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भारत का संविधान इतिहास एवं पृष्ठभूमि

अध्याय - 01 भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - 
The CONSTITUTION OF INDIA                 भारत का संविधान

    भारतीय संविधान की प्रस्तावना

संविधान निर्माण का इतिहास एवं पृथभूमि :- 
भारतीय संविधान निर्माण से पूर्व के ब्रिटिश चार्टर एवं अधिनियम - 
किसी भी देश की राजनैतिक व्यवस्था की नींव उसका संविधान है जो लिखित या अलिखित हो सकता है। संविधान द्वारा शासन की प्रकृति, दंड प्रक्रिया एवं नागरिक आचरण का निर्धारण किया जाता है। संविधान के ही द्वारा राज्य की जनता पर राज्य एवं कानून का शासन होता है। सरकार (राज व्यवस्था) संचालन हेतु विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका की स्थापना, शक्तियां कार्यों का निर्धारण करता है। शासन एवं नागरिकों के अधिकार एवं दायित्वों की परिभाषा तय करते हुए सत्ता व जनता के मध्य पारस्परिक संबंधों का विरोपण करता है। संविधान किसी देश की विधि का आधार है जो राजव्यवस्था के सिद्धातों को निर्धारित करता है। किसी राज्य के संविधान का स्वरूप उसके निर्माताओं के आदर्श, नैतिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक चेतना का दर्पण होता है। नागरिकों की नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक प्रकृति, मान्यता, विश्वास पर आधारित होता है।
भारतीय संविधान का निर्माण संविधान सभा जो कैबिनेट मिशन के अंतर्गत गठित हुई, द्वारा वर्ष 1946 को किया गया।
यह संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकार करने के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत में लागू किया गया।
इससे पहले राजशाही, धार्मिक नियम व मान्यताएं, रूढ़ि एवं प्रथाएं ही कानून थीं।
महाराजा गंगा सिंह का यह वाक्य इसका द्योतक है "कानून गंगा सिंह के गेडीए में है।"

भारत गणराज्य के तत्कालीन संविधान में - 
कुल अध्याय - 22
कुल अनुच्‍छेद - 395
कुल अनुसूचियां - 9
वर्तमान में - 
अध्याय - 25
अनुच्छेद - 448
अनुसूचियां - 12

संविधान निर्माण से पूर्व के विभिन्न कानून जिन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण की नींव के रूप में काम किया -

ईस्ट इंडिया कंपनी के समय के चार्टर एवं अधिनियम - 

01. रेगुलेटिंग एक्ट 1773 : - 
भारतीय क्षेत्र में यह पहला कानून था जिसके अनुसार सत्ता का संचालय किया जाना तय हुआ। इससे पूर्व राजा, नवाब या बादशाह के या संबंधित धर्म के अनुसार कानून मानते थे। कोई परिष्कृत नियम एवं कानून भारत में संचालित नहीं थे।
अब बंगाल का शासन गवर्नर जनरल तथा चार सदस्यीय परिषद् में निहित कर दिया गया। परिषद में निर्णय बहुमत द्वारा लिए जाने की भी व्यवस्था की गई। इस अधिनियम द्वारा प्रशासक मंडल में वारेन हेस्टिंग्स (गवर्नर जनरल) क्लैवरिंग, मॉनसन, बरवैल तथा फिलिप फ्रांसिस परिषद् के सदस्य नियुक्त किए गए जिनका कार्यकाल पांच वर्ष रखा गया। निदेशक बोर्ड की सिफारिश पर केवल ब्रिटिश सम्राट के आदेश से इन्हें निर्धारित अवधि से पहले हटाया सकता था।
(01.) मद्रास व बम्बई की प्रेसीडेंसियों को बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन कर बंगाल के गवर्नर जनरल को तीनों प्रेसीडेन्सियों का गवर्नर जनरल बनाया गया। वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के प्रथम गवर्नर जनरल बने।
(02.) परिषद के सहयोग से गवर्नर जनरल को भारतीय शासनार्थ कानून बना कर लागू करने के अधिकार दिए गए जिसके लिए निदेशक बोर्ड की पूर्व अनुमति ज़रूरी थी।
(03.) अधिनियम द्वारा बंगाल (कलकत्ता) में उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई (सर एलिजा इम्पे प्रथम मुख्य न्यायाधीश) जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश व तीन अन्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए। इस कोर्ट को दीवानी, फौजदारी, जल सेना एवं धार्मिक मामलों में व्यापक अधिकार दिए गए। न्यायालय को यह भी अधिकार था कि वह कम्पनी तथा सम्राट की सेवा में लगे व्यक्तियों के विरुद्ध मामले की सुनवाई कर सकता था। इस न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध इंग्लैंड स्थित प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी।
(04.) संचालक मंडल का कार्यकाल चार वर्ष कर दिया गया, कंपनी में 500 पौंड के स्थान पर 1000 पौंड के अंशधारियों को संचालक चुनने का अधिकार दिया गया।
इस प्रकार 1773 के एक्ट के द्वारा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों में ब्रिटिश संसद का हस्तक्षेप व नियंत्रण प्रारंभ हुआ। पहली बार कम्पनी के शासन हेतु लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया।

02. कलकत्ता सरकार संशोधित अधिनियम 1781 :- 
इस अधिनियम के द्वारा कलकत्ता सरकार को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के लिए भी कानून बनाने का अधिकार दिया गया।
(01.) इस अधिनियम द्वारा सर्वोच्च न्यायालय पर यह रोक लगा दी गई कि वह कम्पनी के कर्मचारियों के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकता, जो उन्होंने एक सरकारी अधिकारी की हैसियत से किया हो।
(02.) कानून बनाते व उसका क्रियान्वयन करते समय भारतीयों के सामाजिक तथा धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करने के निर्देश दिए गए।

03. पिट्स इंडिया एक्ट 1784 :- 
यह अधिनियम ईस्ट इंडिया कम्पनी पर ब्रिटिश क्राउन का अधिकारिक नियंत्रण स्थापित करने एवं भारत में कम्पनी की गिरती साख को बचाने के उद्देश्य से पारित किया गया।
(01.) गवर्नर जनरल परिषद की संख्या 4 से घटा कर 03 की गई। परिषद को युद्ध, संधि, राजस्व, सैन्य शक्ति, देशी रियासतों आदि के अधीक्षण की शक्ति प्रदान की गई।
(03.) कम्पनी द्वारा अधिकृत क्षेत्र को पहली बार ब्रिटिश अधिकृत प्रदेश कहा गया।
(03.) गवर्नर जनरल को देशी राजाओं से युद्ध तथा संधि से पूर्व कम्पनी के संचालकों से स्वीकृति लेना आवश्यक कर दिया गया।
(04) इंग्लैंड में 6 आयुक्तों (कमिश्नरों) के नियंत्रक बोर्ड की स्थापना कर उसे भारत में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्र पर पूरा अधिकार दिया गया। इसे ‘बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल’ का नाम दिया गया जिसके सदस्यों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जानी तय हुआ। बोर्ड ऑफ कंट्रोल के 6 सदस्यों में
01.ब्रिटिश वित्त मंत्री 
02. ब्रिटिश विदेश सचिव
03.  चार सदस्य (सम्राट द्वारा प्रिवी कौंसिल के सदस्यों में से उनके द्वारा चयनित को चुना जाता था।
(05.) बोर्ड ऑफ कंट्रोल (नियंत्रक मंडल) को कम्पनी के भारत सरकार के नाम आदेशों एवं निर्देशों को स्वीकृत अथवा अस्वीकृत करने का अधिकार प्रदान किया गया।
(06.) प्रांतीय परिषद के सदस्यों की संख्या 4 से घटा कर 3 कर दी गई। प्रांतीय शासन को केन्द्रीय आदेशों का अनुपालन आवश्यक कर दिया गया (बम्बई तथा मद्रास के गवर्नर को पूरी तरह से गवर्नर जनरल के अधीन कर दिए गए।
(07.) कम्पनी के कर्मचारियों पर उपहार लेने पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया गया।
(08.) भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों के संबंध में निर्णयों हेतु इंग्लैंड में कोर्ट की स्थापना की गई।
(09.) ईस्ट इंडिया कंपनी के चाय और अफीम के व्यापारिक एकाधिकार को छोड़कर अन्य व्यापारी एकाधिकार समाप्त हो गए।

04. 1786 का अधिनियम 1786 :- 
इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में परिषद के निर्णयों को रद्द करने तथा खुद के निर्णय लागू करने का अधिकार दिया गया। गवर्नर जनरल को मुख्य सेनापति की शक्तियां प्रदान की गई।

05. 1793 का राजपत्र (chartar) :- 
ईस्ट इंडिया कम्पनी के कार्यों एवं संगठन में सुधार हेतु एक चार्टर (राजपत्र) जारी किया गया। इसमें पूर्व के अधिनियमों के समस्त महत्वपूर्ण प्रावधानों को सम्मिलित किया गया।
चार्टर की प्रमुख विशेषताएं - 
01. कम्पनी के व्यापारिक अधिकार आगामी 20 वर्षों तक बढ़ा दिए गए।
02. भारत में शासकों के व्यक्तिगत नियमों के स्थान पर ब्रिटिश सरकार के अधीन लिखित नियम - कानूनों द्वारा शासन की नींव रखी गई जिनकी व्याख्या न्यायालय द्वारा किया जाना तय हुआ।
03. गवर्नर जनरल एवं परिषदों की सदस्यता की योग्यता हेतु सदस्य को न्यूनतम 12 वर्षों तक भारत में अधिवास का अनुभव होना आवश्यक किया गया।
04. नियंत्रक मंडल के सदस्यों का वेतन भारतीय कोष से दिया जाना निर्धारित हुआ।

06. 1813 का राजपत्र (chartar) 1813 :-
ईस्ट इंडिया कम्पनी के एकाधिकार को समाप्त करने हेतु सन 1813 का चार्टर अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया जिसका उद्देश्य था - 
01. ईसाई मिशनरियों की भारत में धार्मिक सुविधाओं की मांग को पूरा करना।
02. लॉर्ड वेलेजली की भारत में आक्रामक नीति को विधाई शक्ति प्रदान करना।
03. कम्पनी की कमजोर आर्थिक स्थिति में सुधार करना।
इस प्रमुख प्रावधान निम्न थे - 
. ईस्ट इंडिया कम्पनी का भारतीय व्यापार पर एकाधिकार समाप्त कर दिया गया, यद्यपि उसका चीन से व्यापार के साथ चाय के व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।
. ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुमति दी गई।
. भारतीयों की शिक्षा के लिए सरकार को प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने के निर्देश दिए गए।
. कम्पनी को अगले 20 वर्षों तक भारत के ब्रिटिश प्रदेशों के राजस्व पर नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया।
. नियंत्रण बोर्ड की शक्तियों की व्याख्या करते हुए उसका विस्तार किया गया।

07. 1833 का राजपत्र - 
सन 1813 के चार्टर के पश्चात भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के साम्राज्य का बड़ा विस्तार हुआ। महाराष्ट्र, मध्य भारत, पंजाब, सिन्ध, ग्वालियर, इंदौर आदि पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हुआ। इस प्रभुत्व को स्थायित्व प्रदान करने हेतु 1833 का चार्टर जारी किया गया जिसके निम्न मुख्य प्रावधान निम्नानुसार थे - 
01. कम्पनी के चाय एवं चीन के साथ व्यापार के एकाधिकार को समाप्त करते हुए उसे पूर्णतः प्रशासनिक और राजनैतिक संस्था बना दिया गया।
02. बंगाल के गवर्नर जनरल को सम्पूर्ण भारत का गवर्नर जनरल घोषित किया गया। इस प्रकार से सम्पूर्ण भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक बने।
03. भारत के प्रदेशों पर ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिक तथा असैनिक शासन के निरीक्षण और नियंत्रण का अधिकार भारत के गवर्नर जनरल को दिया गया। भारत के गवर्नर जनरल की परिषद् द्वारा पारित कानूनों को अधिनियम की संज्ञा दी गई।
04. विधि के संहिताकरण हेतु आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।
05. सम्पूर्ण भारत में दास-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया। फलस्वरूप 1843 में भारत में दास-प्रथा के समाप्ति की घोषणा हुई।
06. इस अधिनियम द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया कि कम्पनी के प्रदेशों में रहने वाले किसी भी भारतीय को धर्म, वंश, रंग या जन्म स्थान के आधार पर कम्पनी के किसी पद से जिसके लिए वह योग्य हो, वंचित नहीं किया जा सकेगा।
08. परिषद सहित गवर्नर जनरल को पूरे भारत हेतु कानून बनाने के अधिकार दिए गए। मद्रास-बम्बई की परिषदों के कानून बनाने के अधिकार समाप्त कर दिये गए।
यह अधिनियम भारत में केन्द्रीकरण (संघीय सरकार) के प्रारंभ की नींव बना। इसकी सर्वाधिक उत्कृष्टता विधियों को संहिताबद्ध करने हेतु आयोग का गठन थी। इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले को नियुक्त किया गया।

08. 1853 का राजपत्र (chartar) - 
1853 का राजपत्र ब्रिटिश भारत के शासन के इतिहास का अंतिम चार्टर एक्ट था। यह राजपत्र भारतीयों की ओर से कम्पनी के शासन की समाप्ति की मांग तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की रिपोर्ट पर आधारित था। 
इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार थीं - 
01. ब्रिटिश संसद को किसी भी समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत में शासन को समाप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।
02. कार्यकारिणी परिषद के कानून सदस्य को परिषद का पूर्ण सदस्य का दर्जा प्रदान किया गया।
03. बंगाल हेतु पृथक से गवर्नर नियुक्त किया गया।
04. गवर्नर जनरल को अपनी परिषद के उपाध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार दिया गया।
05. विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से अलग किया गया।
06. निदेशक मंडल के सदस्यों की संख्या 24 से घटा कर 18 कर दी गई।
07. कम्पनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का प्रावधान किया गया।
08. भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने हेतु इंग्लैंड में विधि आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।
महारानी (ब्रिटिश क्राउन) के शासन काल के शासन काल में संवैधानिक विकास

09. 1858 का अधिनियम (Act.) - 
1853 के चार्टर में ईस्ट इंडिया कम्पनी को शासन हेतु किसी निश्चित अवधि के लिए अधिकृत नहीं किया गया था, अतः किसी भी समय सत्ता का हस्तांतरण ब्रिटिश क्राउन को संसद के माध्यम हस्तांतरित किया जा सकता था। 1857 की क्रांति से शासन के प्रति असंतोष प्रकट हुआ जिससे संसद को ईस्ट इंडिया कम्पनी से शासन छीनने का आधार मिला। ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा हेतु ब्रिटिश संसद ने कई अधिनियम पारित किये जो भारत में ब्रिटिश प्रशासन का आधार बने। 
1858 के अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नानुसार थे - 
01. भारत में सत्ता ईस्ट इंडिया कम्पनी के स्थान प ब्रिटिश संसद को हस्तांतरित।
02. शासन का संचालन ब्रिटिश साम्राज्ञी राज्य सचिव के माध्यम से किया जाना शुरू हुआ। राज्य सचिव की सहायता हेतु 15 सदस्यीय भारत परिषद का गठन किया गया। अब भारत के शासन से संबंधित सभी कानूनों एवं कार्यवाहियों पर भारत सचिव की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गयी।
03. भारत के गवर्नर जनरल का नाम ‘वायसराय’ (क्राउन का प्रतिनिधि) कर दिया गया तथा उसे भारत सचिव की आज्ञा के अनुसार कार्य करने हेतु बाध्यकारी किया गया। इस प्रकार भारत के प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग बने।
04. ब्रिटिश संसद में भारत मंत्री को वायसराय से गुप्त पत्र व्यवहार तथा ब्रिटिश संसद में प्रतिवर्ष भारतीय बजट पेश करने का अधिकार दिया गया।
05. ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेवा को ब्रिटिश शासन के अधीन कर दिया गया।
1 नवम्बर, 1858 को ब्रिटेन की विक्टोरिया ने भारत के संबंध में एक महत्वपूर्ण नीतिगत घोषणा की। 
इस घोषणा की महत्वपूर्ण बातें निम्नानुसार थीं - 
. भारतीय प्रजा को साम्राज्य के अन्य भागों में रहने वाली ब्रिटिश प्रजा के समान माना जायेगा।
. भारतीय लोगों के साथ लोक सेवाओं में अपनी शिक्षा, योग्यता तथा विश्वसनीयता के आधार पर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भर्ती में भेदभाव नहीं किया जायेगा।
. भारत के लोगों के भौतिक एवं नैतिक उन्नति के प्रयास किए जाएंगे।
10. भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1861 - 
1861 का भारतीय परिषद अधिनियम भारत के संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और युगांतकारी घटना है। 
यह दो मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है - 
. इस अधिनियम से गवर्नर जनरल को अपनी विस्तारित परिषद में भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को नामजद कर उन्हें विधायी कार्यों से संबद्ध करने का अधिकार दिया। 
. इस अधिनियम से गवर्नर जनरल की परिषद की विधायी शक्तियों का विकेन्द्रीकरण कर दिया, अर्थात बम्बई और मद्रास की सरकारों को भी विधायी शक्तिया प्रदान की गईं। 
इस अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधान -
. गवर्नर जनरल की विधान परिषद की संख्या में वृद्धि की गयी। अब इस परिषद में न्यूनतम 6 या अधिकतम 12 सदस्य हो सकते थे। उनमें कम-से-कम आधे सदस्यों का गैर-सरकारी होना आवश्यक था।
. गवर्नर जनरल को विधायी कार्यों हेतु नये प्रांत के निर्माण, नव-निर्मित प्रांत में गवर्नर/लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त करने का अधिकार दिया गया।
. गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया। 1865 के इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को प्रेसीडेन्सियों तथा प्रांतों की सीमाओं को उद्घोषणा द्वारा नियत करने या उनमें परिवर्तन करने का अधिकार दिया गया। इसी तरह 1869 के अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विदेश में रहने वाले भारतीयों के संबंध में कानून बनाने का अधिकार दिया गया।

11. 1873 का अधिनियम
1873 के अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी को किसी भी समय भंग करने का प्रावधान किया गया। इसी के अनुसरण में 1 जनवरी, 1874 को ईस्ट इंडिया कम्पनी को भंग कर दिया गया।

12. शाही उपाधि अधिनियम 1876 - 
इस अधिनियम के अंतर्गत निम्नानुसार प्रावधान किए गए - 
. 28 अप्रैल 1876 को शाही घोषणा द्वारा महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया।
. औपचारिक रूप से भारत सरकार का ब्रिटिश सरकार के अधीन अन्तरण मान्य किया गया।
. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में छठे (sixth) सदस्य की नियुक्ति की गयी और लोक निर्माण का कार्य सौपा गया

13. भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1892 - 
सन 1861 के अधिनियम के अंतर्गत गैर-सरकारी सदस्य या तो बड़े जमींदार होते थे या अवकाश प्राप्त अधिकारी या भारत के राज परिवारों के सदस्य। प्रतिनिधित्व की आम आकांक्षा की पुष्टि इससे नहीं हो रही थी। इसी बीच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा आम जन के अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की जाती रही। यूरोपीय व्यापारियों की ओर से भी भारत सरकार को इंग्लैंड में स्थित इंडिया आफिस से अधिक स्वतंत्रता की मांग की जाती रही। सर जॉर्ज चिजनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी जिसके सुझावों का समावेश करते हुए सन 1892 का अधिनियम पारित किया गया। 
इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं - 
. इस अधिनियम द्वारा केन्द्रीय व प्रांतीय विधान परिषद् में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ते हुए उनके निर्वाचन प्रक्रिया का भी विशेष उल्लेख किया गया। यद्यपि इसके द्वारा सीमित चुनाव की ही व्यवस्था हुई, परन्तु भारत के मुख्य सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया।
. परिषद के अधिकारों में वृद्धि की गई। वार्षिक आय- व्यय का ब्योरा परिषद में प्रस्तुत करना आवश्यक किया गया। सदस्यों को कार्यपालिका के काम के बारे में प्रश्न पूछने के अधिकार दिए गए। इस अधिनियम के द्वारा विधायिका के सदस्यों के सीमित निर्वाचन की शुरूआत हुई। 
- खामियां 
इस अधिनियम में अनेक खामियां थी जिनके कारण भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसकी बार-बार आलोचना की। यह माना गया कि स्थानीय निकायों का चुनाव मंडल बनाना एक प्रकार से इनके द्वारा मनोनीत करना ही है। विधान मंडलों की शक्तियां भी काफी सीमित थीं। सदस्य अनुपूरक प्रश्न नहीं पूछ सकते थे। किसी प्रश्न का उत्तर देने से इंकार किया जा सकता था। इसके अलावा वर्गों का प्रतिनिधित्व भी पक्षपातपूर्ण था। बहरहाल भारत में अप्रत्यक्ष लोकतंत्र की नींव पड़ चुकी थी।

14. भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1909 - 
वर्ष 1892 का अधिनियम राष्ट्रवादियों को संतुष्ट नहीं कर सका, साथ ही ब्रिटिश राज विरोधी आंदोलन पर उग्रवादी नेताओं का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड मार्ले तथा भारत में वायसराय लॉर्ड मिन्टो दोनों ही सहमत थे कि कुछ सुधारों की आवश्यकता है। सर अरुण्डेल कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर फरवरी 1909 में नया अधिनियम पारित किया गया जिसे भारतीय परिषद् अधिनियम 1909 और मार्ले-मिन्टो सुधार के नाम से जाना गया। 
इस अधिनियम की विशेषताएं - 
. इस अधिनियम के द्वारा केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई। प्रांतीय विधान परिषदों में गैर-सरकारी बहुमत स्थापित किया गया।
. सभी निर्वाचित सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते थे। स्थानीय निकायों से निर्वाचन परिषद का गठन होता था। ये प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों का चुनाव करती थी। प्रांतीय विधान परिषद के सदस्य केन्द्रीय व्यवस्थापिका के सदस्यों का चुनाव करते थे।
. पहली बार पृथक निर्वाचन व्यवस्था का प्रारंभ किया गया। मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व को विशेष रियायतें दी गई। उन्हें केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया।
. गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में एक भारतीय सदस्य को नियुक्त करने की व्यवस्था की गई। प्रथम भारतीय सदस्य के रूप में सत्येन्द्र सिन्हा की नियुक्ति हुई।
. विधायिका के कार्यक्षेत्र में विस्तार किया गया। सदस्यों को बजट प्रस्ताव करने और जनहित के विषयों पर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। जिन विषयों को विधायिका के क्षेत्र से बाहर रखा गया था, वे थे सशस्त्र सेना, विदेश संबंध और देशी रियासतें।
- खामियां - 
इस अधिनियम की सबसे बड़ी त्रुटि यह रही कि पृथक अथवा साम्प्रदायिक आधार पर निर्वाचन की पद्धति लागू की गई। इसके अलावा जो चुनाव पद्धति अपनाई गई, वह इतनी अस्पष्ट थी कि जन प्रतिनिधित्व प्रणाली छननियों में से छानने की प्रक्रिया मात्र बन गई। संसदीय प्रणाली तो दे दी गई, परंतु उत्तरदायित्व नहीं दिया गया।

15. भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) 1919 - 
20 अगस्त, 1917 को तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया, मॉटेग्यु ने भारत के प्रति ब्रिटिश सरकार के इरादे स्पष्ट करते हुए हाउस ऑफ कॉमंस में ऐतिहासिक वक्तव्य दिया।
शासन की सभी शाखाओं में भारतीयों को शामिल करना और स्वायत्तशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास, जिससे ब्रिटिश भारत के अभिन्न अंग के रूप में उत्तरदायी सरकार की उत्तरोत्तर उपलब्धता हो सके।
इसी घोषणा के क्रियान्वयन हेतु मोंटफोर्ड रिपोर्ट-1918 प्रकाशित की गई, यही रिपोर्ट 1919 के अधिनियम का आधार बनी। 
अधिनियम के प्रावधान - 
इस एक्ट द्वारा तत्कालीन भारतीय संवैधानिक प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये - 
क. केन्द्रीय विधान परिषद का स्थान राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा विधान सभा (निम्न सदन) वाले द्विसदनीय विधान मंडल ने ले लिया। हालांकि, सदस्यों को नामजद करने की कुछ शक्ति बनाये रखी गई। फिर भी प्रत्येक सदन में निर्वाचित सदस्य का बहुमत होना सुनिश्चित किया गया।
ख. सदस्यों का चुनाव सीमांकित निर्वाचन क्षेत्रों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाना था। मताधिकार का विस्तार किया गया। निर्वाचक मंडल हेतु अर्हताएं 
01. धर्म
02. मूल निवास
03. संपत्ति
ग. आठ प्रमुख प्रांत जिन्हें गवर्नर का प्रांत कहा जाता था में द्वैध शासन पद्धति शुरू की गई। प्रांतीय सूची के विषयों को दो भागों में बांटा गया- 
01. सुरक्षित विषय
02. हस्तांतरित विषय।
(इसी आधार पर भारत के संविधान में केंद्रीय एवं राज्य सूची जोड़ी गई।)
सुरक्षित सूची के विषय गवर्नर के अधिकार क्षेत्र में थे और वह इन विभागों को अपने कार्यकारिणी की सहायता से देखता था। हस्तांतरित विषय भारतीय मंत्रियों के अधिकार में थे, जिनकी नियुक्ति भारतीय सदस्यों में से होती थी।
घ. अधिनियम के प्रारंभ के दस वर्ष बाद द्वैध शासन प्रणाली तथा संवैधानिक सुधारों के व्यावहारिक रूप की जांच हेतु व उत्तरदायी सरकार की प्रगति से संबंधित मामलों पर सिफारिश करने बाबत ब्रिटिश संसद द्वारा आयोग का गठन करने की व्यवस्था की गई, जिसके अनुसार 1927 में साईमन आयोग का गठन किया गया।
खामियां - 
1919 के इस अधिनियम में कई कमियां थीं जो उतरदायी सरकार की मांग को पूरा नहीं करती थी। इसके अलावा प्रांतीय विधान मंडल गवर्नर जनरल की स्वीकृति के बिना अनेक विषयों में विधेयक पर बहस नहीं कर सकते थे। सिद्धान्त रूप में केन्द्रीय विधान मंडल सम्पूर्ण क्षेत्र में कानून बनाने हेतु सर्वोच्च तथा सक्षम बना रहा। केन्द्र तथा प्रांतों के बीच शक्तियों के बंटवारे के बावजूद ब्रिटिश भारत का संविधान एकात्मक राज्य का संविधान ही बना रहा। प्रांतों में द्वैध शासन पूरी तरह विफल रहा। गवर्नर का पूर्ण वर्चस्व कायम रहा। वित्तीय शक्ति के अभाव में मंत्री अपनी नीतियों को प्रभावी रूप से कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। इसके अलावा मंत्री विधान मंडल के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं थे। वस्तुतः मंत्रियों को दो शक्तियों, विधान परिषद और गवर्नर जनरल को खुश रखना पड़ता।

16. साइमन कमिशन 1927 - 
1919 के अधिनियम की धारा 84 के अनुसार सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। अतः भारतीयों द्वारा इसका विरोध किया गया। आयोग की रिपोर्ट जून 1930 में प्रकाशित हुई जिसमें डोमिनियन (संप्रभुता) की मांग को ठुकरा दिया गया। इसके कारण कांग्रेस ने 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया।

17. नेहरू रिपोर्ट 1928 - 
कांग्रेस पार्टी ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, लॉर्ड वर्कनहेड की इस चुनौती को स्वीकार किया कि एक ऐसे संविधान की रचना की जाए, जो भारत के हर दल को स्वीकार हो। इस संदर्भ में 28 फरवरी, 1928 को दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया गया। संविधान का प्रारूप बनाने हेतु पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति गठित की गई। 
इस समिति द्वारा प्रस्तुत प्रारूप को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है जिसे लखनऊ के सर्वदलीय सम्मेलन में स्वीकार की गई। दिसम्बर 1928 में कलकत्ता के सर्वदलीय सम्मेलन में इस रिपोर्ट के साम्प्रदायिक समझौता में सभी समुदायों के संयुक्त निर्वाचक समूह के प्रस्ताव पर मोहम्मद अली जिन्ना ने गंभीर आपत्ति उठाई।

18. गोलमेज सम्मेलन 1930 एवं 1932 - 
साइमन आयोग की रिपोर्ट के प्रकाशित होने के पहले ही लॉर्ड इर्विन ने घोषणा की थी कि रिपोर्ट को गोलमेज सम्मेलन में विचार हेतु रखा जायेगा। 
01. प्रथम गोलमेज सम्मेलन - 
यह सम्मेलन 12 नवम्बर, 1930 को लंदन में आयोजित हुआ जो किसी निश्चित सहमति पर नहीं पहुंच सका। पहले सम्मेलन का कांग्रेस ने बहिष्कार किया।
02. दूसरा गोलमेज सम्मेलन - 
इस सम्मेलन में फरवरी 1931 के गांधी - इर्विन समझौते के फलस्वरूप दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की तरफ से गांधीजी ने भाग लिया। श्रीमती सरोजिनी नायडू और पंडित मदन मोहन मालवीय  ब्रिटिश सरकार के मनोनीत सदस्य के रूप में शामिल हुए। अन्य समुदायों प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया। इस सम्मेलन के पश्चात भारत में साम्प्रदायिक अधिनिर्णय (communal award) और पूना समझौता (डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का पूना पैक्ट) का आविर्भाव हुआ, जिनके द्वारा धार्मिक समूहों और हिन्दुओं के विभिन्न वर्ण समूहों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया गया।
कांग्रेस और अन्य राष्ट्रीय समूहों ने इन प्रावधानों का जमकर विरोध किया। 
03. तीसरा गोलमेज सम्मेलन - 
तीसरा और अंतिम गोलमेज सम्मेलन नवम्बर 1932 में आयोजित हुआ जिसके बाद एक श्वेतपत्र जारी किया गया। इस पर ब्रिटेन की संसद की संयुक्त प्रवर समिति ने विचार किया। इसके सुझावों के आधार पर भारत सरकार अधिनियम 1935 बनाया गया।

19. भारत सरकार अधिनियम (Govt. Of India Act) 1935 - 
1935 के भारत सरकार अधिनियम में 321 अनुच्छेद तथा 10 अनुसूचियां थीं। इस अधिनियम मुख्य प्रावधान- 
. इस अधिनियम में अखिल भारतीय संघ का प्रावधान किया गया, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों का शामिल होना अनिवार्य था, किन्तु देशी रियासतों का शामिल होना नरेशों की इच्छा पर निर्भर किया गया।
. संघ तथा केन्द्र के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया। विभिन्न विषयों की तीन सूचियां बनायी गयी- 
01. संघीय सूची
02. प्रांतीय सूची
03. समवर्ती सूची
. 1919 के अधिनियम द्वारा जो द्वैध शासन प्रांतों में लागू किया गया था, उसे केन्द्र में लागू किया गया। केन्द्रीय सरकार के विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया- 
01. संरक्षित विषय (गवर्नर जनरल का अधिकार क्षेत्र)
02. हस्तांतरित विषय (शासन मंत्रिपरिषद का अधिकार क्षेत्र)
. केन्द्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- 
01. राज्य परिषद (उच्च सदन)
02  केन्द्रीय विधान सभा (निम्न सदन)।
च. प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया।
. प्रांतीय विधायिका को प्रांतीय सूची तथा समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार दिया गया।
ज. प्रांतीय विधान मंडल को अनेक शक्तियां दी गयी। मंत्रिपरिषद को विधानमंडल के प्रति जिम्मेदार बना दिया गया और वह एक अविश्वास प्रस्ताव पारित कर उसे पदच्युत कर सकता था। विधान मंडल प्रश्नों तथा अनुपूरक प्रश्नों के माध्यम से प्रशासन पर कुछ नियंत्रण रख सकता था।
. इस अधिनियम के अधीन बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया और उड़ीसा तथा सिन्ध नाम से दो नये प्रांत बना दिये गये।
. इस अधिनियम द्वारा संघीय बैंक और एक संघीय न्यायालय की स्थापना का भी प्रावधान किया गया। 
आज का भारतीय रिजर्व बैंक एवं सर्वोच्च न्यायालय।

20. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Indenpidenc Act) 1947 -
माउन्टबेटेन योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारतीय स्तंत्रता अधिनियम 1947 
इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान - 
. भारत तथा पाकिस्तान नामक दो डोमिनियनों (राष्ट्रों) की स्थापना हेतु 15 अगस्त, 1947 की तारीख निश्चित की गई।
. इसमें भारत का विभाजन भारत तथा पाकिस्तान के रूप में करने व बंगाल एवं पंजाब में दो-दो प्रांत बनाने का प्रस्ताव किया गया। पाकिस्तान को मिलने वाले क्षेत्रों को छोड़कर ब्रिटिश भारत में शामिल  सभी प्रांत भारत में सम्मिलित माने गए।
ग. पूर्वी व पश्चिमी बंगाल और असम के सिलहट जिले को पाकिस्तान में सम्मिलित किया जाना था।
. भारत एवं उसकी रियासतों पर महामहिम महारानी की सरकार का उत्तरदायित्व तथा अधिराजत्व 15 अगस्त, 1947 (रात 12 बजे से) समाप्त हो जायेगा।
. भारतीय रियासतें इन दोनों देशों में से किसी भी देश में शामिल हो सकती थीं।
. प्रत्येक डोमिनियन हेतु पृथक गवर्नर जरनल होगा जिसे महामहिम द्वारा नियुक्त किया जायेगा। गवर्नर जनरल डोमिनियन की सरकार के प्रयोजनों बाबत महामहिम का प्रतिनिधित्व करेगा।
. प्रत्येक डोमिनियन हेतु पृथक - पृथक विधानमंडल होगा, जिसे विधियां बनाने का पूरा प्राधिकार होगा जिसमें ब्रिटिश संसद किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकेगी।
. डोमिनियम की सरकार हेतु अस्थायी उपबंध के द्वारा दोनों संविधान सभाओं की संसद का दर्जा व डोमिनियन विधानमंडल की पूर्ण शक्तियां प्रदान की गयी।
. गवर्नर जनरल को एक्ट के प्रभावी प्रवर्तन हेतु ऐसी व्यवस्था करने बाबत, जो उसे आवश्यक तथा समीचीन प्रतीत हो, अस्थायी आदेश जारी करने के प्राधिकार दिए गए।
. इसमें सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट की सेवाओं तथा भारतीय सशस्त्र बल, ब्रिटिश स्थल सेना, नौसेना और वायु सेना पर महामहिम की सरकार का अधिकार क्षेत्र अथवा प्राधिकार जारी रहने की शर्तें निर्दिष्ट की गईं।
इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार 14 -15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान एवं भारत नामक दो स्वतंत्र राष्ट्रों का गठन हुआ। भारतीय संविधान की बहुत-सी संस्थाओं का विकास संवैधानिक विकास के लम्बे समय में हुआ।
उपरोक्तानुसार
भारत संघ
राज्यों का निर्माण
नीति निर्देशक तत्व
सूचियां
संसद
न्यायालय
बैंक
सेना
लोकतंत्र
राष्ट्रपति/ राज्यपाल (गवर्नर जनरल/ गवर्नर)
मुद्रा 
व्यवस्थापिका
कर व्यवस्था
आदि बहुत से मामले इन्हीं चार्टर/अधिनियमों के कारण वजूद में आए। 
इस तरह भारतीय संविधान, संविधान निर्माताओं की बुद्धिमानी और सूक्ष्म दृष्टि और कालक्रम में विकसित संस्थाओं और कार्यविधियों का एक अपूर्व सम्मिश्रण है।

भारतीय संविधान में विदेशों से लिए गए प्रावधान निम्नानुसार हैं - 
भारत का संविधान पूर्णतः मौलिक होते हुए भी विश्व के अनेक संविधानों के श्रेष्ठ उपबंधों को अपनाकर बनाया गया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसे “विश्व का सबसे समृद्ध संविधान” कहा। नीचे प्रमुख देशों से लिए गए उपबंधों का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत है—
(क) .🇬🇧 ब्रिटेन (United Kingdom) से लिए गए उपबंध - 
01. संसदीय शासन प्रणाली
02. मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी
03. कानून का शासन (Rule of Law)
04. विधि निर्माण की प्रक्रिया
05. एकल नागरिकता
06. स्पीकर की भूमिका
07. संसदीय विशेषाधिकार

(ख). 🇺🇸 संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) से - 
01. मौलिक अधिकार
02. संविधान की सर्वोच्चता
03. न्यायिक समीक्षा
04. संघीय व्यवस्था
05. राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया

(ग). 🇮🇪 आयरलैंड से - 
01. नीति-निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy)
02. राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया

(घ). 🇨🇦 कनाडा से - 
01. मजबूत केंद्र वाला संघ (Strong Centre)
02. अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को
03. राज्यपाल की नियुक्ति

(च). 🇦🇺 ऑस्ट्रेलिया से - 
01. समवर्ती सूची
02. संसद के संयुक्त अधिवेशन की व्यवस्था
03. व्यापार, वाणिज्य एवं आवागमन की स्वतंत्रता

(छ). 🇩🇪 जर्मनी (वाइमर संविधान) से - 01आपातकालीन उपबंध
02. राष्ट्रपति द्वारा मौलिक अधिकारों का निलंबन (आपातकाल में)
(ज). 🇫🇷 फ्रांस से - 
01. गणराज्य की अवधारणा
02. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity)

(झ). 🇷🇺 सोवियत संघ (USSR) से - 
01. मौलिक कर्तव्य
02. समाजवादी राज्य की अवधारणा

(ट). 🇿🇦 दक्षिण अफ्रीका से - 
01. संविधान संशोधन की प्रक्रिया
02. राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन

(ठ).  🇯🇵 जापान से - 
01. विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law)

(ड). 🌍 अन्य स्रोत - 
01. संयुक्त राष्ट्र से मानवाधिकारों की भावना
02. भारत सरकार अधिनियम 1935 से संघीय ढांचा, 
03. प्रशासनिक व्यवस्था

📌 निष्कर्ष - 
भारतीय संविधान किसी एक देश की नकल नहीं, बल्कि विभिन्न संविधानों के श्रेष्ठ तत्वों का भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप समन्वय है। इसी कारण इसे जीवंत और व्यापक संविधान कहा जाता है।

संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया - 

संविधान सभा का गठन  - 
भारतीय संविधान सभा का गठन भारत के लिए संविधान निर्माण के उद्देश्य से किया गया है जिसकी मांग की पृष्ठभूमि निम्नानुसार है - 
. 1934 में एम.एन. रॉय ने पहली बार संविधान सभा का विचार प्रस्तुत किया।
. 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसे औपचारिक मांग के रूप में अपनाया।
. 1940 में इस मांग ने जन-आंदोलन का रूप ले लिया।
. कैबिनेट मिशन योजना, 1946
संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना (1946) के अंतर्गत हुआ।

संविधान सभा के मुख्य बिंदु - 
कुल सदस्य - 389
ब्रिटिश भारत से - 296
देशी रियासतों से - 93
प्रथम बैठक- 9 दिसंबर 1946
अंतिम बैठक- 24 जनवरी 1950
कुल समय- 2 वर्ष 11 माह 18 दिन
कुल बैठकें- 11 सत्र, 165 दिन
संविधान लागू- 26 जनवरी 1950
क. संविधान सभा की बैठकें - 
संविधान सभा की बैठकें कुल 11 सत्रों में हुई जिनका विवरण निम्नानुसार है - 
प्रथम सत्र - 
9 दिसंबर 1946 – 23 दिसंबर 1946
पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई
अस्थायी अध्यक्ष: डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा
11 दिसंबर 1946 को स्थाई अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद चुने गए।
द्वितीय सत्र - 
20 जनवरी 1947 – 25 जनवरी 1947
तृतीय सत्र - 
28 अप्रैल 1947 – 2 मई 1947
चतुर्थ सत्र - 
14 जुलाई 1947 – 31 जुलाई 1947
इसी सत्र में भारत विभाजन से जुड़े निर्णय लिए गए।
पंचम सत्र - 
14 अगस्त 1947 – 30 अगस्त 1947
15 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत की संप्रभु संसद के रूप में कार्य आरंभ किया।
षष्ठम सत्र - 
27 जनवरी 1948
सप्तम सत्र - 
4 नवंबर 1948 – 8 जनवरी 1949
संविधान का प्रारूप (Draft) इसी सत्र में प्रस्तुत व चर्चा में आया
अष्टम सत्र - 
16 मई 1949 – 16 जून 1949
नवम सत्र - 
30 जुलाई 1949 – 18 सितंबर 1949
दशम सत्र - 
6 अक्टूबर 1949 – 17 अक्टूबर 1949
संविधान के अधिकांश अनुच्छेद पारित किए गए।
एकादश (अंतिम) सत्र - 
14 नवंबर 1949 – 26 नवंबर 1949
26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत (Adopt) किया गया।
कुल सत्र- 11
कुल बैठक दिवस- 165
संविधान अंगीकरण- 26 नवंबर 1949
संविधान लागू- 26 जनवरी 1950
अंतिम बैठक (औपचारिक)- 24 जनवरी 1950
(इसी दिन सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए)
संविधान सभा की ये बैठकें केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि विचार, विमर्श, सहमति और लोकतांत्रिक संघर्ष की ऐतिहासिक यात्रा हैं जिनसे आधुनिक भारत की संवैधानिक नींव रखी गई।
ख. भारत विभाजन का प्रभाव - 
1947 के विभाजन के बाद भारत में इसकी सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई जिनमें से - 
- 229 ब्रिटिश भारत से
- 70 देशी रियासतों से
ग. संविधान सभा के सदस्य - 
अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं के माध्यम से हुआ। इस चुनाव में सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व (मुस्लिम, सिख आदि) भी सुनिश्चित किया गया।
पदाधिकारी - 
अध्यक्ष - डॉ. राजेंद्र प्रसाद
उपाध्यक्ष - हरेंद्र कुमार मुखर्जी
संवैधानिक सलाहकार - बी.एन. राव
प्रारूप समिति के अध्यक्ष - डॉ. भीमराव अंबेडकर
अन्य सदस्य (पुरुष) - 
श्री जवाहरलाल नेहरू
श्री सरदार वल्लभभाई पटेल
श्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
श्री के.एम. मुंशी
श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर
श्री टी.टी. कृष्णामाचारी
श्री गोविंद बल्लभ पंत
श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी
श्री फ्रैंक एंथनी
श्री एच.सी. मुखर्जी
(महिला) सदस्य - 
संविधान सभा में 15 महिला सदस्य थीं - 
श्रीमती सरोजिनी नायडू
श्रीमती हंसा मेहता
श्रीमती राजकुमारी अमृत कौर
श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख
श्रीमती बेगम ऐज़ाज़ रसूल

घ. संविधान सभा की समितियाँ - 
संविधान निर्माण के लिए कई समितियाँ गठित की गईं जिनमें से - 
01. प्रारूप समिति - डॉ. बी. आर. अंबेडकर
02. संघीय शक्तियाँ समिति - J.L. नेहरू
03. मौलिक अधिकार समिति - सरदार पटेल
04. अल्पसंख्यक समिति - सरदार पटेल
05. प्रांतीय संविधान समिति - सरदार पटेल
06. राज्यों की समिति - J.L. नेहरू
07. नियम समिति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद

च. संविधान सभा के कार्य - 
संविधान सभा के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे—
01. संविधान का निर्माण - 
भारत के लिए एक लिखित, विस्तृत और लोकतांत्रिक संविधान तैयार करना।
विश्व के विभिन्न संविधानों (ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा आदि) का अध्ययन।
02. मौलिक अधिकारों की व्यवस्था - 
नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, धर्म, शोषण से मुक्ति जैसे अधिकार प्रदान करना।
03. शासन प्रणाली का निर्धारण - 
भारत को संसदीय लोकतंत्र घोषित किया गया। संघात्मक ढांचा बनाते हुए केंद्र को सशक्त बनाया गया।
04. संघ एवं राज्यों के संबंध - 
केंद्र–राज्य शक्तियों का विभाजन (संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची)।
05. अल्पसंख्यकों एवं कमजोर वर्गों का संरक्षण - 
अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की व्यवस्था।
06. स्वतंत्र भारत की संसद के रूप में कार्य - 
संविधान लागू होने तक संविधान सभा ने अस्थायी संसद के रूप में कार्य किया।
संविधान निर्माण पर संविधान निर्माण में लगभग 64 लाख रुपए खर्च हुए। यह खर्च 1946 से 1950 के बीच संविधान सभा के कार्यकाल में हुआ।
छ. खर्च के मद - 
01. संविधान सभा के सत्रों का आयोजन
02. सदस्यों का भत्ता और प्रशासनिक खर्च
03. समितियों का गठन व कार्य
04. संविधान का प्रारूप तैयार करना
05. बहसों का मुद्रण
06. अंतिम संविधान की हस्तलिखित प्रतियों की सज्जा (नंदलाल बोस व शांतिनिकेतन के कलाकारों द्वारा)

ज. 🇮🇳 भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ - 
01. लिखित एवं विस्तृत संविधान
भारत का संविधान लिखित है।
यह विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। प्रारंभ में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं। (वर्तमान में 470+ अनुच्छेद, 25 भाग, 12 अनुसूचियाँ) हैं।
02. लोकतांत्रिक गणराज्य - 
भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। राज्याध्यक्ष जनता द्वारा निर्वाचित नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है।
03. संसदीय शासन प्रणाली - 
ब्रिटिश प्रणाली पर आधारित। नाममात्र का राष्ट्रपति, वास्तविक कार्यकारी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद। मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी।
04. संघात्मक ढाँचा (Federal Structure) - 
केंद्र और राज्यों में शक्तियों का विभाजन।
संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची।
लेकिन एकात्मक झुकाव (Unitary Bias) के साथ।
05. मौलिक अधिकार - 
भाग-III (अनुच्छेद 12–35), समानता, स्वतंत्रता, शोषण से मुक्ति, धर्म की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार, संवैधानिक उपचार का अधिकार यह संविधान की आत्मा (डॉ.अंबेडकर)
06. राज्य के नीति निर्देशक तत्व (भाग-IV) - 
सामाजिक, आर्थिक न्याय की दिशा।
न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं, परंतु शासन के लिए मार्गदर्शक।
07. मौलिक कर्तव्य - भाग-IV(A), अनुच्छेद 51-A - 
नागरिकों में राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना।
08. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका - 
सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय न्यायिक समीक्षा की शक्ति। संविधान का संरक्षक।
09. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार - 
पहले 21 अब 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक मतदाता।
सामाजिक-आर्थिक भेदभाव के बिना।
10. एकल नागरिकता - 
पूरे देश के लिए एक नागरिकता।
अमेरिका की तरह द्वैध नागरिकता नहीं।
11. धर्मनिरपेक्षता - 
राज्य का कोई धर्म नहीं। सभी धर्मों को समान संरक्षण। 42वें संशोधन (1976) से प्रस्तावना में जोड़ा गया।
12. समाजवादी चरित्र - 
आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा।
13. संविधान की सर्वोच्चता - 
संसद भी संविधान के अधीन। कोई भी कानून संविधान के विरुद्ध नहीं हो सकता।
14. लचीलापन एवं कठोरता - 
कुछ प्रावधान साधारण बहुमत से।
कुछ विशेष बहुमत से। कुछ में राज्यों की स्वीकृति भी आवश्यक।
15. आपातकालीन प्रावधान - 
राष्ट्रीय, राज्य और वित्तीय आपातकाल।
संकट की स्थिति में केंद्र को विशेष शक्तियाँ।
16. अल्पसंख्यक एवं कमजोर वर्गों का संरक्षण - 
आरक्षण की व्यवस्था। SC, ST, OBC, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकार।
17. संविधान का स्रोत मिश्रित
ब्रिटेन- संसदीय प्रणाली
अमेरिका- मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा
आयरलैंड- नीति निर्देशक तत्व
कनाडा- संघात्मक ढाँचा
ऑस्ट्रेलिया- समवर्ती सूची

निष्कर्ष - 
संविधान सभा भारत की लोकतांत्रिक चेतना, विविधता और समावेशिता का प्रतीक थी। इसने गहन विचार-विमर्श, सहमति और दूरदृष्टि के साथ ऐसा संविधान दिया जो विश्व का सबसे विस्तृत और जीवंत संविधान है।भारतीय संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का संतुलित समावेश है।
कुछ अतिरिक्त मुख्य बातें - 
प्रथम हस्ताक्षरकर्ता: डॉ. राजेंद्र प्रसाद (संविधान सभा के अध्यक्ष)
हस्ताक्षर की तिथि - 24 जनवरी 1950.
यह कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने भूल से राजेंद्र प्रसाद की जगह उन से पहले हस्ताक्षर कर दिए, परन्तु आधिकारिक रूप से डॉक्टर साहब का ही नाम है।
कुल हस्ताक्षरकर्ता - 284 सदस्य (8 महिलाएँ शामिल)
संविधान सुलेखक - प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा 
संविधान लागू होने की तिथि: 26 जनवरी 1950।
शमशेर भालू खां 
9587243963

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