झाड़ी के फूल
जिगर के दोहे भाग -225.
संहिता से बंधे नहीं, मालक कंपनी मील।
चोर डाकू भाई भाई, इनके ठोको कील।।
24.
मजदूरी मिली नहीं, करे मजदूर काम।
कंपनी नेता की बनी, शरणम दाता राम।।
23.
जिगर बात कुछ ओर है, लगे चोर के चोर।
साधु को डाकू कहे, साहूकार को चोर।।
22.
दाल गले ना चोर की, बिन चोरी घर आए।
संत रुके नहीं संकटे, पथ पर बढ़ता जाए।।
21.
दलाली यहां वैध है, आर्बिटर उप नाम।
कचहरी के बारहणे, साधे सारे काम।।
बारहणे - द्वार के बाहर/बुलावे पर
20.
मुलजिम मुजरम नहीं, कहे न वचन कठोर।
दण्ड उसी को मीलता, वकील जो कमजोर।
19.
निजीकरण शिक्षा का, बूरा हुआ है हाल।
कक्षा लगे न स्टाफ है, मालक मालामाल।।
18.
नशा नाश की आरंभना, मिटे है घर हाण।
शरीर सड़े दुर्गंध से, असमय जात प्राण।।
आरंभना - शुरुआत, हाण - आयु,
17.
पिए दूध जहर उगाल, सांप की उलट चाल।
रोशनी दीप बुझाए, लक्ष्मी लूटे माल।।
16.
उस शत्रु को मित्र कहो, रहो संग हंसे बोल।
तार कसे वीणा बजे, चोट सह बजे ढोल।।
15.
शिक्षक में अब ना रहे, गुरु शिष्य भाव।
अंतर से जो अंधे हुए, मार दिए सद्भाव।।
14.
विद्यालय में शिक्षक, देते है व्याख्यान।
कॉलेजों में लड़ रहे, महानुभव महान।।
13.
प्रदीप नाम रखन से, सुआँख नहीं हो अंध।
शहद की नदी में तरे, ना मीठा तुंब कंद।।
12
धरती पर अनमोल हैं, हृदय प्रेम भाव।
स्नेह जड़ सम्मान की, लोभी करे कटाव।।
11.
सनक पेट में भर आ गए, बैठे ठण्डी छांव।
आपस में लड़ खेलते, ओरन जीवन दांव।।
10.
लुटती आन त्रिया की, गंगानगर के माएं।
टेम्पो होटल घर में, नहीं सुरक्षत मांएं।।
9.
अकबर के दरबार में, गीत जोधा गाए।
राज मोह के कारणे, राजा बेचे गाय।।
8.
मुस्लिम बाबर ओलाद, कहते रहे अबोध।
सुन सुनाई मानता, नहीं करत हैं शोध।।
7.
बदलने को इतिहास, पाना फाड़े लोग।
अतीत बिसरे न कभी, चाहे लेले जोग।।
6.
अति का अंत है बुरा, साध करे या राज।
अति बुरी प्रफुलता, अति न हो नाराज।।
5.
लो पाड़ोसन झोंपड़ी, नित्य करती रार।
आधा में बुहारती, सारा तो को भार।।
4.
महिला सुरक्षा हेत, सजग देखा समाज।
उत्पीड़न बढ़ता गया, रोज लुटती लाज।।
3.
खुद को बड़ा न कहिए, करे न बढ़ बढ़ बात।
है कौन छोटा धर्म से, कौन बड़ी है जात।।
2.
ओछी हरकतें मत करो, छोड़ो निंदा यार।
सर्व शशक्त दो जग में, भाईचारा प्यार।।
1.
संधियां करते रहते, नेता अजब अकूत।
सीमाएं सिकुड़ रहीं , हंसते रहे कपूत।
Comments
Post a Comment