@कॉपीराइट - शमशेर भालू खान
समान नागरिक संहिता (UCC) एक विश्लेषण- शमशेर खानछात्र - राजकीय विधि महाविधालय, चूरू।
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देश में समान हों, नागरिक के अधिकार।
क्षेत्र जाति धर्म का, बंधन है बेकार।।
#जिगर_चूरूवी
कुछ शब्द जिनका स्पष्टीकरण लेख से पूर्व आवश्यक है -
- राष्ट्र (Nation) - किसी स्थान के नागरिकों की सांस्कृतिक एकता।
- राज्य (State/Country) - सीमा, संप्रभुता, सरकार एवं नियम के अनुसार संचालित निश्चित जनसंख्या का निश्चित भू- भाग।
- कानून (Law) - राज्य द्वारा व्यवस्थाओं के संचालन हेतु रीति अनुसार बनाए गए विधि- विधान जिनकी पलना नहीं करने पर किसी दण्ड की अनिवार्यता हो।
- नागरिक (Citizen) - निश्चित भू भाग की सीमा में वास करने वाला व्यक्ति जिसे उस राज्य के कानून के द्वारा अधिवास के अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिस पर उक्त राज्य द्वारा निर्मित कानून लागू होते हों, एवं वह उनका पालन कर्तव्य के अधीन अनिवार्यतः करता हो।
- अल्पसंख्यक (Minority) - किसी राज्य की सीमा में अपेक्षित संख्या में कम संख्या निवास करने वाले अधिक जनसंख्या वाले लोगों से विपरीत धर्म/भाषा के मानने वाले।
- अनुच्छेद (Artical) - किसी राज्य की सरकार एवं व्यवस्थाओं के संचालन हेतु निर्मित विधि के विभिन्न खण्ड।
- समान नागरिक संहिता (Unified Civil Code) UCC - राष्ट्र के सभी नागरिकों के लिए एकसमान कानून।
समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने हेतु चुनौतियां एवं उनका निवारण -
समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) भारत में चर्चा का विषय रहा है। सरल शब्दों में इसका अर्थ और इससे जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार से साझा की जा सकती हैं -
समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है?
समान नागरिक संहिता का अर्थ है, पूरे देश के लिए एक समान कानून।
वर्तमान में, भारत में अलग-अलग धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, आदि) के व्यक्तिगत मामलों के लिए अलग-अलग 'पर्सनल लॉ' जैसे
- हिंदू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम - 1956,
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम - 1956
- हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम - 1956
इसी प्रकार से मुस्लिम पर्सनल लॉ एवं ईसाई लॉ बने हुए हैं जिनके अंतर्गत उनकी धार्मिक मान्यताओं के अंतर्गत विवाह, विवाह विच्छेद, पारिवारिक व्यवस्था, आदि के संचालन संबंधी नियम बने हुए है।
UCC का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून लागू करना है, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या लिंग के क्यों न हों।
UCC के मुख्य बिंदु -
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 (DPSP) -
भारतीय संविधान के राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) के अंतर्गत अनुच्छेद 44 में स्पष्ट किया गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा। नीति निर्देशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है, यह राज्य की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है।इस हेतु समय समय पर सभी सरकारों ने प्रयास किए परन्तु अभी तक सफलता नहीं मिली है।
वर्तमान में भारत में आपराधिक कानून (जैसे IPC/BNS) और अनुबंध/संविदा, श्रम एवं साक्ष्य आदि मामलों में कानून सभी धर्मों के लिए समान रूप से लागू हैं अर्थात इन स्थितियों में UCC लागू है, परन्तु व्यक्तिगत या नागरिक मामलों में लोग अपने-अपने धार्मिक कानूनों के अनुसार चलते हैं।
UCC का उद्देश्य -
इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे राष्ट्रीय एकता बढ़ेगी, लैंगिक समानता आएगी और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सशक्त बनाया जा सकेगा, क्योंकि कई बार धार्मिक कानूनों में महिलाओं के अधिकार पुरुषों के मुकाबले कम माने जाते हैं। धार्मिक कट्टरता के कारण या सरकारों द्वारा अल्पसंख्यक धर्मों के नागरिकों की उपेक्षा के कारण आम जन जो इसके अच्छे परिणामों से अनभिज्ञ है या कट्टर सोच के लोगों के बहकावे में आकर इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं।
UCC लागू करने हेतु चुनौतियां -
UCC को लेकर देश में अलग-अलग विचार हैं -
1. समर्थन में तर्क - समर्थकों का कहना है कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में व्यक्तिगत कानूनों में धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह समानता और न्याय के आधुनिक सिद्धांतों के अनुकूल है। यहां किसी धर्म विशेष के आधार पर न होकर यदि सभी धर्म के लोगों के लिए सामूहिक हितकर कानून बनाया गया तो यह प्रथम दृष्टया उचित एवं स्वीकार्य होगा। इसमें धर्म विशेष के कुछ बिंदु जो उस धर्म की मान्यताओं की रीढ़ हैं को समाहित कर लिया जाए तो कानून को व्यापक समर्थन मिल सकता है जैसे -
- इस्लाम धर्म में विवाह, तलाक, एवं पूजा परम्परा को सम्मिलित करना।
2. विरोध/चिंताएं - विरोध करने वालों का मुख्य तर्क यह है कि भारत विविधताओं वाला देश है। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों की अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं हैं, और एक समान कानून उन परंपराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) में हस्तक्षेप हो सकता है।
फिलहाल, भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर कोई केंद्रीय कानून लागू नहीं है, हालांकि कुछ राज्यों (जैसे उत्तराखंड) ने अपनी विधानसभाओं में इसे लेकर कानून पारित किए हैं। यह विषय अभी भी व्यापक सामाजिक और कानूनी चर्चा का हिस्सा है।
अल्पसंख्यक समाज की चिंताएं एवं उनका निवारण - (विरोध या चिंताओं का निस्तारण) -
समान नागरिक संहिता (UCC) के विरोध के बिंदुओं का निस्तारण करना एक संवेदनशील और जटिल कार्य है, या यूं कहें कि मिर्च के ढेर से पलकों से सुई ढूंढने के समान है। फिर भी संवेदनशील सरकार इसे एकतरफा थोपने के बजाय सहमति और क्रमिक सुधार (Gradual Reform) का दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रभावी समाधान कर सकती है।
मेरे अनुसार इस विरोध को दूर करने के लिए निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनाई जा सकती हैं -
1. समावेशी परामर्श और संवाद (Inclusive Consultation)
- व्यापक चर्चा एवं अविश्वास को दूर करना - कानून बनाने से पहले सभी धर्मों, समुदायों के धार्मिक नेताओं, नागरिक समाज और महिला संगठनों के साथ व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। इससे समुदायों के मन में मौजूद अविश्वास (Trust Deficit) को कम किया जा सकता है।
सांस्कृतिक संवेदनशीलता - भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए, उन अनूठी परंपराओं (जैसे उत्तर-पूर्व की मातृवंशीय परंपराएं) का सम्मान करना आवश्यक है, जो कानून के दायरे में आने के बावजूद समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं।
2. एकमुश्त के बजाय क्रमिक सुधार की नीति - (Gradual Reform)
न्यायालयों ने भी कई बार यह संकेत दिया है कि UCC को रातों-रात लागू करने के बजाय चरणों में लागू किया जाना उचित होगा।
मौजूदा कानूनों में सुधार - सभी व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के भीतर से उन भेदभावपूर्ण प्रावधानों (जैसे तलाक, विरासत में लैंगिक असमानता) को पहले हटाया जाए जो संविधान के समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14-15) एवं धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, अल्पसंख्यकों के अधिकार आदि के विपरीत हैं। एक बार जब समाज इन सुधारों को अपना लेगा, तो एक पूर्ण UCC की ओर बढ़ना आसान हो जाएगा।
3. लैंगिक न्याय पर फोकस -
विरोध का एक बड़ा कारण यह डर है कि UCC किसी धर्म विशेष की संस्कृति को मिटा देगा। यदि सरकार का मुख्य फोकस धार्मिक पहचान के बजाय लैंगिक न्याय (Gender Justice) और मानवाधिकार पर होगा, तो इसे आम जनता का अधिक समर्थन मिलेगा। महिलाओं को विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समान अधिकार देने का तर्क किसी भी समुदाय के लिए अस्वीकार करना कठिन होता है।
4. संवैधानिक नैतिकता का पालन -
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (जैसे सबरीमाला या ट्रिपल तलाक मामला) के अनुसार, किसी भी धार्मिक प्रथा को 'संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के तराजू पर तौला जाना चाहिए। यदि कोई प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे सुधारना राज्य का कर्तव्य है। इस वैचारिक स्पष्टता से UCC को एक धार्मिक हस्तक्षेप के बजाय न्याय का उपकरण बनाया जाए। जैसे ट्रिपल तलाक कानून से केवल मुस्लिम महिलाओं को संबंधित किया गया, यह कानून "भारत में तलाक एवं पुनर्विवाह" अथवा "भारत में विवाह, विवाह विच्छेद एवं पुनर्विवाह" जैसे टाइटल के साथ लाया जाता और इसमें सभी वर्ग के महिला एवं पुरुषों को संबंधित कर आवश्यकता एवं स्थान विशेष पर सकारात्मक सांस्कृतिक मूल्यों को उचित स्थान दिया जाता तो यह अपने आप में UCC का एक भाग होता।
5. साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण (Evidence-Based Approach)
- गोवा जैसे राज्यों का उदाहरण सामने रखना चाहिए, जहाँ समान नागरिक संहिता लंबे समय से लागू है। क्या यहां अन्य धर्म के लोग नहीं रहते, हां रहते हैं और वहां के कानून को मानते भी हैं, इससे यह स्पष्ट होता है कि एक समान कानून होने के बाद भी धार्मिक पहचान और विविधता का अस्तित्व बना रहता है। इससे लोगों के मन का यह डर दूर किया जा सकता है कि UCC उनकी धार्मिक स्वतंत्रता छीन लेगा।
6. अल्पसंख्यक समुदायों का विश्वास जीतना -
अल्पसंख्यकों के मन में अक्सर यह शंका रहती है कि UCC बहुसंख्यक समुदाय के नियमों को उन पर थोपने का एक माध्यम है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रस्तावित संहिता सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं का समामेलन (Codification of best practices) हो, न कि किसी एक समुदाय का कानून। इसमें विभिन्न धर्मों के प्रगतिशील कानूनों को शामिल किया जाना चाहिए।
अतः मेरा मानना है कि -
विरोध के बिंदुओं का निस्तारण कानून को थोपने (Impose) के बजाय उसे स्वीकार्य (Acceptable) बनाने की प्रक्रिया में निहित है। जब UCC को विविधता का विरोधी न मानकर समानता का संरक्षक माना जाएगा, तो इसका विरोध स्वतः कम हो जाएगा। इस संबंध में तमिलनाडु सरकार ने UCC का विरोध किया है तो उत्तराखंड सरकार ने इसे पारित किया है।
सरकारों द्वारा व्यापक जन संपर्क, विस्तृत कार्यशालाओं एवं वार्ताओं के माध्यम से आम सहमति बनानी चाहिए।
क्या किया जा सकता है -
1. एकाधिक विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध।
2. पत्नी को तलाक देने की कठोरतम शर्तें।
3. पति के समान पत्नी को तलाक (इस्लामिक परम्परा के अनुसार "खुला") का विकल्प समाहित करना।
4. पुत्री को पुत्र के समान अधिकार एवं पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन हेतु कर्तव्य की समानता।
5. पत्नी/पति को निश्चित समय अवधि तक अलग रहने या जानबूझ कर खुला/तलाक ना देने की (दुर्भावना) का शमन।
6. स्त्री- पुरुष के मध्य विभेदकारी कानूनों की समाप्ति।
7. उत्तराधिकार के समान नियम।
8. सभी प्रकार की लैंगिक असमानता का शमन।
9. इस के साथ सभी धर्म के ज्ञाताओं की राष्ट्रीय UCC समन्वय समिति का गठन कर सभी के लिए स्वीकार्य ड्राफ्ट का निर्माण करे।
10. प्राप्त ड्राफ्ट पर ससंद के दोनों सदनों, राज्यों की विधानसभा/विधान परिषदों में चर्चा की जावे।
11. सरकार UCC पर राष्ट्रीय समन्वय समिति से प्राप्त ड्राफ्ट को सभी सदनों में चर्चा के बाद तैयार ड्राफ्ट को श्वेत पत्र के माध्यम से सार्वजनिक करे और इस पर आमजन, सभी महाविद्यालयों में अध्ययनरत छात्रों एवं धार्मिक शिक्षा केंद्र के छात्रों से राय ले कर लागू करे तो निश्चिंत रूप से यह एक सफल प्रयास होगा।
हर भारतीय पर UCC लागू हो यह जरूरी है।
पर एक की संस्कृति दूसरे पर थोपने की क्या मजबूरी है।।
सब के सकारात्मक विचारों का समावेश हो।
UCC ऐसी बने जिसमें समाहित सारा देश हो।।
जिगर कहे खुल के मुझे UCC से प्यार है।
पर एक पर बात दूसरे की थोपने से इनकार है।।
- जिगर चूरूवी
शमशेर भालू खां
296 सदफ आशियाना, कायमखानी बस्ती सहजूसर चूरू, 331001
M. 9587243963
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