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14. नूतन रस (हिंदी कविता संग्रह 03) 20 कविताएं ✍️

हिंदी कविता संग्रह - नूतन रस (03)

सूची - 
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62 गुरु वंदना....
61 तारे छिपते नहीं.....
60. सूरज उग रहा है.....
59. वह चाँद.....
58 राखी....
57 बारिश....
56. बहस....
55. आओ लड़ना शुरू करें.....
54. रसोई.....
53 याद दिला दूँ......
52. वाग्जाल ..
51. शब्दोपचार...
50. भय से अभय की ओर...
49. स्वीकार करो....
48.गगन की छत....
47. गहराई के शब्द .....
46. तारा.....
45.नहीं चाहते......
44.दोस्त.........
43.भाषण.........
42. राखी.....
41. चीख.....
40. सपने......
39.भाई दूज.......
38. एक बात बताओ....
37. दोहे.....
36. गुरु नानक देव......
35. हे, भारत के जवाहर......
34. चांद से आए हो क्या.....
33. सोशल मीडिया.....
32. तुम्हें सौंपता हूं.....
31. लड़ कर मरूंगा......
30. चित्र...
29. किस से कहूं...
28. हो गया....
27. लोग....
26. जाते हैं विदेश लोग....
25. मकड़ी का जाला....
24. लाल सलाम...
23. राम......
22. द्वेष....
21. युद्ध रुकना चाहिए.....
20. उपकार स्वयं पर....
19. गांधी.....
18. श्रेष्ठ ....
17. कच्ची आग....
16. नटवरलाल....
15. बचत.....
14 भारत के जवाहर - श्रद्धांजलि गीत...
13. बारिश एक कविता....
12. मकान बनाम घर......
11. दिशा.....
10. माँ.....
09. दोस्त.....
08. होने का मूल्य.....
07. जब लोग खड़े होते हैं......
06. आलोचना सही है......
05. राजनीति एक अखाड़ा...
04. सैनिक एक प्रहरी.....
03. संत और फकीर.....
02. संघर्ष और सरकार.........
01. बाबू काम नहीं करता......

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62. शिक्षक महिमा .....

शिक्षक एक दर्पण है,
शिक्षक दीप समान।
शिक्षक नाम समर्पण है,
शिक्षक नव-विहान॥

शिक्षक ज्ञान की गंगा,
संस्कारों की धार है।
शिक्षक स्वप्न-संरक्षक,
जीवन का आधार है॥

शिक्षक पिता की छाया,
ममता का विस्तार है।
शिक्षक भाल का तिलक,
गौरव का संसार है॥

शिक्षक साक्षात् विधाता,
भविष्य का शिल्पकार है।
अज्ञान-तिमिर का संहारक,
ज्ञान-ज्योति का द्वार है॥

शिक्षक प्राण-संचारक,
अंतर्मन का प्रकाश है।
नवदीप प्रज्ज्वलित करे,
जीवन का विश्वास है॥

शिक्षक एक किसान है,
शिष्य उसकी फसल।
श्रम-स्नेह से सींचे,
पाए कर्मफल॥

पदाभिमान से दूर,
परिश्रम करे भरपूर।
विद्यार्थी की हर प्रगति,
शिक्षक का गुरूर॥

कलम उसकी तेग़ है,
स्वाध्याय का हथियार।
समर्पित भाव-भावना,
विद्यालय है परिवार॥

शिक्षक सदा महान है,
साधक के समान है।
शिष्य की सफलता,
शिक्षक का अभिमान है॥

शिष्य यदि मोती बने,
शिक्षक निर्मल सीप।
शिष्य की उपलब्धि में,
जगमग गुरु-प्रदीप॥

शिक्षक आनंद-गीत है,
शिक्षक मधुरिम राग।
गुरु-वाणी से मिट रहे,
भय-द्वेष के दाग॥

गुरु की महिमा कैसे लिखूँ,
शब्द हुए लाचार।
गुरु पालक, गुरु देव है,
गुरु ज्ञान का द्वार॥

गुरु-वाणी वेदों में,
गुरु-वाणी है कुरान।
गुरु से जगत ज्योतिर्मय,
गुरु प्रकाश का भान॥

जिगर कहे! गुरु-कथा,
शब्दों में कह न पाऊँगा।
जिसने मेरा जीवन गढ़ा,
उस गुरु को नहीं भुलाऊँगा॥
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61. तारे छिपते नहीं....

तारे छिपते नहीं,
सूरज डूबता नहीं,
चाँद निकलता नहीं,
सब अँधेरे और प्रकाश का भ्रम जाल है।

घने गहरे काले बादल,
कड़कती मचलती चपल,
अंतरिक्ष में वृहद मस्तक पर,
एक बिंब के सिवा कुछ भी नहीं।


सूरज डूबता नहीं,
क्षितिज के उस पार,
चमकता है पृथ्वी की ओट में,
सदैव उष्ण और जीवंत।

चाँद निकलता नहीं,
ना ही उसके टुकड़े हुए,
रात के माथे पर दिन में,
निश्चित गति के साथ चलता है।

तम अमिट है और रहेगा,
बस प्रकाश ने उसे छुपा दिया,
निशा के बीत जाने के लिए,
जहाँ सवेरा रास्ता खोजता है।

हवाएं कभी थकती नहीं,
दीप बुझते हैं फिर से जलाने के लिए,
हर एक स्व पथ पर चलायमान,
भ्रमित मानव, इनको डूबने छिपने निकलने का नाम देता।

हमारा सत्य नश्वर है,
ग्रहों की चाल के सापेक्ष,
वे अकेले नहीं एक व्यवस्था है,
अनजान शक्ति से बंधी।

न्याय की अवधारणा में,
पथ के साथी नक्षत्र हैं,
समझ सको तो,
स्वतंत्र पर बंधन से बंधे।

तारे छिपते नहीं,
सूरज डूबता नहीं,
चाँद निकलता नहीं,
क्योंकि रोशनी का होना
गति पर निर्भर है।

रोशनी वहाँ जन्म लेती है,
जहाँ सदियों से,
 अँधेरा पल रहा हो,
अँधकार आवश्यक है
रोशनी के लिए।

और याद रखना,
दिन या रात कितने भी लंबे हों,
प्रकाश या अँधेरा,
सदा के लिए नहीं ठहरता।

स्थान सापेक्ष भ्रम ने,
हमें अंधविश्वासी बना दिया,
ठहरा हुआ आदमी जो देखता है को सत्य मानता,
पर सत्य छिपा है कहीं ओर सुदूर।

सत्य यह है कि प्रतीति,
सदैव तत्व नहीं होती,
यह अनुभव का नहीं,
विश्लेषण का विषय है।

अतः 
जो छिपा है, वह समाप्त नहीं,
जो दिखता है, वह पूर्ण सत्य नहीं,
जो बदल रहा है, वह नष्ट नहीं,
जो स्थिर दिखे पर है गतिशील।
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60. सूरज उग रहा है....

हुई रात घनघोर अंधेरी,
काला अंधा आकाश हुआ।
चारों तरफ गहरा सन्नाटा, 
चोरी सूर्य का प्रकाश हुआ।

पर क्षितिज के उस पार,
कल बीत गया वो कल है।
सन्नाटे की छाती चीरती,
पूरब में नई हलचल है।

पूरब के नभ की लालिमा ने,
सदियों से अँधेरा देखा है।
भूखे ने रात- रात जागकर,
प्रभात, सवेरा देखा है।

हाड़ कंपाती इस ठंड में,
चिथड़ों से लिपटी माँ जागी।
कहीं मिल जाए आग जरा सी,
और रोटी एक सुखी, बासी या दागी।

आज वही सुबह हुई जो रोज होती,
सूरज उगा और बुझ गई ज्योति।
उगते सूरज को दीप दिखाने,
निकलेगा सीप से चमकता मोती।

खेत में कृषक के माथे पर,
उतर रही है, एक किरण।
जिसने मिट्टी में पसीना बोकर,
मौसम से फसलें माँगी थी।

हर सुबह का नया उजाला,
उम्मीद जगाता रोटी की।
पर अंधेरा कायम अभी तक,
आश नहीं घर लौटी थी।

सूरज उग रहा है उनकी आँखों में,
जिनसे किताबें छीन हथियार दिए।
सूरज उग रहा है उन हाथों में,
जिनके जी ते मन को मार दिए।

सूरज उग रहा है उन सपनों में,
जो सोने से पूरे हो न सके।
हंस रहे हैं अक्ष धरती के,
जो भय के कारण रो न सके।

वे अब पूछ रहे हैं,
“अगर आसमान सबका है।
तो फिर खुलकर उड़ने का,
स्वतंत्र अधिकार किसका है?”

सूरज उग रहा है,
अंधकार नहीं रहेगा,
तम के विरुद्ध आवाज़ें उठने लगी हैं
बहुत सहा अब नहीं सहेगा।

ख़ामोशी अब ख़ामोश नहीं रहेगी,
उसकी परतों में प्रश्न पल रहे हैं।
जो कल तक झुका हुआ था,
उठने को पग मचल रहे हैं।

अपने हिस्से का अंतरिक्ष,
मांग रही छोटी चिड़िया।
दाने-दाने को तरसी जो,
पंख फैला रही है छोटी चिड़िया।


और सुनो...
यह सूरज किसी एक घर की छत पर,
नहीं उगने दिया जाएगा।
उसको हिस्से का प्रकाश मिलेगा,
जो क्रांति गीत गाएगा।

सूखे खेतों के लिए,
बंद कारखानों के लिए।
टूटी झुग्गियों के लिए,
खाली स्कूलों के लिए है।

उन रास्तों के लिए,
जिन पर तुमको चलना है।
नंगे बदन नंगे पैर,
ढर्रा पुराना बदलना है।

यह उन लोगों का सूरज होगा,
जिन्होंने उम्मीद बचाकर रखी है।
यह रात चाहे जितनी लंबी हो,
हार के नीचे जीत छिपाकर रखी है।

आज क्षितिज पर लालिमा,
सबकी है सबके लिए।
आजाद क्षितिज की हरितिमा
है नहीं किसी की गरज के लिए।

सूरज उग रहा है,
अब केवल दिन नहीं होगा,
नए समय का नया सवेरा,
नए दौर में, नया गीत गाना होगा।

,59. वह चाँद…

आदत से मजबूर मन ने कह दिया,
हमसे बहुत दूर है वह चाँद।

रात के गहरे अँधियारे को चीर,
ज्योत्स्ना बिखेरता आया वह चाँद।

तारों की बारात में दूल्हा बन,
दूधिया घोड़े पर चढ़ के आया वह चाँद।

मिट्टी से सना, धूप में जला,
काले सीने पे उजली किरणें समेटे वह चाँद।

भूख से लड़ती माँ,
खेत में जूझते पिता,
मज़दूर की हथेली पर रोटी बन आया वह चाँद।

जिस दिन डर की दीवारें अपने हाथों से तोड़ोगे,
उस दिन घर की चौखट पे खुद आएगा वह चाँद।

जिस दिन किस्मत की लाचारी का
रोना होगा बंद,
धरती में से निकलेगा वह चाँद।

चाँद आसमान में नहीं, आँखों में रहता है,
बच्चे की मीठी पुकार पर मामा बन आता वह चाँद।

विरह की वेदना में प्रियसी गिनती है तारे,
अचानक प्रियतम संग आँगन उतरता वह चाँद।

जिगर, खुदी के दम पर सपनों को हकीकत कर,
तेरे बदलने से बदलेगा चाल वह चाँद।

कदम बढ़ा, लक्ष्य की ओर दम लगा,
एक दिन तेरी मुट्ठी में उतरेगा वह चाँद।

जिगर तुमने कहा चाँद बहुत दूर है?
आँख उठाकर देख, तेरे भीतर बसा है वह चाँद।
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58. राखी बाँधना ही काफ़ी नहीं

बहन ने मेरी कलाई पर राखी बाँधी है,
यह धागा नहीं, विश्वास का बंधन है।

मैं कहता हूं, डर मत बहना,
तेरी रक्षा करने हेतु मैं हूं ना।

बहन मुस्कुरा कर धीरे से बोली,
भैया, मेरी रक्षा का वचन हर साल मत देना।

बस इतना करना कि इस दुनिया में मैं,
जलकर ना मरूं, डरकर ना जिऊं।

मेरे पथ पर तुम पहरा ना देना,
बस, पथ से वीभत्स नरभक्षी हटा देना।

मेरी उड़ान को हथेली मत देना,
स्वतंत्र उड़ान हेतु आसमान खुला रखना।

मेरी आवाज़ को सम्मान का प्रश्न मत बनाना,
तुम, उस आवाज़ को सशक्त बनाना।

मुझे राखी के बदले उपहार नहीं चाहिए,
मैं सहोदर हूं, सहोदर की बराबरी चाहिए।

मेरी नहीं मेरे अधिकारों की रक्षा करना,
प्रत्येक सहमति और इच्छा का सम्मान करना।

मेरे अलावा किसी और के साथ अन्याय को,
तुम, मेरे साथ हुआ अन्याय मानना।

देखना, तेरी तरह मैं भी कभी रात के समय,
बिना तेरी सहायता के निडर बाहर निकल सकूं।

मैं चुप था, कलाई पर बँधा धागा,
अचानक बहुत भारी हो गया।

मैने एकटक बहन की ओर देखा,
और पहली बार समझा।

राखी बहन की रक्षा का वचन नहीं,
स्वतंत्र जीवन के अधिकार का संकल्प है।

उस दिन कलाई पर बंधे धागे ने,
एक नए रिश्ते को जन्म दिया।

भाई और बहन के रिश्ते को नहीं,
बराबरी वाली सहोदर के रिश्ते को।
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57. बारिश......

बिजली के सिंहासन पे,
काली बदली आकर,
प्यासी धरती के माथे पर,
हरा तिलक लगाती है,
जब बारिश आती है।

भीगी मिट्टी की महक,
छम-छम गिरती बूँदें,
बूढ़े नीम में जवानी लौटाती है,
जब बारिश आती है।

मन का बच्चा खिल उठा,
जब काग़ज़ की नाव चली,
सूने खेतों में लहराती 
हरितिमा छा जाती है,
जब बारिश आती है।

किसान की आँखों में,
सपनों की फसल उगी,
टप-टप गिरती बूँदें,
धरा के गीत सुनाती हैं,
जब बारिश आती है।

कहीं रसोई में पकौड़े,
गुलगुलों की महक,
कहीं टपकती झोंपड़ी,
गरीब को डराती है,
जब बारिश आती है।

कहीं यह वरदान बनी,
कहीं बाढ़ बन जाती है,
कहीं हँसाती, कहीं रुलाती,
जाने क्या-क्या रंग दिखाती है,
जब बारिश आती है।

हे मेघ! इतना बरसो,
सूखी नदियाँ भर जाएँ,
धरती की प्यास बुझा कर,
निराशा में आस जगाती है,
जब बारिश आती है।

आसमान से पानी नहीं,
उम्मीदें बरसती हैं,
फल-फूल, अन्न की कलियाँ,
महि की गोद सजाती है,
जब बारिश आती है।
शब्दार्थ - 
गुलगुला - एक मीठा पकवान
महि - धरती
******************************
56. कविता - बहस.....

बहस से, 
सच की तलाश हो,
अँधेरे का विनाश हो,
घर-घर में उजास हो,
बहस हो, तार्किक निवास के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

बहस को,
अहंकार से मुक्त करें,
तथ्यों से पक्ष सशक्त करें,
शासन को जनयुक्त करें,
बहस हो, बिंदु किसी खास के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

बहस में,
तर्क हों, तिरस्कार नहीं,
शालीनता पर प्रहार नहीं,
आए संबंधों में दरार नहीं,
बहस हो, वास्तविक इतिहास के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

बहस से,
विचारों को पंख मिले,
अमूर्त से मूर्त अंक मिले,
मंथन से अमृत-पंक मिले,
बहस हो, विवेकपूर्ण सद्भाष के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

बहस से,
नव प्रश्न निर्माण करें,
प्रत्युत्तर का आह्वान करें,
मिल बैठ कर निदान करें,
बहस हो, पाखंड के नाश के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

केवल अपनी सुनने वाले में ज्ञान कहां,
भ्रम जाल में फंसा अभिमान जहां,
तर्क में हारे का अपमान कहां,
बहस हो, संवाद में उल्लास के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

जिगर बहस ऐसी करें,
जहाँ व्यक्ति नहीं, विचार हों,
शब्द से शब्द अंगीकार हों,
प्रत्येक शब्द में संस्कार हों।
बहस हो, अविश्वास से विश्वास के लिए,
बहस हो, सच की तलाश के लिए।

शब्दार्थ - पंक - कीचड़
सद्भाष - अच्छी भाषा
********************

55. आओ लड़ना शुरू करें...

जो बीच में रह गई
अधूरी इबारत,
आओ मिलकर पूरी करें।
चुप्पी की दीवारों से
टकराना शुरू करें,
आओ लड़ना शुरू करें।

आप नहीं माने,
हमने हर एक बात
पूरी शिद्दत से रखी।
अब एक नया ख़्वाब
गढ़ना शुरू करें,
आओ लड़ना शुरू करें।

आप भी हैं, हम भी हैं,
आज़माकर देखेंगे।
कब तक नहीं मानोगे?
इंक़लाब के सैलाब में
नया इतिहास गढ़ना शुरू करें,
आओ लड़ना शुरू करें।

बह न जाए अकड़ कहीं,
अभी तो दरख़्वास्त है।
हम बचें या मरें,
जब सिर पर कफ़न बाँध लिया,
फिर डरना कैसा?
आओ लड़ना शुरू करें।

इंक़लाब ज़िंदा है,
इंक़लाब रहेगा।
आख़िरी साँस तक
इंक़लाब ज़िंदाबाद,
इंक़लाब कहना शुरू करें,
आओ लड़ना शुरू करें।

इंक़लाब ज़िंदाबाद!
**************************
54. रसोई, याद आती है, बहुत याद....

रसोई में जलता चूल्हा,
उस पर सिकती रोटी की महक,
दाल में लगता हींग का छौंक,
मसालों के पकने की छनछनाहट,
सरसों के तेल की तीखी धांस
ओर उस पर माँ की पुकार, 
हाथ धो लो, मैं खाना लगा रही हूं।
याद आती है, बहुत याद....

रसोई में....
उबलती चाय के साथ रिश्तों में गर्माहट,
ध्यान खींचती नव वधु के हाथों में खनकती चूड़ियां,
खिचड़ी में तैरते देशी घी की महक,
हारे से निकली कढ़ावनी का गुलाबी खुरचन,
उस पर दादी का बुलावा, 
बच्चों, दो पलिया दूध पी कर सो जाओ।
याद आती है, बहुत याद....

रसोई के सामने...
पाटे पर रखी चमकती कांसे की थाली
छाछ से भरा बड़ा सा पीतल का गिलास,
मूढ़े पर बैठ कर, खाना परोसती बड़ी बुआ,
एक एक गर्म रोटी लाती भाभी
पिताजी के पास बैठा मैं और भाई,
उस पर दीदी का एक कौर स्नेह से ओर खिलाना।
याद आती है, बहुत याद....

रसोई का.....
वो रूप जो पहले था शायद आज नहीं
अब गैस पर पकता खाना
टेबल पर स्टील के दैत्य
ऊपर लटकता जानलेवा फानूस
बहुत बड़ा, सूना डाइनिंग हॉल,
भोजन के साथ मोबाइल में खोए लोग
उस पर सन्नाटा, केवल सन्नाटा,
मां की वो रसोई, रसोई, याद आती है, बहुत याद....

आज की किचन में...
पेट तो भरता है पर भूख नहीं मिटती
संबंध तो हैं पर रिश्ते नहीं दिखते,
खाना तो है पर रस नहीं बनता,
नाइफ, फोर्क,प्लेट, बाउल में, थाली की वो मधुर ध्वनि नहीं,
बाई के बनाए खाने में माई के बनाए खाने सा स्वाद कहां,
उस पर, पिताजी का वो एक निवाला,
याद आता है, बहुत याद....
*********ए**
53. याद नहीं है तो याद दिला दूँ...

चेहरे पे कितने चेहरे लगाए बैठे हो, 
माँ के नाम पर घाव गहरे लगाए बैठे हो। 
तुम बजाओ ढोल, मैं नाद मिला दूँ, 
याद नहीं है तो याद दिला दूँ...

बिकते ज़मीरों का है बाज़ार किसका, 
यंत्र, तंत्र, षड्यंत्र हथियार किसका। 
हर आह में छिपा अवसाद सुना दूँ, 
याद नहीं है तो याद दिला दूँ...

सत्ता के खेतों में घृणा बोई किसने, 
बस्तियों पर राख की चादर ढोई किसने।
समय की प्रत्येक रूदाद सुना दूँ, 
याद नहीं है तो याद दिला दूँ...

रोटी छीनी, सपनों को तोड़ा गया, 
मानव लहू बूँद-बूँद कर निचोड़ा गया। 
हर घाव का तुमको हिसाब दिला दूँ, 
याद नहीं है तो याद दिला दूँ...

इतिहास कभी खोता नहीं, लौट आता है, 
संहारक का असल चरित्र खोज लाता है। 
विभत्स स्मृतियों का परिदृश्य दिखा दूँ, 
याद नहीं है तो याद दिला दूँ...

अवसर का लाभ उठाना रीति नहीं, 
जो ख़ुद पर लागू न हो, वह नीति नहीं। 
छल और बल के खेल से पर्दा उठा दूँ, 
याद नहीं है तो याद दिला दूँ...
******************

52. वाग्जाल........!

मंचों पर शब्दों का सागर बहता है,
किन्तु सत्य मौन ही रहता है।

भाषण में वादों के महल सजाए जाते हैं,
कथनी से भिन्न करनी के गुर सिखाए जाते हैं।

शब्दों की चमक से आँखें चौंधियाती हैं,
पर हक़ीक़त कोसों दूर नज़र आती है।

भाषण तालियों की गूँज से उभरता है,
कागज़ पर लिखा, कागज़ पर ठहरता है।

अब झूठ के मंच अति व्यापक हुए,
छल के सिद्धांतों के अध्यापक हुए।

भाषण में वास्तविकता का अंश हो,
जन-मन में न अविश्वास का दंश हो।

वचन को कर्म से सिद्ध करना होगा,
अन्यथा अभिभाषण का अधिकार न होगा।

जिगर! उद्बोधन का उद्देश्य केवल शोर नहीं,
सच कहने से बढ़कर कहीं कुछ और नहीं।
*******----

51. शब्दोपचार.......
होठों से बरसती गालियाँ ज़हर होती हैं,
रिश्तों की हरियाली पर कहर होती हैं।

तीर, तलवार का घाव भर जाता है पर,
दुर्वचन का दर्द रहता है उम्र भर।

शब्दों में मरहम, कटु शब्दों में वार है,
मानव जिव्हा, प्राणघातक हथियार है।

गाली से कोई भी बड़ा हो नहीं सकता,
पछतावे के बोझ से खड़ा हो नहीं सकता।

जो लोग तर्कहीन बदतमीज होते हैं,
वो घर, गली में गालियों के बीज बोते हैं।

क्रोध की आग, सर पर चढ़ जाती है जब,
भाषा की पटरी उखड़ जाती है तब।

धीमे, मीठे शब्द, पत्थर को पिघला देंगे,
मुंहफट के बोल, दिलों में दरार ला देंगे। 

सम्मान बाँटोगे, बदले में सम्मान मिलेगा,
अपमान भाव बराबर, अपमान मिलेगा।

जिगर! टूटे हृदय का शब्दोपचार करें,
संसार से कटुता का संहार करें।
*****************

50. भय से अभय की ओर..........

भय काँपता हुआ एक चेहरा है,
यह भीतर बैठा घुप अँधेरा है।

यह विवेक को पग-पग रोकता है,
पीढ़ियों से बेड़ियाँ बनकर टोकता है।

भय से झुकने वाले पर अन्याय हुआ,
मौन रहकर सहना, कब न्याय हुआ।

साहस जब-जब जन्म लेता है,
तोड़ भय-बाधाओं को, दम लेता है।

डर से लड़ना ही तो जीवन है,
डर मौत, और साहस बूटी सरजीवन है।

भय के परे अमरता का वास है,
साहस संघर्षों का अभ्यास है।

हाबू का भय, बचपन से मन में बैठा है,
मन बेकाबू का भय, जन-जन में बैठा है।

जवानी में हार का, बदनामी का डर,
हर आदमी को लगा रहता है, अक्सर।

लगे जब सपनों के बिखर जाने का भय,
बड़ी मुश्किल से गुज़रता है, वो समय।

बुढ़ापा बिछड़ने से सहम जाता है,
पल-पल मृत्यु का वहम आता है।

भय जीवन भर मनुष्य को घेरे रहता,
यह हर साँस में संग, शाम-सवेरे रहता।

भय के आगे झुकना मौत से बढ़कर हुआ,
ज्यों साँप की सवारी पे जाना चढ़कर हुआ।

अभय वही, जो भय को पहचान गया,
जो गिर कर भी उठना जान गया।

जिसने भय को जीता, वो सरदार हुआ,
साहस से मनुष्य का उद्धार हुआ।

जिगर! भय की आँखों में झाँक कर, जीना सीखो,
भय असत्य का पाठ, कभी ना सीखो।
****************

49. स्वीकार करो.....
स्वः को जीत कर हार करो
अनिश्चित को स्वीकार करो।
अंतर्द्वंद्व का संहार करो
जीवन का उद्धार करो।
हावी ना खुद पे ज्वार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।

मुद्रा भंगिमा भाव से
ना डरना आभाव से
सींचे न जल केवल लाव से
नहीं पृथक पतवार नाव से।
हृदय पट खोल बड़े द्वार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।

गत समय की बात क्या
चढ़े मस्तिष्क जज़्बात क्या
सत हुआ आत्मसात क्या
युद्ध में शह और मात क्या
मन गंगा जल से पखार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।

शांत चित्त कला अनुगामी
उदिग्न मन में उपजे कामी 
किसने किसकी भुजा थामी
अग्रज नहीं बनो अनुगामी
तीक्ष्ण विचारों की धार करो
सत्य है मृत्यु स्वीकार करो।
*********
 02. गगन की छत....
नील गगन की छत
वसुंधरा पर सोना
भूख मेरी संम्पत्ति
मेरा हंसना हुआ रोना

भावों से भरा
वेदना से डरा
मरता क्या मरता
पहले से मरा

आतंक का पैरोकार 
रब भगवन दरकार
कभी पंडे मौलवी
कभी डराती सरकार

आजाद बेड़ियों में हैं
विश्वकर्मा ओर मजदूर
कृपणता के बंधुआ
किसान रहा मजबूर

गाँव वहीं हैं जहां थे
उनके हक का विकास
क्यों खा गया खा गया
अफसर मंत्री यहां थे
*********
03. गहराई के शब्द.......
अंतशः की गहराई में
मन्थित सागर
हिलोरे मारने लगे
तीव्र वेग मस्तिष्क की
अथाह गहराइयों में
पहुँच कर झकझोरता
उमड़ता गरजता है
उसे रोक पाना असमर्थ
विवेक की सीमाएँ
तब बरसती हैं
शब्दों की बूँदें
ओर बनती है नदी
जिसे बहा देता हूँ
कलम जटा माध्यम से
कागज की धरा पर
नव सृजन नव रचना
ओर नाम देता हूँ
कविता।
*********
04. तारा.........
एक तारा टूटा
अपना था रूठा
ना बंदूकें सजी
ना संगीने तनी
लाश ही लाश
मुहाफ़िज़ गायब
शैतान आया
बनकर मुहाफ़िज़
दुनिया जलाने
सब मिटाने
आदमी को हराने
पहले था मुश्किल
जीना
अब है मुश्किल
मरना
बहुत मुश्किल
जिंदा लाशें
मुर्दे चल रहे
कफ़न के इंतज़ार में
सब लूटकर
कब्र लूटने
आदमी को हराने
आया है शैतान
मैं ओर मेरे सब
बन्द हैं कैद बिना
अफसोस है
आज़ादी वहम है
निजात कब मिलेगी
हवा में ज़हर है
बस ज़हर।
***********
05. नहीं चाहते.........
हम चलना नहीं चाहते
उजाड़ रास्तों पर
जो सही किंतु दुर्गम
हम चलना चाहें
सुगम रास्तों पर
जो सुगम पर गलत
जो नहीं पहुंचाता
मरुस्थल से
नखलिस्तान में
शांत शीतल
सत्य मार्ग
आ पहुंचे
झाड़ झंझाड में
निकलना मुश्किल
आजीवन
************
06. दोस्त.......
मेरे दोस्त
मितवा
तुम कहो तो
तुम्हें पूछ कर
तुम्हारे घर में
चोरी कर लूं।

क्या चोरूँगा
क्यों चोरूँगा
कब चोरूँगा
तुम्हे बता कर
तुम्हारे घर में
चोरी कर लूं।

नहीं चुराउंगा
रुपये डॉलर
और गहने
नहीं चुराउंगा
महंगे तोहफे
या हार गले का

मैं चुराउंगा
एक अनमोल
खजाना
पुरा नहीं
थोड़ा सा
प्यार दुलार
अच्छी बातें
बड़ा दिल
परोपकार की
भावना
मीठी बोली
सरस् व्यवहार
आकर्षित करने की
मन में बसने की
एक कला
अनूठी कला
निराली चोरी
चोरी कर लूं।

यह सब
बिन माँगे
दोगे
मुझे औऱ सब को
या करनी होगी
तुम्हें पूछकर
तुम्हारे घर में
चोरी।
************
07. भाषण.......
भाषण बाजी ज्ञान सुज्ञानी
पूजे अंधियारे की शैतानी

बने मसीहा करे मनमानी
जंगली सामंती अभिमानी

शो विण्डो के अहिंसक
चुप चुपके हैवानी

करो इनका अभिनन्दन
या तैयार देने कुर्बानी

दाल परोसे आदर्श की
खाये घर में बिरयानी

गेंदा गुलाब रजनी नहीं
नागफनी लगे सुहानी।
*********
08. राखी.........
राखी बहना की मिली
बन्द लिफाफे में आज

बचपन धुंधला याद आया
वो खेलकूद राजसी अंदाज।

राखी बांधे वो गालियां घुमा
कभी जहां था अपना राज।

बहन मुझ से मैं उस से
मिलने को बेताब।

मेरे भैया मेरे चंदा
हो तेरी उम्र दराज।

प्रीत स्नेह से निहारा
भूल गया सब काज।

आशा किरण मन हर्षाये
राखी बहना की मिली आज।
*********
09. चीख.....
चीख चीख कर
जमीन-आसमान तक
उछाल रहे हैं
अर्थहीन शब्द
जिनके भीतर घिन
और कुछ नहीं
एक पेट की
दूसरे पेट से
एक आंख की
दूसरी आंख से
साजिश भर है
सूझती आंखों की
मन की आंखों को
अंधा करने की
साजिश
दर असल
कुछ लोग
एक को
अनेक में बांटकर
तुझे मुझे बरगलाकर
रच रहे साजिश
यह एक साजिश है
तेरे मेरे मुंह 
निवाला छिनने की
एक साजिश
सिर्फ एक साजिश
********
10. सपने..........
हजारों आंखों ने देखे सपने 
हर एक सपना सच्च भी होगा।
जुबां सलामत शहद अपनी।
तुम ने सोचा चले गए हम
हमारा सलीका नया नहीं है
नई नहीं यह ज़हद अपनी।
कह दो ग़म से रहे दूर हम से
डरे नहीं हैं कभी भी तुम से
बनेगी ये जा लहद अपनी।
********
11. भाई दूज........
भाई दूज का त्योंहार 
एक अनुपम उपहार
यमराज मिले बहन से
किया आदर सत्कार।

सुभद्रा से कृष्ण मिलने आए
भाई का अपार स्नेह लाए
आवभगत में पलक बिछाए
पांवों में फूल बिछवाए।

यमराज ने दिया वरदान
दिया बहन को सम्मान
हुए अति प्रसन्न भगवान
आज के दिन सूने श्मशान।

रहे यह संबंध निश्छल
छूने ना पाए छल-बल
बहन हो सबकी सबल
पवित्राय ज्यों गंगा जल।

जिगर अक्षत भाल लगे
बहन को भाई कुणाल लगे
मेला यह हर साल लगे
दुआ बहन को हर हाल लगे।
                   *********
12. एक बात बताओ....
चलो, एक बात बताओ 
करीब बैठो यहां आओ
पास बैठ शम्मा जलाओ
यूँ  दूर - दूर  मत जाओ
चलो, एक बात बताओ।

तब  बात  कुछ ओर थी
तेरे  हाथों में मेरी डोर थी
मैं चांद था तुम चकोर थी
खुद हंसो मुझे हंसाओ 
चलो, एक बात बताओ।

अपने बच्चे बड़े हो गए हैं
सब पैरों पे खड़े हो गए हैं
पार बेड़े हो गए हैं
बैठ कर तुम भी सुस्ताओ
चलो, एक बात बताओ।

इनके बैंक खाते बने
वर्षा में हम छाते बने
धूप में अहाते बने
उन बेटों को बुलाओ
चलो, एक बात बताओ।

मुंह का निवाला दिया
अंधेरों से उजाला दिया
खुला सब न ताला दिया
वैसे ही हमें खिलाओ
चलो, एक बात बताओ।

जिगर यह जरूरी नहीं 
तमन्नाएं सब पूरी नहीं
कहानी है अधूरी नहीं
कहो खुद और सुनाओ
चलो, एक बात बताओ।
**********
13.📘 “जिगर चूरूवी के दोहे.....
1. सत्य और समाज
1️⃣
सत्य कहो तो काटते, झूठ कहो तो ताज।
ऐसे उलटे जगत में, किससे करूँ मैं लाज॥
2️⃣
नेता बोले झूठ जब, जनता माने सत्य।
देश कहाँ अब जाएगा, ईमान हुआ ध्वस्त॥
3️⃣
रोटी, कपड़ा, घर मिले, यही रही अरमान।
किसने देखा अब यहाँ, नीति या भगवान॥
4️⃣
धरती माँ पर लुट रहा, झूठ फरेब का माल।
भूखा इंसां ढूँढता, सच का अब है हाल॥
5️⃣
मन्दिर मस्जिद बाँटते, दिल की सारी राह।
ईश्वर एक ही सदा, क्यों फिर इतना चाह॥
6️⃣
रिश्ते नाते बिक गए, पैसों की परवाह।
माँ-बाप तक हो गए, सौदे में गुनाह॥
7️⃣
भूखा बच्चा बोलता, माँ भूखी रह जाए।
ऐसे पावन त्याग पर, जग श्रद्धा बरसाए॥
8️⃣
जिस घर में सम्मान है, वहीं सच्चा समाज।
झूठ वहाँ टिकता नहीं, सत्य करे अभ्यास॥
9️⃣
भाई-भाई दूर हैं, नाता केवल नाम।
लालच ने कर दी यहाँ, रिश्तों की नीलाम॥
10️⃣
जात पात के फेर में, मानवता खो गई।
राम रहीम खुद यहाँ, दीवारों में रो गई॥

2. नीति और जीवन दर्शन
11️⃣
सत्कर्मों की रेड़ियाँ, बाँट सको तो बाँट।
पुण्य वही जो दे सके, औरों को भी ठाँठ॥
12️⃣
फल की चिंता मत करो, कर्म ही सच्चा धर्म
जो करेगा प्रेम से, मिलेगा शुभ कर्म॥
13️⃣
लोभ मोह के जाल में, मत फँस मानव मित्र
छूट न पाए साँस जब, पछताएगा चित्र॥
14️⃣
मन का दीपक जो जलाए, उसका जीवन धन्य।
अंधियारे में सत्य की, होती है जय जय॥
15️⃣
ज्ञान बिना इंसान का, जीवन जैसे शून्य।
पढ़ लिख कर भी रह गया, भीतर जैसे धून्य
16️⃣
संगति जैसी रखे तू, वैसा बनता भाव।
गंदे जल में डूबकर, कैसे मिले सुवास॥
17️⃣
गर्व करे जो जन्म पर, वह अज्ञानी मान।
कर्म से ऊँचा वही, जो देता पहचान॥
18️⃣
धन से कोई बड़ा नहीं, मन से होता शुद्ध।
जिसने बाँटा प्रेम को, वही रहा अमरुद्ध॥
19️⃣
जिसका मन निर्मल रहा, वही सच्चा ज्ञानी।
बिना दया के जीवन क्या, केवल वीरानी॥
20️⃣
सद्गति उसको ही मिले, जो रखे उपकार।
बोले मीठे बोल जो, हर ले दूसरों भार॥

3. शिक्षा, धर्म और समय
21️⃣
शिक्षा से ही देश का, होता है उत्थान।
अंधकार मिटता सदा, ज्ञान बने पहचान॥
22️⃣
गुरु बिन ज्ञान न मिले, न जीवन का अर्थ।
जिसने सीखा आदरमय, जीता सच्चा पथ॥
23️⃣
धर्म वही जो जोड़ दे, न बाँटे जनमान।
सेवा से भगवान हैं, पूजा से न मान॥
44️⃣
मन्दिर में भगवान से, माँगे सब संसार।
किसी गरीब के द्वार पर, कोई न पहुँचा प्यार॥
25️⃣
समय बड़ा बलवान है, सबको देता सीख।
जो समय को मानता, जग में पाता दीख॥
26️⃣
चलता टेम अनमोल है,मत कर इसमें भ्रान्त
जीवन क्षणिक, स्नेह कर, कर्म रहो संतान्त
27️⃣
स्वार्थ नहीं जो सोचता, वही सच्चा वीर।
लोक-कल्याण हेतु जो, त्याग करे गंभीर॥
28️⃣
संघर्षों से ही मिले, जीवन को आकार।
पत्थर पीसने से ही, बनता सुन्दर हार॥
29️⃣
बेटी जब शिक्षित हुई, जग का भाग्य खिला।
माँ की गोद में पला, उजियारा सवेरा मिला॥
30️⃣
जो दूसरों के काम आये, ही धन्य जन जान
निज स्वार्थ के फेर में, होता मन अपमान॥

4. समसामयिक व्यंग्य और अनुभव
31️⃣
रातभर मस्जिद में रहा, इबादत फरियाद।
सुबह परीक्षा लिख न सका, याद न आये बात॥
32️⃣
जूते कपड़े बाल सब, भई पोशाक अजीब।
खाते-पीते घर के भी, बच्चे लगें गरीब॥
33️⃣
लड़कों से लड़की बढ़ी, पढ़े कमा ले आज।
अनपढ़ बेरोज़ार जन, कैसे करें समाज॥
34️⃣
हाथ में ध्वजा ले खड़ा, बोले “जय श्रीराम।”
घर में पानी लोटा भर, पिता करे कोहराम॥
35️⃣
पानी का अपव्यय बुरा, होगा एक अभिशाप।
बिन पानी सब सूखता, जीवन हुआ सन्ताप॥
36️⃣
मिथिला से सीता चली, कर स्वयंवर दान।
भाग्य हुआ दुर्भाग्य में, जब देखा अवसान॥
37️⃣
पैर चादर से निकाल कर, करना मत अति काम।
केंचुली से सर्प भी, पाता विश्राम॥
38️⃣
होत में जोत है सदा, सब होत में दाता।
अणहुति राख बड़ी कहे, हे कृपालु विधाता॥
39️⃣
लाभ ही सब कुछ नहीं, जीवन के हैं और।
चाँद खिंचे जलधार को, प्रीत खींचे ठौर॥
40️⃣
मन में कभी न राखनी, जो बात ग़ैर कहे।
समय गया तो फिर नहीं, फागुन जैसे बहे॥
41️⃣
पहली कक्षा में गया, पाटी हाथ में कोरी।
आज कलम हाथ में है, गुरु कृपा सँजोरी॥
42️⃣
आँचल और अंचल में, आया कितना भेद।
आँचल ढके सृष्टि सदा, अंचल ढक न देद॥
43️⃣
आँख मूँदकर जो चले, न माने निज सोच।
चलते-फिरते रोग हैं, जीवन उनका खोच॥
44.
दोहा सीधी बात है, गागर में सागर।
जो समझे इस भाव को, वही सच्चा आगर
45.
46.
47.
48.
49.
50.
51.
            *************
14. गुरू नानक देव......
सत जपे नानक गुरू मेरे का नाम
सब जपे नानक गुरू मेरे का नाम 

सर्वजन हित का अवबोध किया
स्वयं सह के दुःख का अवरोध किया।

खुद ने किया पहले कहने से वचन
आचरण से संदेश अत्याल्प प्रवचन

गुरू बाणी में ऊंच नीच का भेद नहीं
बड़ा छोटा रंक राजा का विभेद नहीं।

उपेक्षित की रक्षा का उचित समाधान
गुरू ने स्थापित किया समाज गुण प्रधान।

वर्ग संघर्ष की धारणा का मात्र एक विकल्प
मानव - मानव एक समान का संकल्प।

समतामूलक समाज की लगाई गहरी नीव
बुरा किसी का ना करो न दुःखी हो जीव।

गुरू ग्रन्थ साहेब में रची धर्म की सीख
साईं इतना दीजिए ना मांगे कोई भीख।

पंथी का धर्म करे मानव हित अपार
अहित का किसी के उठे ना विचार।

जिगर गुरू को प्रणाम ईश के स्थानक
जय हो गुरू देव की जय गुरु नानक।
            ************

हे भारत के जवाहर

हे भारत के जवाहर,
राष्ट्र प्रेम के गवाहर
स्वतंत्र अटल सवाहर
सत्य, ओजस्वी कृतज्ञ न्यासी
तुम जेल में थे।

असहयोग की आग में
मां घायल लाठियों की लाग से
जागृत समाजिक जाग से
धन्य, अडिग संकल्पित प्रवासी
तुम जेल में थे।

पत्नी मृत्यु–शैया पर
सवार द्वंद्व की नैया पर
तरुण बलि स्व बैया पर
हे, कलयुग के सन्यासी
तुम जेल में थे।

जमानत के काग़ज़ हाथ में
धैर्यशील अंतर्मन साथ में
चुनी स्वतंत्रता कारावास में
तुम, बापू के अडिग विश्वासी
तुम जेल में थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के सूत्रधार
धधकती आग, अंग्रेजी प्रहार
जन्म राजीव रत्न का नामदार
ओ, महलों के आदिवासी
तुम जेल में थे।

जिन्ना - सावरकर लड़ रहे
विभाजन के डोरे पड़ रहे
नागरिकों के घर उजड़ रहे
हे, प्रयत्नशील वनवासी
तुम जेल में थे।

कश्मीर का दावानल उठा
दुश्मन का कुत्सित प्रयास झूठा
जेल में हरि सिंह से मिलने
खिन्न उदास उच्छवासी
तुम जेल में थे।

सहे अत्याचार फिरंग के
नए पैंतरे वार फिरंग के
जाति धर्म अंगार फिरंग के
एक मानने वाले काबा काशी
तुम जेल में थे।

                 *********
16. चांद से आए हो क्या.......
कविता - चांद से आए हो क्या 
चांद से आए हो क्या, जो तकलीफ नहीं होगी।
धरती से पराए हो क्या, जो तकलीफ नहीं होगी।

जन्म पूर्व यहां संघर्ष शुरू, मरने तक रहेगा
अभी सहा ही क्या, ना जाने क्या-क्या सहेगा।

ओरों से आगे निकलने की होड़ लगी
मेहनत कठिन शक्ति जी तोड़ लगी है। 

बढ़ी प्रतियोगिता हर मोड़ पर भारी 
बिजनेस बड़ा हो या नौकरी सरकारी।

चिंता घर बसाने की  होने लगी
जिंदगी हम पे हंसने कभी रोने लगी।

युवा अवस्था आते बच्चे पालने आए
खुद सोएं दिन में हमें रात भर जगाए।

बढ़ते बच्चों का लालन पालन कैसे हो 
अमीर करते हैं, ठीक बच्चों का वैसा हो।

मुन्ना जिए राजा जैसा बेटी ज्यों गणगौर
बेटे को विदेश भेजा बेटी को बंगलौर

हल्द हाथ हेतु काबिल रिश्तों की खोज
संतान सुख के लिए  घुटते हैं हर रोज।

बेटे के विलायती बहु बेटी ने स्वयंवर रचाया
व्यर्थ ही मां बाप ने समय अपना गंवाया।

दोनों जा के बस गए उनसे इतनी दूर
डॉक्टर विज्ञानी बने दुनिया में मशहूर।

अब बुढ़ापे ने घेर लिया हट गए हाण
खूं खूं कर खांसते तोड़ें खाट के बाण ।

 मिला मां के गुजरने का दोनों को  संदेश
ऑनलाइन क्रियाक्रम करें हुआ दूर बिदेश।

किस के लिए कमाते हो भागते हो दिन-रात
जग बीती है खुद बीती रखना इतना याद।

जिगर बुराई ना करे करे ना बिराणी बात
दीजिए संतान को संस्कार की सौगात।
*******
17. सोशल मीडिया...
सोशल मीडिया.......
सोशल मीडिया सशक्त माध्यम है बोलने की आजादी का
यही कारण है युवाओं में बढ़ती लत और बर्बादी का।

सूचनाएं जल्दी और सुरक्षित पहुंचाने के माध्यम है 
शर्त पहली उपयोग की इसके धैर्य एवं संयम है।

बेटी और बेटे में अंतर इसके का उपयोग न हो
स्वयं पर नियंत्रण रहे इसका दुरुपयोग न हो।

संविधान लोकतंत्र, मानवता की आवाज़ है यह
सोशल मीडिया नहीं डिजिटल समाज है यह।

जन्म - मरण, समस्या - समाधान, आंदोलन एवं विकास 
उम्मीद जगाता, अफवाह फैलाता अंधेरे में प्रकाश।

विचारों को उठने दो आवाजों को बहने दो
रोको मत, जो मर्यादित है, को कहने दो।

बांधोगे बहती हवा को धूप पर पहरा बिठवाओगे।
रात के बाद निश्चित दिन का नियम कैसे बदलवाओगे।

समय की गति से रीति जीवन की बदलती हैं बदलेंगी
पीढ़ियां बदली हैं, संतति बदली और नस्लें बदलेंगी।

समग्र विकास का, स्त्रोत नहीं, मस्तिष्क अवरोध है
जीवन अविरल धारा है, मन सत्य का शोध है।
***********
18. तुम्हे सौंपता हूं.......
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं 
मैं अतीव भाव अंतर्मन तुम्हे सौंपता हूं
ये आल्हादित प्रस्फुटन तुम्हें सौंपता हूं 
जो अंतश ने रचे वचन तुम्हें सौंपता हूं।
सहित स्याही के कलम तुम्हें सौंपता हूं
द्रवित मनोहर स्पंदन तुम्हें सौंपता हूं।

दारुण अनंत अववय की अभिलाषा नहीं
आशान्वित स्वयं से तनिक निराशा नहीं
कमाधिक्य उच्च-नीच अंतर जरासा नहीं
अहम के स्वतः बिसरने की आशा नहीं।
बंदी बांधव का नीरस मन तुम्हें सौंपता हूं
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।

भाव शून्य मरने पर भाव ना अर्पित हुए
अट्ठासों के बीच सद्भाव ना समर्पित हुए
मुद्रित आडंबर की कथाओं में चर्चित हुए
उन्मुक्त असत्य आकर्षण से हर्षित हुए
सभ्यताओं के सुलभ रण तुम्हें सौंपता हूं 
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।

परिवेश न्याय विरोचक परिहास हुआ
पश्च भारत का अग्रगामी इतिहास हुआ
बरसों से संजोए शौर्य का विनाश हुआ
नागरिक को न अब तक आभास हुआ 
आदिकालिन धूसरित क्षण तुम्हें सौंपता हूं
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।

अवलोकनार्थ उजालों का सागर लाया हूं
सभ्यताओं के मृद- भांड गागर लाया हूं
सत्य शोधक समाज अभिजागर लाया हूं
सर्पिल मंजुल मूर्छित लागर लाया हूं 
भविष्यत भारत का वरण तुम्हें सौंपता हूं 
मुदित हृदय का कंचन तुम्हें सौंपता हूं।
***********
19. लड़ कर मरूंगा 
लड़ कर हारुंगा......

जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा 
डर ही मृत्यु है मैं इसको मारूंगा
शेष महि के ऋण अवश्य उतारूंगा
तिरष्कृत को विजय पार उतारूंगा
मुंह के शब्द जिव्हा पर उभारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।

सुने कोई क्यों परिवेदना तुम्हारी
पोषक है शोषक की वेदना तुम्हारी
भूख के समय जागृत चेतना तुम्हारी
भेंट आराध्य को संवेदना तुम्हारी
गहरे पानी में खुद को उतारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा ।

अपराध की नींव थानों में है
नकली सामान कारखानों में है
उत्पीड़न का संघ घरानों में है
अश्लीलता भरी हुई गानों में है
मैं नकारात्मकता को उभारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।

असंभव है जो संभव हो जाए
पाप रहित समस्त भव हो जाए
नाद सत्य का प्रणव हो जाए
अखिलेश ब्रह्मा अर्णव हो जाए 
मैं अजीत देवों के पग पखारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।

सीख कोई देकर गया समय गया हुआ
बेरंग को रंग देकर गया समय गया हुआ
समाधान देकर गया समय गया हुआ 
जड़त्व को लेकर गया समय गया हुआ
मैं बहते समय को निहारूंगा
जीत भले न हो लड़ कर हारुंगा।
*********
20. चित्र
जीवन क्या एक सरल चल चित्र है 
कोई है शत्रु यहां कोई अभिन्न मित्र है।

घोर अंधेरा मां की कोख जीवन था 
संबंधों की पवित्रता हुई अपवित्र है।

बढ़ती उम्र संग बढ़ता गया विलास 
रहना यहां तेरा मेरा वर्णन सचित्र है।

कभी गरल पान कभी अमृत की धार 
हर्ष विषाद भाव आत्मा के भीतर है

बिखरा जीवन पर समेटे नहीं जाता
कथा जीवन की निर्मल विचित्र है।

मरे जो नहीं मारे इच्छाओं के घ्राण 
कागजी फूलों में व्याप्त सुरभि इत्र है।

मृत्यु सत्य अमरता है एक धोखा 
लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति जीना का पवित्र है।
*****
#किस_से_कहें....

मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है
रोता हर एक छुप छुप के
घर घर की यही कहानी है।
प्यासा शहर प्यासे गांव गली
पहाड़ खोदने की नादानी है।
काटो तोड़ो मोड़ो और मरोड़ो
लोगों की आदत यह पुरानी है
मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है।

पत्थरों की न सुनी पुकार गई
उसे खुद की अच्छाई मार गई।
मुकदमों की बहस के आगे
खुदा की कुदरत हार गई।
नदियों के मुहाने मोड़ कर
काटने जंगल सरकार गई।
फाइलों में कुछ लिखा ओर
कहने को नई कहानी है
मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है

धरती का श्रृंगार करे कौन
ए इंसान तु खड़ा है मौन
प्यासी गंडक सूखी सोन
हरियाली का घटता जोन
धरती बेच विकसित होता
आदमी चांद पे लेगा लोन।
धन वैभव के लोभी मानव
काम तेरा यह शैतानी है
मन की बात किस से कहें
हर आंख पानी - पानी है।
*****
22. हो गया...
ले दे कर नामाकूल अधिकारी हो गया
छटांक अदरक से बंदर मदारी हो गया।

खरीद माल चोरी का सेठ भिखारी हो गया
हल्दी की गांठ ले छुट्टन पंसारी हो गया।

निकला घर से जवान था वो नौजवाँ
आया वापस बुढ़ापे में बीमारी हो गया।

खिलाया बाप ने एक निवाला निकाल के
आज वो बाप ओलाद पे भारी हो गया।

थाने में लगा दरोगा दे कर बड़ी रकम
छोड़े मुजरिम तो भ्रष्टाचारी हो गया।

बीस फीसद कमीशन लागत में शुमार
पद सरपंच का बड़ी लाचारी हो गया।

लगाए आग घर को लड़ाए भाई से
जिगर दुश्मन वो लाभकारी हो गया।
*********
23. लोग....
सूरज बदला न चांद न तारों का संजोग 
नया साल मुबारक बधाई देते लोग।

वही धरती वही पानी वही हैं सब लोग 
कोई हुआ मदमस्त कोई निभाए जोग।

वही दिन वही रात वही लगे हैं रोग 
भूखा दिन का सोया देखे छप्पन भोग।

न हवा बदली न दाना पानी का उपभोग 
जोड़ तोड़ में मग्न गुणा भाग घटा योग।

जिगर साल बाद इसका विदाई योग 
कहें अलविदा मुबारक कहें लोग।
******
24. जाते हैं विदेश लोग....
छोड़ अपना देश लोग
जाते हैं विदेश लोग
पितृ पीछे अशेष लोग
टूटते हुए निमेष लोग
लगा धरती के नेस लोग
जाते हैं विदेश लोग।

जाना है अब छोड़ छाड़ 
घर जमीन नदी पहाड़
मिट्टी से ना रहा लाड़
सुना बाग गांव उजाड़ 
हुए आदमी केस लोग
जाते हैं विदेश लोग।

पंछी गलियां और साथी
ना चिट्ठी न कागद पाती
सिमरें भाई - बहन नाती
जोरू पिघले ज्यों बाती
बदल के यहां भेष लोग
जाते हैं विदेश लोग।

वापस ना आएगा अब
भंवरा उड़ जाएगा तब
हैं यहां पे तेरे अपने सब
फिर मिलन होगा जब
खा रहे हैं तैश लोग
जाते हैं विदेश लोग।

जिगर बसना यहां वहां
जिसका दाना है जहां
भाग्य ले कर जाए कहां
यहां से वहां वहां से यहां
देखते प्लेन क्रैश लोग
जाते हैं विदेश लोग।
*****
25. मकड़ी का जाला...
मकड़ी का जाला 
गौरैया ने आला बनाया
एक में दो माला बनाया
घर बिना ताला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया
पेड़ पर शिवाला बनाया
बुलबुल कंठ नाला बनाया
कलाल ने हाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।

मछली का घर समंदर है
कछुआ पानी के अंदर है
मगर मस्त कलंदर है
बैठा पेड़ पर बंदर है
बिल में घुसा छछूंदर है
भाग्य सबका सुंदर है
भारत के सर हिमाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।

हरिण खेत में चरता है
रोज जंगल विचरता है
व्हेल पानी में उतरता है
शेर शिकार करता है
बैठा भूखों मरता है
अपनी करनी भरता है
सांप को रखवाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।

सड़ता है पड़ा हुआ
सूखा ठूंठ खड़ा हुआ
भाई-भाई लड़ा हुआ
सोना नग जड़ा हुआ
घोड़ा नहीं अड़ा हुआ
छोटे से ही बड़ा हुआ।
प्रीत रंग हरयाला बनाया
मकड़ी ने जाला बनाया।
********
26. लाल सलाम....
#लाल_सलाम

शिकंजा पंजे पर कसता है
खींचे तो खून निकलता है।

तुम ऐसा कोई जाल बुनो 
शिकंजे का ही काल चुनो।

रिसते लहु को जमने दो
कोलाहल को थमने दो।

रस्ता वहीं है जहां रुके थे
बैठ सोच कहां पर चुके थे।

शत्रु का काम आघात हुआ
मित्र का काम वो करे दुआ।

मित्र  शत्रु  से बचना होगा
नया खेल तो रचना होगा।

समस्या निदान का हल हो 
वो बने योजना सफल हो।

सीधी बात ना सुने सरकार
टेढ़ी अंगुली का करो विचार।

नव सामंतों को बोल दो
अब संघर्ष के पट खोल दो।

गिना दो सर इस चुनाव में
या छेद करो स्वयं नाव में।

ना मांगे हक लड़ के मिले
जो कटे वो उपवन खिले।

बैठो ना धरे हाथ पर हाथ
ना वो स्वामी ना तुम अनाथ।

कस लो घोड़ों की अब लगाम
लाल सलाम भई लाल सलाम।
*******
26.  राम .....
लू में समीर शीत हैं राम
वसुंधरा की प्रीत हैं राम
दीनहीन की जीत हैं राम
कल आज अतीत हैं राम
मर्यादाओं की रीत हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम।

इसके उसके सबके राम
पताल धरती नभ के राम
बसे हृदय में सबके राम
आंख सांस में लब पे राम
हैं मर्यादित पुनीत हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम।

बिन सीता के अधूरे राम
भाई लक्ष्मण से पूरे राम
प्रतिक्षित सबरी सबूरे राम
मर्यादा पुरुषोत्तम सुरे राम
सुंदर वन का गीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

तुलसी की चौपाई में राम
बजरंग की परछाई में राम
बाकी झूठ सच्चाई में राम
हर मर्ज की दवाई में राम
सत्य की की जीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

पिता के आज्ञा पालक राम
हैं दिव्य अद्भुत बालक राम
सत्य सनातन मालक राम
कण कण के संचालक राम
मित्रता राम अमीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

भय अधर्म के नाशक राम
सत्य अहिंसा उपासक राम
अवधपुरी के शासक राम
राक्षस रावण विनाशक राम
राम ही स्वर संगीत है राम
लू में समीर शीत हैं राम।

आज राम और कल हैं राम
वायु,धरा,ऊष्मा जल हैं राम
सदा अविरल निश्छल हैं राम
राम नाम बेचना छल हैं काम
घृणा में नहीं प्रीत में हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम।

सत्ता नहीं संस्कार हैं राम
प्रचार नहीं व्यवहार हैं राम
नहीं धूसरित संसार हैं राम
व्यथाओं का उपचार हैं राम
निरंजन विष्णु अवतार हैं राम
अबला के बलजीत हैं राम
लू में समीर शीत हैं राम
**********
27. द्वेष....
यह कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी
आग जात-धर्म की सब कुछ जला देगी
स्वर्ग नहीं नभ में यहीं कर्म-फल है
परपीड़ा की समझ भवसागर तिरा देगी
जड़ें अंधविश्वास की विनाश ला देगी।
ये कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी।

है मोह-बन्धन से मुक्ति सम्मोहन
करुणामय छाया जीवन का चन्दन
अथाह गहरे शांत सागर को वंदन
अंतश की चेतना प्रफुल्लित  स्पंदन
अहंकारित मैं खुद से दूर करा देगी।
यह कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी।

पत्थर रज कण में वसुंधरा का अंश
सीख प्रकृति से निर्माण और विध्वंश
पंछी का किसने पूछा उसका वंश
 है असहिष्णुता ही धर्म का दंश
अनबन की शूल हृदय को जला देगी।
यह कट्टरता तुम्हें अमानुष बना देगी।

द्वंद्व-भाव से किसका भला हुआ
विष तन - मन में है घुला हुआ ।
है कौन दूध का धुला छाछ से जला हुआ
आएं दिन अच्छे समय बुरा  टला हुआ
द्वेष की ज्वाला पथ से भटका देगी।
यह कट्टरता तुम्हें अमानुष बना देगी।

त्यागो घृणा, अपनाओ सह-अस्तित्व,
मानवता जीवन का वास्तविक तत्व।
बाँटे जा प्रेम देख बढ़ता अपनत्व
हर पुरुष में हो पुरुष स्त्री में स्त्रीत्व
करुणा धरती को स्वर्ग बना देगी
यह कट्टरता तुम्हें अमानुष बना देगी।
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29. युद्ध रुकना चाहिए 
क्रोध दया से छुपना चाहिए
जहां भी हो युद्ध रुकना चाहिए।

मरते मारते मानव का क्रंदन 
युद्ध रक्त धार से करे अभिनंदन
यह रक्त मानव भाल का चन्दन
हे मनुज थामो इसे करबद्ध वंदन
शूल हृदय में नहीं चुभना चाहिए
जहां भी हो युद्ध रुकना चाहिए।

लहराते झंडों के रंग लाल हुए
कवलित जनसाधारण अकाल हुए।
बिछे चहुं दिश बारूद के जाल हुए
विधवा स्त्री अनाथ बाल हुए
बहता नाला लहू का सूखना चाहिए
जहां भी हो युद्ध रुकना चाहिए।

मरता है मानव ये मरे या वो मरे
दयाहीन मानव शीश पर पग धरे
सत्ता, धन व्यापार कारण सब करे
निरंकुश मरने से तनिक न डरे
जड़ सामने ज्ञान के झुकना चाहिए
जहां भी हो युद्ध रुकना चाहिए।

चेतना को जीवन से हवा कर दो
घायल की गति सारू दवा कर दो
पिपासुओं को संयमी वस्त्र सिलवा कर दो
उच्छृंखल भीरूऔं का डोरा करवा कर दो
दुःखी मन को ओर दुःख ना चाहिए
जहां भी हो युद्ध रुकना चाहिए।

यह गहरी खाई का व्यापार किसके लिए
दूषित हत्यारा व्यवहार किसके लिए
यह बम, तलवारों की धार किसके लिए
प्रजा ही नहीं तो सजे दरबार किसके लिए
जिगर आदमी न आगे आदमी के झुकना चाहिए
जहां भी हो युद्ध रुकना चाहिए।
*******
30. उपकार स्वयं पर....
कविता - उपकार स्वयं पर -

कभी मैं आनंदित था
एक आज़ाद पंछी था
आज हालात बदल गए
वो पुकार रहे हैं मुझको
बंधन में कब तक रहूँ?

देश के लिये, अपने लिये
और दूसरों के लिये क्या हो तुम?
मैं केवल ‘स्व’ तक सीमित नहीं
न ही तुम हो केवल अपने लिये
वो पुकार रहे हैं मुझको
बंधन में कब तक रहूँ?

यदि तुम्हारे हृदय में कहीं
तिनके भर भी स्थान शेष है
तो अपने विस्तृत आँगन में
उस पेड़ की शाखा पर
वो पुकार रहे हैं मुझको
बंधन में कब तक रहूँ?

एक नीड पंछी के लिये
करो उपकार स्वयं पर
मानवता के पथ पर
एक दीप जलाओ तुम
वो पुकार रहे हैं मुझको
बंधन में कब तक रहूँ?
**********
30. गांधी

गांधी का काम दुर्गम और कठिन
गांधी का काम विवेक की मिशाल।

गांधी अहिंसा शस्त्र के संचालक
गांधी निर्मल सुधीर प्रजा पालक।

गांधी का मार्ग सुगम सौम्य सरल
गांधी का मार्ग रसधार अविरल।

गांधी अहम को भस्म करने का नाम है
गांधी होना बहुत मुश्किल काम है।

गांधी का सपना हर हाथ को काम हो
गांधी कहते बुनियादी शिक्षा आम हो।

गांधी के रस्ते कब मिलता आराम है
जिगर गांधी कहे आराम हराम है।

बापू के नाम सादर समर्पित।
******
32. श्रेष्ठ
#कविता - श्रेष्ठ बन

रुक ना तू थक - हार कर 
मलीनता मुख से उतार कर।

कर्म कर, स्वयं का उद्धार कर
लगा कोई रोग तो उपचार कर।

शांत मन से विभोर हो कर
विरुद्ध स्वार्थ के स्वयं को तैयार कर।

पर बस उग्र उत्पात नहीं करते
शीश उठा, निज पग को आधार कर।

पंख पसार उड़ नभ के छोर तक
की कल्पना तो उस को साकार कर।

रहा होत की जोत का नियम सदा
बन श्रेष्ठ मन का बोझ उतार कर।

ना कर सका उद्यम कोई बात नहीं 
अंत प्रारब्ध की भूल को सुधार कर।

बीती दे बिसरा न बैठ अवसाद में
किया क्या क्या नहीं किया विचार कर।

ले संकल्प अंतिम पंक्ति का भला
नहीं संभव बैठे जो पग पसार कर।

असफलता अंत नहीं सफलता अनंत नहीं
भय विहीन साध मन सत्कार कर।
********

33. कविता - कच्ची आग।

कुछ लोग बिकते हैं यहाँ, हीरे के भाव में
अस्मत भी बिकती देखी, रोटी के अभाव में।

काग़ज़ की पर्ची से, बदलती हैं क़िस्मतें,
मर रहा है आदमी, आजीविका के तनाव में।

क़ातिल छूट जाते हैं, हत्या के जो दोषी थे
बदलता है अफ़सर फ़ैसला, नेता के दबाव में।

ऊँचे चढ़-चढ़ देखा, हर घर का यही लेखा
ज़रूरत एक किलो की, पर गुज़ारा है पाव में।

झूठ की चादर ओढ़े, हरि-लाल बैठे हैं
काम के नाम पर बस, फ़ोटो खिंचती नाव में।

कुत्ता कहो तो चिढ़ने वाले शेर कहो तो खुश
कुएं में भांग पड़ी और आग लगी है लाव में।

राज-कोष पर ऐश करना, चाणक्य नीति नहीं
राज डूबे, देश डूबे, लोक-व्यवस्था कटाव में।
***********
34. कविता – नटवरलाल है.....

पेगासस का कमाल है,
सत्ता का ये जाल है।

सियासत का मारा बंगाल,
केरल में भी उछाल है।

है विदेशों में जमा पूँजी,
काले धन का जंजाल है।

सच कम, शोर ज़्यादा,
झूठा सुर और ताल है।

ईवीएम पर उठते सवाल,
पूँजीवाद का जाल है।

उद्योगपतियों का कर्ज़ माफ़,
किसान-मज़दूर कंगाल है।

जनता की हर हार पे,
लोकतंत्र निढाल है।

तीन दिशाओं में क़ब्ज़ा,
बीजेपी मालामाल है।

दावानल-सी फैलती,
धर्मांधता मिसाल है।

तीसरी दुनिया का राज,
किसकी यह चाल है?

ताज अनपढ़ के सर पर,
शिक्षा का बुरा हाल है।

हर घर उजड़ते रिश्तों का
कहते हैं उन्हें ख़याल है।

‘जिगर’ पर्ची का राज यहाँ,
हर चेहरा नटवरलाल है।
**************
35. बचत....

नहीं भ्रमण पर जाना तुमको, देश से बाहर इस साल,
शादी-ब्याह में सोना छोड़ो, देश का बचाओ माल।

​गाड़ी घर में खड़ी रखो, चलो साइकिल या पैदल,
आज तेल में सब्जी छौंकी, पानी में छौंकना कल।

​पंखा, कूलर, एसी छोड़ो, फ्रिज भी अपना बंद करो,
बिजली की बचत करो दीपक की लौ मंद करो।
 
​कपड़े-लत्ते और दिखावे, इन पर कैंची रोज़ धरो,
बढ़ती जाती है महंगाई, कौड़ी जोड़ो मौज करो।

​घर पे रहकर काम करो, देश पर ये अहसान करो,
रूखी-सूखी खाकर चुपचाप, शासन का गुणगान करो।

​बंद करो ये काजू-बादाम, संतरों का भी त्याग करो,
केवल एक रोटी खाकर, गैस की कम आग करो।

​आटा, तेल, नून और ज्वार, बचाना धर्म हमारा है,
'कोई भूखा सोए ना', यह तो सरकार का नारा है।

​जिगर! नेताजी पर पाबंदी, नहीं होती कभी यहाँ,
वो चाहें तो मशरूम खाएं, घूमें चाहे जहाँ - तहाँ।
*********
36. श्रद्धांजलि गीत - भारत के जवाहर

चिता सजी ये जो चंदन लाल की।
भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल की।।

वर्षों तक बंद जेल में संतान मोतीलाल की।
देश हित में छोड़ी चिंता रोटी दाल की।।

आराम हराम का नारा इनका विख्यात है।
बोकारो, भेल, रेल जिनका ही प्रताप है।।

बेटी को लिखे पत्र संसार का ज्ञान।
जिन्हें लड़ प्रियदर्शिनी बनी महान।।

गांधी के सच्चे अनुयायी पटेल के मीत
लड़े स्वतंत्रता की खातिर, ओर पाई जीत।।

संविधान निर्माण में अग्रिम जिनका नाम।
लाल जवाहर देश का पूज्य सुबह शाम।।

आनंद भवन को समर का स्थान बना दिया।
राष्ट्र के लिए खुद का सुख चैन जला दिया।।

जेल में हुआ नवासा नाम राजीव रतन
घर प्रिय देश जिन्हें, प्यारा था वतन।।

सीने से लगा के रखते वो हमेशा गुलाब।
चाचा नेहरू जिंदाबाद, जिंदाबाद, जिंदाबाद।

देश करे है याद जिन्हें शीश झुकाए आज
बढ़ता देश बढ़ता रहे, आगे बढ़े समाज।।

वर्तमान के पथदृष्टा का आज दिन निर्वाण।
कहते आधुनिक भारत के ऐसे हुआ निर्माण।।

नमन मेरा स्वीकार हो पुण्य आत्म स्नेह।
चीर स्मृति प्रेम रस जैसे बरसे मेह।।

*********

37. बारिश - एक कविता।

बारिश, नहीं केवल पानी है

यह सूखी धरती की तृप्ति

बीज की प्रार्थना का उत्तर

उदास किसान के चेहरे की  मुस्कान

विकराल अकाल की अंत्येष्टि

विरह में कवि की सौंदर्य कल्पना

ईश्वर के प्रति मानव के समर्पण का फल

भीतर के विश्वास की बूंद की कहानी है

बारिश, नहीं केवल पानी है।


बारिश

केवल फसलों के लिए नहीं

यह सूखते बांधों को भरने

पहाड़ों पर अविरल बहते झरने

नदियों की कल-कल ध्वनि

पिघलते हिमनद की पुनर्स्थापना

नंगे होते पहाड़ों की पहरावनी

कटते जंगल की जवानी

एक एक बूंद इसकी सुहानी है

बारिश, नहीं केवल पानी है।


बारिश

धरा पर उगलती आग की शामक

जीवन चक्र की अक्षुण्य विरासत

पौधे से पेड़ की जननी 

यह बनाए सतरंगी धनक

उच्छृंखल मानव का बंधन

नगर निकायों की पोल खोलने वाली

यह धरती की चूनर धानी है

बारिश, नहीं केवल पानी है।

*********

38. एक कविता - मकान बनाम घर।

घर के दरवाजे, 

अंदर नहीं आने देते,

कड़वाहट को 

और खुल जाते हैं,

मेरे आने की आहट से।

घर की ईंटें,

ईंट नहीं, 

परिश्रम और प्रतीक्षा में घुले

लहू से लाल हैं।

घर की दीवारें,

सिर्फ उसे खड़ा करती हैं,

रिश्ते उसे जिंदा रखते हैं।

घर में सुलगते चूल्हे,

इस पर सिकती रोटियों से

अधिक 

परिवार के रिश्तों की 

गर्मी का आभास होता है।

घर की खिड़कियां, 

अंतर्मन को बाहर की दुनिया का 

सत्य और वीभत्स रूप दिखाती हैं

भीतर का विश्वास जगाती हैं।

घर का आँगन,

धूप को समेट कर 

ढलती उम्र की झुर्रियों को उभार देता है। 

बराबर करता है अनुभव और सुख की चाँदनी

जो अंदर और बाहर के लोगों के 

चेहरे को पहचान लेती है।

घर में माँ की पुकार,

घंटी नहीं होती

फिर भी

सबसे पहले सुनाई देती है।

घर में पिता की चुप्पी,

दीवार पर टँगी तस्वीर नहीं

बरगद की छाँव होती है

जिसका एहसास 

धूप में निकलने पर समझ आता है।

घर के बच्चे,

मकान को घर बनाते हैं

उनकी हँसी

वास्तुकार के नक्शे की नींव,

नन्हे कदमों से जमा कर 

मज़बूत हैं।

घर के बुज़ुर्ग,

घर का अतीत नहीं,

उसकी जड़ें हैं

जिनसे घर का हर सदस्य अकाल के समय पोषण पाता है।

यह दुनिया एक घर है,

जहां बड़े-बड़े मकान

अट्टालिकाएं

घर नहीं केवल इमारत हैं

बिना परिवार और आदमियत के

केवल इमारत।

मैं जब लौटता हूं 

अपने घर में

उस पते पर नहीं,

उनके पास

जो मुझे देखकर चहक उठते हैं

......आ गए?

और यहीं से,

इमारत के

घर के होने की शुरूआत होती है।

*********

39 कविता - दिशा

दिशा,
केवल रास्ता नहीं
यह अंतर प्रज्ज्वलित दीप है।
शोर में उलझी दुनिया के उलट,
दिशा मौन हो कर
सही कदम चुनती है।

दिशा,
वहाँ जन्म लेती है
जहाँ उद्देश्य साँस लेते हैं
और 
सपने आलस से नहीं
संकल्प संग आँखें खोलते हैं।

दिशा,
हर मोड़ पर
रास्ते में मिल ही जाती है
लक्ष्य से थोड़ी दूर
उठते हर पग के निकट 
विवेक की साथिन।

दिशा,
मानचित्र में
उत्तर में ध्रुव तारा
दक्षिण में बर्फीले महासागर
पूर्व में सूर्योदय
पश्चिम में संध्या 
नहीं।

दिशा,
सत्य के कंपास की ओर
मुड़ती है
मनुष्य को
मनुष्यता की ओर ले जाती है।

दिशा,
भटके हुए कदमों को
दोष नहीं देती
भटकते मन को रोकती 
दिशा ही
शिक्षक है।

आओ चलें,
सही दिशा की ओर
जहाँ सफलता से पूर्व 
सत्य मिले
जहाँ ऊँचाई के पूर्व
विनम्रता मिले
और आदमियत से इंसानियत मिले।
*********
39. माँ......

माँ,
के होने की अनुभूति,
अपने आप में निराली
यह जब बुलाती है तो
बड़ा भी खुद को बच्चा
महसूस कर लेता है।

माँ,
केवल एक नाम नहीं
सृष्टि का स्मरण है
देवी के अवतार जैसी
तपती दोपहर में नीम की छांव जैसी
माँ, तो बस माँ है
इसके जैसा कोई नहीं।

माँ,
रसोई में रोटी नहीं बेलती
खुद को घिसती है
आँच की जगह खुद जलती है
घर की धड़कनों में घोलती है
अपने हिस्से की मिठास
और उसे
मुस्कुरा कर 
बच्चों की थाली में रख देती है।

माँ,
का सीने पर हाथ
रात के अंधेरे में 
सुरक्षित होने का 
भाव देता है
कभी बुरे सपने से डर कर 
उठ बैठता हूं तो
थपकी दे कर कहती है
सोजा, मैं हूं ना।

माँ,
चली गई
और दुनिया कहती है
तुम अकेले हो
तब हवा में धीरे से
उसकी दुआ
मेरे कंधे पर हाथ रख कर
कहती है
हौसला रख, मैं हूं ना।

माँ,
किताब नहीं लिखती,
पर उसके संस्कार
पीढ़ियों का इतिहास लिखते हैं
हजारों साल तक
हजारों किताबों से बढ़कर
मेरी हर बात से माँ के 
शब्द झरते हैं।

माँ,
समय के साथ बूढ़ी तो होती है
पर उसकी चिंताएं कभी वृद्ध नहीं होती
मैं उसके लिए कल भी बच्चा था
आज भी बच्चा हूं
वो मुझे अबोध की तरह 
निहारती है।

माँ,
धरती माँ का, सबसे सुंदर चमत्कार है
खुदा हर घर नहीं पहुँच सकता
शायद इसलिए
उसने माँ बनाई।

माँ, माँ, माँ 
माँ जैसा कोई नहीं
कोई नहीं, कोई नहीं।
**********

40. कविता - दोस्त....

दोस्त, 
यह नाम है, ज़िंदगी की किताब का,
इसके पन्नों को वक्त कभी पीला नहीं कर पाता।

दोस्त, 
वह है जो दोस्त की हँसी में अपनी जीत ढूंढ ले, 
और उसकी ख़ामोशी में बिना पूछे दर्द पढ़ ले।

दोस्ती, 
रिश्तों की भीड़ में सबसे कम औपचारिक,
मगर सबसे अधिक स्वार्थहीन रिश्ता है। 

दोस्ती,
जहाँ हिसाब नहीं, एहसान नहीं, केवल अपनापन,
जो धीरे-धीरे अविरल साँसों में उतरता रहता है।

दोस्त, 
सच का आईना भी है और छाया भी,
जो ग़लती पर टोकता, गिरने पर थामता है।

दोस्त,
दोस्त की हार को अपनी हार मान रूआंसा हो जाता है,
और जीत पर सबसे ऊँची आवाज़ में ताली बजाता है।

दोस्त,
हर सफ़र की मंज़िल ज़रूरी नहीं होती, कभी-कभी दोस्त का साथ मंज़िल बन जाता है।

मेरे दोस्त,
इसलिए, दोस्त को दौलत की तरह ना रखना, 
उसे ईश्वर की अनमोल दुआ की तरह सँजोकर सबके साथ बांटना।

क्योंकि दोस्त,
उम्र बीत जाती है, मगर सच्ची दोस्ती पर
समय की धूल भी कभी परत नहीं जमा पाती।
**************
40. कविता: होने का मूल्य

विज्ञान,
जब मेरी हड्डियों से संवाद करेगा,
वह बता देगा,
मैं बूढ़ा था या जवान,
नर था या नारी, गोरी थी त्वचा या साँवली,
मैंने यह जीवन कितना लंबा जिया।

पर वह कभी नहीं कह पाएगा
कि मैं ब्राह्मण था या शूद्र,
वैश्य था या क्षत्रिय,
हिन्दू था या मुस्लिम, सिख था या ईसाई।

क्योंकि
ये पहचानें हड्डियों में नहीं बसतीं,
न रक्त में बहती हैं, न डीएनए की लिपि में लिखी होती हैं।

विज्ञान नहीं पढ़ सकता
आत्मा और मन का स्वभाव,
मेरा नाम, मेरा इतिहास या मेरा काम।
ये तो सभ्यता के गढ़े हुए परिचय हैं
जो समय के साथ बदल जाते हैं।

मनुष्य का होना उसके कर्म में है,
उसकी करुणा में, सत्यनिष्ठा में, प्रेम में है।

मान लेने से सत्य नहीं बदलता,
नाम बदल सकते हैं, पर प्रकृति नहीं।

इसलिए
यदि कुछ बनना ही है,
तो पहले मनुष्य बनो।

क्योंकि
मानने का मूल्य सीमित है,
पर होने का मूल्य अनंत है।
***********
42.कविता - जब लोग खड़े हो जाते हैं.....

हर तरफ भीड़ थी 
मगर उस भीड़ में 
हर चेहरा अकेला था
हर आँख झुकी हुई 
हर होंठ डर के ताले से
बंद था।


सामने खड़ी सत्ता 
हाथ में कोड़ा लिए
सोचती है
ये सर कभी नहीं उठेंगे
कभी सवाल नहीं पूछेंगे।
क्योंकि, इस भीड़ में
सब अकेले हैं।

फिर एक दिन
मैं, एक आदमी 
खड़ा हुआ
अत्याचार के विरुद्ध
लोगों में से कुछ ने कहा
राजनीति कर रहा है
कुछ साथ आए।

कोड़ा उसी तरह 
बरस रहा था
ज़ख़्म उसी के हिस्से आए
जो मेरे साथ खड़े थे
बाक़ी लोग ख़ामोशी से
सब सह रहे थे
सरकार का अत्याचार
भूल से वो खुद को
सुरक्षित समझते रहे।


लेकिन सच
कोड़ों से नहीं मरता
सच ही तो है
जो किसी से नहीं डरता
सच कभी
किसी की हाजरी नहीं भरता
यही सच की शक्ति है।

सच की शक्ति को 
पहचान कर
कुछ और लोग उठे
फिर कुछ और
देखते ही देखते 
झुके हुए सर 
सीना तान
खड़े हो गए
अत्याचार के विरुद्ध।

जिस भीड़ को 
डराकर 
भीड़ रखा गया
वही भीड़ 
अब हिम्मत का 
दरिया बन गई।

अब कोड़ा काँप रहा है
सत्ता थर्रा रही है
लाठी, कौड़े और बंदूक
झुके हैं

जन आंदोलन के सामने
तानाशाह को 
जनता की शक्ति का 
भान हो गया कि 
कुर्सियाँ ताक़त से नहीं
जनता की स्वीकृति से टिकती हैं।

जब तक लोग 
घुटनों पर रहते हैं
सत्ता विशाल 
दिखाई देती है
जिस दिन लोग 
अपने पैरों पर 
खड़े हो जाएँ
उसी दिन
ऊँचे सिंहासन भी 
छोटे पड़ जाते हैं।

क्योंकि 
इतिहास ने 
बार-बार लिखा है
कोई भी सरकार 
जनता से बड़ी नहीं
और जनता
एकता से 
बड़ी नहीं होती।
*************
43. कविता - आलोचना सही है...

आलोचना सही है, यदि कर्ता का दिल काला न हो,
शब्दों में हो सच्चाई, मन में कोई ज्वाला न हो।

जो आईना दिखाए, वह तेरा दुश्मन नहीं,
सच के होंठों पर कभी झूठ का ताला न हो।

वाह-वाही से कभी मंज़िल नहीं मिलती,
आदमी का हक़ीक़त से जो पाला न हो।

ठोकरें गिराती नहीं, हर रोज़ सँभलना सिखाती हैं,
टीस में गहरा दर्द सा कोई नाला न हो।

प्रशंसा फूल है, पल भर में जो मुरझा जाए,
आलोचना में झूठ और मिर्च-मसाला न हो।

आलोचनाएँ उम्र भर इंसान के काम आती हैं,
विश्वास की दीवार में बना आला न हो।

सत्य धर्म की नींव है, असत्य अधर्म, जिगर,
सत पर असत का कभी बोलबाला न हो।

नाला - मानसिक पीड़ा
आला - दीवार का खोखला भाग
****************कविता - राजनीति एक अखाड़ा

राजनीति एक अखाड़ा है, दाँवों का व्यापार है,
सच की साँसें थम जातीं, झूठ करे श्रृंगार है।

यहां वादों की कुश्ती है, खादी के नीचे जूट है।
केवल कुर्सी मंज़िल इनकी, जनता के संग लूट है।

भाषण के पहलवान यहाँ गुण खुद के खुद गाते हैं,
कल के घुर विरोधी को दल बदलू गले लगाते हैं।

तालियों की गूँज में, प्रश्न कहीं खो गया,
सत्ता की कालिख से  लोकतंत्र मैला हो गया।

आशा की एक किरण शेष, जनता के राज की,
जनमानस की जय, विजय सर्व समाज की।

अखाड़ा में राजनीति के, नियम रखना याद यह,
शह-मात के खेल में, देश हो ना बर्बाद यह।

न सिंहासन स्थायी है, न सदा ही ताज रहे,
जनता है निर्णायक सदा, जनता का ही राज रहे।

बड़े धुरंधरों को मिट्टी खा गई, बदले मुट्ठीभर राख में,
अहंकार नहीं बलशाली, घुण लगती है साख में।

समय से तेज नहीं जगत में अन्य कोई धार है,
घमंड का उपासक रावण लाचार था, लाचार है।

जिगर तमगे बंटते हैं, लुटेरे डाकू चोरों में,
भारत बंटा अगड़े पिछड़े, दुनिया काले गौरों में।
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45. कविता - सैनिक एक प्रहरी.......


जब-जब सीमा पर शहीद माँ का लाल हुआ,
धरती की मिट्टी का रंग गहरा लाल हुआ।

बर्फ़ में जमा खून उस सैनिक का है,
रेत में तपा लहू उस सैनिक का है।

सैनिक का रक्त पानी हो नहीं सकता,
सैनिक कभी गद्दार हो नहीं सकता।

लड़ना फौजी के भाग्य में लिखा है,
यह लड़ना भी उसने खेतों में सीखा है।

जंगल के सन्नाटे उसको खटकते नहीं,
सैनिक लक्ष्य से कभी भटकते नहीं।

टैंकों की घरघराहट में उसका जोश है,
सोता बंदूकों के साए में ये सरफरोश है।

पलटन है परिवार, कंपनी गांव उसका,
रण क्षेत्र में डिगता कभी ना पांव उसका।

लड़ता सैनिक, मरता नहीं कभी,
शत्रु सेना विशाल, डरता नहीं कभी।

खुद के परिवार से उसको लगाव है, पर
मातृभूमि प्रथम, बंकर है उसका घर।

शहादत रूपी दुल्हन को नित्य गले लगाते हैं,
वर्दी पहन जाने वाले तिरंगा लपेट कर आते हैं।

सूना आंचल माँ का,  बिखरा ललना का श्रृंगार है,
पिता के कंधे झुके, भाई को इंतज़ार है।

हर दिन कारगिल लड़ते मन एवं मैदान में,
सैनिक शीश चढ़ाते हैं भारत मां को दान में।

जब तक नभ में सूर्य रहेगा, गूँजायमान जय गान है,
सैनिक, तेरे त्याग से जीवित हिन्दुस्तान है।

मुक्त कंठ से प्रशंसा करता जिगर, जवान की
जय जय जय हो मेरे भारत महान की।
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46. कविता - संत फकीर 

न महलों का मोह, न सोने की ज़ंजीर,
सतमार्ग का पथिक होता संत-फ़क़ीर।

न ऊँचा आसन चाहे,
सिंहासन की ना चाह,
प्रेम-ज्योति से प्रदीप्त, शाहों का शाह।

कंधे पर झोली, अधरों पर मुस्कान है,
गंगा-सी वाणी शांत निर्मल धनवान है।

रोटी मिले तो शुक्र, न मिले तो सब्र,
हर पल एक ही धुन, एक रब का ज़िक्र।

जात-पात, धर्म से परे, न ऊँच-नीच का भेद है,
दिव्य दृष्टि में एक रंग, नहीं मानव में विभेद है।

मद से दूर, लोभ से परे, क्रोध कोसों पार है,
मन में दीप्त प्रेम-दीप, वही संत साकार है।

धन-वैभव से क्या वास्ता, दुआओं का खज़ाना है,
रूखी-सूखी खा कर भी धरती पे सो जाना है।

सत्य के वस्त्र पर सेवा का श्रृंगार है,
त्याग जिसकी साधना, समभाव अपार है।

बरखा, गर्मी, शीत या ऋतु मधुमास हो,
सुख-दुख एक समान, यह संत का विश्वास हो।

साधु वो दीप जो घने तम में उजियारा भरे,
संत-फ़क़ीर एक नाव, भवसागर पार करे।

उपदेशों से क्या होगा, कर्म अगर निष्प्राण है,
कथनी-करनी एक-सी, संत की पहचान है।

प्रशंसा हो या निंदा, आरोपों की भीड़ में,
सत्य-धर्म न छोड़ना, रहो सुख या पीड़ में।

मंदिर में न मस्जिद में, न गीता और क़ुरआन में,
सहृदयता मिलती नहीं दुनिया की दुकान में।

मिलना है यदि रब से, इतना रखना ध्यान,
दया, धर्म, धैर्य के घर, मिलते हैं भगवान।

प्रेम बाँटो जगत को, जिगर का यह संदेश है,
प्रीत पंथ सीमाहीन, अनंत और अशेष है।
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47 कविता : आंदोलन और सरकार...

संघर्ष में जनवादी चेतना का बसेरा है,
लोकतंत्र के तंत्र को भ्रष्टाचारियों ने घेरा है।

जब सत्ता संवाद से मुँह मोड़ने लगती है,
तब जनता ने उठकर सिंहासन को घेरा है।

हिटलरशाही से टकराने का पथ अहिंसक होता है,
सर्वहारा के हिस्से पर पूँजीपतियों का डेरा है।

क्रांति के शंखनाद से इतिहास बदलते देखा है,
आंदोलन से राष्ट्र निर्माण का उदित स्वर्णिम सवेरा है।

गूँगी और बहरी सत्ता, तम की पैरोकार बनी,
संघर्ष से ही धरती पर से, भागता अंधेरा है।

जनता जुल्म के आगे अब चुप रह सकती नहीं,
वंशवाद से बढ़कर कहाँ, कोई शत्रु तेरा है।

आंदोलन नारों से आगे, आकांक्षाओं का विस्तार है,
समानता और समता का जनसंघर्ष चितेरा है।

सरकार शासक नहीं, विश्वास की ज़िम्मेदार है,
जनता कहती संसाधनों पर, पहला हक़ मेरा है।

अधिकारों की पुकार को ना व्यवस्था का भार दो,
लाठी-गोली के आगे तनकर खड़ा बघेरा है।

पेलट से विचार ना झुके, ना बम से सपने रुकते हैं,
साँपों के घेरे में देखो, आज खड़ा सपेरा है।

लोक दमनकारी शासन, दुश्शासन बन आया है,
लाल संघर्ष के झंडे का नया युग नव ऐरा है।

हठ छोड़ संवाद करो, तानाशाही छोड़ कर,
लोकमत में उठता देखो, असंतोष घनेरा है।

अहिंसक आंदोलन पर जुल्म सहा नहीं जाएगा,
कल का राजमहल, आज खंडहर का ढेरा है।
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47. कविता - बाबू काम नहीं करता.......

दिखने में कभी यह, आराम नहीं करता,
बाबू वही है जो काम नहीं करता।
हथेली गर्म तो वो, हर बात सुनता है,
हरे रंग के नोटों को, चुग-चुग के चुनता है।
कर दी जेब भारी तो सुबह शाम नहीं करता
यह बाबू है वही, जो काम नहीं करता।

अड़चन न हो, फिर भी वो अड़चन लगाता है,
फ़ाइल को घुमा-घुमाकर खूब थकाता है।
सांठ-गाँठ का पोता या नाती वो,
काम चक्कर कटा कर निपटाता है वो।
काम रोकने का कभी, नाम नहीं करता,
यह बाबू है वही, जो काम नहीं करता।

पटवारी की हाज़री में जाना ज़रूरी है,
अटकी फ़ाइल का वज़न बढ़ाना जरूरी है।
मस्टरोल में नाम लिखवाना हो अगर तुमको,
चारा भैंस को बाबू की, चराना ज़रूरी है।
धन ले कितना, ये चर्चा आम नहीं करता,
यह बाबू है वही, जो काम नहीं करता।

अफ़सर लगा ले ज़ोर कितना एड़ी-चोटी का,
कुछ बिगाड़ नहीं सकता, इस चमड़ी मोटी का।
नोटशीट पर लिखे को घुमाता ग़ज़ब है,
“Not” को “Note” बना देता ग़ज़ब है।
बिना मतलब के वो सलाम नहीं करता,
यह बाबू है वही, जो काम नहीं करता।

नेताओं के छक्के छुड़ाते हैं बाबू जी,
ईश्वर के बस से बाहर, हैं बेकाबू जी।
रिश्वत को ये खर्चा-पानी कहता है,
हर कोई यहां इसकी, मनमानी सहता है।
जिगर किसी के सर इल्ज़ाम नहीं धरता,
यह बाबू है वही, जो काम नहीं करता।
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#जिगर_चूरूवी


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