उच्च शिक्षा में प्रताड़ना निरोधक नियम 2012, संशोधित 2026 (UGC, लॉ)
जिस मामले को लेकर गतमाह में सोशल मीडिया, चौपाल बस एवं कैंपस में विशेष चर्चा रही वो है UGC.
अधिकांश लोग सुनी सुनाई बातों पर यकीं कर लेते हैं, जो सही नहीं है। आइए जानते हैं पूरा सच।
भारत में यूनिवर्सिटी कॉलेज और स्कूल कैंपस एवं कक्षा में कई घटनाएं घट चुकी हैं जिनमें से हाल ही की दो घटनाएं वीभत्स एवं हृदयविदारक हैं,
1. पायल ताड़वी की आत्महत्या
2. रोहित वेमुला की आत्महत्या
इन्हीं घटनाओं को लेकर न्याय की गुहार लगाने वर्ष 2019 में, पायल तड़वी की माता अबेदा तड़वी और रोहित वेमुला की माता राधिका वेमुला की याचिका लेकर कोलंबिया यूनिवर्सिटी से LLM (Columbia Law School Merit Award से सम्मानित) एडवोकेट दिशा वाडेकर, इस संदर्भ में गहन अनुसंधान के डेटा सहित कोर्ट में याचिका प्रस्तुत करती हैं। कोर्ट में, हो भेदभाव पर बहस हुई जिसमें वर्ष 2023 में भारत सरकार द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट (विभिन्न IIT, NIT, IIM जैसे संस्थानों में वर्ष 2019 से 2021 तक 98 SC,ST एवं OBC के छात्रों ने आत्महत्या की। वर्तमान में ज्ञात आंकड़ों के अनुसार भारत में भेदभाव के मामलों में 118% की वृद्धि हुई, जिसमें दबा दिए गए मामले शामिल नहीं हैं।
यहीं से सुप्रीम कोर्ट की भृकुटि तननी शुरू होती है, कोर्ट ने स्पष्ट रूप से मानते हुए कि कैम्पस में जातिगत भेदभाव, सामाजिक बुराई नहीं, प्रशासनिक अपराध है, UGC को सख्त निर्देश दिए कि वर्ष 2012 में बने निरोधक नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए।
वर्ष 2012 में बने नियम लचीले थे जिन्हें लागू करना या ना करना कॉलेज रजिस्ट्रार पर निर्भर करता था। अक्सर शिकायत को गौण करने के पीछे कारण था कि रजिस्ट्रार द्वारा संस्थान की की साख बचाने के प्रयास या व्यस्तता। इसी अनदेखेपन एवं प्रताड़ना से परेशान हो कर छात्र आत्महत्या करने पर विवश हो जाते हैं।
UGC ने 2012 के नियमों में बदलाव किए
1. एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कमेटी (ADC) - उक्त प्रकरणों के निस्तारण हेतु गठित कमेटी में संस्थान रजिस्ट्रार (एडमिन) के साथ, छात्र, शिक्षक, विशेषज्ञ एवं SC/ST/OBC और अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधि भी सम्मिलित होंगे जो इस प्रकार के वाद (कैंपस में बुली, Bully) की सम्पूर्ण सुनवाई एवं मॉनिटरिंग कर रिपोर्ट अनिवार्य रूप से न्यूनतम 15 और अधिकतम 30 दिन में जांच रिपोर्ट देगी।
2. सिविल लॉ - कार्यवाही सिविल लॉ (क्रिमिनल नहीं) के अनुसार होगी, जो प्रताड़क के साथ - साथ संस्थान पर भी कार्यवाही हो सकती है।
3. EWS को सम्मिलित करना - प्रताड़ना के वर्ग में EWS वर्ग को भी सम्मिलित किया गया है।
4. इक्विटी की पहल - सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, UGC ने सभी विश्वविद्यालयों को 'इक्विटी ऑफिसर' नियुक्त करने का आदेश दिया है जो सुनिश्चित करेगा कि किसी भी छात्र को जाति या आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर प्रताड़ित न किया जाए।
5. दंडात्मक प्रावधान - नए नियमों में स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई यूनिवर्सिटी इन नियमों को लागू करने में विफल रहती है, तो UGC उसका
I. अनुदान रोक सकती है।
II. डिग्री की मान्यता रद्द कर सकती है।
III. सार्वजनिक घोषणा कर उक्त यूनिवर्सिटी को UGC अपनी वेबसाइट पर असुरक्षित या ब्लैक लिस्टेट घोषित कर सकती है।
6. E-SAMADHAN - छात्र UGC के e-Samadhan' पोर्टल पर शिकायत भेज सकते हैं, यदि उनका कॉलेज सुनवाई नहीं कर रहा है तो।
जमीनी सच्चाई - अदालत का मानना है कि रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामले इसलिए हुए, क्योंकि संस्थानों के पास Empathy (सहानुभूति) की कमी थी। नए नियम संस्थानों में Caste Sensitization (जातिगत संवेदीकरण) प्रोग्राम चलाने को भी अनिवार्य बना रहे हैं।
विरोधी पक्ष का डर - विरोध करने वाले पक्ष का मुख्य डर यह है कि अब तक जो इनविजिबल बायस (अदृश्य भेदभाव) चलता था, उस पर कानूनी उंगली उठाई जा सकेगी।
UGC के नए नियम एवं प्रक्रिया - सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अंतर्गत किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान (HEI) में भेदभाव के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाया गया है जिसके लिए स्टेप बाय स्टेप प्रक्रिया निम्नानुसार है -
स्टेप 01 -
I. आंतरिक शिकायत - पीड़ित द्वारा संबंधित कॉलेज या यूनिवर्सिटी की एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कमेटी (ADC) को लिखित शिकायत दी जाएगी।
II. शिकायत रजिस्टर का संधारण - संस्थान कार्यालय में अनिवार्य रूप से शिकायत रजिस्टर का संधारण करेगा।
III. ऑनलाइन विकल्प - कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट पर एक समर्पित लिंक होना चाहिए जहाँ छात्र अपनी पहचान गुप्त रखकर भी शिकायत कर सके।
स्टेप 2. इक्विटी ऑफिसर की भूमिका - दोनों पक्षों को नोटिस जारी करना।
स्टेप 3. कमेटी का कार्य एवं भूमिका -
I. जांच - कमेटी शिकायत मिलने के 15 से 30 दिनों के भीतर जांच कर रिपोर्ट देगी।
II. फैक्ट फाइंडिंग: कमेटी गवाहों से बात करती है और साक्ष्य (जैसे मैसेज, ईमेल या मौखिक गवाही) जुटाती है।
स्टेप 4. कार्रवाई की सिफारिश - कमेटी आरोपों की सत्यता के आधार पर सिफारिश करेगी -
I. सुधारात्मक- आरोपी से लिखित माफीनामा और शपथ पत्र लेना।
II. दंडात्मक (अकादमिक) - आरोपी छात्र का निलंबन (Suspension), छात्रवृत्ति रोकना या हॉस्टल से निष्कासन।
III. प्रशासनिक - यदि आरोपी कोई प्रोफेसर या स्टाफ है, तो उसके खिलाफ सेवा नियमों के तहत विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई।
स्टेप 5. UGC e-Samadhan पोर्टल (यदि कॉलेज सुनवाई न करे) तो - यदि कॉलेज प्रशासन 30 दिनों के भीतर कार्रवाई नहीं करता या शिकायत को दबाने की कोशिश करता है, तो छात्र सीधे UGC के e-Samadhan पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करवा सकता है। जिसके आधार पर UGC संबंधित संस्थान पर कार्यवाही करती है।
स्टेप 6: कानूनी सहारा (SC/ST Act) - चूंकि UGC के नियम सिविल और प्रशासनिक हैं, इसलिए यदि मामला गंभीर प्रताड़ना या जातिसूचक गालियों का है, तो छात्र समानांतर रूप से SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के तहत पुलिस में FIR भी दर्ज करा सकता है। यहां UGC की जांच और पुलिस की जांच दोनों साथ-साथ चल सकती हैं।
महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच - नए नियमों में एक एंटी-विक्टिमाइजेशन (Anti-Victimization) क्लॉज भी है। इसका मतलब है कि शिकायत करने के कारण कॉलेज प्रशासन उस छात्र को परेशान नहीं कर सकता (जैसे जानबूझकर फेल करना या अटेंडेंस काटना)। अगर ऐसा होता है, तो यह अपने आप में गंभीर दंडनीय अपराध माना जाएगा।
अतः समझदार बनें, सुनी सुनाई बात पर यकीन करने से पूर्व तथ्यों को देखें।
शमशेर भालू खां
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