छोटे और तकनीकी उल्लंघनों के लिए जेल जाने के डर को खत्म करना।
II. न्यायपालिका पर बोझ कम करना - छोटे मामलों को अदालतों के बजाय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सुलझाना।
III. विश्वास-आधारित शासन - नागरिकों और व्यापारियों पर भरोसा करना कि वे अनजाने में हुई छोटी गलतियों को सुधार लेंगे।
2. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान - इस अधिनियम के द्वारा 19 मंत्रालयों के 183 प्रावधानों के 42 अधिनियमों में संशोधन किया गया है।
I. प्रमुख कानून जो प्रभावित हुए - 
. भारतीय वन अधिनियम, 1927
. सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000
. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
. कॉपीराइट अधिनियम, 1957
. खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006
. मोटर वाहन अधिनियम, 1988
3. दंड और जुर्माने में बदलाव - 
I. जेल की सजा हटाना - कई धाराओं में जहाँ मामूली तकनीकी चूक पर जेल का प्रावधान था, उसे हटाकर अब केवल आर्थिक दंड रखा गया है।
II. जुर्माने में स्वत वृद्धि - इस कानून में एक अनूठा प्रावधान है कि हर 3 साल में जुर्माने और शास्ति की न्यूनतम राशि में 10% की वृद्धि की जाएगी।
IV. निर्णय तंत्र - अब दंड लगाने का काम सीधे कोर्ट के बजाय नामित अधिकारी कर सकेंगे, जिससे मामले जल्दी निपटेंगे।
4. लाभ - 
I. व्यापारियों के लिए - अनुपालन का बोझ कम होगा और निवेशक भारत में व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
II. स्टार्टअप्स के लिए - नई कंपनियों को छोटी प्रक्रियात्मक गलतियों के कारण कानूनी चक्करों में नहीं फंसना पड़ेगा।
III. आम जनता के लिए - लालफीताशाही कम होगी और सरकारी विभागों के साथ काम करना आसान होगा।
ताजा अपडेट (2025-26) - विशेष जानकारी 2023 के इन नियमों की सफलता के बाद, सरकार अब जन विश्वास 2.0 (2025) पर काम कर रही है, जिसमें और भी अधिक कानूनों (लगभग 100 से ज्यादा प्रावधानों) को अपराधमुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है।
हिट एंड रन - (टक्कर मारकर भागना) के मामलों में कानून अब पहले से कहीं अधिक सख्त हो गया है। 2026 की वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार, इसमें चालक और मालिक की जिम्मेदारी को दो अलग-अलग नजरियों से देखा जाता है - आपराधिक दायित्व और नागरिक दायित्व - यहाँ चालक और मालिक के दोष और बिना दोष दायित्व (No-Fault Liability) की विस्तृत व्याख्या है की गई है।
I. चालक का आपराधिक दोष - 
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 106 अब हिट एंड रन मामलों में मुख्य कानून है। इसे दो श्रेणियों में बांटा गया है - 
(क) रिपोर्ट करने पर धारा 106 (1) - यदि ड्राइवर से दुर्घटना होती है और वह तुरंत पुलिस या मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना देता है, तो उसे अधिकतम 5 साल की जेल और जुर्माना हो सकता है।
(ख)भाग जाने पर धारा 106(2) - यदि ड्राइवर लापरवाही से गाड़ी चलाकर किसी की मृत्यु का कारण बनता है और पुलिस को सूचित किए बिना मौके से भाग जाता है, तो उसे 10 साल तक की जेल और भारी जुर्माना (₹7 लाख तक) हो सकता है।
II. मालिक का दायित्व - वाहन मालिक की जिम्मेदारी मुख्य रूप से नागरिक दायित्व के अंतर्गत आती है - 
(अ) विकारियस लायबिलिटी - कानूनन मालिक, ड्राइवर के कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है यदि दुर्घटना काम के दौरान हुई हो, मालिक को जेल तो नहीं होती परन्तु मुआवजे का भुगतान मालिक या संबंधित बीमा कंपनी को करना पड़ता है।
(ब) पंजीकरण (RC) का महत्व - कोर्ट उसी व्यक्ति को मालिक मानता है जिसका नाम RTO के रिकॉर्ड में दर्ज है। यदि गाड़ी बेच दी गई है परन्तु नाम ट्रांसफर नहीं हुआ है, तो मुआवजा RC में लिखित मालिक को ही भरना पड़ सकता है।
III. बिना दोष दायित्व (No-Fault Liability) - यह सिद्धांत मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164 के तहत आता है। इसका मतलब है कि पीड़ित को मुआवजा पाने के लिए यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि ड्राइवर की गलती थी।
मुआवजे का निर्धारण - 
A. मृत्यु होने पर - 5 लाख
B. गंभीर चोट लगने पर 2.5 लाख
विशेष - हिट एंड रन के उन मामलों में जहाँ गाड़ी की पहचान नहीं हो पाती, वहां सरकार की विशेष योजना (धारा 161) के तहत मृत्यु पर 2 लाख और गंभीर चोट पर 50 हजार का मुआवजा दिया जाता है।
मुख्य अंतर: दोष बनाम बिना दोष
I. दोष दायित्व - यहाँ पीड़ित को साबित करना होता है कि ड्राइवर लापरवाह था। इसमें मुआवजे की राशि (मृतक की आय के आधार पर) असीमित हो सकती है।
II. बिना दोष दायित्व - यहाँ गलती साबित करने की जरूरत नहीं है। यह त्वरित राहत के लिए एक निश्चित राशि है।
तृतीय पक्ष की अवधारणामोटर वाहन कानून और बीमा क्षेत्र के तृतीय पक्ष की अवधारणा को समझने के लिए बीमा अनुबंध में शामिल तीन पक्षों को जानना होगा - 
1. तीन पक्ष - 
I. प्रथम पक्ष - वाहन का मालिक जिसने बीमा पॉलिसी खरीदी है।
II. द्वितीय पक्ष - बीमा कंपनी जिसने नुकसान की भरपाई करने का वादा किया।
III. तृतीय पक्ष - कोई भी अन्य व्यक्ति (राहगीर, दूसरी गाड़ी का चालक, या संपत्ति का मालिक) जिसे संबंधित वाहन से नुकसान पहुँचा है।
2. तृतीय पक्ष बीमा - भारत में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 146 के तहत हर वाहन के लिए थर्ड पार्टी बीमा होना अनिवार्य है। इसके बिना सड़क पर गाड़ी चलाना अपराध है।
A. उद्देश्य - इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि आपकी गलती से किसी निर्दोष व्यक्ति की मृत्यु हो जाए या उसे चोट लगे, तो उसे उचित मुआवजा मिल सके, भले ही आपके पास पैसे न हों।
∆ बीमा में समाहित (कवर) - 
©तीसरे व्यक्ति की मृत्यु या शारीरिक चोट।
©तीसरे व्यक्ति की संपत्ति को नुकसान।
∆ बीमा में समाहित (कवर) नहीं - 
©स्वयं के वाहन को हुआ नुकसान।
©स्वयं (ड्राइवर/मालिक) लगी चोट।
3. मुख्य अवधारणाएं - 
क. असीमित दायित्व - तृतीय पक्ष की मृत्यु या शारीरिक चोट के मामले में, बीमा कंपनी का दायित्व असीमित होता है। कोर्ट पीड़ित की उम्र और कमाई के आधार पर जो भी मुआवजा तय करेगा, बीमा कंपनी को वह पूरा देना होगा। हालांकि, संपत्ति के नुकसान के लिए यह सीमा आमतौर पर ₹7.5 लाख तक सीमित होती है।
ख. जस्ट मुआवजा - धारा 168 के तहत, दावा अधिकरण (MACT) का यह कर्तव्य है कि वह पीड़ित को जस्ट यानी न्यायसंगत मुआवजा दिलाए। इसमें केवल इलाज का खर्च ही नहीं, बल्कि भविष्य की आय का नुकसान और मानसिक पीड़ा भी शामिल होती है।
ग. कानूनी अनिवार्यता - यह एक कानूनी अनिवार्यता है। यदि आपके पास कॉम्प्रिहेंसिव (First Party) बीमा नहीं है तो चलेगा, लेकिन थर्ड पार्टी बीमा के बिना गाड़ी चलाना आपको भारी जुर्माने और कानूनी पचड़े में डाल सकता है।
4. दावा प्रक्रिया - यदि किसी वाहन से किसी तीसरे पक्ष का नुकसान होता है तो - 
∆ FIR दर्ज करना - यह अनिवार्य है।
∆ MACT में मामला - पीड़ित व्यक्ति मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजे के लिए अर्जी देता है।
∆ बीमा कंपनी का भुगतान - कोर्ट के आदेश के बाद मुआवजे की राशि बीमा कंपनी सीधे पीड़ित को भुगतान करती है।
विशेष - यदि दुर्घटना के समय ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस नहीं था या वह नशे में था, तो बीमा कंपनी पहले पीड़ित को भुगतान करेगी, लेकिन बाद में वह पैसा मालिक से वसूल कर सकती है।
1. प्रमुख नए प्रावधान - 
I. गोल्डन आवर - दुर्घटना के बाद का पहला एक घंटा गोल्डन आवर कहलाता है। सरकार ने पीड़ितों के लिए कैशलेस उपचार की योजना शुरू की है ताकि इस महत्वपूर्ण समय में जान बचाई जा सके।
II. बचाने वाले (सामरियों) की सुरक्षा (Good Samaritans) - यदि कोई व्यक्ति किसी सड़क दुर्घटना पीड़ित की मदद करता है, तो उसे पुलिस या कानूनी पूछताछ से सुरक्षा दी जाएगी। उसे अपनी पहचान बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
III. नाबालिग द्वारा अपराध - यदि कोई नाबालिग गाड़ी चलाता है, तो उसके अभिभावक या वाहन मालिक को दोषी माना जाएगा। इसमें ₹25,000 जुर्माना और 3 साल की कैद का प्रावधान है, साथ ही वाहन का रजिस्ट्रेशन भी रद्द किया जा सकता है।
IV. वाहन रिकॉल - यदि किसी वाहन में ऐसा कोई दोष पाया जाता है जो पर्यावरण या सड़क सुरक्षा के लिए हानिकारक है, तो सरकार निर्माता को वे सभी वाहन वापस बुलाने का आदेश दे सकती है।
2. संशोधित जुर्माना सूची - संशोधन के बाद जुर्मानों में भारी वृद्धि की गई है ताकि लोग नियमों का पालन करें - 
सामान्य उल्लंघन (धारा 177) ₹500 
बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाना ₹5,000 
नशे में गाड़ी चलाना (धारा 185) 10,000
खतरनाक ड्राइविंग 5,000 तक
ओवरस्पीडिंग 1,000 से 2,000 (LMV के लिए)
बिना सीट बेल्ट/हेलमेट 1,000 (+ 3 महीने के लिए लाइसेंस रद्द)
इमरजेंसी वाहनों (एम्बुलेंस) को रास्ता न देना 10,000
बिना बीमा के ड्राइविंग 2,000
3. हिट एंड रन (Hit and Run) - हिट एंड रन के मामलों में मुआवजे की राशि को कई गुना बढ़ा दिया गया है:
I. मृत्यु के मामले में है - ₹25,000 से बढ़ाकर ₹2 लाख।
II. गंभीर चोट के मामले में -₹12,500 से बढ़ाकर ₹50,000।
4. सामुदायिक सेवा - पहली बार कानून में सामुदायिक सेवा को एक दंड के रूप में शामिल किया गया है। छोटे अपराधों के लिए कोर्ट अपराधी को समाज सेवा (जैसे- ट्रैफिक पुलिस की मदद करना या अस्पताल में सेवा) करने का आदेश दे सकता है।
विशेष - यदि कोई ट्रैफिक पुलिस अधिकारी या प्रवर्तन अधिकारी स्वयं नियम तोड़ता है, तो उसे उस अपराध के लिए निर्धारित जुर्माने का दोगुना भुगतान करना होगा।
ड्राइविंग लाइसेंस मोटर वाहन अधिनियम (संशोधन) 2019 ने ड्राइविंग लाइसेंस (DL) की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बना दिया है। अब पूरे भारत में लाइसेंस से जुड़ी जानकारी को एक केंद्रीकृत डेटाबेस में रखा जाता है।
यहाँ ड्राइविंग लाइसेंस और उससे संबंधित रजिस्टरों की विस्तृत व्याख्या है:
1. ड्राइविंग लाइसेंस (DL) की अवधारणा - धारा 3 के तहत भारत में सार्वजनिक स्थान पर वाहन चलाने हेतु ड्राइविंग लाइसेंस होना अनिवार्य है। यह तीन प्रकार के होते हैं - 
I. लर्नर लाइसेंस 
II. स्थाई लाइसेंस 
A. LMV लाइसेंस 
B. भारी वाहन लाइसेंस 
I. लर्नर लाइसेंस - यह 6 महीने के लिए वैध होता है। नए नियमों के अनुसार, इसके लिए आवेदन और कुछ राज्यों में टेस्ट भी ऑनलाइन दिया जा सकता है।
II. स्थायी लाइसेस
A. LMV ड्राइविंग लाइसेंस - लर्नर लाइसेंस मिलने के 30 दिन बाद और 6 महीने के भीतर इसके लिए आवेदन करना होता है।
B. भारी वाहन लाइसेंस - LMV लाइसेंस के तीन वर्ष बाद भारी (हैवी) वाहन लाइसेंस लिया जा सकता है।
2. ड्राइविंग लाइसेंस के रजिस्टर - भ्रष्टाचार को रोकने और एक व्यक्ति-एक लाइसेंस का नियम लागू करने हेतु सरकार ने रजिस्टरों को दो स्तरों पर अनिवार्य किया है - 
A. राज्य ड्राइविंग लाइसेंस रजिस्टर - प्रत्येक राज्य सरकार को धारा 26 के तहत एक रजिस्टर संधारित करना होगा जिसमें -
राज्य द्वारा जारी किए गए, नवीनीकृत या रद्द किए गए सभी लाइसेंसों का विवरण होता है।
 यह रजिस्टर डिजिटल रूप में होता है जिसे सारथी पोर्टल के नाम से जाना जाता है।
B. राष्ट्रीय ड्राइविंग लाइसेंस रजिस्टर - धारा 25A (2019 संशोधन में जोड़ी गई) के तहत केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय रजिस्टर का संधारण करती है- 
A. महत्व - यह पोर्टल सभी राज्यों के डेटा को एक जगह जोड़ता है।
B. फायदा - यदि किसी व्यक्ति का लाइसेंस एक राज्य में रद्द हो जाता है, तो वह दूसरे राज्य में जाकर नया लाइसेंस नहीं बनवा पाएगा, क्योंकि नेशनल रजिस्टर में उसका डेटा ब्लैकलिस्ट में दिखाई देगा।
C. यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों (पुलिस) को पूरे भारत में किसी भी ड्राइवर की हिस्ट्री तुरंत चेक करने की सुविधा देता है।
3. लाइसेंस से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण नियम (2019 संशोधन) - 
A. नवीनीकरण - अब लाइसेंस समाप्त होने के 1 साल पहले से लेकर 1 साल बाद तक रिन्यूअल के लिए आवेदन कर सकते हैं। (पहले यह समय सीमा केवल 30 दिन थी)।
B. पता बदलना - ऑनलाइन माध्यम से घर बैठे लाइसेंस में पता बदला जा सकता है, बशर्ते आपका डेटा नेशनल रजिस्टर में अपडेटेड हो।
C. प्रशिक्षण केंद्र - सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटर से सर्टिफिकेट लेने पर, आपको RTO में ड्राइविंग टेस्ट देने से छूट मिल सकती है।
4. सारथी (Sarathi) पोर्टल - यह वह डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो राष्ट्रीय और राज्य रजिस्टरों के बीच सेतु का काम करता है।
A. पारदर्शिता - कोई भी व्यक्ति अपनी DL की स्थिति ऑनलाइन देख सकता है।
B. डिजिटल कॉपी - डिजी लॉकर या mParivahan ऐप में रखा गया डिजिटल लाइसेंस अब भौतिक लाइसेंस के समान ही मान्य है।
विशेष - अब ड्राइविंग लाइसेंस को आधार से लिंक करना अनिवार्य जैसा हो गया है ताकि फर्जी लाइसेंसों को पकड़ा जा सके।
राष्ट्रीय परिवहन नीति (NLP) - राष्ट्रीय परिवहन नीति किसी भी देश के विकास की रीढ़ होती है। भारत में इसका मुख्य उद्देश्य ऐसा एकीकृत (Integrated) और कुशल नेटवर्क तैयार करना है जो लोगों और सामान की आवाजाही को सस्ता, सुरक्षित और तेज बना सके।
वर्तमान में, भारत राष्ट्रीय लॉजिस्टिक नीति (NLP) और गति शक्ति मास्टर प्लान के माध्यम से अपनी परिवहन नीति को संचालित कर रहा है। इसके मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं - 
1. NLP के उद्देश्य - 
A. मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी - सड़क, रेल, जलमार्ग और हवाई मार्ग को आपस में जोड़ना ताकि सामान एक माध्यम से दूसरे माध्यम में आसानी से ट्रांसफर हो सके।
B. लागत में कमी - भारत में वर्तमान लॉजिस्टिक लागत GDP का लगभग 13 से 14% है। नीति का लक्ष्य इसे वैश्विक मानकों के अनुरूप 8 से 9% तक लाना है।
C. सतत विकास - प्रदूषण कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और हरित ईंधन को बढ़ावा देना।
2. NLP के प्रमुख घटक - 
. सड़क परिवहन (PMGSY प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और भारतमाला प्रोजेक्ट) - सड़क परिवहन नीति का जोर राष्ट्रीय राजमार्गों के घनत्व को बढ़ाने और एक्सप्रेसवे के जाल बिछाने पर है। इसमें सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।
ख. रेलवे का आधुनिकीकरण - रेलवे को केवल यात्री परिवहन तक सीमित न रखकर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) के माध्यम से माल ढुलाई के लिए अधिक सक्षम बनाना।
ग. जलमार्ग और बंदरगाह (सागरमाला) - भारत की लंबी तटरेखा और नदियों का उपयोग करना। सड़क के मुकाबले जलमार्ग से परिवहन 50 से 60% सस्ता पड़ता है।
घ. हवाई संपर्क (उड़ान योजना) - 
हवाई चप्पल वाले को हवाई जहाज की यात्रा (UDAN) के तहत छोटे शहरों को हवाई मार्ग से जोड़ना ताकि क्षेत्रीय विकास हो सके।
3. डिजिटल एकीकरण (Digital Integration) - राष्ट्रीय परिवहन नीति अब पूरी तरह से तकनीक पर आधारित है:
∆ FASTag - टोल प्लाजा पर समय और ईंधन की बचत के लिए।
∆ ULIP (Unified Logistics Interface Platform) - यह एक डिजिटल पोर्टल है जहाँ माल भेजने वाले, ट्रांसपोर्टर और सरकारी एजेंसियां एक ही प्लेटफॉर्म पर सारी जानकारी साझा करते हैं।
∆ e-Way Bill - माल की आवाजाही की डिजिटल ट्रैकिंग के लिए।
4. चुनौतियाँ और भविष्य की राह - 
नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती लास्ट माइल कनेक्टिविटी (अंतिम छोर तक पहुँच) है। इसके लिए सरकार गाँवों को मंडियों से जोड़ने और शहरों में मेट्रो/लॉजिस्टिक्स पार्क बनाने पर निवेश कर रही है।
निष्कर्ष - 2026 तक, भारत की परिवहन नीति का केंद्र ग्रीन मोबिलिटी है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल बसें और इलेक्ट्रिक हाईवे इस दिशा में नए कदम हैं।
राष्ट्रीय लॉजिस्टिक नीति 2024 - 25 का विश्लेषण यह समझने में मदद करेगा कि कैसे नई सड़कें और रेलवे कॉरिडोर भारत की अर्थव्यवस्था को बदल रहे हैं।
मोटर वाहन अधिनियम (संशोधन) 2019 - मोटर वाहन अधिनियम 2019 के बाद अपराध और दंड की पूरी संरचना को बदल दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य जुर्माने को इतना प्रभावी बनाना है कि लोग नियमों को तोड़ने से डरें।
I. सामान्य और दस्तावेजी अपराध - 
1. धारा 177 - सामान्य यातायात नियम उल्लंघन (कोई विशेष धारा न होने पर) 
जुर्माना - ₹500 (दूसरी बार ₹1500)
2. 181 - बिना DL गाड़ी चलाना
 जुर्माना - ₹5,000 और/या 3 महीने की जेल।
3. 182A  - वाहन के मानक/डिजाइन में अवैध बदलाव करना
जुर्माना - ₹5,000 प्रति बदलाव 
4. 192 - बिना (RC) के वाहन चलाना
जुर्माना - ₹5,000 तक (दूसरी बार ₹10,000/जेल)
5.196 - बिना बीमा के गाड़ी चलाना 
जुर्माना -₹2,000 और/या 3 महीने जेल (दूसरी बार ₹4,000)
II. सड़क सुरक्षा और व्यवहार संबंधी अपराध - ये वे अपराध हैं जिनसे जान - माल का खतरा सबसे अधिक होता है - 
1. धारा 184 (खतरनाक ड्राइविंग) - रेड लाइट जंप करना, मोबाइल का उपयोग, गलत तरीके से ओवरटेक करना।
दंड - ₹1,000 से ₹5,000 के बीच और/या 6 महीने से 1 साल की जेल।
2. धारा 185 (नशे में ड्राइविंग) - शराब या ड्रग्स के प्रभाव में वाहन चलाना।
दंड - ₹10,000 और/या 6 महीने जेल (दूसरी बार अपराध पर ₹15,000 और 2 साल जेल)।
3. धारा 189 (स्पीड रेसिंग) - सड़क पर रेस लगाना।
दंड: ₹5,000 और/या 1 महीने जेल (दूसरी बार ₹10,000 और 1 महीने जेल)।
4. धारा 194C - (ओवरलोडिंग - टू व्हीलर) दो से ज्यादा सवारी बैठाना।
दंड - ₹1,000 जुर्माना और 3 महीने के लिए लाइसेंस रद्द।
5. धारा 194D (बिना हेलमेट) - 
दंड - ₹1,000 जुर्माना और 3 महीने के लिए लाइसेंस रद्द।
6. धारा 194E (आपातकालीन वाहन) - एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड को रास्ता न देना।
दंड - ₹10,000 और/या 6 महीने की जेल
III . किशोर अपराध (Juvenile Offences धारा 199A - यह 2019 के संशोधन की सबसे सख्त धारा है। यदि कोई नाबालिग अपराध करता है।
1.  अभिभावक/मालिक के लिए दंड -₹25,000 का जुर्माना और 3 साल की जेल।
2. नाबालिग के लिए दंड - 25 साल की उम्र तक ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिलेगा।
3. वाहन गाड़ी का रजिस्ट्रेशन - (RC) 12 महीने के लिए रद्द कर दिया जाएगा।
IV. अधिकारियों द्वारा अपराध (धारा 210B) - यदि कोई यातायात नियम लागू करने वाला अधिकारी (पुलिस या RTO अधिकारी) स्वयं इनमें से कोई नियम तोड़ता है, तो उसे उस अपराध के लिए निर्धारित जुर्माने का दोगुना (2x) भुगतान करना होगा।
V. कंपाउंडिंग (Compounding of Offences) धारा 200 - कुछ अपराधों में मौके पर ही जुर्माना भरकर मामला सुलझाया जा सकता है (On-the-spot fine)। परंतु नशे में गाड़ी चलाना या गंभीर दुर्घटना जैसे मामलों में कंपाउंडिंग नहीं होती और कोर्ट जाना अनिवार्य होता है।
विशेष - बार-बार अपराध करने पर जुर्माना बढ़ने के साथ - साथ ड्राइविंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द (Disqualified) किया जा सकता है।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) -  इसका गठन मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 165 के तहत किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को त्वरित और सरल तरीके से न्याय दिलाना है, ताकि उन्हें नियमित दीवानी अदालतों (Civil Courts) के लंबे चक्कर न काटने पड़ें।
यहाँ MACT की शक्तियों और क्षेत्राधिकार का विस्तृत विवरण है:
1. MACT का क्षेत्राधिकार धारा 166 - क्षेत्राधिकार का अर्थ है कि पीड़ित कहाँ मामला दर्ज करा सकता है। धारा 166 के अनुसार, पीड़ित के पास तीन विकल्प होते हैं:
I. दुर्घटना स्थल - जहाँ दुर्घटना हुई हो।
II. प्रतिवादी का निवास - जहाँ दुर्घटना करने वाला व्यक्ति या वाहन मालिक रहता हो।
III. दावेदार का निवास - जहाँ पीड़ित स्वयं रहता है या व्यवसाय करता है।
महत्वपूर्ण बदलाव - 2019 के संशोधन के बाद, अब दावा दायर करने के लिए 6 महीने की समय सीमा तय कर दी गई है। दुर्घटना के 6 महीने के भीतर क्लेम फाइल करना अनिवार्य है।
2. न्यायाधिकरण की शक्तियाँ - MACT को धारा 169 के तहत सिविल कोर्ट की कई शक्तियाँ प्राप्त हैं, ताकि वह प्रभावी ढंग से कार्य कर सके - 
I. शपथ दिलाना - यह गवाहों को बुला सकता है और उन्हें शपथ पर बयान देने के लिए मजबूर कर सकता है।
II. दस्तावेज मंगाना - किसी भी दस्तावेज (जैसे पुलिस रिपोर्ट, बीमा पॉलिसी) को पेश करने का आदेश दे सकता है।
III. जांच के आदेश - दुर्घटना स्थल की जांच के लिए स्थानीय आयुक्त नियुक्त कर सकता है।
IV. विशेषज्ञ की मदद - चिकित्सा या तकनीकी विशेषज्ञों की राय ले सकता है (जैसे चोट की गंभीरता मापने के लिए)।
V. मुआवजे का निर्धारण (Just Compensation) - यह केवल दावा की गई राशि तक सीमित नहीं है। यदि न्यायाधिकरण को लगे कि नुकसान अधिक है, तो वह माँगी गई राशि से अधिक न्यायसंगत मुआवजा भी दे सकता है।
VI. ब्याज का आदेश - न्यायाधिकरण दावा दायर करने की तारीख से भुगतान की तारीख तक उचित ब्याज (7% से 9%) देने का आदेश भी दे सकता है।
3. दावा कौन कर सकता है - 
I. वह व्यक्ति जिसे चोट लगी हो।
II. संपत्ति का मालिक (जिसका वाहन या सामान क्षतिग्रस्त हुआ हो)।
III. मृतक के सभी या कोई भी कानूनी प्रतिनिधि (वारिस)।
IV चोटिल व्यक्ति या मृतक के वारिसों द्वारा अधिकृत एजेंट।
4. अंतरिम मुआवजा - न्यायाधिकरण के पास यह शक्ति है कि वह अंतिम निर्णय आने से पहले पीड़ित को तत्काल सहायता के रूप में अंतरिम राहत दिला सके। यह विशेष रूप से बिना दोष दायित्व (No -Fault Liability) के मामलों में बहुत उपयोगी होता है, जहाँ मृत्यु पर ₹5 लाख और गंभीर चोट पर ₹2.5 लाख की राशि तुरंत दिलाई जा सकती है।
5. अपील - यदि कोई पक्ष MACT के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह धारा 173 के तहत उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। लेकिन अपील तभी मान्य होगी जब विवादित राशि ₹1 लाख से अधिक हो और अपील निर्णय के 90 दिनों के भीतर की जाए।
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                  UNIT - V 
महत्वपूर्ण केस लॉज - अपकृत्य विधि को समझने के लिए ये 10 लैंडमार्क केस सबसे महत्वपूर्ण हैं। ये मामले ही इस कानून की नींव हैं - 
केस संख्या 01. ऐशबी बनाम व्हाइट (Ashby v. White, 1703) - ऐशबी बनाम व्हाइट (1703) का मामला Injuria Sine Damno (बिना हानि के क्षति) के कानूनी सिद्धांत को स्थापित करता है।
1. मामले के तथ्य - 
वादी (Plaintiff) - मिस्टर ऐशबी एलेसबरी के योग्य मतदाता थे।
प्रतिवादी (Defendant) - विलियम व्हाइट, जो एक निर्वाचन अधिकारी।
घटना - संसदीय चुनाव के दौरान, व्हाइट ने ऐशबी को अपना वोट डालने से गैरकानूनी तरीके से रोक दिया।
चुनाव परिणाम - जिस उम्मीदवार को ऐशबी वोट देना चाहते थे, वह चुनाव जीत गया। यानी ऐशबी के वोट न देने से चुनाव के परिणाम पर कोई भौतिक असर नहीं पड़ा और न ही उन्हें कोई वित्तीय नुकसान हुआ।
कानूनी मुद्दा (Legal Issue) - अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या कोई व्यक्ति मुआवजे की मांग कर सकता है यदि उसके कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ हो, भले ही उसे वास्तव में कोई शारीरिक या आर्थिक नुकसान न हुआ हो?
3. न्यायालय का निर्णय (Judgment) - हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने लॉर्ड चीफ जस्टिस सर जॉन होल्ट के ऐतिहासिक तर्क को स्वीकार किया और वादी (ऐशबी) के पक्ष में फैसला सुनाया कि वादी का कोई अधिकार है, तो उसके पास उसे बनाए रखने का उपाय भी होना चाहिए, अधिकार का उल्लंघन ही अपने आप में क्षति है, चाहे उससे एक पैसे का भी नुकसान न हुआ हो।
4. स्थापित सिद्धांत - Injuria Sine Damno - इस केस से Injuria का कानूनी अधिकार का उल्लंघन उल्लंघन हुआ।
Sine (साइन) बिना।
Damno (डेमनो) वास्तविक भौतिक या आर्थिक हानि।
इसका अर्थ है कि यदि आपके किसी मौलिक या कानूनी अधिकार (जैसे वोट देने का अधिकार) का हनन होता है, तो आप केस कर सकते हैं, चाहे आपको चोट लगी हो या नहीं।
5. महत्व (Significance) - 
- Ubi Jus Ibi Remedium: जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार भी है। यह मामला इस लैटिन सूत्र को चरितार्थ करता है।
- यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक ढाल बन गया।
 - आज भी भारत और अन्य देशों के संवैधानिक कानूनों में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर यह केस एक मिसाल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
दिलचस्प तथ्य - इस केस के बाद संसद और न्यायपालिका के बीच काफी संघर्ष हुआ, क्योंकि संसद ने इसे विशेषाधिकारों का हनन माना।
केस संख्या 02. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वी.पी. शांता (1995) - इस फैसले के माध्यम से चिकित्सा सेवा को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में लाया गया था।
यहाँ इस केस के मुख्य बिंदु और परिणाम दिए गए हैं - 
1. मुख्य विवाद - 
. क्या डॉक्टर और अस्पताल द्वारा दी जाने वाली सेवाएं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा मानी जा सकती हैं? 
. डॉक्टरों का तर्क था कि चिकित्सा व्यापार के स्थान पर एक महान पेशा है।  इसलिए उन्हें उपभोक्ता अदालतों में नहीं घसीटा जाना चाहिए।
2. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (1995) - 
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि - 
डॉक्टर और मरीज का रिश्ता - मरीज एक 'उपभोक्ता' है और डॉक्टर द्वारा दी गई सलाह, निदान (Diagnosis) और उपचार एक 'सेवा' है।
निःशुल्क बनाम सशुल्क सेवा - यदि डॉक्टर या अस्पताल पैसे लेकर इलाज करते हैं, तो वे इस कानून के दायरे में आएंगे।
यदि सेवा पूरी तरह से मुफ्त दी जा रही है (जैसे सरकारी अस्पतालों में), तो वह इस कानून के दायरे में नहीं आएगी।
 यदि कोई अस्पताल अमीरों से पैसे लेता है और गरीबों का मुफ्त इलाज करता है, तो मुफ्त इलाज कराने वाले मरीज भी उपभोक्ता माने जाएंगे।
3. फैसले का प्रभाव - 
∆ जवाबदेही बढ़ी - डॉक्टरों और अस्पतालों को अब चिकित्सा लापरवाही (Medical Negligence) के लिए उपभोक्ता अदालतों में जवाबदेह बनाया जा सकता था।
∆ सस्ता और तेज़ न्याय - मरीजों को सिविल कोर्ट के चक्कर लगाने के बजाय उपभोक्ता फोरम में जाने का विकल्प मिला, जहाँ प्रक्रिया सरल और सस्ती है।
∆ मुआवजा - यदि इलाज में लापरवाही साबित होती है, तो मरीज या उसके परिवार को हर्जाना मिल सकता है।
4. ताज़ा स्थिति (2024-2025) - हाल ही में (मई 2024), सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले (वकीलों से संबंधित) में इस फैसले पर पुनर्विचार करने की बात कही थी। 7 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने वी.पी. शांता केस के फैसले को बदलने से इनकार कर दिया। इसका मतलब है कि आज भी डॉक्टर और चिकित्सा सेवाएं उपभोक्ता कानून के दायरे में बनी हुई हैं।
केस संख्या 03 म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम श्रीमती सुभगवती (1966) - का मामला भारतीय अपकृत्य विधि में लापरवाही और रेस इप्सा लोक्विटुर के सिद्धांत को समझाने का सशक्त उदाहरण है।
1. मामले के तथ्य - 
स्थान और घटना - दिल्ली के चांदनी चौक में टाउन हॉल के सामने पुराना घंटाघर था। 18 सितंबर 1951 को यह अचानक गिर गया।
क्षति - इस दुर्घटना में श्रीमती सुभगवती के परिवार के सदस्यों सहित कुछ अन्य राहगीरों की मृत्यु हो गई।
∆ मुकदमा - पीड़ितों के वारिसों ने दिल्ली नगर निगम (MCD) के खिलाफ लापरवाही का आरोप लगाते हुए हर्जाने के लिए मुकदमा दायर किया।
2. मुख्य कानूनी प्रश्न - क्या नगर निगम को इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, भले ही उन्होंने जानबूझकर कोई गलती न की हो।
3. न्यायालय का निर्णय और तर्क - 
∆ निरीक्षण की जिम्मेदारी - घंटाघर लगभग 80 साल पुराना था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संरचना की उम्र आमतौर पर 40 से 45 साल होती है। नगर निगम का यह कर्तव्य था कि वह इसकी समय-समय पर जांच और मरम्मत कराए।
∆ कोर्ट ने Res Ipsa Loquitur - (घटना स्वयं बोलती है) के लैटिन सिद्धांत का उपयोग किया जिसका अर्थ है कि कुछ घटनाएं इतनी स्पष्ट होती हैं कि लापरवाही साबित करने के लिए अलग से सबूत की जरूरत नहीं होती। एक सार्वजनिक इमारत का अचानक गिर जाना इस बात का प्रमाण है कि उसकी देखभाल में लापरवाही बरती गई थी।
∆ नगर निगम का तर्क - MCD ने तर्क दिया था कि यह एक अपरिहार्य दुर्घटना थी और इसमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं था। कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और कहा कि संरचना का पुराना होना ही संभावित खतरे की चेतावनी थी।
4 केस का निष्कर्ष - सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगम की अपील खारिज कर दी और आदेश दिया कि पीड़ितों को उचित मुआवजा दिया जाए। यह केस स्थापित करता है कि सार्वजनिक प्राधिकरण अपनी संपत्तियों के रखरखाव के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी हैं ताकि जनता को कोई नुकसान न हो।
रोचक तुलना - यह मामला इंग्लैंड के प्रसिद्ध केस स्कॉट बनाम लंदन एंड सेंट कैथरीन डॉक्स' (1865) जैसा ही है, जहाँ एक गोदाम से चीनी की बोरियाँ एक राहगीर पर गिर गई जिसे कोर्ट ने लापरवाही माना था।
केस संख्या 04. एन. नागेंद्र राव एंड कंपनी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1994) राज्य के उत्तरदायित्व का सिद्धांत और राजकीय उन्मुक्ति के सिद्धांत को आधुनिक संदर्भ में परिभाषित करने वाला महत्वपूर्ण फैसला है।
1. मामले के तथ्य (Facts) - 
अपीलकर्ता (नागेंद्र राव) का उर्वरकों और खाद्यान्न का व्यवसाय था।
पुलिस और सतर्कता विभाग ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत उनके परिसर से भारी मात्रा में उर्वरक और अनाज जब्त कर लिया।
बाद में, जिला राजस्व अधिकारी ने जब्त किए गए स्टॉक का कुछ हिस्सा वापस करने का आदेश दिया।
 अपीलकर्ता सामान लेने पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि लंबे समय तक खराब रखरखाव और अधिकारियों की लापरवाही के कारण उर्वरक पूरी तरह से खराब हो चुका था और खाद्यान्न की गुणवत्ता भी खत्म हो गई थी।
उन्होंने राज्य सरकार से मुआवजे की मांग की, जिसे आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सामान की जब्ती एक राजकीय कार्य था, इसलिए सरकार जिम्मेदार नहीं है।
2. मुख्य कानूनी प्रश्न - 
क्या राज्य अपने अधिकारियों द्वारा वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई लापरवाही के लिए उत्तरदायी है? 
क्या राजकीय उन्मुक्ति (कि राजा कोई गलती नहीं कर सकता) का सिद्धांत आज भी लागू होता है?
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय - सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने राज्य को मुआवजे के रूप में ₹1,06,125 और ब्याज के भुगतान का आदेश देते हुए सिद्धांत दिए कि - 
राजकीय और गैर-राजकीय कार्यों में अंतर - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल युद्ध, शांति, कूटनीति और कानून-व्यवस्था जैसे कार्य ही राजकीय माने जा सकते हैं।आवश्यक वस्तुओं की जब्ती या व्यापारिक नियंत्रण जैसे कार्य कल्याणकारी राज्य के वैधानिक कार्य हैं, संप्रभु या राजकीय नहीं।
∆ राजकीय संप्रभुता का अंत - कोर्ट ने कहा कि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में राजा कोई गलती नहीं कर सकता का पुराना ब्रिटिश सिद्धांत अब लागू नहीं होता।
∆ प्रतिनिधिक दायित्व - यदि कोई सरकारी अधिकारी कानूनी काम के दौरान लापरवाही बरतता है जिससे किसी नागरिक को नुकसान होता है, तो राज्य उस नुकसान की भरपाई के लिए उसी तरह जिम्मेदार है जैसे कोई मालिक अपने कर्मचारी की गलती के लिए होता है।
∆ कस्तूरी लाल केस का प्रभाव कम होना - कोर्ट ने 1965 के कस्तूरी लाल मामले के प्रभाव को सीमित करते हुए कहा कि राज्य को उसकी जिम्मेदारी से भागने के लिए राजकीय शक्ति का बहाना नहीं लेने दिया जा सकता।
4. फैसले का महत्व - इस फैसले के बाद यह स्थापित हो गया कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है। यदि सरकारी मशीनरी की लापरवाही से किसी नागरिक की संपत्ति या अधिकारों का नुकसान होता है, तो वह अदालत से मुआवजे का हकदार है।
केस संख्या 05 ग्लोस्टर ग्रामर स्कूल केस (1410)  - यह Damnum Sine Injuria के सिद्धांत को समझने का सटीक उदाहरण है। यह केस ऐशबी बनाम व्हाइट के विपरीत अवधारणा पर आधारित है।
1. मामले के तथ्य - 
I. वादी - एक ग्रामर स्कूल का मालिक।
II. प्रतिवादी एक शिक्षक जो उसी स्कूल में पढ़ाते थे।
III.घटना - प्रतिवादी शिक्षक ने स्कूल छोड़ दिया और वादी के स्कूल के ठीक सामने खुद का स्कूल खोल कर कम फीस में पढ़ना शुरू किया।
2. परिणाम - नए स्कूल की फीस कम थी, इसलिए वादी के स्कूल के अधिकांश छात्र वहां चले गए। छात्रों को वापस लाने हेतु वादी को भी म फीस कम करनी पड़ी, जिससे उसे आर्थिक हानि हुई।
3.. कानूनी मुद्दा अदालत के सामने सवाल यह था - 
क्या किसी व्यक्ति के वैध व्यवसाय या प्रतिस्पर्धा के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान के लिए मुआवजे का दावा किया जा सकता है, यदि उसने कोई कानून न तोड़ा हो?
4. न्यायालय का निर्णय - न्यायालय ने वादी के दावे को खारिज कर दिया और फैसला सुनाया कि उसे कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। न्यायाधीश ने तर्क दिया कि व्यवसाय में प्रतिस्पर्धा के कारण हुआ नुकसान कानून की नजर में क्षति नहीं है। प्रतिवादी को अपना स्कूल चलाने का पूरा अधिकार है, और यद्यपि इससे वादी को आर्थिक हानि हुई है, लेकिन उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है।
4. स्थापित सिद्धांत: Damnum Sine Injuria - 
Damnum (डेमनो) - वास्तविक हानि या नुकसान (धन, स्वास्थ्य या आराम का)।
Sine (साइन) - बिना।
Injuria (इंजुरिया) - कानूनी अधिकार का उल्लंघन।
अर्थ - ऐसी हानि जिसके लिए कोई कानूनी उपचार नहीं मिलता क्योंकि किसी के अधिकार का हनन नहीं हुआ है।
5. महत्व - यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि कानून केवल उन नुकसानों की भरपाई करता है जो अवैध हों।
∆ यह मुक्त व्यापार और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है।
∆ आधुनिक समय में, यदि आपके घर के पास कोई नई दुकान खुलती है और आपकी बिक्री कम हो जाती है, तो आप इस सिद्धांत के कारण उस पर केस नहीं कर सकते।
∆ उदाहरण - यदि आप अपनी जमीन पर कुआँ खोदते हैं और इस कारण आपके पड़ोसी के कुएँ का पानी सूख जाता है, तो यह भी Damnum Sine Injuria का मामला होगा। पड़ोसी आप पर केस नहीं कर सकता क्योंकि आपको अपनी जमीन पर कुआँ खोदने का अधिकार है।
केस संख्या 06. डोनोघ बनाम स्टीवेन्सन (Donoghue v. Stevenson, 1932) घोंघे वाला/जिंजर बीयर केस- 
इस केस ने पूरी दुनिया के कानून में यह तय किया कि निर्माताओं का उपभोक्ताओं के प्रति क्या कर्तव्य है।
1. मामले के तथ्य - 
I.वादी - मिसेज डोनोघ।
II. प्रतिवादी - मिस्टर स्टीवेन्सन (एक जिंजर बीयर निर्माता)।
2. घटना - मिसेज डोनोघ की एक सहेली ने उनके लिए एक कैफे में जिंजर बीयर खरीदी। बीयर की बोतल गहरे रंग की (Opaque) थी, इसलिए अंदर का हिस्सा बाहर से नहीं दिख रहा था। जब मिसेज डोनोघ ने आधी बीयर पी ली और बाकी गिलास में उड़ेली, तो उसमें से एक सड़ा हुआ घोंघा निकला।
3. परिणाम - सड़ा हुआ जीव देखने और दूषित बीयर पीने से उन्हें गंभीर पेट दर्द और मानसिक सदमा लगा।
4. कानूनी पेच - उस समय तक कानून यह था कि आप केवल उसी पर केस कर सकते हैं जिसके साथ आपका अनुबंध हो। चूँकि बीयर सहेली ने खरीदी थी, इसलिए मिसेज डोनोघ का दुकानदार या निर्माता के साथ कोई सीधा कॉन्ट्रैक्ट नहीं था।
5. कोर्ट का निर्णय - हाउस ऑफ लॉर्ड्स के जस्टिस लॉर्ड एटकिन ने पड़ोसी सिद्धांत (Neighbour Principle) के सिद्धांत पर निर्णय दिया कि - 
पड़ोसी से प्रेम करना चाहिए, जिसका कानूनी अर्थ है, ऐसी लापरवाही से बचना जिससे पड़ोसी को नुकसान ना पहुंचे।
4. पड़ोसी सिद्धांत (Who is my Neighbour?) - लॉर्ड एटकिन के अनुसार, पड़ोसी का अर्थ केवल बगल में रहने वाला व्यक्ति नहीं वे सभी हैं जो - 
∆ कार्य से पड़ोसी (निकटता) - काम से निकटता से प्रभावित हो सकते हैं कि हमें अपना काम करते समय उनके बारे में सोचना चाहिए।
∆ निर्माता का कर्तव्य - निर्माता का कानूनी दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि उसके उत्पाद से अंतिम उपभोक्ता को कोई नुकसान न हो, भले ही उनके बीच कोई सीधा अनुबंध न हो।
5. इस केस का महत्व - 
I. उपभोक्ता संरक्षण की नींव - आज हम जो उपभोक्ता अधिकार देखते हैं, वे इसी केस से शुरू हुए।
II. लापरवाही का सिद्धांत - यह स्थापित हुआ कि लापरवाही एक स्वतंत्र कानूनी अपराध है।
III. अनुबंध की अनिवार्यता खत्म - अब पीड़ित व्यक्ति निर्माता पर सीधे दावा कर सकता है, चाहे सामान किसी ने भी खरीदा हो।
IV. स्थापित होने वाली 3 मुख्य बातें - 
निर्माता का उपभोक्ता के प्रति सावधानी बरतने का कर्तव्य जिसका उल्लंघन हुआ (बोतल में घोंघा होना) जिसके कारण वास्तविक क्षति हुई।
V. विशेष - मिसेज डोनोघ ने मुआवजे के तौर पर £500 की मांग की, मामला अदालत के बाहर ही सेटल हो गया।
केस संख्या 07. रायलैंड्स बनाम फ्लेचर (Rylands v. Fletcher, 1868) - यह कानून में कठोर दायित्व के सिद्धांत को जन्म देने वाला प्रसिद्ध केस है जिसमें कभी-कभी गलती न होने पर भी दूसरे को हुए नुकसान का जिम्मेदार माना जा सकता है।
1. मामले के तथ्य - 
∆ वादी - मिस्टर फ्लेचर, जिनकी जमीन के नीचे कोयले की खदानें थीं।
∆ प्रतिवादी - मिस्टर रायलैंड्स, जिन्होंने अपनी मिल को पानी की आपूर्ति हेतु अपनी जमीन पर एक जलाशय बनवाया।
2. घटना - जलाशय बनवाने के लिए रायलैंड्स ने स्वतंत्र ठेकेदारों को काम पर रखा। खुदाई के दौरान ठेकेदारों को कुछ पुरानी खदानें मिलीं जो मिट्टी से भरी थीं। उन्होंने लापरवाही बरती और उन्हें ठीक से बंद नहीं किया।
3. परिणाम - जैसे ही जलाशय में पानी भरा गया, पुरानी खदानों से होते हुए फ्लेचर की कोयला खदानों में घुस गया और उन्हें पूरी तरह डुबो दिया।
4. कानूनी मुद्दा - रायलैंड्स ने तर्क दिया कि यह उनकी गलती नहीं थी, बल्कि ठेकेदारों की लापरवाही थी। सवाल यह था कि - 
∆ कठोर दायित्व - क्या कोई व्यक्ति अपनी जमीन पर रखी किसी खतरनाक वस्तु के बाहर निकलने से हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार है, भले ही उसने व्यक्तिगत रूप से कोई लापरवाही न की हो?
3. कोर्ट का निर्णय - कोर्ट ने रायलैंड्स को दोषी ठहराया और कठोर दायित्व का नियम देते हुए कहा कि - 
जो व्यक्ति अपनी जमीन पर किसी ऐसी चीज को लाता है या इकट्ठा करता है, जिसके बाहर निकलने पर नुकसान होने की संभावना हो (जैसे पानी, गैस, बिजली या जंगली जानवर), तो उसे उसे अपने जोखिम पर रखना होगा। यदि वह बाहर निकलती है, तो वह उससे हुए सभी नुकसानों के लिए उत्तरदायी है।
4. कठोर दायित्व के तीन आवश्यक तत्व - 
∆ खतरनाक वस्तु - वह चीज जो अपनी सीमा से बाहर निकलने पर नुकसान कर सकती हो।
∆ जमीन का गैर-प्राकृतिक उपयोग - जैसे पानी को बहुत बड़ी मात्रा में इकट्ठा करना (सामान्य घरेलू उपयोग के लिए पानी रखना इसमें नहीं आता)।
∆ पलायन - वस्तु मालिक के नियंत्रण वाली जमीन से बाहर निकलकर दूसरे की जमीन पर चली जाए।
5. कठोर दायित्व के अपवाद - रायलैंड्स बनाम फ्लेचर का नियम हर जगह लागू नहीं होता। इसके कुछ अपवाद भी हैं - 
∆ दैवीय घटना - यदि बिजली गिरने या अत्यधिक बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से पानी बाहर निकल जाए।
∆ तीसरे पक्ष का काम - यदि किसी अजनबी ने जानबूझकर नुकसान पहुँचाने के लिए जलाशय की दीवार तोड़ दी हो।
वादी की गलती - यदि पीड़ित ने स्वयं ही उस खतरे को निमंत्रण दिया हो।
∆ साझा लाभ - यदि वह चीज दोनों पक्षों के फायदे के लिए रखी गई थी।
© भारत में इसकी स्थिति (MC Mehta Case) - भारत में, एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रायलैंड्स बनाम फ्लेचर का नियम अब पुराना पड़ गया है। भारत में पूर्ण दायित्व का नियम लागू होता है, जहाँ खतरनाक उद्योगों के पास बचाव की कोई गुंजाइश नहीं है।

केस संख्या 08. MC मेहता बनाम भारत संघ, 1987 (ओलियम गैस रिसाव केस) - इस केस के माध्यम से भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण दायित्व का एक नया और अत्यंत कठोर सिद्धांत प्रतिपादित किया।
1. मामले की पृष्ठभूमि - दिल्ली के श्री राम फूड एंड फर्टिलाइजर्स इंडस्ट्रीज की एक इकाई से दिसंबर 1985 में खतरनाक ओलियम गैस का रिसाव हुआ। इस घटना में एक वकील की मृत्यु हो गई और कई अन्य लोग प्रभावित हुए। यह घटना भोपाल गैस त्रासदी के ठीक एक साल बाद घटित हुई,जिसने पूरे देश को हिला दिया।
2. पूर्ण दायित्व' का सिद्धांत - जस्टिस पी. एन. भगवती ने कहा कि भारत को अब इंग्लैंड के 19वीं सदी के पुराने नियम पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। उन्होंने पूर्ण दायित्व का नियम दिया, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं - 
I. कोई अपवाद नहीं - कठोर दायित्व में दैवीय घटना या तीसरे पक्ष की गलती जैसे बचाव मिल जाते थे, लेकिन पूर्ण दायित्व में कोई बचाव नहीं मिलता। यदि आप खतरनाक उद्योग चला रहे हैं, तो नुकसान होने पर आप हर हाल में जिम्मेदार हैं।
II. खतरनाक गतिविधि - यदि कोई उद्योग ऐसी किसी गतिविधि में लगा है जो स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए खतरनाक है, तो उस उद्योग की जिम्मेदारी पूर्ण और अप्रतिदेय (Non-delegable) है।
III. मुआवजे की मात्रा - कोर्ट ने तय किया कि मुआवजा उद्योग की क्षमता और आकार के आधार पर होना चाहिए। यानी उद्योग जितना बड़ा और अमीर होगा, उसे उतना ही अधिक जुर्माना देना होगा ताकि वह भविष्य में ऐसी गलती न करे (इसे प्रतिरोधी जुर्माना कहा गया)।

केस संख्या 09. कस्तूरी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1965 - का मामला भारत के कानूनी इतिहास में संप्रभु उन्मुक्ति के सिद्धांत पर विवादास्पद व महत्वपूर्ण फैसला है। इसमें प्रश्न उठा कि - 
क्या सरकार अपने कर्मचारियों द्वारा की गई गलती के लिए जिम्मेदार है, खासकर जब वे अपनी राजकीय शक्तियों का उपयोग कर रहे हों।
  क्या राज्य सरकार पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के लिए उत्तरदायी है, जब वे अपनी कानूनी शक्तियों गिरफ्तारी और जब्ती) का प्रयोग कर रहे हों?
1. मामले के तथ्य - 
∆ वादी - कस्तूरी लाल रैलिया राम, जो अमृतसर के जौहरी थे।
∆ घटना - कस्तूरी लाल सोना और चांदी बेचने हेतु मेरठ आए तो पुलिस ने उन्हें इस संदेह में गिरफ्तार कर लिया कि उनके पास चोरी का माल है।
∆ जब्ती - पुलिस ने उनका 21 सेर चांदी और 103 तोला सोना जब्त कर मालखाने में रख दिया।
∆ घटनाक्रम - उस मालखाने का इंचार्ज पुलिस कॉन्स्टेबल मोहम्मद अमीर सारा माल लेकर पाकिस्तान भाग गया।
∆ दावा - कस्तूरी लाल ने उत्तर प्रदेश सरकार से अपने सोने की कीमत वापस पाने के लिए मुकदमा किया, क्योंकि पुलिस की लापरवाही से उनका नुकसान हुआ।
2. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय - मुख्य न्यायाधीश PB गजेंद्र गडकर ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने कस्तूरी लाल को कोई राहत नहीं दी, न्यायालय ने कहा कि - 
पुलिस द्वारा गिरफ्तारी और संपत्ति की जब्ती करना संप्रभु शक्तियाँ हैं। यदि इन शक्तियों के प्रयोग के दौरान किसी कर्मचारी की लापरवाही से नुकसान होता है, तो राज्य (सरकार) को इस हेतु उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने विकारियस लायबिलिटी (प्रतिनिधिक दायित्व) के सिद्धांत को यहाँ खारिज कर दिया क्योंकि पुलिस का काम देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ा था।
4. संप्रभु बनाम गैर-संप्रभु कार्य - इस केस के माध्यम से दो श्रेणियों को स्पष्ट किया गया - 
∆ संप्रभु कार्य - जैसे सेना, पुलिस, न्याय प्रशासन और कर (Tax) वसूली। इनके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं होती (इस फैसले के अनुसार)।
∆ गैर-संप्रभु कार्य - जैसे रेलवे चलाना, व्यापार करना या अस्पताल चलाना। इनके लिए सरकार एक सामान्य मालिक की तरह जिम्मेदार होती है।
5. इस केस की आलोचना और वर्तमान स्थिति - 
आलोचना - इस फैसले की कड़ी आलोचना हुई क्योंकि इसमें निर्दोष नागरिक को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा और उसे कोई न्याय नहीं मिला। खुद जज ने भी टिप्पणी की थी कि यह कानून बहुत कठोर है और संसद को इसे बदलना चाहिए।
बदलाव - बाद के वर्षों में, नीलाबती बेहरा (1993) और अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने इस कठोर रुख को नरम किया। अब संवैधानिक उपचार के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सरकार को मुआवजा देना पड़ता है।
निष्कर्ष - आज के समय में कस्तूरी लाल केस के प्रभाव को काफी हद तक कम कर दिया गया है, लेकिन इसे अभी तक पूरी तरह से समाप्त नहीं किया गया है। यह अभी भी राज्य के दायित्वों पर चर्चा का प्रमुख केंद्र है।

केस संख्या 10 लायड बनाम ग्रेस स्मिथ एंड कंपनी, 1912 - यह मामला प्रतिनिधिक दायित्व के सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह केस स्पष्ट करता है कि एक मालिक अपने कर्मचारी द्वारा किए गए धोखाधड़ी के कार्यों के लिए भी जिम्मेदार है, बशर्ते वह कार्य रोजगार के दौरान किया गया हो।
1. मामले के तथ्य - 
∆ वादी - एक विधवा महिला Mrs लायड जिनके पास दो संपत्तियां थीं।
∆ प्रतिवादी - प्रतिष्ठित सॉलिसिटर (वकील) फर्म ग्रेस स्मिथ एंड कंपनी।
∆ घटना - मिसेज लायड अपनी संपत्तियों के प्रबंधन के संबंध में सलाह हेतु फर्म कार्यालय पहुंची जहां उनकी मुलाकात फर्म के मैनेजिंग क्लर्क मिस्टर सैंडर्सन से हुई।
∆ धोखाधड़ी - क्लर्क ने मिसेज लायड को गुमराह किया और उनसे कुछ ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए, जिनसे संपत्तियां क्लर्क के नाम ट्रांसफर हो गईं। क्लर्क ने बाद में उन संपत्तियों को बेच दिया और सारा पैसा लेकर भाग गया।
∆ दावा - जब मिसेज लायड को इस धोखाधड़ी का पता चला, तो उन्होंने फर्म (मालिक) पर मुआवजे के लिए मुकदमा किया।
2. कानूनी तर्क - फर्म का तर्क था कि क्लर्क की धोखाधड़ी उसका निजी स्वार्थ था, फर्म ने उसे चोरी या धोखाधड़ी करने हेतु नियुक्त नहीं किया था। इसलिए, फर्म को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
3. न्यायालय का निर्णय - हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने फर्म के इस तर्क को खारिज कर दिया और फैसला मिसेज लायड के पक्ष में सुनाया। न्यायालय ने सिद्धांत दिया कि - 
मालिक अपने एजेंट या कर्मचारी द्वारा किए गए किसी भी गलत कार्य के लिए उत्तरदायी है, यदि वह कार्य उसे सौंपे गए अधिकार क्षेत्र के भीतर किया गया हो।
यह मायने नहीं रखता कि कर्मचारी ने वह कार्य अपने फायदे के लिए किया या मालिक के फायदे के लिए।
 क्लर्क को फर्म ने ग्राहकों के साथ लेन-देन करने और दस्तावेज तैयार करने के लिए अधिकृत किया था, इसलिए फर्म उसकी धोखाधड़ी हेतु उत्तरदायी है।
4. प्रतिनिधिक दायित्व का मुख्य सूत्र - 
इस केस ने दो महत्वपूर्ण लैटिन सूत्रों को और मजबूत किया:
∆. Qui facit per alium facit per se - जो दूसरे के माध्यम से कार्य करता है, वह स्वयं वह कार्य करता है।
∆. Respondeat Superior - वरिष्ठ (मालिक) को उत्तरदायी होने दें।
5. इस केस का महत्व - 
∆. धोखाधड़ी में विस्तार - इससे पहले माना जाता था कि मालिक केवल तभी जिम्मेदार है जब कर्मचारी का कार्य मालिक के लाभ के लिए हो। इस केस ने उस धारणा को बदल दिया।
∆. ग्राहकों की सुरक्षा - यह सुनिश्चित करता है कि बड़ी कंपनियां या फर्म अपने कर्मचारियों के व्यवहार के प्रति अधिक सावधान रहें, क्योंकि पीड़ित ग्राहक सीधे कंपनी से हर्जाना वसूल सकता है।
उदाहरण - यदि किसी बैंक का कैशियर आपसे पैसे जमा करने के लिए लेता है और रसीद देकर खुद की जेब में रख लेता है, तो बैंक यह नहीं कह सकता कि यह कैशियर की निजी चोरी है। बैंक को आपको पैसे लौटाने होंगे क्योंकि वह चोरी रोजगार के दौरान हुई थी।

केस संख्या 11. बर्नार्ड बनाम हैगिस 1863 -  यह मामला अपकृत्य और अनुबंध के बीच की उस महीन रेखा को स्पष्ट करता है, जो विशेष रूप से एक नाबालिग की जिम्मेदारी से जुड़ी है।
यह केस सिखाता है कि एक नाबालिग अनुबंध के तहत तो अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है, लेकिन वह अपकृत्य के तहत किए गए गलत कार्य का उत्तरदायी माना जाएगा।
1. मामले के तथ्य - 
∆ वादी - मिस्टर हैगिस, जो घोड़ों के मालिक थे।
∆ प्रतिवादी - मिस्टर बर्नार्ड, जो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र और नाबालिग थे।
∆ घटना - बर्नार्ड ने हैगिस से एक घोड़ी किराए पर ली। अनुबंध में यह स्पष्ट शर्त थी कि घोड़ी का उपयोग केवल सवारी के लिए किया जाएगा और उसे कूदने हेतु इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
∆ उल्लंघन - बर्नार्ड ने अपने एक दोस्त को वह घोड़ी दे दी, जिसने उससे ऊँची कूद लगवाई। कूदते समय नुकीले डंडे  पर गिरने से घोड़ी की मृत्यु हो गई।
∆ दावा - हैगिस ने नुकसान की भरपाई के लिए बर्नार्ड पर केस किया।
2. कानूनी पेच - चूँकि बर्नार्ड एक नाबालिग था, इसलिए सामान्य कानून के अनुसार उसके साथ किया गया अनुबंध अमान्य था। बर्नार्ड के वकील ने तर्क दिया कि यह मामला अनुबंध के उल्लंघन का है, इसलिए एक नाबालिग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
3. न्यायालय का निर्णय - न्यायालय ने बर्नार्ड के तर्क को खारिज कर दिया और उसे उत्तरदायी ठहराया। न्यायालय ने कहा कि 
यह केवल अनुबंध का उल्लंघन नहीं था बल्कि यह स्वतंत्र रूप से एक अपकृत्य था
घोड़ी को कूदने के लिए इस्तेमाल करना उस सीमा से बाहर का कार्य था जिसके लिए उसे किराए पर लिया गया। यह एक प्रकार का अतिचार' और लापरवाही थी।
कानून नाबालिग को अनुबंध से सुरक्षा देता है, लेकिन उसे अपकृत्य (जैसे किसी की संपत्ति को जानबूझकर नष्ट करना) करने का लाइसेंस नहीं देता।
4. स्थापित सिद्धांत - 
इस केस ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि -  नाबालिग अपने द्वारा किए गए अपकृत्य हेतु उत्तरदायी है, बशर्ते वह अपकृत्य इतना अलग और स्वतंत्र हो कि उसे केवल अनुबंध के उल्लंघन के रूप में न देखा जाए।
5. महत्व - 
∆ सुरक्षा और जिम्मेदारी का संतुलन - यह मामला नाबालिगों को उनके गलत कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाता है।
∆ बालिंग्स बनाम हॉकिन्स व Jennings v. Rundall से तुलना - केस में नाबालिग ने किराए के घोड़े को बहुत तेज चलाकर थका दिया, उसे जिम्मेदार नहीं माना गया क्योंकि वह केवल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन था। लेकिन बर्नार्ड बनाम हैगिस में, घोड़े से कूद लगवाना बिल्कुल अलग और खतरनाक कार्य था।
निष्कर्ष - यदि कोई नाबालिग अनुबंध की आड़ में किसी की संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है, तो वह कानून की नजर में बच नहीं सकता।
केस संख्या 12. वैगन माउंड केस (Overseas Tankship Ltd v. Morts Dock & Engineering Co., 1961) -
केस नुकसान की दूरस्थता के सिद्धांत को निर्धारित करने वाला आधुनिक केस है।
इस केस ने पुराने पॉलमिस केस के नियम को पलट दिया और तर्कसंगत दूरदर्शिता का नया पैमाना स्थापित किया।
1. मामले के तथ्य - 
∆ प्रतिवादी - वैगन माउंड नामक जहाज के मालिक।
वादी - मॉर्ट्स डॉक कंपनी, जो सिडनी बंदरगाह पर जहाज मरम्मत (Wharf) का काम करती थी।
∆ घटना - वैगन माउंड जहाज से लापरवाही के कारण भारी मात्रा में तेल समुद्र के पानी में बह गया। हवा और लहरों के साथ यह तेल बहकर वादी के डॉक (बंदरगाह) तक पहुँचा, जहाँ वेल्डिंग का काम चल रहा था।
∆ तर्क - वादी ने वेल्डिंग का काम रोक दिया और विशेषज्ञों से पूछा। विशेषज्ञों ने कहा कि पानी पर तैरते तेल में आग लगना असंभव है। इसलिए काम फिर शुरू कर दिया गया।
∆ हादसा - दो दिन बाद, वेल्डिंग की एक चिंगारी पानी में पड़े कपड़े के टुकड़े पर पड़ी, जिससे कपड़े ने आग पकड़ ली और फिर पूरे तेल में आग लग गई। इससे वादी का पूरा डॉक जलकर खाक हो गया।
2. कानूनी मुद्दा - अदालत के सामने सवाल यह था कि क्या प्रतिवादी उस नुकसान के लिए जिम्मेदार है जिसे एक सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति पहले से नहीं देख सकता था?
3. प्रीवी काउंसिल का निर्णय - अदालत ने वादी का दावा खारिज कर दिया और प्रतिवादी को आग से हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं माना। न्यायालय ने निर्णय दिया कि - 
प्रतिवादी केवल उसी नुकसान के लिए जिम्मेदार है जिसे एक तर्कसंगत व्यक्ति पहले से देख सकता था।
 तेल का फैलाना लापरवाही थी, लेकिन पानी पर तैरते तेल में आग लग जाना उस समय के वैज्ञानिक ज्ञान के अनुसार तर्कसंगत रूप से दूरदर्शी नहीं था।
तेल फैलने से होने वाले मामूली प्रदूषण के लिए तो वे जिम्मेदार हो सकते थे, पर आग से होने वाली तबाही के लिए नहीं।
4. स्थापित सिद्धांत  तर्कसंगत दूरदर्शिता - इस केस से पॉलमिस टेस्ट (जो कहता है कि प्रत्यक्ष नुकसान चाहे कितना भी अजीब हो, मुआवजा देना होगा) को खत्म कर दिया गया और नया नियम आया - 
किसी व्यक्ति को केवल उन्हीं परिणामों के लिए दोषी ठहराया जा सकता है जो उसके कार्य से होने वाले संभावित खतरों के दायरे में हों।
निष्कर्ष - यह केस कानून को तर्कसंगत बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति पर अनपेक्षित और अजीबोगरीब दुर्घटनाओं के लिए भारी आर्थिक बोझ न डाला जाए, जिन्हें सोचना भी नामुमकिन था।
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समाज अपराध और विकृत मानसिकता
एक विचार - जिस प्रकार से पर्यावरण, जल, भूमि और ध्वनि प्रदूषण होते हैं उसी प्रकार से मानसिकता भी प्रदूषित होती है। दूषित मानसिकता समाज के लिए वैसे ही हानिकारक है जैसे जल प्रदूषण मछली के लिए हानिकारक है। यह सत्य है कि हर प्रकार के प्रदूषण के लिए कोई ना कोई तथ्य, पदार्थ या कृत्य कारण होता है। असामाजिक मानसिकता अपराध के घटित होने का कारण होती है।
समाज में घटित अपराधों का विकृत मानसिकता (Abnormal Mentality) का गहरा संबंध है। अपराध मात्र कानूनी उल्लंघन नहीं है, अपितु यह सामाजिक संरचना और व्यक्तिगत मनोविज्ञान के बीच के टकराव का परिणाम है।
यहाँ हम इस विषय को विस्तृत विश्लेषण के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे - 
1. विकृत मानसिकता क्या है?
विकृत मानसिकता का अर्थ ऐसी मानसिक स्थिति से है जो समाज के स्थापित नैतिक और कानूनी मानकों से अलग होती है। इसमें व्यक्ति की सोचने, समझने और व्यवहार करने की शक्ति असामान्य हो जाती है।
विकृत मानसिकता के पहलू  - 
I. सहानुभूति का अभाव - अपराधी अक्सर दूसरों के दर्द को महसूस नहीं कर पाते।
II. आवेगशीलता (Impulsivity) - बिना परिणाम की सोचे तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं।
III. सामाजिक अलगाव - अपराधी स्वयं को समाज से कटा हुआ अनुभव करता है जिससे उसके मन में आक्रोश पैदा होता है।
2. समाज और अपराध का संबंध - 
समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम के अनुसार, अपराध समाज का अभिन्न अंग है, परंतु जब इसकी दर बढ़ जाती है, तो यह सामाजिक असंतुलन का संकेत देता है। समाज में अपराध बढ़ने के कारण - 
I. सामाजिक आर्थिक स्थिति - गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव व्यक्ति को हताशा की ओर धकेलता है। अभाव की अधिकता कभी-कभी अपराध को जन्म देती है।
II. पारिवारिक वातावरण - बचपन में देखा गया घरेलू शोषण या माता-पिता का हिंसक व्यवहार बच्चों में विकृत मानसिकता के बीज बो सकता है। माता - पिता का असंतुलित प्रेम भी अलगाव को जन्म दे सकता है जो आगे चलकर बच्चे को अपराधी बना सकता है।
III. सांस्कृतिक प्रभाव - फिल्मों और सोशल मीडिया पर हिंसा का महिमामंडन भी युवा दिमाग को प्रभावित करता है। आजकल स्वैग का प्रचलन बढ़ गया है। बच्चे अपराधियों के प्रोफाइल को देखकर उनके जैसे बनने के प्रयास करते हैं जो आगे चलकर उन्हें अपराध की अंधेरी दुनिया में धकेल देता है।
3. अपराध के पीछे मनोवैज्ञानिक कारण - अपराध विज्ञान (Criminology) में अपराधी की मानसिकता को समझने के लिए तीन प्रमुख सिद्धांत देखे जाते हैं - 
I. मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) - दमित इच्छाएं और बचपन के अनसुलझे संघर्ष।
II. व्यवहारवाद (Behaviorism) - व्यक्ति अपने परिवेश और साथियों से अपराध करना सीखता है।
III. संज्ञानात्मक (Cognitive) - अपराधी द्वारा गलत तर्क देना कि "उसका अपराध सही है" या "पीड़ित इसी के लायक था।"
इसे आसानी से समझने के लिए हम फिल्म के हीरो द्वारा की गई चोरी/डाके के कृत्य को न्यायपूर्ण कार्य मान लेते हैं। हीरो द्वारा विलन की हत्या (कानून को हाथ में लेना) को न्याय की संज्ञा दे देते हैं।
4. मानसिक विकृति का समाधान और सुधार के उपाय - जेल, फांसी या अन्य सजा से अपराध खत्म नहीं होता, इस हेतु मानसिक और सामाजिक सुधार की आवश्यकता है - 
I. काउंसलिंग और पुनर्वास - जेलों को केवल सजा का केंद्र नहीं, बल्कि सुधार गृह (Reform Homes) बनाया जाना चाहिए।
II. नैतिक शिक्षा - घर, समुदाय और स्कूल में बचपन से ही नैतिक मूल्यों और संवेदनशीलता की शिक्षा देना।
III. मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता - समाज में मानसिक रोगों को कलंक न मानकर उनका सही समय पर इलाज कराना।
निष्कर्ष - स्वस्थ समाज का निर्माण तभी संभव है जब हम अपराध के बजाय अपराधी की मानसिकता के मूल कारणों पर विचार कर उत्पन्न कारणों को समाप्त करने का प्रयास करें। जैसा कि प्रसिद्ध कथन है - "अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं", इसका अर्थ यही है कि हम उस विकृति को सुधारने का प्रयास करें जिसने  अपराध को जन्म दिया।
अपराध और विकृत मानसिकता को गहराई से समझने हेतु हमें अपराध विज्ञान  और मनोविज्ञान के उन पहलुओं को देखना होगा जहाँ से हिंसा का जन्म होता है।
यहां हम प्रसिद्ध केस स्टडीज और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की चर्चा करेंगे - 
केस स्टडी -
I. मानसिक विकार - सीरियल किलर्स की मानसिकता के संबंध में 
मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि क्रूर अपराध करने वाले अधिकांश अपराधियों में व्यक्तित्व विकार (Personality Disorder) होता है।
II. सहानुभूति का अभाव (Lack of Empathy) - ऐसे अपराधी पीड़ित के दर्द को महसूस नहीं करते। उनके लिए इंसान एक वस्तु के समान होता है। सीरियल किलर्स अपराध कर मानसिक रूप से तृप्ति का अनुभव करते हैं।
III. बचपन का आघात (Childhood Trauma) - अध्ययनों के अनुसार कई खूंखार अपराधियों का बचपन में घोर शारीरिक या मानसिक शोषण हुआ।
उदाहरण - भारत में दिल्ली के निठारी कांड को दुनिया के कुख्यात सीरियल किलर्स केस के रूप में जाना जाता है। किलर समाज के सामने बहुत ही सामान्य और सीधे दिखते थे परन्तु एकांत में उनकी विकृत मानसिकता हावी हो जाती थी।
2. मैकडोनाल्ड ट्रायड (MacDonald Triad) - यह अपराध विज्ञान का एक सिद्धांत है जिसमें तीन ऐसे लक्षण बताए गए हैं जो अधिकांशतः बचपन में देखे जाते हैं, यही कारण भविष्य में साधारण व्यक्ति के हिंसक अपराधी बनने की संभावना को दर्शाते हैं - 
I. पशु क्रूरता - जानवरों को बिना कारण सताना या मारना।
II. अग्नि-उन्माद (Pyromania) - बिना वजह चीजों में आग लगाना।
III. रात में बिस्तर गीला करना - बालक की एक निश्चित उम्र के बाद भी यदि वह बिस्तर गिला करता है तो समस्या हो सकती है क्योंकि बड़ों का रात में बिस्तर गिला करना अत्यधिक मानसिक तनाव का संकेत है और यही तनाव अपराध का जनक है।
3. भारत में कानून और मानसिक स्थिति (IPC Section 84) - भारत में कानून विकृत मानसिकता को सजा में रियायत का आधार मानता है, लेकिन इसकी शर्तें बहुत सख्त हैं - 
I. धारा 84 (IPC/BNS) - यदि कोई व्यक्ति अपराध करते समय मानसिक रूप से इतना अस्वस्थ था कि वह अपने कृत्य की प्रकृति (Nature) कि यह उक्त कृत्य गलत या अवैध है, यह समझने में असमर्थ है तो उसे दंडित नहीं किया जा सकता।
II. कानूनी बनाम चिकित्सा पागलपन - कानून हर मानसिक बीमार को अपराधी नहीं मानता। कोर्ट केवल कानूनी पागलपन (Legal Insanity) को स्वीकार करता है, जहाँ व्यक्ति को सही-गलत का बिल्कुल बोध न हो।
4. अपराध के जन्म में समाज की भूमिका (लेबलिंग थ्योरी) - समाजशास्त्र में एक Labeling Theory है। जब समाज किसी व्यक्ति को एक बार अपराधी का टैग (Label) लगा देता है, तो वह व्यक्ति चाहकर भी मुख्यधारा में नहीं लौट पाता। इससे उसकी मानसिकता और अधिक विकृत हो जाती है और वह बड़े अपराधों की ओर बढ़ जाता है।
निष्कर्ष और सुधार - विकृत मानसिकता को रोकने के लिए समाज में मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर खुलकर बात होना जरूरी है। जेलों को यातना गृह के स्थान पर सुधार गृह बनाया जाना चाहिए ताकि अपराधी की सोच को बदला जा सके।
समाज में सभी को सम्मान से जीवन का अधिकार है, अपराधी भी समाज का ही अंग है, यदि हम समाज में अपराधिक वातारण को बदलकर परिस्थितिजन्य घटनाओं का शमन कर दें तो निश्चित रूप से अपराध में कमी आएगी। आवश्यकता है समाज को इस ओर एक कदम ओर आगे बढ़ने की।
शमशेर भालू खां
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नोट्स - LLB सेमेस्टर प्रथम 
द्वारा - शमशेर भालू खां 
छात्र - LLB प्रथम सेमेस्टर 2025
296 सदफ आशियाना, कायमखानी बस्ती, सहजूसर (चूरू)
9587243963
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संदर्भ एवं स्त्रोत - 
I. पुस्तक - अपकृत्य विधि, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एवं मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत क्षतिपूर्ति - लेखक -एम. एल. शुक्ला 
प्रकाशक - सेंट्रल लॉ एजेंसी, प्रयागराज 
II. Dr. - व्याख्याता राजकीय लॉ कॉलेज चूरू
III. एडवोकेट अंजलि 
IV. भारत का संविधान 
V. विभिन्न आलेख एवं पत्रिकाएं 
VI. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, 
VII. गूगल जैमिनाई 
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बासनपीर मामले की हकीकत

इस ब्लॉग और मेरी अन्य व्यक्ति से हुई बातचीत पर मंहत प्रतापपुरी का बयान जीवनपाल सिंह भाटी की आवाज में सत्य घटना सद्भावना रैली बासनपीर जूनी पूर्व मंत्री सालेह मुहम्मद का बयान बासनपीर जूनी के सत्य एवं जैसाने की अपनायत की पड़ताल -  पिछले कुछ दिनों से जैसलमेर के बासन पीर इलाके का मामला सामने रहा है। कहा जा रहा है कि पूर्व राज परिवार की जमीन पर बासनपीर गांव के लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है। नजदीक से पड़ताल करने पर हकीकत कुछ ओर निकली। जिसके कुछ तथ्य निम्नानुसार हैं - रियासत काल में सन 1662 में बीकानेर और जैसलमेर रियासत के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में जैसलमेर सेना के दो वीर योद्धा सोढ़ा जी और पालीवाल जी शहीद हो गए। युद्ध के बाद बासन पीर (युद्ध स्थल) तालाब की तलहटी पर शहीदों की स्मृति में छतरियां बनवाई हैं। जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाके में 84 गांव पालीवाल ब्राह्मणों ने बसाए जिनमें से एक गांव बासनपीर जूनी भी था। पालीवाल ब्राह्मण समृद्ध किसान और व्यापारी थे, रियासत के दीवान सालिम सिंह से अनबन के कारण सन् 1825 में सभी गांव खाली करने को मजबूर हो गए। पालीवाल...

✍️कायम वंश और कायमखानी सिलसिला सामान्य इतिहास की टूटी कड़ियाँ

कायमखानी समाज कुछ कही कुछ अनकही👇 - शमशेर भालू खां  अनुक्रमणिका -  01. राजपूत समाज एवं चौहान वंश सामान्य परिचय 02. कायम वंश और कायमखानी 03. कायमखानी कौन एक बहस 04. पुस्तक समीक्षा - कायम रासो  05. कायम वंश गोत्र एवं रियासतें 06. चायल वंश रियासतें एवं गोत्र 07. जोईया वंश स्थापना एवं इतिहास 08. मोयल वंश का इतिहास 09. खोखर वंश का परिचय 10. टाक वंश का इतिहास एवं परिचय  11. नारू वंश का इतिहास 12 जाटू तंवर वंश का इतिहास 13. 14.भाटी वंश का इतिहास 15 सरखेल वंश का इतिहास  16. सर्वा वंश का इतिहास 17. बेहलीम वंश का इतिहास  18. चावड़ा वंश का इतिहास 19. राठौड़ वंश का इतिहास  20. चौहान वंश का इतिहास  21. कायमखानी समाज वर्तमान स्थिति 22. आभार, संदर्भ एवं स्त्रोत कायम वंश और कायमखानी समाज टूटी हुई कड़ियां दादा नवाब (वली अल्लाह) हजरत कायम खां  साहब   नारनौल का कायमखानीयों का महल     नारनौल में कायमखानियों का किला मकबरा नवाब कायम खा साहब हांसी,हरियाणा   ...

✅इस्लाम धर्म में व्यापार, ब्याज एवं मुनाफा

अरब व्यापारी हर देश में हर देश का हर एक सामान खरीदते और बेचते थे। अरब में व्यापार -  किसी भी क्षेत्र में सभी सामान उपलब्ध नहीं हो सकते। हर क्षेत्र का किसी ना किसी सामान के उत्पादन में विशेष स्थान होता है। उपलब्ध सामग्री का उत्पादन, भंडारण, परिवहन एवं विपणन ही व्यापार कहलाता है। क्षेत्र अनुसार इसके अलग - अलग नाम हो सकते हैं। इस्लाम धर्म का उदय अरब में हुआ। अरब क्षेत्र में तीन प्रकार की जनजातियां रहती थीं। बायदा - यमनी  अराबा - कहतानू (मिस्र) मुस्ता अराबा - अरबी (इस्माइली) यह जनजातियां खेती, व्यापार एवं अन्य कार्य करती थीं। हजारों सालों से इनका व्यापार रोम, चीन एवं अफ्रीका के देशों से रहा। अरब व्यापारी पश्चिम में अटलांटिक महासागर से लेकर पूर्व में अरब सागर तक, अरब प्रायद्वीप तक व्यापार करते थे। अरब नील से ह्यांग्हो तक व्यापार करते थे। अरब प्रायद्वीप कई व्यापार मार्गों के केंद्र में स्थित था, जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया, भूमध्य सागर और मिस्र शामिल थे। यहां मुख्य सभ्यताएं रहीं -  - सुमेरियन एवं बेबीलोन  सभ्यता (मेसोपोटामिया/इराक) (दजला फरात) की सभ्यता। - फ...