भारत में सरकारी विद्यालयों की स्थिति
सरकारी विद्यालयों में घटता नामांकन - UDISE+ 2023-24 के आँकड़ों का विश्लेषण -
सत्य कहानी - U-DISE+ (Unified District Information System for Education) की जबानी -
रिपोर्ट के सकारात्मक बिंदु -
1. पहले के सत्रों की तुलना में शिक्षकों की संख्या में मामूली वृद्धि हुई।
2. बालिकाओं के नामांकन में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
3. सेवारत शिक्षक प्रशिक्षणों की संख्या बढ़ी है।
सरकार ने हाल ही में वर्ष 2023 - 24 के U- DISE के आंकड़े जारी किए हैं।
इन आंकड़ों के अनुसार देश में हर दिन 13 स्कूल बंद हो रहे हैं। अर्थात एक वर्ष में 4,791 विद्यालय बंद। वर्ष 2023 - 24 की शुरुआत में देश 14 लाख 71 स्कूल थे जो वर्ष के अंत में 14 लाख 66 हजार रह गई। इनमें से आधे से ज़्यादा, अकेले मध्य प्रदेश से।
इन आंकड़ों के अनुसार बिहार में 946, छत्तीसगढ़ में 234, दिल्ली में 87 नए सरकारी स्कूल खुले, यह सुनने में अच्छा लगा पर वास्तविकता अलग है।
बिहार में उन्हीं स्कूलों के साथ 4 लाख 37 हज़ार छत्तीसगढ़ में करीब 50 हज़ार व दिल्ली में 45 हज़ार से ज़्यादा छात्रों का नामांकन घटा।
स्कूल बढ़े, छात्र घटे -
सबसे अजीब आंकड़ा - देश में 5,663 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी छात्र नहीं है। लेकिन वहां 20,667 शिक्षक तैनात हैं। पश्चिम बंगाल अकेले में शून्य नामांकन वाले 4,133 विद्यालयों में 19,502 शिक्षक कार्यरत हैं। एक लाख से ज़्यादा स्कूल एकल शिक्षक हैं। भवनहीन, भूमिहीन विद्यालय भी हजारों की संख्या में हैं।
सवाल यह नहीं कि स्कूल कितने खुले।
सवाल यह है — बच्चे कहां गए।
आँकड़ों के अनुसार -
देश में हर दिन लगभग 13 स्कूल बंद होना (करीब 4,791 सालाना): हालिया UDISE+ रिपोर्ट में स्कूलों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। अलग-अलग वर्षों में बंद/विलय (closure/merger) की संख्या अलग रही है, इसलिए यह आँकड़ा संबंधित रिपोर्ट वर्ष पर निर्भर करता है।
बिहार, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में नए स्कूल खुलने के बावजूद नामांकन घटना: UDISE+ में कई राज्यों में स्कूलों की संख्या और छात्र नामांकन के बीच ऐसा विरोधाभास दिखाई देता है। यह दावा व्यापक रूप से रिपोर्ट के रुझानों से मेल खाता है।
5,663 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं, लेकिन शिक्षक तैनात हैं: यह आँकड़ा UDISE+ 2023-24 की प्रमुख बातों में शामिल है।
एक लाख से अधिक एकल-शिक्षक स्कूल -
एक महत्वपूर्ण बात भी है कि इन आँकड़ों का यह अर्थ ज़रूरी नहीं कि बच्चे पढ़ाई छोड़ गए हों। कई मामलों में -
1. छोटे स्कूलों का विलय किया गया है।
2. छात्र निजी स्कूलों में स्थानांतरित हुए हैं।
3. जनसंख्या और जन्मदर में बदलाव से भी प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन घटा है।
"बच्चे कहाँ गए?", यह एक वैध नीति संबंधी प्रश्न है, लेकिन इसका उत्तर केवल "स्कूल बंद हो गए" नहीं है। इसके पीछे निजी स्कूलों की ओर रुझान, स्कूलों का विलय, जनसांख्यिकीय बदलाव और अन्य कारण भी हैं।
1. प्रशासनिक - कम नामांकन वाले स्कूलों को पास के बड़े स्कूल में मर्ज करना। राजस्थान में 17,000+ स्कूल 2014-18 में मर्ज हुए थे। इससे स्कूल संख्या घटती है, पर छात्र नहीं।
2. जनसांख्यिकीय - भारत में TFR 2.0 पर आ गया है। वर्ष 2014 - 15 में कक्षा-1 में 2.6 करोड़ बच्चों ने प्रवेश किया जो वर्ष 2023 - 24 में 2.2 करोड़ रह गया। अर्थात हर वर्ष 40 लाख कम नामांकन हुआ।
3. मांग का बदलाव - अंग्रेजी माध्यम, बेहतर इंफ्रा की चाह में निजी स्कूलों की ओर पलायन। RTE के तहत 25% सीटें भी इसका कारण हैं।
4. ड्रॉपआउट - नामांकन में कमी का एक हिस्सा ड्रॉपआउट से जुड़ा हो सकता है।
यहां हम राजस्थान के संदर्भ में चर्चा करेंगे -
राजस्थान के संदर्भ में UDISE+ 2023-24 के आँकड़े कुछ महत्वपूर्ण संकेत देते हैं -
1. नामांकन में बड़ी गिरावट - पिछले दो शैक्षणिक वर्षों में राजस्थान के स्कूलों में कुल छात्र नामांकन लगभग 8.4 लाख कम हुआ है। यह गिरावट मुख्यतः सरकारी स्कूलों में दर्ज की गई है।
2. सरकारी स्कूल सबसे अधिक प्रभावित - रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी सरकारी स्कूलों से बाहर हुए हैं। इसके संभावित कारणों में निजी स्कूलों की ओर रुझान, कम जन्मदर, शहरी पलायन तथा स्कूलों का विलय शामिल हो सकते हैं। केवल UDISE+ के आँकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी।
3. राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में राजस्थान - देशभर में जहाँ शिक्षक संख्या बढ़ी है और ड्रॉपआउट दर में सुधार दर्ज हुआ है, वहीं राजस्थान में नामांकन में कमी नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
पुराने 33 जिलों के आधार पर राजस्थान की स्थिति देखें, तो उपलब्ध UDISE+ और हालिया रिपोर्टों से यह तस्वीर सामने आती है -
33 जिलों के अनुसार उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर सामान्य प्रवृत्ति (Trend)
1. बाड़मेर - मामूली वृद्धि
2. जैसलमेर लगभग स्थिर
(कारण सीमावर्ती क्षेत्र में निजी विद्यालयों की कम संख्या, सरकारी विद्यालय ही विकल्प)
3. अजमेर - कमी
4. अलवर - कमी
5. बांसवाड़ा - कमी
6. बारां - कमी
7. भरतपुर - कमी
8. भीलवाड़ा - कमी
9. बीकानेर - कमी
10. बूंदी - कमी
11. चित्तौड़गढ़ - कमी
12. चूरू - कमी
13. दौसा - कमी
14. धौलपुर - कमी
15. डूंगरपुर - कमी
16. श्रीगंगानगर - कमी
17. हनुमानगढ़ - कमी
18. जयपुर - कमी
19. जालौर - कमी
20. झालावाड़ - कमी
21. झुंझुनूं - कमी
22. जोधपुर - कमी
23. करौली कमी
24. कोटा कमी
25. नागौर कमी
26. पाली कमी
27. प्रतापगढ़ कमी
28. राजसमंद कमी
29. स. माधोपुर कमी
30. सीकर कमी
31. सिरोही कमी
32. टोंक
33. उदयपुर
उक्त तालिका के अनुसार - राजस्थान में पिछले दो वर्षों में लगभग 8.4 लाख छात्रों का नामांकन घटा है, जिसका सबसे बड़ा असर सरकारी विद्यालयों में देखा गया।
अधिकांश पुराने 33 जिलों में नामांकन घटने का रुझान है। हालांकि, सार्वजनिक UDISE+ रिपोर्ट में जिलेवार छात्र संख्या (कितने छात्र बढ़े या घटे) जारी नहीं की गई है, इसलिए प्रत्येक जिले के लिए सटीक संख्या बताना संभव नहीं है।
सरकारी निजी विद्यालयों की तुलना - UDISE+ के हालिया आँकड़ों के आधार पर राजस्थान में सरकारी और निजी विद्यालयों का विश्लेषण काफी चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है, जिसके अनुसार राजस्थान की स्थिति -
राजस्थान में कुल 66000 विद्यालयों में से लगभग 33,500 विद्यालयों में नामांकन पिछले दो वर्षों में तुलनात्मक नामांकन तेजी से घटा है।
इसके मुख्य कारण -
1. कारण असुरक्षित भवन
2. शिक्षक उपलब्धता
3. घर से विद्यालय की दूरी के कारण परिवहन साधन।
4. ग्रामीण पलायन
5. अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के प्रति आकर्षण
6. घटती जन्मदर
7. निजी विद्यालयों में अधिक निगरानी व जवाबदेही।
8. सरकारी विद्यालयों का बंद होना
9. सरकारी स्कूलों में छात्रों का आधार मैप करने से घोस्ट स्टूडेंट (फर्जी नामांकन) में कमी।
10. कुछ क्षेत्रों में वैकल्पिक शिक्षा संस्थानों, जिनमें मदरसे भी शामिल हैं, की ओर बढ़ता रुझान।
11. स्वाध्याय या ओपन स्कूल में अध्ययन भी इसका एक कारण हो सकता है।
(कुछ लोग एक कारण स्कूलों के विलय को भी मानते है परन्तु यह वैध नहीं है, विलय के कारण नामांकन भी विलय हो गया, जो कम नहीं हुआ।
12. विद्यालय की वास स्थान से दूरी।
13. विद्यालयों को मर्ज करने से छात्र के वासस्थान से विद्यालय की दूरी 3 से 8 किलोमीटर बढ़ गई, जिससे या तो बच्चा वैकल्पिक शिक्षा में चला गया या ड्रॉपआउट हो गया।
यह सच है कि निजी विद्यालयों में नामांकन बढ़ा है परन्तु बहुत कम, अधिकांश घटता नामांकन ड्रॉपआउट की श्रेणी में आ रहा है।
पूरे भारत के सरकारी विद्यालयों के नामांकन में करीब 86 लाख की कमी आई है, निजी विद्यालयों में 30 लाख अधिक नामांकन बढ़ा है, 57 लाख बच्चे ड्रॉपआउट हुए हैं या वैकल्पिक शिक्षा को चुना है, जो एक चिंताजनक आंकड़ा है।
अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि पूर्व की अपेक्षा प्रथम कक्षा में यह प्रतिशत न्यूनतम रहा है।
नीति के स्तर पर चिंता -
यह केवल "सरकारी बनाम निजी" का प्रश्न नहीं है। यदि सरकारी विद्यालयों में नामांकन लगातार घटता है, तो -
विद्यालयों के विलय या बंद होने की संभावना बढ़ती है। इससे सरकारी नौकरियों में कमी आएगी।
शिक्षक संसाधनों का पुनर्वितरण करना पड़ता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुँच प्रभावित होती है।
यह विषय शिक्षा नीति के लिए गंभीर है और केवल विद्यालयों की संख्या देखकर स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। छात्र कहाँ जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं, और किन क्षेत्रों में सरकारी विद्यालय अभी भी मजबूत हैं, इन सभी प्रश्नों का संयुक्त विश्लेषण आवश्यक है।
आमजन, न्यून व मध्यम आय वर्ग के नागरिकों की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ेगा। सभी लोग निजी विद्यालयों की फीस नहीं भर सकते और वो स्कूल से वंचित हो जाएंगे। फिर वही वर्ग संघर्ष और अस्थिरता।
आने वाले समय में यह वर्ग संघर्ष में बदल जायेगा। यदि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक जारी रही, तो सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए सरकार को दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में चाहे विद्यार्थी कम हों, सरकारी विद्यालय खोलने चाहिए, साथ ही तंत्र को अधिक चुस्त करना होगा।
चेतावनी -
सरकारी शिक्षकों को भी संभल जाना चाहिए अन्यथा सरकारी स्कूलों में सरकारी शिक्षक इतिहास बन कर रह जाएंगे।
यह संकट शिक्षक, गरीब नागरिक और साधनहीन व्यक्तियों के अस्तित्व का संकट है। यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत के सामाजिक ढांचे को बचाने का प्रश्न है।
सरकार को क्या करना चाहिए -
1. छात्र - शिक्षक अनुपात का संतुलन
2. संख्यात्मक आंकड़ों की जगह लर्निंग आउटकम पर जोर देना।
3. आंकड़ों का लोकतंत्रीकरण - जिला-वार सटीक डेटा सार्वजनिक होना चाहिए, वह पारदर्शी शासन के लिए अनिवार्य है।
4. एनरोलमेंट रिटेंशन पर ध्यान देना होगा।
5. ड्रॉपआउट दर कम करने हेतु नीति निर्माण।
6. स्थाई शिक्षक स्थानांतरण एवं कार्य नीति का निर्माण।
7. अकर्मण्य शिक्षकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति, व अच्छा काम करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहन।
8. शिक्षकों का ठहराव व डेप्युटेशन परम्परा पर पूर्ण रोक लगाना।
9. वर्तमान में भारत में शिक्षा पर सरकार (केंद्र और राज्य दोनों मिलाकर) द्वारा किया जा रहा खर्च GDP का लगभग 4.1% है। कोठारी कमीशन 1968 की सिफारिशों के अनुसार इसे बढ़ाकर GDP का न्यूनतम 6% भाग शिक्षा पर खर्च हो।
10. सरकारी स्कूलों में परिवहन व्यवस्था लागू की जाए (पहले सरकार दो किलोमीटर से अधिक दूरी से आने वाले बच्चों को परिवहन भत्ता देती थी, जो अब बंद हो गया है)
अंत में -
इमारतें तो खड़ी हैं, मगर रूह कहां है
किताबें हाथ में हैं, पर जुबां में रूह कहां है
नींव जो आज खोखली हो रही है शिक्षा की,
वतन के मुस्तक़बिल की जुस्तजू कहां है।
लेख एवं विश्लेषण -
शमशेर भालू खां (जिगर चूरूवी)
सोर्स -
1. UDISE+ Report 2023-24, Ministry of Education, Government of India.
2. UDISE+ School Education Dashboard.
3. National Family Health Survey (NFHS-5) (TFR संबंधी आँकड़ों के लिए).
4. Kothari Commission Report (1964-66).
5. National Education Policy 2020
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