लघुकथा - गार्ड साहब
Doco कंपनी के मुख्य द्वार पर तैनात मातादीन का गार्ड की नौकरी का तीसरा आज दिन था। नई वर्दी नया जोश और क्या काम।
इससे पहले वह अपने खेत में काम कर के आजीविका चलाया करता था, मगर बिटिया के ब्याह में ज्यादा खर्च के कारण दो बीघा जमीन साहूकार को गिरवी रखी थी, हाथ से निकल गई।
गांव में काम नहीं मिलने पर वह शहर आ गया, थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा था, सो उसे Doco में गार्ड का काम मिल गया।
समय करीब नौ बजे, सरदाना साहब कंपनी के काम काज को देखने पैदल ही निकल पड़े। सर पर बड़ा सा तौलिया लगाए वो गेट के अंदर जाने लगे, कि मातादीन ने रोक लिया।
कहां घुसे जा रहे हैं साहब, पहले अपना पास दिखाएं, फिर अंदर जाएं। सरदाना साहब ने रौब से कहा, यह कंपनी मेरी है, मैं कंपनी का MD हूं, मुझे पास की क्या जरूरत, लेकिन गार्ड अड़ा रहा।
सरदाना साहब को वापस जाना पड़ा।
दूसरे दिन बिना गेट पास लगी गाड़ी ले कर आए, लेकिन गार्ड ने अंदर नहीं जाने दिया और उन्हें वापस लौटना पड़ा।
तीसरे दिन तैयार हो कर चले, गेट पास वाली गाड़ी को कोने पर खड़ा किया पर गार्ड ने नहीं जाने दिया।
गेट में पास दिखा कर प्रवेश करने वाले साथी उसे समझा रहे थे कि वो इस कंपनी के मालिक सरदाना साहब हैं, जल्दबाजी में अपना पास भूल गए होंगे, जिद मत करो इन्हें जाने दो, परन्तु मातादीन ने उसके हाथ में ड्यूटी पर चढ़ने से पहले थमाया गया पत्र दिखाते हुए कहा कि इसके अनुसार बिना पास के किसी को भी अन्दर जाने की मनाही है, साहब कहते हैं तो इसमें लिखे नियमों को तोड़ कर अंदर जा सकते हैं पर मैं उन्हें ऐसा नहीं करने दूंगा।
"सर, आप पहचान-पत्र ले आइए" बड़ी विनम्रता से उसने कहा।
"मैं इस कंपनी का MD हूँ।"
"हो सकते हैं, सर। लेकिन बिना पहचान-पत्र के प्रवेश नहीं।"
गार्ड ने फिर नियमों वाले बोर्ड की ओर इशारा किया, देखिए, "बोर्ड पर लिखा है कि कंपनी में कोई भी कर्मचारी पहचान-पत्र दिखा कर ही प्रवेश कर सकता है।
कुछ ही क्षणों में वरिष्ठ अधिकारी भी पहुँच गए। उन्होंने MD की पहचान की पुष्टि की पर गार्ड नहीं माना।
सरदाना साहब पीछे मुड़े, दूर खड़ी गाड़ी में बैठे ड्राइवर को फोन किया, एक मिनट में गाड़ी गेट पर थी। MD साहब गाड़ी में बैठे, गार्ड ने दरवाजा खोला और वो अंदर चले गए।
गार्ड साहब की आँखों में न डर था, पर अपराधबोध नहीं। उसके चेहरे पर केवल कर्तव्यबोध दिखाई दे रहा था।
MD ने गार्ड को अंदर बुलवाया, स्टाफ के लोग आशंकित थे कि अभी तो नौकरी लगी थी, बेचारा मातादीन, यह तो बेभाव ही गया।
डरता - डरता मातादीन केबिन के दरवाजे पर खड़ा हो गया, MD साहब फोन पर HRA से बातचीत में व्यस्त थे।
चश्मा ऊपर - नीचे करते हुए HRA सक्सेना जी हाथों में लिफाफा लिए अंदर पहुंचे।
सरदाना साहब ने मातादीन को अंदर आने का इशारा करते हुए कुर्सी पर बैठने का हुक्म दिया।
उसने कांपते हुए मुंह लटकाए हाथ जोड़ कर पाव भर शरीर को कुर्सी पर टिका दिया। MD उसके पास आया, कंधे पर हाथ रखा और सक्सेना साहब से लिफाफा ले कर उसको संभलाते हुए कहा, शाबाश, आज से अब इस कंपनी के सुपरवाइजर हो। इस लिफाफे में तुम्हारा सुपरवाइजर का प्रमोशन लेटर और दो लाख रूपए हैं। मैने तुम्हारे बारे में सब पता किया, अब पहले अपने गांव जाओ, साहूकार से जमीन वापस लो, दो महीने की छुट्टी दे रहा हूं, आते समय केर और सागरी जरूर लाना।
मातादीन की आंखों में अब खुशी के आंसू थे, और MD साहब के भी।
HRA सक्सेना यह सब देख कर भावुक हो था था और स्टाफ भी।
मॉरल - कर भला तो अंत भला।
#जिगर_चूरूवी
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