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11. नूतन रस (हिंदी कविता संग्रह 03) 20 कविताएं ✍️

हिंदी कविता संग्रह - नूतन रस (03)

सूची - 
01. स्वीकार करो....
02.गगन की छत....
03. गहराई के शब्द .....
04. तारा.....
05.नहीं चाहते......
06.दोस्त.........
07.भाषण.........
08. राखी.....
09. चीख.....
10. सपने......
11.भाई दूज.......
12. एक बात बताओ....
13. दोहे.....
14. गुरु नानक देव......
15. हे, भारत के जवाहर......
16. चांद से आए हो क्या.....
17. सोशल मीडिया.....
18. तुम्हें सौंपता हूं.....
19. लड़ कर मरूंगा......
20. चित्र...
21. किस से कहूं...
22. हो गया....
23. लोग....
24. जाते हैं विदेश लोग....
25. मकड़ी का जाला....
26. लाल सलाम...
27. राम......

01. स्वीकार करो.....
स्वः को जीत कर हार करो
अनिश्चित को स्वीकार करो।
अंतर्द्वंद्व का संहार करो
जीवन का उद्धार करो।
हावी ना खुद पे ज्वार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।

मुद्रा भंगिमा भाव से
ना डरना आभाव से
सींचे न जल केवल लाव से
नहीं पृथक पतवार नाव से।
हृदय पट खोल बड़े द्वार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।

गत समय की बात क्या
चढ़े मस्तिष्क जज़्बात क्या
सत हुआ आत्मसात क्या
युद्ध में शह और मात क्या
मन गंगा जल से पखार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।

शांत चित्त कला अनुगामी
उदिग्न मन में उपजे कामी 
किसने किसकी भुजा थामी
अग्रज नहीं बनो अनुगामी
तीक्ष्ण विचारों की धार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।
*********
 02. गगन की छत....
नील गगन की छत
वसुंधरा पर सोना
भूख मेरी संम्पत्ति
मेरा हंसना हुआ रोना

भावों से भरा
वेदना से डरा
मरता क्या मरता
पहले से मरा

आतंक का पैरोकार 
रब भगवन दरकार
कभी पंडे मौलवी
कभी डराती सरकार

आजाद बेड़ियों में हैं
विश्वकर्मा ओर मजदूर
कृपणता के बंधुआ
किसान रहा मजबूर

गाँव वहीं हैं जहां थे
उनके हक का विकास
क्यों खा गया खा गया
अफसर मंत्री यहां थे
*********
03. गहराई के शब्द.......
अंतशः की गहराई में
मन्थित सागर
हिलोरे मारने लगे
तीव्र वेग मस्तिष्क की
अथाह गहराइयों में
पहुँच कर झकझोरता
उमड़ता गरजता है
उसे रोक पाना असमर्थ
विवेक की सीमाएँ
तब बरसती हैं
शब्दों की बूँदें
ओर बनती है नदी
जिसे बहा देता हूँ
कलम जटा माध्यम से
कागज की धरा पर
नव सृजन नव रचना
ओर नाम देता हूँ
कविता।
*********
04. तारा.........
एक तारा टूटा
अपना था रूठा
ना बंदूकें सजी
ना संगीने तनी
लाश ही लाश
मुहाफ़िज़ गायब
शैतान आया
बनकर मुहाफ़िज़
दुनिया जलाने
सब मिटाने
आदमी को हराने
पहले था मुश्किल
जीना
अब है मुश्किल
मरना
बहुत मुश्किल
जिंदा लाशें
मुर्दे चल रहे
कफ़न के इंतज़ार में
सब लूटकर
कब्र लूटने
आदमी को हराने
आया है शैतान
मैं ओर मेरे सब
बन्द हैं कैद बिना
अफसोस है
आज़ादी वहम है
निजात कब मिलेगी
हवा में ज़हर है
बस ज़हर।
***********
05. नहीं चाहते.........
हम चलना नहीं चाहते
उजाड़ रास्तों पर
जो सही किंतु दुर्गम
हम चलना चाहें
सुगम रास्तों पर
जो सुगम पर गलत
जो नहीं पहुंचाता
मरुस्थल से
नखलिस्तान में
शांत शीतल
सत्य मार्ग
आ पहुंचे
झाड़ झंझाड में
निकलना मुश्किल
आजीवन
************
06. दोस्त.......
मेरे दोस्त
मितवा
तुम कहो तो
तुम्हें पूछ कर
तुम्हारे घर में
चोरी कर लूं।

क्या चोरूँगा
क्यों चोरूँगा
कब चोरूँगा
तुम्हे बता कर
तुम्हारे घर में
चोरी कर लूं।

नहीं चुराउंगा
रुपये डॉलर
और गहने
नहीं चुराउंगा
महंगे तोहफे
या हार गले का

मैं चुराउंगा
एक अनमोल
खजाना
पुरा नहीं
थोड़ा सा
प्यार दुलार
अच्छी बातें
बड़ा दिल
परोपकार की
भावना
मीठी बोली
सरस् व्यवहार
आकर्षित करने की
मन में बसने की
एक कला
अनूठी कला
निराली चोरी
चोरी कर लूं।

यह सब
बिन माँगे
दोगे
मुझे औऱ सब को
या करनी होगी
तुम्हें पूछकर
तुम्हारे घर में
चोरी।
************
07. भाषण.......
भाषण बाजी ज्ञान सुज्ञानी
पूजे अंधियारे की शैतानी

बने मसीहा करे मनमानी
जंगली सामंती अभिमानी

शो विण्डो के अहिंसक
चुप चुपके हैवानी

करो इनका अभिनन्दन
या तैयार देने कुर्बानी

दाल परोसे आदर्श की
खाये घर में बिरयानी

गेंदा गुलाब रजनी नहीं
नागफनी लगे सुहानी।
*********
08. राखी.........
राखी बहना की मिली
बन्द लिफाफे में आज

बचपन धुंधला याद आया
वो खेलकूद राजसी अंदाज।

राखी बांधे वो गालियां घुमा
कभी जहां था अपना राज।

बहन मुझ से मैं उस से
मिलने को बेताब।

मेरे भैया मेरे चंदा
हो तेरी उम्र दराज।

प्रीत स्नेह से निहारा
भूल गया सब काज।

आशा किरण मन हर्षाये
राखी बहना की मिली आज।
*********
09. चीख.....
चीख चीख कर
जमीन-आसमान तक
उछाल रहे हैं
अर्थहीन शब्द
जिनके भीतर घिन
और कुछ नहीं
एक पेट की
दूसरे पेट से
एक आंख की
दूसरी आंख से
साजिश भर है
सूझती आंखों की
मन की आंखों को
अंधा करने की
साजिश
दर असल
कुछ लोग
एक को
अनेक में बांटकर
तुझे मुझे बरगलाकर
रच रहे साजिश
यह एक साजिश है
तेरे मेरे मुंह 
निवाला छिनने की
एक साजिश
सिर्फ एक साजिश
********
10. सपने..........
हजारों आंखों ने देखे सपने 
हर एक सपना सच्च भी होगा।
जुबां सलामत शहद अपनी।
तुम ने सोचा चले गए हम
हमारा सलीका नया नहीं है
नई नहीं यह ज़हद अपनी।
कह दो ग़म से रहे दूर हम से
डरे नहीं हैं कभी भी तुम से
बनेगी ये जा लहद अपनी।
********
11. भाई दूज........
भाई दूज का त्योंहार 
एक अनुपम उपहार
यमराज मिले बहन से
किया आदर सत्कार।

सुभद्रा से कृष्ण मिलने आए
भाई का अपार स्नेह लाए
आवभगत में पलक बिछाए
पांवों में फूल बिछवाए।

यमराज ने दिया वरदान
दिया बहन को सम्मान
हुए अति प्रसन्न भगवान
आज के दिन सूने श्मशान।

रहे यह संबंध निश्छल
छूने ना पाए छल-बल
बहन हो सबकी सबल
पवित्राय ज्यों गंगा जल।

जिगर अक्षत भाल लगे
बहन को भाई कुणाल लगे
मेला यह हर साल लगे
दुआ बहन को हर हाल लगे।
                   *********
12. एक बात बताओ....
चलो, एक बात बताओ 
करीब बैठो यहां आओ
पास बैठ शम्मा जलाओ
यूँ  दूर - दूर  मत जाओ
चलो, एक बात बताओ।

तब  बात  कुछ ओर थी
तेरे  हाथों में मेरी डोर थी
मैं चांद था तुम चकोर थी
खुद हंसो मुझे हंसाओ 
चलो, एक बात बताओ।

अपने बच्चे बड़े हो गए हैं
सब पैरों पे खड़े हो गए हैं
पार बेड़े हो गए हैं
बैठ कर तुम भी सुस्ताओ
चलो, एक बात बताओ।

इनके बैंक खाते बने
वर्षा में हम छाते बने
धूप में अहाते बने
उन बेटों को बुलाओ
चलो, एक बात बताओ।

मुंह का निवाला दिया
अंधेरों से उजाला दिया
खुला सब न ताला दिया
वैसे ही हमें खिलाओ
चलो, एक बात बताओ।

जिगर यह जरूरी नहीं 
तमन्नाएं सब पूरी नहीं
कहानी है अधूरी नहीं
कहो खुद और सुनाओ
चलो, एक बात बताओ।
**********
13.📘 “जिगर चूरूवी के दोहे.....
1. सत्य और समाज
1️⃣
सत्य कहो तो काटते, झूठ कहो तो ताज।
ऐसे उलटे जगत में, किससे करूँ मैं लाज॥
2️⃣
नेता बोले झूठ जब, जनता माने सत्य।
देश कहाँ अब जाएगा, ईमान हुआ ध्वस्त॥
3️⃣
रोटी, कपड़ा, घर मिले, यही रही अरमान।
किसने देखा अब यहाँ, नीति या भगवान॥
4️⃣
धरती माँ पर लुट रहा, झूठ फरेब का माल।
भूखा इंसां ढूँढता, सच का अब है हाल॥
5️⃣
मन्दिर मस्जिद बाँटते, दिल की सारी राह।
ईश्वर एक ही सदा, क्यों फिर इतना चाह॥
6️⃣
रिश्ते नाते बिक गए, पैसों की परवाह।
माँ-बाप तक हो गए, सौदे में गुनाह॥
7️⃣
भूखा बच्चा बोलता, माँ भूखी रह जाए।
ऐसे पावन त्याग पर, जग श्रद्धा बरसाए॥
8️⃣
जिस घर में सम्मान है, वहीं सच्चा समाज।
झूठ वहाँ टिकता नहीं, सत्य करे अभ्यास॥
9️⃣
भाई-भाई दूर हैं, नाता केवल नाम।
लालच ने कर दी यहाँ, रिश्तों की नीलाम॥
10️⃣
जात पात के फेर में, मानवता खो गई।
राम रहीम खुद यहाँ, दीवारों में रो गई॥

2. नीति और जीवन दर्शन
11️⃣
सत्कर्मों की रेड़ियाँ, बाँट सको तो बाँट।
पुण्य वही जो दे सके, औरों को भी ठाँठ॥
12️⃣
फल की चिंता मत करो, कर्म ही सच्चा धर्म
जो करेगा प्रेम से, मिलेगा शुभ कर्म॥
13️⃣
लोभ मोह के जाल में, मत फँस मानव मित्र
छूट न पाए साँस जब, पछताएगा चित्र॥
14️⃣
मन का दीपक जो जलाए, उसका जीवन धन्य।
अंधियारे में सत्य की, होती है जय जय॥
15️⃣
ज्ञान बिना इंसान का, जीवन जैसे शून्य।
पढ़ लिख कर भी रह गया, भीतर जैसे धून्य
16️⃣
संगति जैसी रखे तू, वैसा बनता भाव।
गंदे जल में डूबकर, कैसे मिले सुवास॥
17️⃣
गर्व करे जो जन्म पर, वह अज्ञानी मान।
कर्म से ऊँचा वही, जो देता पहचान॥
18️⃣
धन से कोई बड़ा नहीं, मन से होता शुद्ध।
जिसने बाँटा प्रेम को, वही रहा अमरुद्ध॥
19️⃣
जिसका मन निर्मल रहा, वही सच्चा ज्ञानी।
बिना दया के जीवन क्या, केवल वीरानी॥
20️⃣
सद्गति उसको ही मिले, जो रखे उपकार।
बोले मीठे बोल जो, हर ले दूसरों भार॥

3. शिक्षा, धर्म और समय
21️⃣
शिक्षा से ही देश का, होता है उत्थान।
अंधकार मिटता सदा, ज्ञान बने पहचान॥
22️⃣
गुरु बिन ज्ञान न मिले, न जीवन का अर्थ।
जिसने सीखा आदरमय, जीता सच्चा पथ॥
23️⃣
धर्म वही जो जोड़ दे, न बाँटे जनमान।
सेवा से भगवान हैं, पूजा से न मान॥
44️⃣
मन्दिर में भगवान से, माँगे सब संसार।
किसी गरीब के द्वार पर, कोई न पहुँचा प्यार॥
25️⃣
समय बड़ा बलवान है, सबको देता सीख।
जो समय को मानता, जग में पाता दीख॥
26️⃣
चलता टेम अनमोल है,मत कर इसमें भ्रान्त
जीवन क्षणिक, स्नेह कर, कर्म रहो संतान्त
27️⃣
स्वार्थ नहीं जो सोचता, वही सच्चा वीर।
लोक-कल्याण हेतु जो, त्याग करे गंभीर॥
28️⃣
संघर्षों से ही मिले, जीवन को आकार।
पत्थर पीसने से ही, बनता सुन्दर हार॥
29️⃣
बेटी जब शिक्षित हुई, जग का भाग्य खिला।
माँ की गोद में पला, उजियारा सवेरा मिला॥
30️⃣
जो दूसरों के काम आये, ही धन्य जन जान
निज स्वार्थ के फेर में, होता मन अपमान॥

4. समसामयिक व्यंग्य और अनुभव
31️⃣
रातभर मस्जिद में रहा, इबादत फरियाद।
सुबह परीक्षा लिख न सका, याद न आये बात॥
32️⃣
जूते कपड़े बाल सब, भई पोशाक अजीब।
खाते-पीते घर के भी, बच्चे लगें गरीब॥
33️⃣
लड़कों से लड़की बढ़ी, पढ़े कमा ले आज।
अनपढ़ बेरोज़ार जन, कैसे करें समाज॥
34️⃣
हाथ में ध्वजा ले खड़ा, बोले “जय श्रीराम।”
घर में पानी लोटा भर, पिता करे कोहराम॥
35️⃣
पानी का अपव्यय बुरा, होगा एक अभिशाप।
बिन पानी सब सूखता, जीवन हुआ सन्ताप॥
36️⃣
मिथिला से सीता चली, कर स्वयंवर दान।
भाग्य हुआ दुर्भाग्य में, जब देखा अवसान॥
37️⃣
पैर चादर से निकाल कर, करना मत अति काम।
केंचुली से सर्प भी, पाता विश्राम॥
38️⃣
होत में जोत है सदा, सब होत में दाता।
अणहुति राख बड़ी कहे, हे कृपालु विधाता॥
39️⃣
लाभ ही सब कुछ नहीं, जीवन के हैं और।
चाँद खिंचे जलधार को, प्रीत खींचे ठौर॥
40️⃣
मन में कभी न राखनी, जो बात ग़ैर कहे।
समय गया तो फिर नहीं, फागुन जैसे बहे॥
41️⃣
पहली कक्षा में गया, पाटी हाथ में कोरी।
आज कलम हाथ में है, गुरु कृपा सँजोरी॥
42️⃣
आँचल और अंचल में, आया कितना भेद।
आँचल ढके सृष्टि सदा, अंचल ढक न देद॥
43️⃣
आँख मूँदकर जो चले, न माने निज सोच।
चलते-फिरते रोग हैं, जीवन उनका खोच॥
44.
दोहा सीधी बात है, गागर में सागर।
जो समझे इस भाव को, वही सच्चा आगर
45.
46.
47.
48.
49.
50.
51.
            *************
14. गुरू नानक देव......
सत जपे नानक गुरू मेरे का नाम
सब जपे नानक गुरू मेरे का नाम 

सर्वजन हित का अवबोध किया
स्वयं सह के दुःख का अवरोध किया।

खुद ने किया पहले कहने से वचन
आचरण से संदेश अत्याल्प प्रवचन

गुरू बाणी में ऊंच नीच का भेद नहीं
बड़ा छोटा रंक राजा का विभेद नहीं।

उपेक्षित की रक्षा का उचित समाधान
गुरू ने स्थापित किया समाज गुण प्रधान।

वर्ग संघर्ष की धारणा का मात्र एक विकल्प
मानव - मानव एक समान का संकल्प।

समतामूलक समाज की लगाई गहरी नीव
बुरा किसी का ना करो न दुःखी हो जीव।

गुरू ग्रन्थ साहेब में रची धर्म की सीख
साईं इतना दीजिए ना मांगे कोई भीख।

पंथी का धर्म करे मानव हित अपार
अहित का किसी के उठे ना विचार।

जिगर गुरू को प्रणाम ईश के स्थानक
जय हो गुरू देव की जय गुरु नानक।
            ************

हे भारत के जवाहर

हे भारत के जवाहर,
राष्ट्र प्रेम के गवाहर
स्वतंत्र अटल सवाहर
सत्य, ओजस्वी कृतज्ञ न्यासी
तुम जेल में थे।

असहयोग की आग में
मां घायल लाठियों की लाग से
जागृत समाजिक जाग से
धन्य, अडिग संकल्पित प्रवासी
तुम जेल में थे।

पत्नी मृत्यु–शैया पर
सवार द्वंद्व की नैया पर
तरुण बलि स्व बैया पर
हे, कलयुग के सन्यासी
तुम जेल में थे।

जमानत के काग़ज़ हाथ में
धैर्यशील अंतर्मन साथ में
चुनी स्वतंत्रता कारावास में
तुम, बापू के अडिग विश्वासी
तुम जेल में थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के सूत्रधार
धधकती आग, अंग्रेजी प्रहार
जन्म राजीव रत्न का नामदार
ओ, महलों के आदिवासी
तुम जेल में थे।

जिन्ना - सावरकर लड़ रहे
विभाजन के डोरे पड़ रहे
नागरिकों के घर उजड़ रहे
हे, प्रयत्नशील वनवासी
तुम जेल में थे।

कश्मीर का दावानल उठा
दुश्मन का कुत्सित प्रयास झूठा
जेल में हरि सिंह से मिलने
खिन्न उदास उच्छवासी
तुम जेल में थे।

सहे अत्याचार फिरंग के
नए पैंतरे वार फिरंग के
जाति धर्म अंगार फिरंग के
एक मानने वाले काबा काशी
तुम जेल में थे।

                 *********
16. चांद से आए हो क्या.......
कविता - चांद से आए हो क्या 
चांद से आए हो क्या, जो तकलीफ नहीं होगी।
धरती से पराए हो क्या, जो तकलीफ नहीं होगी।

जन्म पूर्व यहां संघर्ष शुरू, मरने तक रहेगा
अभी सहा ही क्या, ना जाने क्या-क्या सहेगा।

ओरों से आगे निकलने की होड़ लगी
मेहनत कठिन शक्ति जी तोड़ लगी है। 

बढ़ी प्रतियोगिता हर मोड़ पर भारी 
बिजनेस बड़ा हो या नौकरी सरकारी।

चिंता घर बसाने की  होने लगी
जिंदगी हम पे हंसने कभी रोने लगी।

युवा अवस्था आते बच्चे पालने आए
खुद सोएं दिन में हमें रात भर जगाए।

बढ़ते बच्चों का लालन पालन कैसे हो 
अमीर करते हैं, ठीक बच्चों का वैसा हो।

मुन्ना जिए राजा जैसा बेटी ज्यों गणगौर
बेटे को विदेश भेजा बेटी को बंगलौर

हल्द हाथ हेतु काबिल रिश्तों की खोज
संतान सुख के लिए  घुटते हैं हर रोज।

बेटे के विलायती बहु बेटी ने स्वयंवर रचाया
व्यर्थ ही मां बाप ने समय अपना गंवाया।

दोनों जा के बस गए उनसे इतनी दूर
डॉक्टर विज्ञानी बने दुनिया में मशहूर।

अब बुढ़ापे ने घेर लिया हट गए हाण
खूं खूं कर खांसते तोड़ें खाट के बाण ।

 मिला मां के गुजरने का दोनों को  संदेश
ऑनलाइन क्रियाक्रम करें हुआ दूर बिदेश।

किस के लिए कमाते हो भागते हो दिन-रात
जग बीती है खुद बीती रखना इतना याद।

जिगर बुराई ना करे करे ना बिराणी बात
दीजिए संतान को संस्कार की सौगात।
*******
17. सोशल मीडिया...
सोशल मीडिया.......
सोशल मीडिया सशक्त माध्यम है बोलने की आजादी का
यही कारण है युवाओं में बढ़ती लत और बर्बादी का।

सूचनाएं जल्दी और सुरक्षित पहुंचाने के माध्यम है 
शर्त पहली उपयोग की इसके धैर्य एवं संयम है।

बेटी और बेटे में अंतर इसके का उपयोग न हो
स्वयं पर नियंत्रण रहे इसका दुरुपयोग न हो।

संविधान लोकतंत्र, मानवता की आवाज़ है यह
सोशल मीडिया नहीं डिजिटल समाज है यह।

जन्म - मरण, समस्या - समाधान, आंदोलन एवं विकास 
उम्मीद जगाता, अफवाह फैलाता अंधेरे में प्रकाश।

विचारों को उठने दो आवाजों को बहने दो
रोको मत, जो मर्यादित है, को कहने दो।

बांधोगे बहती हवा को धूप पर पहरा बिठवाओगे।
रात के बाद निश्चित दिन का नियम कैसे बदलवाओगे।

समय की गति से रीति जीवन की बदलती हैं बदलेंगी
पीढ़ियां बदली हैं, संतति बदली और नस्लें बदलेंगी।

समग्र विकास का, स्त्रोत नहीं, मस्तिष्क अवरोध है
जीवन अविरल धारा है, मन सत्य का शोध है।
***********
18. तुम्हे सौंपता हूं.......
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं 
मैं अतीव भाव अंतर्मन तुम्हे सौंपता हूं
ये आल्हादित प्रस्फुटन तुम्हें सौंपता हूं 
जो अंतश ने रचे वचन तुम्हें सौंपता हूं।
सहित स्याही के कलम तुम्हें सौंपता हूं
द्रवित मनोहर स्पंदन तुम्हें सौंपता हूं।

दारुण अनंत अववय की अभिलाषा नहीं
आशान्वित स्वयं से तनिक निराशा नहीं
कमाधिक्य उच्च-नीच अंतर जरासा नहीं
अहम के स्वतः बिसरने की आशा नहीं।
बंदी बांधव का नीरस मन तुम्हें सौंपता हूं
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।

भाव शून्य मरने पर भाव ना अर्पित हुए
अट्ठासों के बीच सद्भाव ना समर्पित हुए
मुद्रित आडंबर की कथाओं में चर्चित हुए
उन्मुक्त असत्य आकर्षण से हर्षित हुए
सभ्यताओं के सुलभ रण तुम्हें सौंपता हूं 
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।

परिवेश न्याय विरोचक परिहास हुआ
पश्च भारत का अग्रगामी इतिहास हुआ
बरसों से संजोए शौर्य का विनाश हुआ
नागरिक को न अब तक आभास हुआ 
आदिकालिन धूसरित क्षण तुम्हें सौंपता हूं
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।

अवलोकनार्थ उजालों का सागर लाया हूं
सभ्यताओं के मृद- भांड गागर लाया हूं
सत्य शोधक समाज अभिजागर लाया हूं
सर्पिल मंजुल मूर्छित लागर लाया हूं 
भविष्यत भारत का वरण तुम्हें सौंपता हूं 
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।
***********
19. लड़ कर मरूंगा 
लड़ कर हारुंगा......

जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा 
डर ही मृत्यु है मैं इसको मारूंगा
शेष महि के ऋण अवश्य उतारूंगा
तिरष्कृत को विजय पार उतारूंगा
मुंह के शब्द जिव्हा पर उभारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।

सुने कोई क्यों परिवेदना तुम्हारी
पोषक है शोषक की वेदना तुम्हारी
भूख के समय जागृत चेतना तुम्हारी
भेंट आराध्य को संवेदना तुम्हारी
गहरे पानी में खुद को उतारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा ।

अपराध की नींव थानों में है
नकली सामान कारखानों में है
उत्पीड़न का संघ घरानों में है
अश्लीलता भरी हुई गानों में है
मैं नकारात्मकता को उभारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।

असंभव है जो संभव हो जाए
पाप रहित समस्त भव हो जाए
नाद सत्य का प्रणव हो जाए
अखिलेश ब्रह्मा अर्णव हो जाए 
मैं अजीत देवों के पग पखारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।

सीख कोई देकर गया समय गया हुआ
बेरंग को रंग देकर गया समय गया हुआ
समाधान देकर गया समय गया हुआ 
जड़त्व को लेकर गया समय गया हुआ
मैं बहते समय को निहारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।
*********
20. चित्र
जीवन क्या एक सरल चल चित्र है 
कोई है शत्रु यहां कोई अभिन्न मित्र है।

घोर अंधेरा मां की कोख जीवन था 
संबंधों की पवित्रता हुई अपवित्र है।

बढ़ती उम्र संग बढ़ता गया विलास 
रहना यहां तेरा मेरा वर्णन सचित्र है।

कभी गरल पान कभी अमृत की धार 
हर्ष विषाद भाव आत्मा के भीतर है

बिखरा जीवन पर समेटे नहीं जाता
कथा जीवन की निर्मल विचित्र है।

मरे जो नहीं मारे इच्छाओं के घ्राण 
कागजी फूलों में व्याप्त सुरभि इत्र है।

मृत्यु सत्य अमरता है एक धोखा 
लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति जीना का पवित्र है।
*****
#किस_से_कहें....

मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है
रोता हर एक छुप छुप के
घर घर की यही कहानी है।
प्यासा शहर प्यासे गांव गली
पहाड़ खोदने की नादानी है।
काटो तोड़ो मोड़ो और मरोड़ो
लोगों की आदत यह पुरानी है
मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है।

पत्थरों की न सुनी पुकार गई
उसे खुद की अच्छाई मार गई।
मुकदमों की बहस के आगे
खुदा की कुदरत हार गई।
नदियों के मुहाने मोड़ कर
काटने जंगल सरकार गई।
फाइलों में कुछ लिखा ओर
कहने को नई कहानी है
मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है

धरती का श्रृंगार करे कौन
ए इंसान तु खड़ा है मौन
प्यासी गंडक सूखी सोन
हरियाली का घटता जोन
धरती बेच विकसित होता
आदमी चांद पे लेगा लोन।
धन वैभव के लोभी मानव
काम तेरा यह शैतानी है
मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है।
*****
22. हो गया...
ले दे कर नामाकूल अधिकारी हो गया
छटांक अदरक से बंदर मदारी हो गया।

खरीद माल चोरी का सेठ भिखारी हो गया
हल्दी की गांठ ले छुट्टन पंसारी हो गया।

निकला घर से जवान था वो नौजवाँ
आया वापस बुढ़ापे में बीमारी हो गया।

खिलाया बाप ने एक निवाला निकाल के
आज वो बाप ओलाद पे भारी हो गया।

थाने में लगा दरोगा दे कर बड़ी रकम
छोड़े मुजरिम तो भ्रष्टाचारी हो गया।

बीस फीसद कमीशन लागत में शुमार
पद सरपंच का बड़ी लाचारी हो गया।

लगाए आग घर को लड़ाए भाई से
जिगर दुश्मन वो लाभकारी हो गया।
*********
23. लोग....
सूरज बदला न चांद न तारों का संजोग 
नया साल मुबारक बधाई देते लोग।

वही धरती वही पानी वही हैं सब लोग 
कोई हुआ मदमस्त कोई निभाए जोग।

वही दिन वही रात वही लगे हैं रोग 
भूखा दिन का सोया देखे छप्पन भोग।

न हवा बदली न दाना पानी का उपभोग 
जोड़ तोड़ में मग्न गुणा भाग घटा योग।

जिगर साल बाद इसका विदाई योग 
कहें अलविदा मुबारक कहें लोग।
******
24. जाते हैं विदेश लोग....
छोड़ अपना देश लोग
जाते हैं विदेश लोग
पितृ पीछे अशेष लोग
टूटते हुए निमेष लोग
लगा धरती के नेस लोग
जाते हैं विदेश लोग।

जाना है अब छोड़ छाड़ 
घर जमीन नदी पहाड़
मिट्टी से ना रहा लाड़
सुना बाग गांव उजाड़ 
हुए आदमी केस लोग
जाते हैं विदेश लोग।

पंछी गलियां और साथी
ना चिट्ठी न कागद पाती
सिमरें भाई - बहन नाती
जोरू पिघले ज्यों बाती
बदल के यहां भेष लोग
जाते हैं विदेश लोग।

वापस ना आएगा अब
भंवरा उड़ जाएगा तब
हैं यहां पे तेरे अपने सब
फिर मिलन होगा जब
खा रहे हैं तैश लोग
जाते हैं विदेश लोग।

जिगर बसना यहां वहां
जिसका दाना है जहां
भाग्य ले कर जाए कहां
यहां से वहां वहां से यहां
देखते प्लेन क्रैश लोग
जाते हैं विदेश लोग।
*****
25. मकड़ी का जाला...
मकड़ी का जाला 
गौरैया ने आला बनाया
एक में दो माला बनाया
घर बिना ताला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया
पेड़ पर शिवाला बनाया
बुलबुल कंठ नाला बनाया
कलाल ने हाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।

मछली का घर समंदर है
कछुआ पानी के अंदर है
मगर मस्त कलंदर है
बैठा पेड़ पर बंदर है
बिल में घुसा छछूंदर है
भाग्य सबका सुंदर है
भारत के सर हिमाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।

हरिण खेत में चरता है
रोज जंगल विचरता है
व्हेल पानी में उतरता है
शेर शिकार करता है
बैठा भूखों मरता है
अपनी करनी भरता है
सांप को रखवाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।

सड़ता है पड़ा हुआ
सूखा ठूंठ खड़ा हुआ
भाई-भाई लड़ा हुआ
सोना नग जड़ा हुआ
घोड़ा नहीं अड़ा हुआ
छोटे से ही बड़ा हुआ।
प्रीत रंग हरयाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।
********
26. लाल सलाम....
#लाल_सलाम

शिकंजा पंजे पर कसता है
खींचे तो खून निकलता है।

तुम ऐसा कोई जाल बुनो 
शिकंजे का ही काल चुनो।

रिसते लहु को जमने दो
कोलाहल को थमने दो।

रस्ता वहीं है जहां रुके थे
बैठ सोच कहां पर चुके थे।

शत्रु का काम आघात हुआ
मित्र का काम वो करे दुआ।

मित्र  शत्रु  से बचना होगा
नया खेल तो रचना होगा।

समस्या निदान का हल हो 
वो बने योजना सफल हो।

सीधी बात ना सुने सरकार
टेढ़ी अंगुली का करो विचार।

नव सामंतों को बोल दो
अब संघर्ष के पट खोल दो।

गिना दो सर इस चुनाव में
या छेद करो स्वयं नाव में।

ना मांगे हक लड़ के मिले
जो कटे वो उपवन खिले।

बैठो ना धरे हाथ पर हाथ
ना वो स्वामी ना तुम अनाथ।

कस लो घोड़ों की अब लगाम
लाल सलाम भई लाल सलाम।
*******
26.  राम .....
लू में समीर शीत हैं राम
वसुंधरा की प्रीत हैं राम
दीनहीन की जीत हैं राम
कल आज अतीत हैं राम
मर्यादाओं की रीत हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम।

इसके उसके सबके राम
पताल धरती नभ के राम
बसे हृदय में सबके राम
आंख सांस में लब पे राम
हैं मर्यादित पुनीत हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम।

बिन सीता के अधूरे राम
भाई लक्ष्मण से पूरे राम
प्रतिक्षित सबरी सबूरे राम
मर्यादा पुरुषोत्तम सुरे राम
सुंदर वन का गीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

तुलसी की चौपाई में राम
बजरंग की परछाई में राम
बाकी झूठ सच्चाई में राम
हर मर्ज की दवाई में राम
सत्य की की जीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

पिता के आज्ञा पालक राम
हैं दिव्य अद्भुत बालक राम
सत्य सनातन मालक राम
कण कण के संचालक राम
मित्रता राम अमीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

भय अधर्म के नाशक राम
सत्य अहिंसा उपासक राम
अवधपुरी के शासक राम
राक्षस रावण विनाशक राम
राम ही स्वर संगीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

आज राम और कल हैं राम
वायु,धरा,ऊष्मा जल हैं राम
सदा अविरल निश्छल हैं राम
राम नाम बेचना छल हैं काम
घृणा में नहीं प्रीत में हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम।

सत्ता नहीं संस्कार हैं राम
प्रचार नहीं व्यवहार हैं राम
नहीं धूसरित संसार हैं राम
व्यथाओं का उपचार हैं राम
निरंजन विष्णु अवतार हैं राम
अबला के बलजीत हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम
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