श्रमिक एवं औद्योगिक कानून पेपर - I
Labour and Industrial Laws
SYLLABUS
DR. BHIMRAO AMBEDKAR LAW UNIVERSITY, JAIPUR, PAPER 1.5
यूनिट- I (परिचय)
1.1 श्रम विधान के उद्देश्य, प्रकृति और विकास।
1.2 श्रम कल्याण विधि-शास्त्र की अवधारणा और विकास।
1.3 नैसर्गिक न्याय, सामाजिक न्याय की अवधारणा और श्रम।
1.4 भारत का संविधान, 1950 [अनुच्छेद: 14, 19, 21, 23-24, 38, और 41-43A]
1.5 श्रम एवं न्यायिक प्रक्रिया और जनहित याचिका (PIL)
यूनिट-II - व्यापार संघ अधिनियम, 1926 (संशोधन अधिनियम, 2001 सहित)
2.1 अधिनियम की आवश्यकता, महत्व, उद्देश्य, परिभाषाएं, अवधारणा और मुख्य विशेषताएं।
2.2 व्यापार संघों के अधिकार और दायित्व।
2.3 पंजीकृत व्यापार संघ का पंजीकरण, उन्मुक्तियां और विशेषाधिकार
2.4 व्यापार संघ की निधियां (फंड), विलय और व्यापार संघ का विघटन
2.5 सामूहिक सौदेबाजी
यूनिट-III - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
3.1 कार्यक्षेत्र, प्रयोज्यता और परिभाषाएं
समुचित सरकार, कर्मकार/श्रमिक, उद्योग
औद्योगिक विवाद,पंचाट (निर्णय), समझौता, जनोपयोगी सेवा, हड़ताल, तालाबंदी, छंटनी, कामबंदी/ले-ऑफ (Lay off), बंदी (Closure)
3.2 हड़ताल और तालाबंदी पर रोक/निषेध।
3.3 कामबंदी (ले-ऑफ), छंटनी और उपक्रम की बंदी के लिए मुआवजे का अधिकार।
3.4 औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए मशीनरी (तंत्र)
3.5 अनुचित श्रम व्यवहार और औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946।
UNIT IV - अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)
4.1 आवश्यकता, महत्व और उद्देश्य
4.2 संगठन की परिभाषा, अवधारणा, मुख्य विशेषताएं और इतिहास
4.3 ILO कैसे कार्य करता है -
* ILO महानिदेशक।
* बहुपक्षीय प्रणाली।
* विकास के लिए साझेदारी।
* कार्यक्रम और बजट।
* जवाबदेही और पारदर्शिता।
4.4 संगठनात्मक संरचना -
* सदस्य राष्ट्र (Member States)।
* 2030 विकास एजेंडा (सतत विकास लक्ष्य)।
4.5 ILO का मिशन और प्रभाव
* ILO और भारत में मानवाधिकार।
विशेष - ILO की सबसे बड़ी विशेषता इसकी त्रिपक्षीय संरचना है, जिसमें सरकार, नियोक्ता और श्रमिक तीनों मिलकर बैठते हैं। परीक्षा में इस शब्द का प्रयोग जरूर कीजिएगा।
महत्वपूर्ण वाद (LEADING CASES)
1. एक्सेल वियर बनाम भारत संघ (1978)
2. पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (1982)
3. सोम प्रकाश बनाम भारत संघ (1981)
4. दिल्ली क्लॉथ एंड जनरल मिल्स लिमिटेड बनाम शंभूनाथ मुखर्जी (1935)
5. एयर इंडिया बनाम नरगेश मिर्जा (1981)
6.0BEST अंडरटेकिंग बॉम्बे बनाम श्रीमती एग्नेस (1964)।
7. DS नाकरा बनाम भारत संघ (1983)
8. एक्सप्रेस न्यूजपेपर लिमिटेड बनाम भारत संघ (1958)
9. रॉयल टॉकीज हैदराबाद बनाम ई.एस.आई. कॉर्पोरेशन (1978)
इकाई (Unit) 1
श्रम कानूनों के उद्देश्य विकास एवं प्रकृति - (Object Neture and Development of Labour Laws) -
श्रम (Labour) का अर्थ - केवल शारीरिक मेहनत नहीं है, बल्कि अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की दृष्टि में इसका अर्थ बहुत व्यापक है।
सरल शब्दों में किसी भी आर्थिक उद्देश्य या प्रतिफल (धन) की प्राप्ति के लिए किया गया कोई भी शारीरिक या मानसिक प्रयास श्रम कहलाता है।
श्रम की मुख्य विशेषताएं - श्रम को अन्य संसाधनों (जैसे भूमि या पूंजी) से अलग माना जाता है।
∆ श्रम और श्रमिक अटूट हैं - आप श्रमिक को उसके श्रम से अलग नहीं कर सकते। काम करने के लिए श्रमिक का स्वयं उपस्थित होना अनिवार्य है।
∆ श्रम नाशवान है - यदि एक श्रमिक आज काम नहीं करता, तो उसका आज का श्रम हमेशा के लिए खत्म हो जाता है; इसे कल के लिए स्टोर (Store) नहीं किया जा सकता।
∆ सक्रिय साधन - उत्पादन के अन्य साधन (जैसे मशीन या जमीन) तब तक काम नहीं करते जब तक मानव श्रम उनका उपयोग न करे।
∆ गतिशीलता - श्रम एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है (जैसे गांव से शहर की ओर पलायन)।
श्रम के मुख्य प्रकार Kinds of Labour - श्रम को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
1. शारीरिक श्रम (Physical Labour) इसमें शरीर की शक्ति का अधिक उपयोग होता है। इसे अक्सर 'ब्लू कॉलर जॉब' भी कहा जाता है।
उदाहरण - बोझा ढोने वाला मजदूर, रिक्शा चालक, या निर्माण कार्य में लगे श्रमिक।
2. मानसिक श्रम (Mental Labour) -
इसमें मस्तिष्क, बुद्धि और सोच-विचार का अधिक उपयोग होता है। इसे 'व्हाइट कॉलर जॉब' कहा जाता है।
उदाहरण - एक शिक्षक द्वारा पढ़ाना, डॉक्टर द्वारा मरीज का इलाज करना, या सॉफ्टवेयर इंजीनियर द्वारा कोडिंग करना।
श्रम के वर्गीकरण का चार्ट
कुशलता -
कुशल श्रम (Skilled) - जिसमें विशेष प्रशिक्षण या शिक्षा की आवश्यकता होती है (जैसे इंजीनियर)।
अकुशल श्रम (Unskilled) - जिसमें किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती (जैसे सफाई कर्मचारी)।
अर्थशास्त्र में श्रम का महत्व -
उत्पादन का अनिवार्य साधन - बिना श्रम के कच्चा माल कभी भी तैयार माल (Product) में नहीं बदल सकता।
आय का स्रोत - समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने श्रम को बेचकर ही अपनी जीविका चलाता है।
देश का विकास- किसी भी देश की प्रगति उसके मानव श्रम की गुणवत्ता और कौशल (Skill) पर निर्भर करती है।
निष्कर्ष - यदि कोई व्यक्ति केवल अपने आनंद या व्यायाम के लिए गड्डा खोदता है, तो अर्थशास्त्र में उसे श्रम नहीं माना जाएगा। लेकिन यदि वही व्यक्ति पैसे के लिए गड्डा खोदता है, तो वह श्रम कहलाएगा।
श्रम विभाजन (Division of Labour) का सिद्धांत - श्रम विभाजन अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की एक मौलिक अवधारणा है। सरल शब्दों में, इसका अर्थ है किसी बड़े कार्य को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना और प्रत्येक हिस्से को उस व्यक्ति को सौंपना जो उस काम में कुशल हो।
यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि एक व्यक्ति सब कुछ नहीं कर सकता, लेकिन वह एक काम को बहुत बेहतर तरीके से कर सकता है।
1. एडम स्मिथ का दृष्टिकोण (अर्थशास्त्रीय पक्ष) - आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Wealth of Nations (1776) में इस सिद्धांत को विस्तार से समझाया। उन्होंने एक पिन बनाने के कारखाने का उदाहरण दिया जिसमें -
✓यदि एक अकेला व्यक्ति पिन बनाए, तो वह दिन भर में शायद ही एक या दो पिन बना पाएगा।
✓लेकिन यदि काम को 18 अलग-अलग चरणों (तार काटना, सीधा करना, नुकीला बनाना आदि) में बांट दिया जाए, तो वही मजदूर मिलकर हजारों पिन बना सकते हैं।
श्रम विभाजन के लाभ -
I. कार्यकुशलता में वृद्धि - बार-बार एक ही काम करने से मजदूर उस कार्य में विशेषज्ञ बन जाता है।
II. समय की बचत - एक औजार छोड़कर दूसरा औजार उठाने में जो समय बर्बाद होता है, वह बच जाता है।
III. नवाचार (Innovation) - जब कोई व्यक्ति एक ही काम को गहराई से समझता है, तो वह उसे आसान बनाने के लिए नई मशीनें या तरीके ईजाद करता है।
2. एमिल दुर्खीम का दृष्टिकोण (समाजशास्त्रीय पक्ष) - प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने इसे समाज की एकता से जोड़कर देखा। उन्होंने अपनी पुस्तक The Division of Labour in Society में दो तरह की एकजुटता बताई है।
I. यांत्रिक एकजुटता (Mechanical Solidarity) - जहाँ लोग एक जैसा काम करते हैं (जैसे पुराने कबीले) और उनकी सोच एक जैसी होती है।
II. सावयवी एकजुटता (Organic Solidarity) - आधुनिक समाज में काम इतने बंट गए हैं कि हर व्यक्ति दूसरे पर निर्भर है (जैसे किसान पर खाने के लिए, डॉक्टर पर इलाज के लिए)। यह निर्भरता ही समाज को जोड़े रखती है।
3. श्रम विभाजन के प्रकार - श्रम विभाजन मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है -
A. व्यावसायिक (Simple) - समाज का अलग-अलग व्यवसायों में बंटना (जैसे लोहार, कुम्हार, डॉक्टर)।
B. जटिल (Complex) - एक ही व्यवसाय के भीतर काम का बंटना (जैसे एक मोबाइल फैक्ट्री में स्क्रीन लगाने वाला अलग और बैटरी लगाने वाला अलग)।
C. क्षेत्रीय (Territorial) - जब कोई खास इलाका किसी विशेष उत्पादन के लिए जाना जाए (जैसे असम की चाय या सूरत का कपड़ा)।
4. श्रम विभाजन की सीमाएं और दोष
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इस सिद्धांत के कुछ नुकसान भी हैं -
∆ नीरसता (Monotony) - दिन भर एक ही छोटा सा काम करने से मजदूर ऊब जाता है और उसकी रचनात्मकता खत्म हो जाती है।
∆ निर्भरता - यदि उत्पादन की कड़ी का एक भी हिस्सा रुक जाए, तो पूरा काम ठप हो जाता है।
∆ बेरोजगारी का डर - यदि कोई नई मशीन उस विशिष्ट छोटे काम को करने लगे, तो वह मजदूर बेरोजगार हो जाता है क्योंकि उसे कोई और काम नहीं आता।
निष्कर्ष - श्रम विभाजन आधुनिक औद्योगिक प्रगति की रीढ़ है। इसी के कारण आज बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) संभव हो पाया है। श्रम कानूनों के संदर्भ में, यह सिद्धांत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करता है कि किस प्रकार के काम के लिए किस स्तर के वेतन और सुरक्षा की आवश्यकता है।
श्रमिक (worker)- सामान्य भाषा में, श्रमिक (Worker) वह व्यक्ति है जो अपनी आजीविका चलाने के लिए शारीरिक या मानसिक परिश्रम करता है। हालांकि, कानूनी - आर्थिक दृष्टिकोण से इसकी परिभाषा काफी विस्तृत है।
सरल शब्दों में समझें तो - वह व्यक्ति जो वेतन या मजदूरी के बदले किसी नियोक्ता (Employer) के लिए काम करता है, श्रमिक कहलाता है।
श्रमिक के प्रकार (कौशल और कार्य के आधार पर) - श्रमिकों को उनके काम की प्रकृति और हुनर के आधार पर मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा गया है।
A. कुशल (Unskilled) - जिन्हें काम के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। | बोझा ढोने वाले, निर्माण मजदूर, सफाईकर्मी।
B. अर्ध कुशल (Semi skilled) -जिन्हें काम की सामान्य जानकारी होती है पर वे विशेषज्ञ नहीं होते। मशीन ऑपरेटर, सहायक इलेक्ट्रिशियन।
C. कुशल (Skilled) - जिन्हें अपने काम का विशेष प्रशिक्षण और अनुभव होता है। कारपेंटर, प्लम्बर, वेल्डर, मैकेनिक।
D. उच्च-कुशल (Highly Skilled) -
जो तकनीकी रूप से बहुत उन्नत और विशेषज्ञ होते हैं। | सॉफ्टवेयर इंजीनियर, आर्किटेक्ट, सीनियर डॉक्टर। |
श्रमिकों के संबंध में कानूनी परिभाषा (भारतीय कानूनों के अनुसार) - भारतीय श्रम कानूनों (जैसे Industrial Disputes Act, 1947) के अनुसार 'वर्कमैन' (Workman) या श्रमिक की परिभाषा में वे सभी लोग शामिल हैं जो -
क. किराये या इनाम (Reward) के लिए काम करते हैं।
ख. चाहे काम शारीरिक (Manual), तकनीकी (Technical), लिपिकीय (Clerical) या पर्यवेक्षी (Supervisory) हो।
अपवाद (श्रमिक की श्रेणी से बाहर) - प्रबंधन (Management) या प्रशासनिक (Administrative) पदों पर बैठे लोगों को आमतौर पर श्रमिक की कानूनी श्रेणी से बाहर रखा जाता है। (खासकर यदि उनका वेतन एक निश्चित सीमा से अधिक हो)।
कार्य क्षेत्र के आधार पर वर्गीकरण -
A. संगठित क्षेत्र के श्रमिक (Organized Sector) - वे जो बड़ी कंपनियों या सरकारी विभागों में काम करते हैं, जिन्हें नियमित वेतन, पीएफ (PF) और बीमा जैसी सुविधाएं मिलती हैं।
B. असंगठित क्षेत्र के श्रमिक - (Unorganized Sector) - भारत में लगभग 90% श्रमिक इसी क्षेत्र में हैं। इसमें रेहड़ी-पटरी वाले, खेतिहर मजदूर और घरों में काम करने वाले लोग शामिल हैं। इनके पास नौकरी की सुरक्षा कम होती है।
कॉलर के रंग (Collar Jobs) के आधार पर पहचान -
A. ब्लू कॉलर (Blue Collar) - जो मुख्य रूप से शारीरिक श्रम करते हैं (जैसे फैक्ट्री वर्कर)।
B. व्हाइट कॉलर (White Collar) - जो कार्यालयों में बैठकर मानसिक या प्रशासनिक कार्य करते हैं।
C. पिंक कॉलर (Pink Collar) - जो सेवा क्षेत्र (Service Sector) जैसे लाइब्रेरी, रिटेल या टीचिंग में होते हैं।
विशेष - अब नई श्रम संहिताओं (New Labour Codes) में गिग वर्कर्स (Gig Workers) जैसे जोमैटो/स्विगी के डिलीवरी पार्टनर्स को भी श्रमिक अधिकारों के दायरे में लाने की कोशिश की गई है।
फैक्ट्री (Factory) - सरल शब्दों में, फैक्ट्री या कारखाना उस स्थान या परिसर (Premises) को कहते हैं जहाँ कच्चे माल (Raw Material) को मशीनों और श्रमिकों (Labour) की सहायता से उपयोगी वस्तुओं या तैयार माल (Finished Goods) में बदला जाता है। भारतीय कानून, कारखाना अधिनियम - (The Factories Act, 1948) के अनुसार फैक्ट्री की एक निश्चित परिभाषा दी गई है - फैक्ट्री की कानूनी परिभाषा - कोई भी परिसर फैक्ट्री माना जाएगा -
A. जहाँ 10 या अधिक श्रमिक काम कर रहे हों और उत्पादन प्रक्रिया में बिजली (Power) का उपयोग हो रहा हो।
B. जहाँ 20 या अधिक श्रमिक काम कर रहे हों, भले ही वहाँ बिजली का उपयोग न हो रहा हो।
फैक्ट्री के मुख्य तत्व - एक स्थान को फैक्ट्री कहलाने हेतु उसमें निम्नलिखित चीजें होना आवश्यक हैं -
A. उत्पादन प्रक्रिया - यहाँ कुछ न कुछ बनाया, बदला, मरम्मत किया या पैक किया जाना चाहिए।
B. श्रमिक - कार्य को संपन्न करने के लिए लोगों का होना जरूरी है।
C. निश्चित स्थान - यह एक चारदीवारी या निश्चित क्षेत्र के अंदर होना चाहिए।
D. उपकरण और मशीनें - काम को बड़े स्तर पर करने के लिए मशीनों का प्रयोग होता है।
फैक्ट्री के कुछ सामान्य उदाहरण -
क. कपड़ा फैक्ट्री - जहाँ धागे से कपड़ा या कपड़े से शर्ट/पैंट बनाई जाती है।
ख. चीनी मिल - जहाँ गन्ने से चीनी बनाई जाती है।
ग. स्टील प्लांट - जहाँ लोहे के अयस्क से स्टील की चादरें या रॉड बनाई जाती हैं।
घ. खाद्य प्रसंस्करण इकाई - जहाँ आलू से चिप्स या टमाटर से केचप बनाया जाता है।
फैक्ट्री का महत्व -
I. रोजगार - यह हजारों लोगों को काम (श्रम) और वेतन प्रदान करती है।
II. बड़े पैमाने पर उत्पादन - यहाँ वस्तुएं इतनी अधिक मात्रा में बनती हैं कि वे आम जनता के लिए सस्ती हो जाती हैं।
III. आर्थिक विकास - फैक्ट्री से ही देश का औद्योगिक विकास होता है और निर्यात बढ़ता है।
उद्योग (Industry) - यह एक व्यापक शब्द है जो उन सभी आर्थिक गतिविधियों के समूह को दर्शाता है जो वस्तुओं के उत्पादन, कच्चे माल को तैयार माल में बदलने या सेवाएं प्रदान करने से संबंधित हैं। सरल भाषा में, एक ही तरह का व्यवसाय करने वाली सभी कंपनियों या फैक्ट्रियों के समूह को उद्योग कहा जाता है।
उदाहरण - भारत में जितनी भी कंपनियां कारें बनाती हैं (जैसे टाटा, मारुति, हुंडई), उन सबको मिलाकर ऑटोमोबाइल उद्योग कहा जाता है।
उद्योगों का वर्गीकरण (Types of Industries) - उद्योगों को उनकी प्रकृति, आकार और कच्चे माल के आधार पर मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है -
1. प्राथमिक उद्योग (Primary Industry) - ये उद्योग सीधे प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े होते हैं।
A. निष्कर्षण (खनन) उद्योग - पृथ्वी से खनिज या तेल निकालना (जैसे: खनन, ड्रिलिंग)।
B. जनन उद्योग - पौधों और पशुओं का पालन (जैसे: कृषि, मुर्गी पालन, मछली पालन)।
2. द्वितीयक उद्योग (Secondary Industry) - यहाँ प्राथमिक उद्योगों से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग करके नई वस्तुएं बनाई जाती हैं। इसे विनिर्माण (Manufacturing) भी कहते हैं।
अ. भारी उद्योग - जहाँ बड़ी मशीनों और लोहे का काम होता है (जैसे स्टील प्लांट)।
ब. हल्के उद्योग - जहाँ उपभोक्ता वस्तुएं बनती हैं (जैसे खिलौना या इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग)।
स. निर्माण उद्योग - पुल, सड़क और इमारतें बनाना।
3. तृतीयक उद्योग - ये उद्योग कोई वस्तु नहीं बनाते, बल्कि सेवाएं प्रदान करते हैं जो व्यापार को सुचारू बनाती हैं।
उदाहरण - बैंकिंग, बीमा, परिवहन, पर्यटन और शिक्षा।
आकार और पूंजी के आधार पर उद्योग
A. कुटीर उद्योग - घर के सदस्यों द्वारा कम पूंजी में चलाया जाने वाला। जैसे टोकरी बुनना, अचार-पापड़ बनाना।
B. लघु उद्योग - जिसमें छोटी मशीनें और सीमित श्रमिक होते हैं। सिलाई मशीन, रबर या प्लास्टिक खिलौने।
C. बृहद (बड़े) उद्योग - जहाँ करोड़ों का निवेश और हजारों श्रमिक होते हैं। टाटा स्टील, रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स।
अर्थव्यवस्था में उद्योग का महत्व
A. रोजगार - उद्योग लाखों लोगों को काम और आजीविका प्रदान करते हैं।
B. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) - भारत की जीडीपी में उद्योग क्षेत्र का योगदान लगभग 30% है।
C. आत्मनिर्भरता - उद्योगों के विकास से देश को जरूरी सामान के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
D. निर्यात - देश में बनी वस्तुएं विदेशों में बेचकर विदेशी मुद्रा कमाई जाती है।
उद्योगों के वर्गीकरण और उनके प्रकारों के बारे में इस वीडियो में बहुत विस्तार से बताया गया है।
फैक्ट्री (Factory) और उद्योग (Industry) में अंतर - फैक्ट्री और उद्योग दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें अक्सर एक ही समझ लिया जाता है जबकि इनके बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। सरल शब्दों में, फैक्ट्री एक स्थान (Site) है, जबकि उद्योग एक क्षेत्र (Sector) है।
नीचे विस्तार से इनके अर्थ और उदाहरण दिए गए हैं -
1. फैक्ट्री (Factory) - फैक्ट्री (कारखाना) वह भौतिक स्थान या इमारत है जहाँ कच्चे माल (Raw Material) को मशीनों, उपकरणों और श्रमिकों की सहायता से तैयार माल में बदला जाता है।
फैक्ट्री की विशेषता - वास्तविक उत्पादन की प्रक्रिया होती है।
उदाहरण - मानेसर में मारुति सुजुकी की फैक्ट्री (जहाँ कारें असेंबल होती हैं)।सूरत में कपड़े बनाने की एक बड़ी मिल।
2. उद्योग (Industry) - उद्योग एक अधिक व्यापक (Broad) शब्द है। यह उन सभी व्यवसायों या फैक्ट्रियों का एक समूह (Group) है जो एक ही प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन करते हैं या एक जैसी सेवाएं प्रदान करते हैं।
मुख्य विशेषता - यह किसी विशेष व्यवसाय के पूरे क्षेत्र को दर्शाता है।
उदाहरण -
∆ ऑटोमोबाइल उद्योग - इसमें टाटा मोटर्स, मारुति, महिंद्रा जैसी सभी कंपनियां और उनकी सभी फैक्ट्रियां शामिल होंगी।
∆ कपड़ा उद्योग - इसमें कपास उगाने से लेकर कपड़ा बुनने और कपड़े सिलने वाली सभी इकाइयां शामिल होंगी।
फैक्ट्री और उद्योग के बीच मुख्य अंतर -
प्रकृति - यह एक भौतिक स्थान या इकाई (Unit) है। | यह समान व्यवसायों का एक समूह (Group) है।
क्षेत्र - इसका दायरा सीमित होता है। इसका दायरा बहुत विस्तृत होता है।
कार्य - यहाँ कच्चा माल मशीनों से प्रोसेस होता है। यह उत्पादन और सेवा दोनों को दर्शाता है।
दृष्टिकोण - इसे उत्पादन केंद्र कहा जा सकता है। इसे आर्थिक क्षेत्र (Economic Sector) कहा जाता है। |
उद्योगों के प्रकार (वर्गीकरण) - उद्योगों को उनके काम के आधार पर मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जाता है -
01. प्राथमिक उद्योग (Primary Industry) - जो सीधे प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े हैं। (जैसे - कृषि, खनन, मछली पालन)।
02. द्वितीयक उद्योग (Secondary Industry) - जहाँ फैक्ट्रियों में निर्माण कार्य होता है। (जैसे - लोहा-इस्पात उद्योग, कपड़ा उद्योग)।
03. तृतीयक उद्योग (Tertiary Industry) - जो सेवाएं प्रदान करते हैं।
समुचित सरकार (Appropriate Government) - श्रम कानूनों और प्रशासनिक शब्दावली में समुचित सरकार का अर्थ उस सरकार (केंद्र या राज्य) से है जिसके पास किसी विशिष्ट संस्थान, उद्योग या विवाद पर नियंत्रण करने और नियम बनाने की कानूनी शक्ति होती है।
चूँकि भारत एक संघीय ढांचा है, इसलिए शक्तियों का बँवारा केंद्र और राज्य के बीच किया गया है। समुचित सरकार का निर्धारण इस आधार पर होता है कि वह उद्योग या प्रतिष्ठान किसके अधिकार क्षेत्र में आता है।
समुचित सरकार का वर्गीकरण - आमतौर पर इसे दो भागों में समझा जा सकता है -
01. केंद्र सरकार (Central Government) - कई मामलों में केंद्र सरकार ही समुचित सरकार होती है - रेलवे, बैंकिंग, बीमा, रक्षा, तार एवं डाक विभाग, खदानें और तेल क्षेत्र, प्रमुख बंदरगाह, हवाई परिवहन सेवाएं, छावनी बोर्ड, केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (जैसे - ONGC, SAIL, BSNL)।
02. राज्य सरकार (State Govt.) -
ऊपर दिए गए क्षेत्रों को छोड़कर, अन्य सभी औद्योगिक विवादों या प्रतिष्ठानों के लिए संबंधित राज्य की सरकार समुचित सरकार होती है।
उदाहरण - निजी फैक्ट्रियां, दुकानें, राज्य परिवहन निगम, कृषि कार्य, और स्थानीय निकाय।
समुचित सरकार के निर्धारण की आवश्यकता - श्रम कानूनों (जैसे - औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम) के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि आदेश कौन जारी करेगा।
विवाद सुलझाना - यदि किसी बैंक में हड़ताल होती है, तो केंद्र सरकार का श्रम विभाग हस्तक्षेप करेगा। लेकिन यदि किसी स्थानीय कपड़ा मिल में विवाद होता है, तो राज्य सरकार का श्रम विभाग उसे सुलझाएगा।
निरीक्षण - कारखानों की सुरक्षा और मानकों की जांच के लिए इंस्पेक्टर कौन नियुक्त करेगा, यह समुचित सरकार ही तय करती है।
नियम बनाना - न्यूनतम मजदूरी तय करना या काम के घंटे निर्धारित करने की शक्ति भी समुचित सरकार के पास होती है।
एक उदाहरण से समझें -
परिदृश्य A - यदि भारतीय स्टेट बैंक (SBI) में कर्मचारियों की कोई समस्या है, तो वहाँ की समुचित सरकार केंद्र सरकार होगी, क्योंकि बैंकिंग एक केंद्रीय विषय है।
परिदृश्य B - यदि आपके शहर की किसी निजी बिस्कुट फैक्ट्री में कोई समस्या है, तो वहाँ की समुचित सरकार राज्य सरकार (जैसे उत्तर प्रदेश या राजस्थान सरकार) होगी।
श्रम कल्याण - श्रम कल्याण का अर्थ उन सभी सेवाओं, सुविधाओं और लाभों से है जो कर्मचारियों के जीवन स्तर को सुधारने और उन्हें कार्यस्थल पर एक सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण प्रदान करने के लिए दिए जाते हैं।
सरल शब्दों में, वेतन के अलावा एक नियोक्ता अपने श्रमिकों को जो भी अतिरिक्त सुविधाएं देता है ताकि वे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ रह सकें, उसे ही श्रम कल्याण कहा जाता है।
श्रम कल्याण के मुख्य पहलू - श्रम कल्याण को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:
01. वैधानिक कल्याण (Statutory Welfare) - ये वे सुविधाएं हैं जो सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों (जैसे: कारखाना अधिनियम, 1948) के तहत देना अनिवार्य है।
उदाहरण - कार्यस्थल पर पीने के साफ पानी की व्यवस्था, पर्याप्त रोशनी, शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) किट और बैठने की उचित व्यवस्था।
02. स्वैच्छिक कल्याण (Voluntary Welfare) - ये वे सुविधाएं हैं जो कंपनियां अपनी इच्छा से अपने कर्मचारियों की कार्यक्षमता और वफादारी बढ़ाने के लिए प्रदान करती हैं।उदाहरण - परिवहन सुविधा (Bus service), रियायती दरों पर कैंटीन, मनोरंजन के साधन और बच्चों के लिए छात्रवृत्ति।
श्रम कल्याण को निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से विस्तार से समझा जा सकता है -
स्वास्थ्य और सुरक्षा - कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा उपकरण (जैसे हेलमेट, दस्ताने) प्रदान करना और कर्मचारियों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण (Health Check-up) करवाना।
आर्थिक सुरक्षा - भविष्य निधि (PF), पेंशन, ग्रेच्युटी और बीमा जैसी सुविधाएं देना ताकि कर्मचारी का भविष्य सुरक्षित रहे।
आवास और परिवहन - यदि फैक्ट्री शहर से दूर है, तो कर्मचारियों को रहने के लिए क्वार्टर देना या घर से लाने-ले जाने के लिए बस की सुविधा देना।
शिक्षा और मनोरंजन - कर्मचारियों के बच्चों के लिए स्कूल की व्यवस्था करना और कर्मचारियों के तनाव को कम करने के लिए जिम, पुस्तकालय या खेलकूद प्रतियोगिताओं का आयोजन करना।
कार्य की स्थितियां - काम के घंटों को सीमित करना, साप्ताहिक अवकाश देना और महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) की व्यवस्था करना।
श्रम कल्याण का महत्व -
A.कार्यक्षमता में वृद्धि - जब श्रमिक स्वस्थ और खुश होता है, तो वह अधिक बेहतर ढंग से काम करता है।
B.मजदूर-मालिक संबंध - कल्याणकारी कार्यों से नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच विश्वास बढ़ता है और हड़ताल जैसी स्थितियां कम होती हैं।
C. श्रमिकों की स्थिरता - अच्छी सुविधाएं मिलने पर कर्मचारी नौकरी छोड़कर नहीं जाते, जिससे कंपनी का टर्नओवर रेट कम रहता है।
D. सामाजिक न्याय - यह समाज के कमजोर वर्ग (मजदूरों) को गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद करता है।
निष्कर्ष - श्रम कल्याण केवल परोपकार नहीं है, बल्कि एक निवेश है। एक संतुष्ट श्रमिक ही किसी भी उद्योग की वास्तविक संपत्ति होता है।
श्रम कानून (Labour Law) - उन नियमों और कानूनों का समूह है जो श्रमिकों, नियोक्ताओं और सरकार के बीच संबंधों को विनियमित करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य कार्यस्थल पर शांति बनाए रखना और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। सरल शब्दों में, यह वह कानून है जो तय करता है कि एक मजदूर को कितनी मजदूरी मिलेगी, वह कितने घंटे काम करेगा और काम के दौरान उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी।
श्रम कानून के मुख्य उद्देश्य -
शोषण से बचाव - मजदूरों को बंधुआ मजदूरी, कम वेतन और असुरक्षित कार्य स्थितियों से बचाना।
सामाजिक सुरक्षा- बीमारी, बुढ़ापे या दुर्घटना की स्थिति में श्रमिक को आर्थिक मदद सुनिश्चित करना।
विवादों का निपटारा- मालिक और मजदूरों के बीच होने वाले झगड़ों (हड़ताल या तालाबंदी) को कानूनी तरीके से सुलझाना।
औद्योगिक शांति - देश के आर्थिक विकास के लिए उद्योगों में निरंतर काम सुनिश्चित करना।
भारतीय श्रम कानूनों का वर्गीकरण - भारत में श्रम कानूनों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों (अब 4 श्रम संहिताओं में समेकित) में समझा जा सकता है -
1. मजदूरी संबंधी (Wage Related) -
यह सुनिश्चित करता है कि श्रमिकों को समय पर और पर्याप्त वेतन मिले।
उदाहरण- न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (Minimum Wages Act)। यह तय करता है कि किसी भी श्रमिक को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम राशि से कम वेतन नहीं दिया जा सकता।
2. सामाजिक सुरक्षा (Social Security) - यह कानून श्रमिक के भविष्य और स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं।
उदाहरण - पीएफ (EPF), ग्रेच्युटी, और कर्मचारी राज्य बीमा (ESI)। यदि काम के दौरान किसी को चोट लगती है, तो इलाज का खर्च मालिक या बीमा कंपनी उठाएगी।
3. औद्योगिक संबंध (Industrial Relations) - यह ट्रेड यूनियनों (मजदूर संघों) और मालिकों के बीच के संबंधों को नियंत्रित करता है।
उदाहरण - औद्योगिक विवाद अधिनियम (Industrial Disputes Act)। इसमें हड़ताल, छंटनी और तालाबंदी के नियम दिए गए हैं।
4. कार्य स्थिति और सुरक्षा - यह तय करता है कि कार्यस्थल पर सफाई, वेंटिलेशन और सुरक्षा के इंतजाम कैसे होंगे।
उदाहरण - कारखाना अधिनियम जिसमें महिलाओं के लिए काम के घंटे और बच्चों के काम करने पर रोक जैसे नियम शामिल हैं।
भारत में नया बदलाव - 4 लेबर कोड (New Labour Codes) - भारत सरकार ने पुराने 44 जटिल श्रम कानूनों को मिलाकर वर्ष 2025 में 4 सरल संहिताओं (Codes) में बदल दिया है -
मजदूरी संहिता (Code on Wages)
सभी के लिए न्यूनतम वेतन और बोनस।
सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code) - गिग वर्कर्स (जैसे जोमैटो/स्विगी डिलीवरी बॉय) को भी बीमा लाभ।
औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code) - विवादों को जल्दी सुलझाने के नियम।
सुरक्षा और स्वास्थ्य संहिता (OSH Code) - कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं क्यों जरूरी हैं - बिना श्रम कानून के, शक्तिशाली नियोक्ता अपनी शर्तों पर काम करा सकते हैं, जिससे समाज में असमानता बढ़ती है। श्रम कानून श्रमिक को 'गरिमा के साथ काम' करने का अधिकार देता है।
श्रम कानूनों की प्रकृति (Nature of labour laws) - श्रम कानूनों की प्रकृति काफी अनूठी है क्योंकि यह अन्य सामान्य कानूनों (जैसे संपत्ति कानून या अनुबंध कानून) से अलग सिद्धांतों पर आधारित है। इसकी प्रकृति को समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है -
1. सुरक्षात्मक प्रकृति (Protective Nature) - श्रम कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सुरक्षात्मक होता है। आम तौर पर कानून दो समान पक्षों के बीच होता है, लेकिन श्रम कानून मानता है कि नियोक्ता (मालिक) आर्थिक रूप से शक्तिशाली है और श्रमिक कमजोर। इसलिए यह कानून श्रमिकों को शोषण से बचाने के लिए ढाल का काम करता है।
उदाहरण - न्यूनतम मजदूरी तय करना ताकि मालिक अपनी मर्जी से बहुत कम पैसे न दे सके।
2. सामाजिक-आर्थिक न्याय (Social and Economic Justice) - इसकी प्रकृति केवल सजा देने की नहीं बल्कि समाज में न्याय स्थापित करने की है। यह अमीर और गरीब के बीच की खाई को कम करने और श्रमिकों को समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने के उद्देश्य से बनाया गया है। भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) की झलक इसमें स्पष्ट दिखाई देती है।
3. गतिशील और परिवर्तनशील (Dynamic and Evolving) - श्रम कानून स्थिर नहीं होते। समाज और तकनीक जैसे-जैसे बदलती है, ये कानून भी बदलते हैं।
उदाहरण - पहले केवल फैक्ट्री मजदूरों के लिए कानून थे लेकिन अब कंप्यूटर पर काम करने वाले आईटी प्रोफेशनल और 'डिलीवरी पार्टनर्स' (Gig Workers) के लिए भी नियम बनाए जा रहे हैं।
4. अनुबंध की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध (Restriction on Freedom of Contract) - सामान्य नागरिक कानूनों में दो लोग अपनी मर्जी से कोई भी समझौता कर सकते हैं। लेकिन श्रम कानून की प्रकृति ऐसी है कि यह मालिक और मजदूर को ऐसा कोई समझौता करने से रोकता है जो मजदूर के अधिकारों के खिलाफ हो।
उदाहरण - यदि कोई श्रमिक लिख कर भी दे दे कि मैं 12 घंटे काम करने को तैयार हूँ तो भी कानून इसकी अनुमति नहीं देता है। यहाँ कानून समझौते से ऊपर है।
5. त्रिपक्षीय आधार (Tripartite Basis) - श्रम कानूनों के निर्माण और क्रियान्वयन में तीन पक्ष शामिल होते हैं:
I. श्रमिक (Labor)
II. नियोक्ता (Employer)
III. सरकार (Government)
इसकी प्रकृति इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखने की है ताकि औद्योगिक शांति बनी रहे।
6. अनिवार्य प्रकृति (Compulsory Nature) - ज्यादातर श्रम कानून अनिवार्य (Mandatory) होते हैं। यदि कोई फैक्ट्री या संस्थान किसी विशेष श्रेणी (जैसे श्रमिकों की संख्या) में आता है, तो उसे पीएफ (PF), ईएसआई (ESI) और सुरक्षा मानकों का पालन करना ही होगा। इसे नियोक्ता की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता।
निष्कर्ष - श्रम कानून की प्रकृति मानवीय है। यह श्रम को केवल बिकने वाली वस्तु (दास) नहीं मानता बल्कि श्रमिक को एक इंसान मानता है जिसके पास भावनाएं और अधिकार हैं।
भारत में श्रम कानूनों (Labor Laws) का विकास
भारत में इनका विकास रातों-रात नहीं हुआ बल्कि यह औद्योगिक क्रांति, ब्रिटिश शासन और स्वतंत्रता के बाद की आर्थिक नीतियों का एक लंबा परिणाम है। इसका उद्देश्य मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करना और नियोक्ताओं (Employers) के साथ उनके संबंधों को संतुलित करना रहा है।
भारत में श्रम कानूनों का विकास - श्रम कानूनों के विकास को हम मुख्य रूप से तीन चरणों में देख सकते हैं।
1. ब्रिटिश काल (स्वतंत्रता से पूर्व) -
शुरुआत में, अंग्रेजों ने श्रम कानून मजदूरों के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश मिल मालिकों के हितों की रक्षा के लिए बनाए थे ताकि भारतीय श्रम सस्ता बना रहे या प्रतिस्पर्धी न हो सके।
क. भारतीय कारखाना अधिनियम, 1881 यह पहला प्रमुख कानून था। इसमें बच्चों के काम करने के घंटों को सीमित किया गया।
ख. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 पहली बार मजदूरों को संघ बनाने की कानूनी मान्यता मिली।
ग. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 स्वतंत्रता से ठीक पहले लागू इस कानून का उद्देश्य हड़तालों और तालाबंदी को रोकना और विवादों को सुलझाना था।
02. स्वतंत्रता के बाद का चरण (संवैधानिक ढांचा) - आजादी के बाद, भारतीय संविधान ने श्रम अधिकारों को एक नई दिशा दी। संविधान के राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP) में श्रमिकों के लिए आजीविका मजदूरी और काम की मानवीय स्थितिया सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
क. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 - सरकार ने तय किया कि किसी भी मजदूर को एक निश्चित राशि से कम भुगतान नहीं किया जा सकता।
ख. कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (ESI) 1948 - स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम।
ग. कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) 1952 - सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा के लिए।
3. आधुनिक युग और श्रम संहिता (Labor Codes) - समय के साथ पुराने कानून जटिल और संख्या में बहुत अधिक (लगभग 44 केंद्रीय कानून) हो गए थे। व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business) और श्रमिकों के व्यापक कल्याण के लिए 2019-2020 में केंद्र सरकार ने इन कानूनों को 4 प्रमुख संहिताओं (Codes) में समाहित कर दिया -
क. वेतन संहिता (Wage Code) - सभी क्षेत्रों के लिए न्यूनतम मजदूरी का विस्तार।
ख. सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code) - गिग वर्कर्स (जैसे जोमैटो, स्विगी के डिलीवरी पार्टनर) को भी सुरक्षा के दायरे में लाना।
ग. औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code) - विवाद सुलझाने की प्रक्रिया को सरल बनाना।
घ. व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य संहिता (OSH Code) - काम करने की स्थितियों और सुरक्षा मानकों में सुधार।
श्रम कानूनों के विकास के मुख्य कारण
क. शोषण रोकना - बंधुआ मजदूरी और कम वेतन को खत्म करना।
ख. सामाजिक न्याय - समाज के कमजोर वर्ग को आर्थिक सुरक्षा देना।
ग. औद्योगिक शांति - हड़तालों को कम कर उत्पादन बढ़ाना।
घ. वैश्वीकरण - अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मानकों के अनुसार भारतीय कानूनों को ढालना।
विधि शास्त्र में श्रम कल्याण की परिकल्पना का विकास (Concspt and Growth of Labour Welfare Jurisprudance.) - विधि शास्त्र में श्रम कल्याण की परिकल्पना इस बुनियादी विचार पर टिकी है कि श्रम केवल वस्तु नहीं है, बल्कि एक मानवीय गरिमा है। पुराने विधिशास्त्र में मालिक और नौकर का सिद्धांत चलता था, लेकिन आधुनिक विधिशास्त्र में इसे नियोक्ता और कर्मचारी के सामाजिक न्याय के रिश्ते में बदल दिया गया है। मुख्य विधिशास्त्रीय दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं -
01. सामाजिक न्याय का सिद्धांत (Theory of Social Justice) - विधिशास्त्र के अनुसार, श्रम कल्याण का मुख्य आधार सामाजिक न्याय है। इसका अर्थ है कि कानून को समाज के शक्तिशाली वर्ग (मालिक) और कमजोर वर्ग (मजदूर) के बीच की खाई को पाटना चाहिए। न्यायपालिका यह मानती है कि चूंकि दोनों पक्षों की मोलभाव करने की शक्ति समान नहीं है, इसलिए राज्य को हस्तक्षेप कर श्रमिकों के पक्ष में कानून बनाने चाहिए।
02. अहस्तक्षेप से कल्याणकारी राज्य की ओर (Laissez-faire to Welfare State) - 19वीं सदी में अहस्तक्षेप का सिद्धांत था, जहाँ राज्य व्यापारिक मामलों में दखल नहीं देता था। लेकिन आधुनिक विधिशास्त्र ने इसे खारिज कर दिया। अब कानून का उद्देश्य केवल शांति बनाए रखना नहीं बल्कि श्रमिकों का आर्थिक और सामाजिक उत्थान करना है।
03. मानवाधिकारवादी दृष्टिकोण (Human Rights Perspective) - विधिशास्त्र में अब श्रम अधिकारों को मानवाधिकारों के रूप में देखा जाता है।
A. सम्मानजनक जीवन - सिर्फ जीवित रहना काफी नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, आराम और मनोरंजन के साथ जीवन जीना श्रमिक का अधिकार है।
B. शोषण के विरुद्ध अधिकार - बंधुआ मजदूरी या कम वेतन देना केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का अपमान है।
04. वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice) - यह अरस्तू (Aristotle) द्वारा दिया गया एक विधिशास्त्रीय विचार है। श्रम कल्याण के संदर्भ में इसका अर्थ है कि उद्योगों से होने वाले लाभ का एक उचित हिस्सा उन श्रमिकों को भी मिलना चाहिए जिनकी मेहनत से वह लाभ पैदा हुआ है। बोनस और न्यूनतम मजदूरी इसी परिकल्पना का हिस्सा हैं।
श्रम कल्याण के प्रमुख विधिशास्त्रीय स्तंभ
I. सुरक्षात्मक - शोषण से बचाना, बाल श्रम निषेध, काम के घंटे तय करना।
II. सुधारात्मक - जीवन स्तर सुधारना, न्यूनतम मजदूरी, बोनस, कैंटीन सुविधाएं।
III. सामाजिक सुरक्षा - भविष्य की अनिश्चितता से बचाना, पेंशन, ESI, मातृत्व लाभ।
निष्कर्ष - विधि शास्त्र में श्रम कल्याण की परिकल्पना समानता और मानवीय गरिमा के इर्द-गिर्द घूमती है। यह केवल नियमों का समूह नहीं है, बल्कि एक सामाजिक दर्शन है जो यह मानता है कि एक समृद्ध उद्योग के लिए एक खुशहाल और सुरक्षित श्रमिक का होना अनिवार्य है।
श्रमिकों के लिए 'न्यायिक कल्याण की भावना' (Judicial Welfare Sentiment) - श्रमिकों के लिए न्यायिक कल्याण की भावना का विकास केवल कानूनों के बनने से नहीं, बल्कि न्यायपालिका द्वारा उन कानूनों की उदार और मानवीय व्याख्या करने से हुआ है। भारतीय संदर्भ में, यह विकास अहस्तक्षेप (Laissez-faire) के सिद्धांत से हटकर 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की ओर बढ़ने की एक यात्रा है। इसका विकास मुख्य रूप से निम्नलिखित चरणों और सिद्धांतों के माध्यम से हुआ है -
1. संवैधानिक आधार और सामाजिक न्याय - भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक और आर्थिक न्याय का संकल्प लिया गया। अनुच्छेद 39, 41, 42 और 43 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) ने न्यायपालिका को यह दिशा दी कि कानून का उद्देश्य केवल विवाद सुलझाना नहीं, बल्कि कमजोर वर्ग (श्रमिक) का कल्याण होना चाहिए।
2. विधि की उचित प्रक्रिया का विस्तार (अनुच्छेद 21) - न्यायपालिका ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या इतनी व्यापक कर दी कि इसमें सम्मानजनक जीवन और आजीविका का अधिकार भी शामिल हो गया।
केस -
A. ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (1985) - कोर्ट ने माना कि आजीविका का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
B. डी.के. यादव बनाम JMA इंडस्ट्रीज (1993) - कोर्ट ने कहा कि किसी श्रमिक को बिना उचित प्रक्रिया और सुनवाई के नौकरी से निकालना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है।
03. जनहित याचिका (PIL) का उदय
वर्ष 1980 के दशक में जस्टिस PN भगवती और जस्टिस PR कृष्णा अय्यर ने PIL की शुरुआत की। इसने उन गरीब श्रमिकों के लिए अदालत के दरवाजे खोल दिए जो खुद वहां नहीं पहुंच सकते थे।
C. बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984)- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बंधुआ मजदूरी को गुलामी का रूप माना और उनके पुनर्वास के लिए कड़े निर्देश दिए।
D. एशियाड वर्कर्स केस (1982) - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यूनतम मजदूरी से कम देना जबरन श्रम (Forced Labour) के समान है, जो अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।
4. कार्यस्थल पर सुरक्षा और गरिमा (Judicial Activism) - जब विधायिका ने कानून बनाने में देरी की, तो न्यायपालिका ने स्वयं दिशा-निर्देश जारी किए -
E. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) - कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए ऐतिहासिक दिशा-निर्देश दिए, जो बाद में कानून का आधार बने।
F. MC मेहता - बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर पूर्ण रोक और उनके शिक्षा कोष की स्थापना का आदेश दिया गया।
न्यायिक कल्याण भावना के प्रमुख मील के पत्थर (तालिका)
क. आजीविका का अधिकार - ओल्गा टेलिस (1985) | जीवन के अधिकार में काम करने का अधिकार शामिल।
ख. न्यूनतम मजदूरी- पीयूडीआर बनाम भारत संघ (1982) कम वेतन देना शोषण और मौलिक अधिकार का हनन।
ग. समान कार्य, समान वेतन- रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982) लिंग या पद के आधार पर भेदभाव का अंत।
घ. प्राकृतिक न्याय - DK यादव (1993) मनमानी छंटनी पर रोक, सुनवाई का अनिवार्य अधिकार।
निष्कर्ष - श्रमिकों के लिए न्यायिक कल्याण भावना का विकास औद्योगिक शांति से बढ़कर औद्योगिक न्याय तक पहुँच गया है। आज न्यायालय केवल यह प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत विधिशास्त्र की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसे ईश्वरीय कानून या विवेक का नियम भी कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति के साथ कानूनी या प्रशासनिक प्रक्रिया में अन्याय न हो।
सरल शब्दों में, यह वे बुनियादी नियम हैं जिनका पालन हर उस अधिकारी या न्यायालय को करना चाहिए जो किसी व्यक्ति के अधिकारों पर निर्णय ले रहा है।
प्राकृतिक न्याय के दो मुख्य आधारभूत सिद्धांत -
प्राकृतिक न्याय (Netural Justice)
मुख्य रूप से दो लैटिन सूत्रों (Maxims) पर टिका है -
1. नेमो जुडेक्स इन कौसा सुआ (Nemo Judex in Causa Sua) -
इसका अर्थ है कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता।
इसे पक्षपात के विरुद्ध नियम (Rule against Bias) कहा जाता है।
∆ निर्णय लेने वाला व्यक्ति निष्पक्ष होना चाहिए।
∆ यदि न्यायाधीश का उस मामले में कोई आर्थिक, व्यक्तिगत या व्यावसायिक हित है, तो उसे उस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
∆उद्देश्य - न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।
02. ऑडी अल्टरम पार्टम (Audi Alteram Partem) - इसका अर्थ है दूसरे पक्ष को भी सुनो।
इसे सुनवाई का अधिकार (Right to fair hearing) कहा जाता है।
∆. किसी भी व्यक्ति को बिना सुने सजा नहीं दी जा सकती।
∆. निर्णय लेने से पहले प्रभावित पक्ष को नोटिस दिया जाना चाहिए ताकि वह अपनी सफाई पेश कर सके।
∆. उसे अपने पक्ष में सबूत और तर्क रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
03. तार्किक निर्णय का सिद्धांत - यह एक उभरता हुआ सिद्धांत है।
04. बोलने वाला आदेश - आधुनिक विधिशास्त्र में एक तीसरा सिद्धांत भी जुड़ गया है, जिसे बोलने वाला आदेश कहा जाता है। इसका अर्थ है कि कोई भी अधिकारी या कोर्ट जब फैसला सुनाता है, तो उसे उस फैसले के कारण भी बताने चाहिए।
∆. बिना कारण के दिया गया आदेश मनमान माना जाता है और उसे चुनौती दी जा सकती है।
प्राकृतिक न्याय का महत्व -
∆. निरंकुशता पर रोक - यह प्रशासन को अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने से रोकता है।
∆. मानवाधिकारों की सुरक्षा - यह सुनिश्चित करता है कि गरीब या कमजोर व्यक्ति को भी अपनी बात कहने का हक मिले।
∆. न्यायपालिका में विश्वास - जब प्रक्रिया निष्पक्ष होती है, तो जनता का कानून पर भरोसा बना रहता है।
प्राकृतिक न्याय के कुछ अपवाद -
इसके कुछ विशेष परिस्थितियों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को सीमित किया जा सकता है -
आपातकाल (Emergency) - जब देश की सुरक्षा का मामला हो।
∆. अत्यधिक गोपनीयता - जहाँ जानकारी सार्वजनिक करने से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ सकती हो।
∆. अंतरिम आदेश - जहाँ तुरंत कार्रवाई न करने पर भारी नुकसान हो सकता है (जैसे किसी अवैध इमारत को तुरंत गिराना)।
सामाजिक न्याय (Social Justice)
की अवधारणा का सरल अर्थ है- समाज में सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार, अवसर और सुविधाएं प्राप्त होना। यह एक ऐसा विचार है जो समाज के वंचित, पिछड़े और कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाने पर जोर देता है।
विधिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में इसे मानवीय गरिमा और समानता का आधार माना जाता है।
सामाजिक न्याय के मुख्य तत्व - सामाजिक न्याय मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिका होता है -
A. समानता (Equality) - जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान या रंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो।
B.पहुँच (Access) - समाज के संसाधनों (शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और रोजगार) तक सबकी पहुँच सुनिश्चित हो।
C. भागीदारी (Participation) - निर्णय लेने की प्रक्रिया में समाज के हर वर्ग (विशेषकर अल्पसंख्यकों और वंचितों) की हिस्सेदारी हो।
D. मानवाधिकार (Human Rights) - प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।
भारतीय संविधान और सामाजिक न्याय
भारत में सामाजिक न्याय केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है। संविधान की प्रस्तावना में ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का संकल्प लिया गया है।
I. अनुच्छेद 14 - कानून के समक्ष समानता।
II. अनुच्छेद 15 - धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
III. अनुच्छेद 16- सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता।
IV. अनुच्छेद 17 - अस्पृश्यता (Un-touchability) का अंत।
V. अनुच्छेद 46 - अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना।
जॉन रॉल्स का सामाजिक न्याय का सिद्धांत (John Rawls' Theory) - प्रसिद्ध दार्शनिक जॉन रॉल्स ने सामाजिक न्याय को समझने के लिए अज्ञानता का पर्दा का सिद्धांत दिया था। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को यह पता न हो कि समाज में उसकी स्थिति क्या होगी (वह अमीर होगा या गरीब, ऊंची जाति का होगा या नीची), तो वह हमेशा ऐसे नियम बनाएगा जो सबसे निचले स्तर के व्यक्ति के लिए भी लाभकारी हों। यही सामाजिक न्याय की असली कसौटी है।
सामाजिक न्याय और श्रम कल्याण - जैसा कि हम श्रम कानूनों पर चर्चा कर रहे थे, सामाजिक न्याय ही वह कड़ी है जो मजदूरों को मिल मालिकों के शोषण से बचाती है। सामाजिक न्याय के अंतर्गत यह महत्वपूर्ण है
∆. यह सुनिश्चित करना कि एक मजदूर को उतनी मजदूरी मिले जिससे वह सम्मान से जी सके, सामाजिक न्याय है।
∆. कार्यस्थल पर महिलाओं को सुरक्षा देना सामाजिक न्याय है।
∆. बराबरी का हक देना सामाजिक न्याय है।
निष्कर्ष - सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज से मत्स्य न्याय (बड़ी मछली का छोटी मछली को खाना) को खत्म करना और एक ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ शक्तिशाली के साथ-साथ दुर्बल भी सुरक्षित महसूस करे। इससे न्यायिक कल्याण भावना का उदय हुआ।
जब हम इन दोनों को मिलाते हैं, तो न्यायिक कल्याण भावना पैदा होती है। आज की तारीख में कोर्ट केवल यह नहीं देखता कि कानून क्या कहता है, बल्कि यह देखता है कि -
∆. क्या प्रक्रिया सही थी? (प्राकृतिक न्याय)
∆. क्या नतीजा गरीब श्रमिक के प्रति मानवीय था? (सामाजिक न्याय)
संक्षेप में कहें तो प्राकृतिक न्याय श्रमिक को प्रक्रिया के शोषण से बचाता है, और सामाजिक न्याय उसे अभाव के शोषण से बचाता है।
प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और श्रम कल्याण (Labour Welfare) - के बीच का संबंध बहुत गहरा है। अगर श्रम कल्याण एक लक्ष्य है, तो प्राकृतिक न्याय उस लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता है।
इसे विस्तार से समझने के लिए नीचे दिए गए बिंदुओं पर गौर करें -
1. प्राकृतिक न्याय - प्रक्रिया की निष्पक्षता -
∆. प्राकृतिक न्याय यह सुनिश्चित करता है कि जब भी किसी श्रमिक के अधिकारों की बात आए, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शी और भेदभाव रहित हो।
∆. सुनवाई का अधिकार - यदि किसी श्रमिक को नौकरी से निकाला जा रहा है या उस पर कोई जुर्माना लगाया जा रहा है, तो उसे पहले कारण बताओ नोटिस देना अनिवार्य है। उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
∆. निष्पक्ष जांच (Domesti Enquiry) - कारखानों में होने वाली जांच में प्रबंधन को न्यायाधीश और अभियोजक दोनों की भूमिका एक साथ नहीं निभानी चाहिए। जांच अधिकारी को तटस्थ होना चाहिए।
मनमानी पर रोक: यह सिद्धांत मालिकों को अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने से रोकता है।
2. श्रम कल्याण - मानवीय गरिमा की रक्षा - श्रम कल्याण का अर्थ है श्रमिकों को काम की ऐसी स्थितियां देना जहाँ उनका शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास हो सके।
∆. आर्थिक कल्याण- उचित वेतन, बोनस और बीमा।
∆. सुविधाजनक कल्याण - कैंटीन, विश्राम कक्ष, पीने का साफ पानी और शौचालय।
∆. सुरक्षात्मक कल्याण - खतरनाक मशीनों से सुरक्षा और काम के घंटों का निर्धारण।
प्राकृतिक न्याय और श्रम कल्याण का मेल
जब हम इन दोनों को जोड़ते हैं, तो एक कल्याणकारी न्याय की स्थिति पैदा होती है।
अनुशासनात्मक मामलों में मान लीजिए एक श्रमिक बीमार था और काम पर नहीं आ सका। श्रम कल्याण कहता है कि उसे बीमारी की छुट्टी मिलनी चाहिए, और प्राकृतिक न्याय यह सुनिश्चित करता है कि उसे अपनी बीमारी का सबूत पेश करने का मौका मिले ताकि उसे गलत तरीके से बर्खास्त न किया जाए।
शिकायत निवारण - फैक्ट्रियों में शिकायत समितियों का होना श्रम कल्याण का हिस्सा है, लेकिन उन समितियों में सुनवाई का निष्पक्ष होना प्राकृतिक न्याय है।
सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) - ट्रेड यूनियनों और मालिकों के बीच बातचीत के दौरान दोनों पक्षों को समान रूप से सुना जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।
निष्कर्ष - सरल शब्दों में, श्रम कल्याण बताता है कि मजदूर को क्या मिलना चाहिए (रोटी, सुरक्षा, सम्मान), जबकि प्राकृतिक न्याय यह सुनिश्चित करता है कि उसे वह सब कैसे मिले (बिना पक्षपात और पारदर्शी प्रक्रिया के साथ)।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 23, 24, 38, 41 से 43A श्रमिक कल्याण के संदर्भ में -
भारतीय संविधान के ये अनुच्छेद श्रम चार्टर की तरह कार्य करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य श्रमिकों को केवल एक उत्पादन का कारक न मानकर उन्हें एक मानवीय इकाई के रूप में प्रतिष्ठित करना है।
आइए इन अनुच्छेदों की व्याख्या श्रमिक कल्याण के विशिष्ट संदर्भ में समझते हैं -
1. मौलिक अधिकार (भाग-III) - श्रमिकों का सुरक्षा कवच
A. अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) - यह सुनिश्चित करता है कि श्रम कानूनों का लाभ सभी मजदूरों को समान रूप से मिले। इसी अनुच्छेद से समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत निकलता है। यह प्रबंधन द्वारा की जाने वाली मनमानी और भेदभावपूर्ण छंटनी पर रोक लगाता है।
B. अनुच्छेद 19 (संगम बनाने की स्वतंत्रता) - अनुच्छेद 19(1)(c) श्रमिकों को ट्रेड यूनियन (मजदूर संघ) बनाने का मौलिक अधिकार देता है। इसके बिना श्रमिक सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) नहीं कर सकते।
C. अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) - न्यायालयों ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा के साथ जीना है। इसमें आजीविका का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार शामिल है।
D. अनुच्छेद 23 (मानव दुर्व्यापार और बलात श्रम का निषेध) - यह बंधुआ मजदूरी और बेगार को प्रतिबंधित करता है। यदि किसी मजदूर को उसकी इच्छा के विरुद्ध या न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम कराया जाता है, तो वह अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।
E. अनुच्छेद 24 (बाल श्रम का निषेध) - यह 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कारखानों, खानों या किसी भी खतरनाक नियोजन में काम पर रखने पर पूर्ण रोक लगाता है।
02. राज्य के नीति निर्देशक तत्व (भाग-IV) - कल्याणकारी राज्य के रोडमैप में मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा लागू कराए जा सकते हैं, ये अनुच्छेद सरकार को कानून बनाने के निर्देश देते हैं -
F. अनुच्छेद 38 (सामाजिक व्यवस्था) - राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह आय, स्थिति और अवसरों की असमानता को कम करके श्रमिकों के लिए एक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था बनाए।
G. अनुच्छेद 41 (काम का अधिकार) - राज्य अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर सभी के लिए काम, शिक्षा और बीमारी या बुढ़ापे की स्थिति में सार्वजनिक सहायता पाने का अधिकार सुरक्षित करेगा। (जैसे- MGNREGA इसी की देन है)।
H. अनुच्छेद 42 (मानवीय परिस्थितियां और मातृत्व राहत) - यह सुनिश्चित करता है कि कार्यस्थल पर काम की स्थितियां मानवीय हों और महिला श्रमिकों को मातृत्व लाभ प्राप्त हो।
I. अनुच्छेद 43 (आजीविका मजदूरी) - सरकार का लक्ष्य श्रमिकों को न केवल न्यूनतम मजदूरी, बल्कि जीविका मजदूरी (Living Wage) दिलाना है, जिससे वे सम्मानजनक जीवन, बच्चों की शिक्षा और मनोरंजन का आनंद ले सकें।
J. अनुच्छेद 43A (प्रबंधन में भागीदारी) - यह आधुनिक औद्योगिक लोकतंत्र का आधार है। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए।
निष्कर्ष -
समानता - 14, 15, 16 भेदभाव का अंत और समान अवसर
स्वतंत्रता - 19, 21 यूनियन बनाना और गरिमापूर्ण जीवन।
सुरक्षा - 23, 24 शोषण और बाल श्रम से मुक्ति
कल्याण 38, 41, 42, 43 उचित वेतन, स्वास्थ्य और प्रबंधन में हिस्सा।
यह संवैधानिक ढांचा ही भारत में 'श्रमिक' को 'स्वामी' के शोषण से बचाने की सबसे बड़ी कानूनी दीवार है।
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UNIT II
श्रमिक संघ अधिनियम Trade Unions Act, 1926) - यह कानून मजदूरों को संगठित होने और अपनी मांगों को सामूहिक रूप से रखने की शक्ति देता है।
विशेष बात - व्यापार बनाम श्रमिक शब्द
यद्यपि हिंदी में इसे श्रमिक संघ अधिनियम कहा जाता है, परन्तु अंग्रेजी नाम में Trade (व्यापार) शब्द का इस्तेमाल होता है। इसका कारण यह है कि यह कानून केवल शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों के लिए ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े कर्मचारियों और यहाँ तक कि नियोक्ताओं के संघों पर भी लागू होता है।
1 श्रमिक संघ का अर्थ - अधिनियम की धारा 2(h) के अनुसार, श्रमिक संघ का अर्थ है - "कोई भी ऐसा स्थाई या अस्थायी संगठन, जो मुख्य रूप से श्रमिकों और नियोक्ताओं (Employers) या श्रमिकों और श्रमिकों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया हो श्रमिक संघ कहलाएगा।"
2 श्रमिक संघ का -
मुख्य उद्देश्य - सामंजस्य के सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) करना होता है।
A. श्रमिक संघ का पंजीकरण -(Registration) - धारा 3 से 10
पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, लेकिन पंजीकृत संघ को बहुत सी कानूनी सुविधाएं मिलती हैं।
B. सदस्यों की संख्या - किसी भी श्रमिक संघ के पंजीकरण के लिए कम से कम 7 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
C. पंजीकरण के नियम - पंजीकरण के समय और उसके बाद भी, उद्योग में कार्यरत कुल श्रमिकों का कम से कम 10% या 100 श्रमिक (जो भी कम हो) उस संघ के सदस्य होने चाहिए।
D. रजिस्ट्रार - समुचित सरकार एक रजिस्ट्रार की नियुक्ति करती है जो पंजीकरण का प्रमाण पत्र जारी करता है।
3 पंजीकृत ट्रेड यूनियन के अधिकार और सुविधाएं - यह इस अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पंजीकृत संघ के लाभ -
A कॉर्पोरेट निकाय - पंजीकरण के बाद संघ एक कानूनी व्यक्ति बन जाता है। वह अपने नाम से संपत्ति खरीद सकता है और किसी पर मुकदमा कर सकता है (या उस पर मुकदमा किया जा सकता है)।
B. दीवानी मुकदमों से उन्मुक्ति धारा 18 - यदि कोई ट्रेड यूनियन हड़ताल करता है और उससे मालिक को व्यापारिक नुकसान होता है, तो मालिक संघ के पदाधिकारियों पर हर्जाने का दीवानी मुकदमा नहीं चला सकता।
C. आपराधिक साजिश से सुरक्षा - धारा 17 के अंतर्गत संघ के सदस्य अपनी मांगों के लिए एकजुट होकर योजना बना सकते हैं, इसे आपराधिक साजिश नहीं माना जाएगा।
4. संघ की निधियाँ - इस अधिनियम संघ की आय एवं व्यय के संबंध में विवरण दिया गया है - (पैसा कहाँ से कहां खर्च) -
A. सामान्य निधि धारा 15 - इसका उपयोग पदाधिकारियों के वेतन, प्रशासनिक खर्च, कानूनी कार्यवाही और सदस्यों के कल्याण के लिए किया जा सकता है।
राजनीतिक निधि धारा 16 - यह एक अलग फंड होता है। सदस्य इसमें योगदान देने के लिए बाध्य नहीं हैं। इसका उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों या चुनाव प्रचार के लिए किया जा सकता है।
5. श्रमिक संघ के महत्वपूर्ण नियम -
A. पदाधिकारी - अधिनियम के अनुसार, कम से कम 50% पदाधिकारी उसी उद्योग से होने चाहिए जिसमें संघ बना है (बाहरी लोगों की भागीदारी को सीमित करने हेतु)।
B. नाम में बदलाव - यदि संघ अपना नाम बदलना चाहता है, तो उसे कम से कम 2/3 सदस्यों की सहमति और रजिस्ट्रार की अनुमति लेनी होगी।
विघटन (Dissolution) - संघ को बंद करने के लिए 7 सदस्यों और सचिव के हस्ताक्षर वाला नोटिस रजिस्ट्रार को 14 दिनों के भीतर देना होता है।
6. दंड - यदि कोई संघ गलत जानकारी देता है या अधिनियम के नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है और उसका पंजीकरण भी रद्द हो सकता है।
निष्कर्ष - यह कानून औद्योगिक शांति बनाए रखने के लिए बनाया गया था ताकि मजदूर अकेले पड़कर शोषण का शिकार न हों। आज के समय में, कई ट्रेड यूनियनों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, लेकिन 1926 का यह मूल कानून अभी भी उनकी कार्यप्रणाली का आधार है।
अधिनियम की धाराएं - श्रमिक संघ अधिनियम, 1926 एक संक्षिप्त लेकिन बहुत शक्तिशाली कानून है। इस अधिनियम में कुल 5 अध्याय में बंटी 33 धाराएं हैं। उप-धाराएं (जैसे 9A, 21A) संशोधनों के माध्यम से बाद में जोड़ी गई।
मुख्य बिंदु -
∆ धारा 3-13 - पंजीकरण की प्रक्रिया है।
∆ धारा 15-18 - यूनियन के फंड और
∆ कानूनी सुरक्षा की बात करती है।
∆ धारा 28-33 - अनुशासन और पारदर्शिता
अधिनियम का ढांचा -
अध्याय 1 धारा 01 से 02
प्रारंभिक नाम एवं परिभाषाएं
धारा 1 -
नाम - इस अधिनियम का नाम श्रमिक संघ अधिनियम 1926
विस्तार - इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है।
(नोट - पहले यह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत पर लागू होता था, लेकिन 2019 के बाद यह वहां भी प्रभावी है)।
प्रारंभ - यह कानून 1 जून 1927 से प्रभावी होगा। (तारीख से लागू होगा जिसे सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित करे।)
धारा 2 - परिभाषाएं - कार्यकारी,
व्यापार विवाद एवं ट्रेड यूनियन।
मुख्य परिभाषाएं -
धारा 2(a) - समुचित सरकार - यह बताती है कि किस यूनियन के लिए कौन सी सरकार जिम्मेदार होगी जैसे -
A. रेलवे, डाक, बंदरगाह या तेल क्षेत्रों से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार।
B. अन्य सभी मामलों में (जैसे राज्य की फैक्ट्रियां), राज्य सरकार।
धारा 2(g) - व्यापार विवाद का मतलब है ऐसा कोई भी विवाद जो -
∆ नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच हो।
∆ श्रमिकों और श्रमिकों के बीच हो।
∆ नियोक्ताओं व नियोक्ताओं के बीच हो।
ये विवाद काम की शर्तों, रोजगार या गैर-रोजगार से संबंधित होने चाहिए।
धारा 2(h) - ट्रेड यूनियन की परिभाषा ट्रेड यूनियन का अर्थ है -
संगठन - श्रमिकों, नियोक्ताओं या दोनों का कोई भी अस्थायी या स्थायी संगठन।
सामंजस्य - श्रमिकों और नियोक्ताओं, या श्रमिकों और श्रमिकों के बीच संबंधों को विनियमित करने के लिए बनाया गया संघ।
नियोक्ताओं का संघ भी इस अधिनियम के अंतर्गत शामिल हो सकता है।
अपवाद - यह अधिनियम उन संगठनों पर लागू नहीं होता जो केवल साझेदारी के समझौते हैं या किसी एक नियोक्ता और उसके कर्मचारी के बीच का निजी अनुबंध हैं।
4. अन्य महत्वपूर्ण शब्द -
धारा 2(b) - कार्यकारी वह निकाय (Body) जिसे यूनियन के मामलों का प्रबंधन सौंपा गया है।
धारा 2(i) - पंजीकृत कार्यालय वह कार्यालय जिसे यूनियन का मुख्य पता माना गया है और जहाँ रजिस्ट्रार पत्राचार करता है।
धारा 2(k) - पदाधिकारी (Office-bearer) - इसमें कार्यकारी सदस्य शामिल हैं, लेकिन ऑडिटर्स और कुछ विशेष बाहरी लोगों को इसमें शामिल नहीं किया जाता।
जिगर जी, धारा 3 श्रमिक संघ अधिनियम की एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रशासनिक धारा है। यह वह आधार है जहाँ से एक ट्रेड यूनियन के सरकारी अस्तित्व की शुरुआत होती है।
धारा 3 - रजिस्ट्रार की नियुक्ति - यह धारा राज्य सरकारों को यह शक्ति देती है कि वे ट्रेड यूनियनों के प्रबंधन हेतु सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति करे।
रजिस्ट्रार की नियुक्ति - समुचित सरकार एक व्यक्ति को ट्रेड यूनियनों का रजिस्ट्रार नियुक्त करेगी।
अतिरिक्त और उप-रजिस्ट्रार - सरकार काम के बोझ को देखते हुए उतने अतिरिक्त रजिस्ट्रार और उप-रजिस्ट्रार नियुक्त कर सकती है जितने वह उचित समझे।
अधिकार क्षेत्र - सरकार यह तय करती है कि कौन सा रजिस्ट्रार किस स्थानीय क्षेत्र में काम करेगा।
शक्तियाँ - अतिरिक्त या उप-रजिस्ट्रार उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करते हैं जो सरकार द्वारा उन्हें सौंपी जाती हैं। वे मुख्य रजिस्ट्रार की देखरेख में काम करते हैं।
रजिस्ट्रार की भूमिका महत्वपूर्ण क्यों - बिना रजिस्ट्रार के कोई भी संघ पंजीकृत ट्रेड यूनियन नहीं बन सकता। रजिस्ट्रार के पास निम्नलिखित शक्तियाँ होती हैं -
∆ यूनियन का पंजीकरण करना (धारा 8)।
∆ पंजीकरण रद्द करना (धारा 10)।
∆ यूनियन के नाम में बदलाव को अनुमति देना।
∆ यूनियन के वार्षिक रिटर्न की जाँच करना।
धारा 4 - ट्रेड यूनियन के पंजीकरण की पहली सीढ़ी है। यह धारा बताती है कि कौन लोग पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं और इसके लिए न्यूनतम शर्तें क्या हैं। इसमें 2001 में एक बड़ा संशोधन किया गया, जिसे समझना बहुत जरूरी है।
धारा 4 में पंजीकरण के लिए आवेदन के मुख्य प्रावधान -
न्यूनतम 7 सदस्य - किसी भी ट्रेड यूनियन के पंजीकरण के लिए कम से कम 7 सदस्यों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। ये सदस्य उस उद्योग या प्रतिष्ठान से जुड़े होने चाहिए।
आवेदन की प्रक्रिया - संघ के 7 या उससे अधिक सदस्य यूनियन के नियमों की एक प्रति के साथ रजिस्ट्रार को आवेदन भेजते हैं।
2001 का महत्वपूर्ण संशोधन (10% नियम) - पंजीकरण के समय और उसके बाद भी, यूनियन के पास उस प्रतिष्ठान में काम करने वाले कुल श्रमिकों का कम से कम 10% या 100 श्रमिक (जो भी कम हो) सदस्य के रूप में होने चाहिए।
उदाहरण - अगर किसी फैक्ट्री में 500 मजदूर हैं, तो यूनियन के पास कम से कम 50 सदस्य होने चाहिए। अगर फैक्ट्री में 5000 मजदूर हैं, तो कम से कम 100 सदस्य होने चाहिए।
एक विशेष परिस्थिति - धारा 4(2) एक बहुत ही दिलचस्प स्थिति के बारे में बताती है - आवेदन करने के बाद, लेकिन पंजीकरण होने से पहले, कुछ सदस्यों ने यूनियन छोड़ दी हो, तो भी आवेदन अवैध नहीं होगा। बशर्ते -
∆ छोड़ने वाले सदस्यों की संख्या कुल आवेदनकर्ताओं की संख्या से आधी से अधिक न हो।
∆ अंत तक कम से कम 7 सदस्य जुड़े रहें।
धारा 5 - पंजीकरण के लिए आवेदन के विवरण - यह धारा बताती है कि धारा 4 के तहत पंजीकरण हेतु आवेदन पत्र (Application Form) के साथ कौन-कौन सी जानकारियाँ और दस्तावेज़ होने अनिवार्य हैं।
मुख्य प्रावधान - रजिस्ट्रार के पास भेजे जाने वाले आवेदन के साथ निम्नलिखित विवरण संलग्न होने चाहिए -
सदस्यों का विवरण - आवेदन करने वाले सभी सदस्यों के नाम, उनके व्यवसाय और पते।
यूनियन का विवरण - ट्रेड यूनियन का नाम और उसके पंजीकृत कार्यालय का पूरा पता।
पदाधिकारियों का विवरण - यूनियन के सभी पदाधिकारियों के नाम, उनकी आयु, उनके पते और उनका व्यवसाय।
नियमों की प्रति - यूनियन के नियमों की एक किताब (Rule Book) साथ लगानी होती है, जिसमें यूनियन के काम करने का तरीका लिखा हो।
धारा 5(2) - यदि कोई ट्रेड यूनियन पंजीकरण आवेदन से एक वर्ष से अधिक समय पहले से अस्तित्व में है, तो उसे ऊपर दी गई जानकारियों के साथ एक और दस्तावेज़ देना होगा -
संपत्ति और देनदारियों का विवरण - यूनियन के पास कितना पैसा है, कितनी संपत्ति है और उस पर कितना कर्ज है, इसका पूरा ब्यौरा एक निर्धारित प्रारूप (Format) में देना होगा।
धारा 6 - नियमों की जांच धारा 5 में दस्तावेज़ देने के बाद रजिस्ट्रार द्वारा उन अनिवार्य बातों की सूची देता है जो ट्रेड यूनियन के संविधान या नियमावली में होनी चाहिए। यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी ट्रेड यूनियन लोकतांत्रिक तरीके से चले।
नियमों की बुकलेट में ये बातें नहीं हैं, तो रजिस्ट्रार आपकी यूनियन को पंजीकृत करने से मना कर देगा।
यूनियन के नियमों में निम्नलिखित स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए -
यूनियन का नाम: संगठन का नाम क्या होगा।
उद्देश्य - वे सभी उद्देश्य जिनके लिए ट्रेड यूनियन बनाई गई है।
फंड का उपयोग - वह उद्देश्य जिनके लिए यूनियन का पैसा खर्च किया जा सकता है।
सदस्यों की सूची - सदस्यों की सूची रखना और उसे पदाधिकारियों या सदस्यों द्वारा निरीक्षण करने की सुविधा।
सदस्यता और चंदा (Subscription) - न्यूनतम चंदा - ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिकों के लिए कम से कम 1 रुपया प्रति वर्ष, असंगठित क्षेत्र के लिए 3 रुपये प्रति वर्ष और अन्य के लिए 12 रुपये प्रति वर्ष (यह संशोधन के बाद के नियम हैं)।
सदस्यों को शामिल करने की शर्तें - यूनियन में किस सदस्य को शामिल किया जा सकता है और किसे नहीं।
नियमों में संशोधन - नियमों को बदलने, उन्हें रद्द करने या नए नियम जोड़ने की प्रक्रिया।
पदाधिकारियों की नियुक्ति और हटाना - कार्यकारिणी और अन्य पदाधिकारियों को चुनने और उन्हें पद से हटाने का तरीका।
सुरक्षित अभिरक्षा - यूनियन के फंड की सुरक्षा और उसका वार्षिक ऑडिट कैसे होगा। यूनियन का बैंक खाता।
विघटन - यदि यूनियन को भविष्य में बंद करना पड़े, तो उसका तरीका क्या होगा।
धारा 7 रजिस्ट्रार द्वारा जांच - धारा 4, 5 और 6 के तहत आवेदन जमा करने पर रजिस्ट्रार आँख बंद करके उसे स्वीकार नहीं करता। रजिस्ट्रार को यह शक्ति देती है कि वह प्राप्त आवेदन की गहराई से जांच करे। इसे अतिरिक्त जानकारी मांगने की शक्ति कहा जा सकता है।
धारा 7 के मुख्य बिंदु - जानकारी की मांग - यदि रजिस्ट्रार को लगता है कि आवेदन में कोई कमी है या कोई बात स्पष्ट नहीं है, तो वह अतिरिक्त जानकारी मांग सकता है। जब तक वांछित जानकारी नहीं देते, वह पंजीकरण की प्रक्रिया रोक सकता है।
नाम में बदलाव का निर्देश - यदि आपके द्वारा प्रस्तावित ट्रेड यूनियन का नाम किसी ऐसी यूनियन से मिलता-जुलता है जो पहले से पंजीकृत है, तो रजिस्ट्रार आपको नाम बदलने का आदेश दे सकता है।
कारण - ताकि जनता या यूनियन के सदस्य भ्रमित न हों।
पंजीकरण से इनकार - यदि रजिस्ट्रार द्वारा मांगे गए बदलाव या जानकारी को यूनियन के सदस्य पूरा नहीं करते, तो वह पंजीकरण करने से मना कर सकता है।
धारा 8 पंजीकरण - वह मंज़िल है जहाँ यूनियन की मेहनत सफल होती है। यह धारा रजिस्ट्रार को सभी जांच आदि से संतुष्ट होने पर यूनियन को पंजीकृत करने का आदेश देती है। इस धारा का सरल अर्थ यह है कि यदि रजिस्ट्रार उन सभी जाँचों से संतुष्ट हो जाता है जो उसने धारा 5, 6 और 7 के तहत की थीं, तो वह यूनियन का पंजीकरण कर लेगा।
प्रक्रिया इस प्रकार है -
रजिस्ट्रार का संतोष है - रजिस्ट्रार यह सुनिश्चित करता है कि यूनियन ने इस अधिनियम की सभी शर्तों (जैसे 7 सदस्यों का होना, नियमों का सही होना और नाम का अलग होना) को पूरा कर लिया है।
रजिस्टर में प्रविष्टि - रजिस्ट्रार अपने पास रखे गए ट्रेड यूनियन रजिस्टर में उस यूनियन के बारे में सारी जानकारी (नाम, पता, उद्देश्य आदि) दर्ज करता है।
अनिवार्यता - यदि सभी शर्तें पूरी हैं, तो रजिस्ट्रार पंजीकरण करने से मना नहीं कर सकता।
धारा 9 - पंजीकरण का प्रमाण-पत्र -
जब कोई श्रमिक संघ पंजीकरण के लिए आवेदन करता है, तो रजिस्ट्रार उसकी जांच कर धारा 9 के तहत -
प्रमाण-पत्र जारी करना - यदि रजिस्ट्रार संतुष्ट हो जाता है कि यूनियन ने पंजीकरण की सभी कानूनी आवश्यकताओं (धारा 8 के तहत) को पूरा कर लिया है, तो वह उस यूनियन को एक पंजीकरण प्रमाण-पत्र जारी करता है।
ठोस सबूत - यह प्रमाण-पत्र इस बात का ठोस सबूत माना जाता है कि वह ट्रेड यूनियन इस अधिनियम के तहत विधिवत पंजीकृत (Registered) हो चुकी है। कोर्ट या किसी भी कानूनी कार्यवाही में इस प्रमाण-पत्र को यूनियन की वैधता के अंतिम प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है।
धारा 9A - न्यूनतम सदस्यता - यह धारा अनिवार्य बनाती है कि एक पंजीकृत ट्रेड यूनियन के पास कम से कम 10% या 100 श्रमिक (जो भी कम हो) सदस्य के रूप में हमेशा होने चाहिए। किसी भी स्थिति में सदस्यों की संख्या 7 से कम नहीं होनी चाहिए। (1964 के संशोधन द्वारा जोड़ी गई)
धारा 10 - पंजीकरण रद्द - यह यूनियन के वजूद को खत्म करने यानी पंजीकरण रद्द करने से जुड़ी है। रजिस्ट्रार किसी भी ट्रेड यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कर सकता है यदि -
स्वयं यूनियन के आवेदन पर - यदि यूनियन खुद रजिस्ट्रार को आवेदन दे कि वह अपना पंजीकरण रद्द करना चाहती है।
धोखाधड़ी या गलती से पंजीकरण - यदि रजिस्ट्रार को पता चले कि पंजीकरण का प्रमाण-पत्र धोखाधड़ी या किसी गलती से प्राप्त किया गया है।
यूनियन का अस्तित्व समाप्त होना - यदि यूनियन ने काम करना बंद कर दिया है या अब उसका कोई अस्तित्व नहीं रहा।
नियमों का उल्लंघन - यदि यूनियन ने जानबूझकर अधिनियम के किसी प्रावधान का उल्लंघन किया हो या रजिस्ट्रार के नोटिस (2 माह की लिखित अवधि के बाद भी) किसी अवैध नियम को जारी रखा हो या नोटिस का जवाब नहीं दिया हो तो।
सदस्यता में कमी - यदि यूनियन के पास सदस्यों की वह न्यूनतम संख्या (जैसे कि 10% या 100 सदस्य) नहीं रही, जो कानूनन अनिवार्य है।
धारा 11 अपील - अगर रजिस्ट्रार किसी यूनियन को पंजीकृत (Register) करने से मना कर देता है या उसका पंजीकरण रद्द कर देता है, तो यूनियन के पास चुप बैठने के अलावा कानूनी रास्ता धारा 11 बताती है।
हाई कोर्ट - यदि यूनियन का मुख्यालय किसी प्रेसीडेंसी शहर (जैसे मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) में है।
श्रम न्यायालय/औद्योगिक अधिकरण - अन्य क्षेत्रों में जहाँ सरकार ने इसके लिए अधिकार दिए हों।
सिविल कोर्ट - जहाँ ऊपर दी गई सुविधाएं उपलब्ध न हों, वहां जिला अदालत में अपील की जा सकती है।
समय सीमा - आमतौर पर रजिस्ट्रार के आदेश के प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर अपील दायर करनी होती है।
अदालत की शक्तियाँ -
आदेश देना - अदालत अपील सुनने के बाद रजिस्ट्रार के आदेश को खारिज कर सकती है या पंजीकरण हेतु निर्देश दे सकती है या वह रजिस्ट्रार के फैसले को सही भी ठहरा सकती है।
धारा का महत्व - यह धारा सुनिश्चित करती है कि रजिस्ट्रार अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल न करे। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है, ताकि किसी भी यूनियन को बिना निष्पक्ष सुनवाई के खत्म न किया जा सके।
धारा 12 पंजीकृत कार्यालय - पंजीकरण के बाद यह एक निकाय (बॉडी) बन जाता है। इसका पंजीकरण प्रारूप में ही पंजीकृत कार्यालय की जानकारी देना अनिवार्य है जहाँ यूनियन से संबंधित आधिकारिक सूचनाएं नोटिस और पत्र भेजे जाते हैं। पते में बदलाव के 14 दिन में रजिस्ट्रार को लिखित में सूचित करना जरूरी है।
धारा 13 यूनियन एक निकाय (बॉडी) -
∆ यूनियन अपने नाम से संपत्ति खरीदने, (गाड़ी, भवन, कार्यालय, बैंक लेनदेन) सकती है।
∆ (Sue and be Sued) यूनियन किसी पर मुकदमा कर सकती है और उस पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है।
∆ यूनियन की अपनी एक मुहर होती है।
∆ यूनियन सदस्यों से अलग स्वतंत्र कानूनी इकाई, यूनियन का अस्तित्व उसके सदस्यों के आने या जाने (मौत या इस्तीफे) से खत्म नहीं होता। इसे शाश्वत उत्तराधिकार कहते हैं।
∆ यूनियन को उसी नाम से जाना पुकारा या संबंधित किया जाएगा जिस नाम से पंजीकरण हुआ है।
∆ संविदा या अनुबंध का कर सकती है।
धारा 14 वचन - यह धारा मुख्य रूप से तीन कानूनों का उल्लेख करती है जो एक पंजीकृत ट्रेड यूनियन पर लागू नहीं होंगे।
I. सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860
II. सहकारी समिति अधिनियम, 1912
III. कंपनी अधिनियम - ट्रेड यूनियन एक बॉडी कॉर्पोरेट (धारा 13 के तहत) है, अतः कंपनी चलाने के नियम यूनियनों पर लागू नहीं होते।
∆ यदि कोई ट्रेड यूनियन इन कानूनों के तहत पंजीकृत होने की कोशिश करती है, तो वह पंजीकरण अवैध माना जाएगा। सरकार ने यह धारा इसलिए बनाई ताकि:
धारा 15 (General Fund) - सामान्य निधि का उपयोग केवल उन्हीं कामों के लिए होगा जो कानून में दिए गए हैं (जैसे वेतन, ऑडिट, कानूनी केस)।
धारा 16 राजनैतिक फंड - राजनीतिक कार्यों के लिए अलग फंड बनाना होगा जिसमें किसी भी सदस्य को अलग से पैसा देने हेतु मजबूर नहीं किया जा सकता।
धारा 17 हड़ताल पर मुकदमों से बचाव - यूनियन के सदस्यों को आपराधिक साजिश के आरोपों से सुरक्षा मिलती है, यदि वे अपनी जायज मांगों के लिए हड़ताल की योजना बनाते हैं।
धारा 18 दीवानी वाद से सुरक्षा - हड़ताल या प्रदर्शन के समय हुए घाटे के एवज में कंपनी व्यापारिक नुकसान के लिए यूनियन के पदाधिकारियों पर दीवानी मुकदमा नहीं कर सकती।
धारा 19 - समझौतों की प्रवर्तनीयता -
भारतीय संविदा अधिनियम के तहत ऐसे समझौते जो किसी को व्यापार या काम को करने से रोकते हैं, वे अवैध माने जाते हैं। लेकिन धारा 19 ट्रेड यूनियनों को यहाँ एक विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।
समझौते अवैध नहीं होंगे - कोई भी समझौता जो ट्रेड यूनियन के सदस्यों के बीच उनके काम, व्यापार या रोजगार की शर्तों को लेकर होता है, वह सिर्फ इसलिए शून्य या अवैध नहीं माना जाएगा कि वह व्यापार में बाधा डालता है।
उद्देश्य - यूनियनें अक्सर हड़ताल करने या सामूहिक सौदेबाजी के लिए समझौते करती हैं। यदि धारा 19 न हो, तो ऐसे समझौतों को काम में रुकावट डालने वाला कहकर कोर्ट में चुनौती दी जा सकती थी। यह धारा यूनियनों को अपनी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने की कानूनी ढाल देती है।
दीवानी अदालतों की भूमिका - हालांकि ये समझौते अवैध नहीं हैं, लेकिन धारा 19 यह भी स्पष्ट करती है कि दीवानी अदालतें यूनियन के सदस्यों के बीच हुए ऐसे किसी भी समझौते को लागू करने के लिए मजबूर नहीं करेंगी जो किसी सदस्य को हर्जाना देने या यूनियन के नियमों का पालन करने के लिए बाध्य करता हो।
आसान भाषा में समझें - मान लीजिए कि यूनियन के सभी सदस्यों ने फैसला किया कि हम कल से काम पर नहीं जाएंगे जब तक वेतन नहीं बढ़ता। यह एक प्रकार का व्यापार में बाधा डालने वाला समझौता है। धारा 19 यह सुनिश्चित करती है कि पुलिस या कंपनी इस समझौते को अवैध साजिश नहीं कह सकती पर कोई सदस्य फिर भी काम पर चला जाता है, तो यूनियन उसे कोर्ट ले जाकर यह नहीं कह सकती कि कोर्ट इस सदस्य को काम करने से रोके।
धारा 20: ऑडिट - संघ की लेखा पुस्तकों को देखने का अधिकार सदस्यों को दिया जाता है।
धारा 21 सदस्य कौन बन सकता है - 15 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी व्यक्ति यूनियन का सदस्य बन सकता है, लेकिन पदाधिकारी बनने के लिए आयु 18 वर्ष होनी चाहिए।
धारा 21A-पदाधिकारियों की अयोग्यता- 1964 में संशोधन कर जोड़ी गई इस धारा के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी ट्रेड यूनियन की कार्यकारिणी का सदस्य या पदाधिकारी बनने के लिए अयोग्य माना जाएगा यदि-
आयु - उसने 18 वर्ष की आयु पूरी न की हो। (ध्यान दें - सदस्य बनने के लिए उम्र 15 वर्ष है, लेकिन पदाधिकारी बनने के लिए 18 वर्ष अनिवार्य है)।
नैतिक अधमता - उसे भारत की किसी भी अदालत द्वारा ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो जिसमें नैतिक पतन शामिल हो (जैसे चोरी, धोखाधड़ी, बलात्कार या भ्रष्टाचार)।
सजा की अवधि - यदि उसे दोषी ठहराया गया है, तो वह सजा पूरी होने की तारीख से 5 वर्ष तक पदाधिकारी बनने के लिए अयोग्य रहेगा। यानी सजा काटने के 5 साल बाद ही वह चुनाव लड़ सकता है।
स्वच्छ नेतृत्व - यह सुनिश्चित करने के लिए कि श्रमिकों का नेतृत्व साफ-सुथरी छवि वाले लोग करें।
यूनियन की सुरक्षा - अपराधी तत्वों को यूनियन के फंड और प्रभाव का गलत इस्तेमाल करने से रोकना।
एक विशेष बात - यदि कोई व्यक्ति पद पर रहते हुए किसी ऐसे अपराध में दोषी पाया जाता है, तो उसे तुरंत अपना पद छोड़ना पड़ता है। इस प्रकार से धारा 21A ट्रेड यूनियन अधिनियम की एक बहुत ही महत्वपूर्ण धारा है क्योंकि यह तय करती है कि कौन व्यक्ति यूनियन का पदाधिकारी नहीं बन सकता। इसे 1964 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया था ताकि अपराधी छवि वाले लोगों को यूनियन के नेतृत्व से दूर रखा जा सके।
धारा 22 ट्रेड यूनियन के संचालन हेतु कार्यकारिणी - यूनियन के नेतृत्व में कितने लोग बाहरी हो सकते हैं। सरल शब्दों में, यह धारा बताती है कि पदाधिकारियों में से कितने लोग ऐसे हो सकते हैं जो उस उद्योग या कंपनी में कर्मचारी नहीं हैं।
I.असंगठित क्षेत्र - यदि यूनियन किसी असंगठित क्षेत्र (जैसे निर्माण कार्य, रेहड़ी-पटरी आदि) से जुड़ी है, तो कुल पदाधिकारियों में से आधे (50%) बाहरी व्यक्ति हो सकते हैं।
II. अन्य उद्योगों - किसी भी अन्य पंजीकृत ट्रेड यूनियन में, बाहरी पदाधिकारियों की संख्या कुल संख्या के एक-तिहाई (1/3) या 5, जो भी कम हो से अधिक नहीं हो सकती। शेष सभी पदाधिकारी उसी उद्योग में काम करने वाले श्रमिक होने चाहिए।
III. सरकार की विशेष शक्ति - राज्य सरकार के पास यह शक्ति है कि वह विशेष परिस्थितियों में किसी यूनियन को इन नियमों से छूट दे सकती है।
बाहरी व्यक्ति कौन - बाहरी व्यक्ति वे होते हैं जो उस उद्योग में वास्तविक रूप से नियोजित नहीं हैं। अक्सर यूनियनें वकीलों, समाजसेवियों या अनुभवी राजनेताओं को अपना मार्गदर्शक बनाने के लिए उन्हें पदाधिकारी बनाती हैं। धारा 22 इसी पर लगाम लगाती है ताकि यूनियन का नियंत्रण वास्तविक श्रमिकों के हाथ में ही रहे।
धारा का उद्देश्य -
बाहरी हस्तक्षेप रोकना - राजनीतिक दल या बाहरी लोग यूनियन का इस्तेमाल अपने निजी फायदे के लिए न करें।
श्रमिकों का नेतृत्व - यह सुनिश्चित करने के लिए कि श्रमिक स्वयं अपनी समस्याओं का समाधान करना सीखें और नेतृत्व की बागडोर संभालें।
नोट - किसी भी व्यक्ति को केवल इसलिए बाहरी नहीं माना जाएगा कि उसे उसके पद से हटा दिया गया है या बर्खास्त कर दिया गया है, बशर्ते वह पहले वहीं कर्मचारी था।
धारा 23: संघ का नाम बदलना - संघ कार्यकारिणी निर्धारित प्रक्रिया अपना कर संघ के नाम या उद्देश्यों या किसी नियम में परिवर्तन कर सकता है।
धारा 24 संघों का विलय - दो या दो से अधिक संघों का आपस में विलय करने के नियम। यह धारा बताती है कि दो या दो से अधिक पंजीकृत ट्रेड यूनियनें 60% सदस्यों की सहमति या मतदान से एक यूनियन बन सकती हैं।
संपत्ति का एकीकरण - एकीकरण के बाद पुरानी यूनियनों की संपत्ति और अधिकार नई बनी यूनियन के पास चले जाते हैं।
धारा 25 - नाम परिवर्तन या एकीकरण की सूचना - यदि कोई यूनियन नाम बदलना चाहती है, तो उसे अपने कुल सदस्यों के कम से कम 2/3 (दो-तिहाई) सदस्यों की सहमति लेनी होगी।
नोटिस - नाम बदलने या एकीकरण करने के बाद, यूनियन के सचिव और 7 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला एक लिखित नोटिस रजिस्ट्रार को भेजा जाना चाहिए।
रजिस्ट्रार की भूमिका - यदि रजिस्ट्रार संतुष्ट है कि सभी नियमों का पालन हुआ है और नया नाम किसी दूसरी यूनियन से मिलता-जुलता नहीं है, तो वह इसे अपने रजिस्टर में दर्ज कर लेगा।
धारा 26 - नाम परिवर्तन और एकीकरण के प्रभाव - यह धारा सुनिश्चित करती है कि नाम बदलने या जुड़ने से यूनियन की कानूनी जिम्मेदारियां खत्म न हों।
अधिकार और दायित्व यथावत - नाम बदलने से यूनियन के अधिकारों या उन पर चल रहे मुकदमों पर कोई असर नहीं पड़ता। पुराने नाम से चल रही कानूनी कार्यवाही नए नाम से जारी रहेगी।
तीसरे पक्ष पर प्रभाव - दो यूनियनें जुड़ती हैं, तो उनके लेनदारों या उन पर बकाया किसी भी देनदारी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। नई यूनियन उन सभी ऋणों के लिए जिम्मेदार होगी।
धारा 27 संघ का विघटन - यदि संघ को बंद करना है, तो सात सदस्यों और सचिव के हस्ताक्षर वाला नोटिस रजिस्ट्रार को भेजा जाता है। संतुष्टि पर विघटन कर दिया जाता है।
धारा 28: वार्षिक विवरण -
वार्षिक रिपोर्ट - हर पंजीकृत यूनियन को प्रति वर्ष 31 दिसंबर तक वार्षिक विवरण रजिस्ट्रार को भेजना होता है जिसमें आय - व्यय, संपत्ति और देनदारियों का पूरा ऑडिटेड हिसाब - किताब होता है।
पदाधिकारियों की सूची - इसके साथ ही यूनियन को अपने वर्तमान पदाधिकारियों की बदलती सूची भी भेजनी पड़ती है।
धारा 29 सरकार के पास नियम बनाने की शक्ति - यह सरकार को अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बनाने की शक्ति देती है (जैसे ऑडिट कैसे होगा, फीस कितनी होगी आदि)।
धारा 30 - नियमों का प्रकाशन व वैधता
धारा 31 दंड - विवरण जमा न करने पर 5 रुपए दंड/जुर्माना या शास्ती लगाया जा सकता है। लगातार अवहेलना करने पर यह दंड प्रति सप्ताह अतिरिक्त लगाया जा सकता है।
गलत जानकारी - यदि कोई जान बूझकर गलत जानकारी देता है, तो जुर्माना 500 रुपये तक हो सकता है।
धारा 32 गलत जानकारी देने पर सजा -
यदि कोई व्यक्ति किसी सदस्य या यूनियन को गुमराह करने के उद्देश्य से नियमों की गलत कॉपी या जानकारी देता है, तो उस पर 200 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
धारा 33 - अपराधों का संज्ञान व सुनवाई - किसी मुकदमे में अदालत तभी संज्ञान लेगी जब शिकायत रजिस्ट्रार द्वारा या उसकी अनुमति से की गई हो। इन अपराधों की सुनवाई प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट से नीचे की अदालत में नहीं होगी।
संक्षेप में - धारा 1 से 33 तक का सफर यूनियन के जन्म, संचालन और दंड तक की पूरी कहानी है।
अध्याय 1 प्रारंभिक (धारा 1-2) -
धारा 1- अधिनियम का नाम, विस्तार (पूरा भारत), लागू होने की तिथि।
धारा 2 - परिभाषाएँ (ट्रेड डिस्प्यूट, वर्कमेन और ट्रेड यूनियन)।
अध्याय 2 पंजीकरण (धारा 3-14) -
धारा 3 - रजिस्ट्रार की नियुक्ति।
धारा 4 - पंजीकरण के लिए आवेदन (कम से कम 7 सदस्यों द्वारा)।
धारा 5 - आवेदन के साथ यूनियन के नियम और विवरण देना।
धारा 6 - यूनियन के नियमावली में किन बातों का होना अनिवार्य है।
धारा 7- रजिस्ट्रार द्वारा अतिरिक्त जानकारी मांगने की शक्ति।
धारा 8 - यूनियन का पंजीकरण।
धारा 9 - पंजीकरण का प्रमाण-पत्र जारी करना।
धारा 9A - न्यूनतम सदस्यता बनाए रखना (10% या 100 श्रमिक)।
धारा 10 - पंजीकरण रद्द करना (धोखाधड़ी या नियमों के उल्लंघन पर)।
धारा 11 - रजिस्ट्रार के फैसले के खिलाफ अदालत में अपील।
धारा 12 - पंजीकृत कार्यालय का पता और उसमें बदलाव की सूचना।
धारा 13 - यूनियन का निगमित निकाय बनना (संपत्ति रखना, मुकदमा करना)।
धारा 14 - सोसायटी या कंपनी एक्ट जैसे अन्य कानूनों का लागू न होना।
अध्याय 3 - अधिकार और दायित्व (धारा 15-28)
धारा 15 - सामान्य फंड का उपयोग
धारा 16 - राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अलग फंड बनाना
धारा 17 - आपराधिक साजिश के मामलों में यूनियन पदाधिकारियों को छूट।
धारा 18 - दीवानी मामलों में कुछ स्थितियों में सुरक्षा।
धारा 19 - यूनियन के सदस्यों के बीच समझौते की वैधता।
धारा 20 - सदस्यों को यूनियन के खाते और रिकॉर्ड देखने का अधिकार।
धारा 21 - नाबालिगों (15 वर्ष+) का सदस्य बनने का अधिकार।
धारा 21A - पदाधिकारियों की अयोग्यता (जैसे अपराधी होने पर पद नहीं मिल सकता)।
धारा 22 - पदाधिकारियों में बाहरी व्यक्तियों की संख्या पर सीमा।
धारा 23 - यूनियन का नाम बदलना।
धारा 24 - दो या अधिक यूनियनों का आपस में जुड़ना
धारा 25 - नाम बदलने या जुड़ने का नोटिस देना।
धारा 26 - नाम बदलने या जुड़ने का कानूनी प्रभाव।
धारा 27 - यूनियन को बंद करना
धारा 28 - प्रतिवर्ष वार्षिक रिटर्न प्रतिवेदन(हिसाब-किताब) रजिस्ट्रार को भेजना।
अध्याय 4: नियम और दंड (धारा 29-33)
धारा 29 - सरकार द्वारा नियम बनाने की शक्ति।
धारा 30 - नियमों का प्रकाशन।
धारा 31 - रिपोर्ट न भेजने या देरी करने पर जुर्माना।
धारा 32 - गलत जानकारी या फर्जी नियम देने पर सजा।
धारा 33 - अपराधों की सुनवाई (मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा)।
ट्रेड यूनियन (संशोधन) अधिनियम, 2001 - संशोधन का मुख्य उद्देश्य ट्रेड यूनियनों की कार्यप्रणाली में अनुशासन लाना और छोटी-छोटी कागजी यूनियनों की बाढ़ को रोकना था।
पंजीकरण हेतु न्यूनतम सदस्यता (धारा 4 में संशोधन) - संशोधन से पहले, केवल 7 सदस्य मिलकर यूनियन बना सकते थे। 2001 के बाद इसे कड़ा करते हुए कार्यरत श्रमिकों की कम से कम 10% या 100 कर्मचारी (जो भी कम हो) का सदस्य होना अनिवार्य है।
धारा 9A जोड़ा जाना- यूनियन में अपराधिक तत्वों के प्रवेश पर रोक।
धारा 22 में संशोधन - बाहरी पदाधिकारियों संगठित क्षेत्र में अधिकतम 5 या 1/3 व असंगठित क्षेत्र 50% से अधिक नहीं हो सकते।
पदाधिकारियों की अयोग्यता (धारा 21A) - पदाधिकारियों की योग्यता के नियमों को और स्पष्ट किया गया ताकि अपराधी छवि वाले लोग यूनियन का नेतृत्व न कर सकें।
विवादों का निपटारा - 2001 के संशोधन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि यूनियन के भीतर पदाधिकारियों के चुनाव या अन्य आंतरिक विषयों पर कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने की प्रक्रिया क्या होगी।
सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining)- सामूहिक सौदेबाजी किसी भी ट्रेड यूनियन की आत्मा होती है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से श्रमिक अकेले लड़ने के बजाय एक समूह के रूप में अपने नियोक्ता के सामने अपनी मांगें रखते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य मैनेजमेंट और मजदूरों के बीच बीच का रास्ता निकालना है।
सामूहिक सौदेबाजी की विशेषताएं -
सामूहिक शक्ति - इसमें एक अकेला कर्मचारी नहीं, बल्कि पूरी यूनियन बातचीत करती है।
कार्ल मार्क्स का वाक्य - दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ।
द्विपक्षीय प्रक्रिया - इसमें दो मुख्य पक्ष होते हैं -
1. सर्वहारा - श्रमिक व
2. अभिजात्य - पूंजीपति
इसमें आमतौर पर बाहर के किसी तीसरे पक्ष (जैसे कोर्ट) का हस्तक्षेप तब तक नहीं होता जब तक बातचीत विफल न हो जाए।
वाक्य - बात से बात बनती है।
लोकतांत्रिक पद्धति - यह औद्योगिक लोकतंत्र का एक रूप है जहाँ कर्मचारी अपनी कार्य स्थितियों को खुद तय करने हेतु सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
लचीलापन - इसमें अदालती कार्यवाही की तरह कठोरता नहीं होती, दोनों पक्ष समझौते के लिए थोड़ा झुकते हैं।
सौदेबाजी के मुख्य मुद्दे (विषयों) -
सामूहिक सौदेबाजी इन मुद्दों पर केंद्रित होती है -
मजदूरी और भत्ते - वेतन में वृद्धि, बोनस, और ओवरटाइम की दरें।
एक पक्ष - समान काम समान वेतन।
दूसरा पक्ष - काम नहीं तो दाम नहीं।
कार्य की स्थिति - काम के घंटे, छुट्टियों की संख्या, और सुरक्षा उपकरण।
सेवा शर्तें - छंटनी, निलंबन, और पदोन्नति के नियम।
कल्याणकारी कार्य - कैंटीन, चिकित्सा सुविधा, और आवास।
सामूहिक सौदेबाजी के चरण -
∆ समस्या का चयन
∆ मांग पत्र तैयार करना
∆ ज्ञापन/मांगों का प्रस्तुतिकरण
∆ सुनवाई/वार्ता - प्रबंधन और यूनियन के प्रतिनिधि मेज पर बैठकर एक-दूसरे के प्रस्तावों को सुनते हैं।
∆ सौदेबाजी - दो और लो व कुछ तुम झुको कुछ हम के आधार पर दोनों पक्ष किसी एक बिंदु पर सहमत होने की कोशिश करते हैं।
∆ समझौता - यदि सहमति बन जाती है, तो एक लिखित समझौता तैयार किया जाता है जिस पर उभयपक्ष हस्ताक्षर करते हैं।
∆ कार्यान्वयन - समझौते को लागू किया जाता है। यदि बातचीत विफल हो जाए, तो यूनियन हड़ताल या मैनेजमेंट तालाबंदी का सहारा ले सकता है। |
कानूनी आधार (Trade Unions Act, 1926 के संदर्भ में) - इस अधिनियम में सामूहिक सौदेबाजी शब्द का सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन धारा 18 (दीवानी मामलों में सुरक्षा) और धारा 19 (समझौतों की वैधता) यूनियन को यह शक्ति प्रदान करती हैं कि वे कर्मचारियों के हित में ऐसे समझौते कर सकें।
महत्वपूर्ण तथ्य - सामूहिक सौदेबाजी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह औद्योगिक शांति बनि रहती है और छोटी-छोटी बातों पर कोर्ट-कचहरी जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
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UNIT - III
श्रमिक (Workman) - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(s) में श्रमिक को परिभाषित किया गया है। इस कानून के सभी लाभ (जैसे मुआवजा, हड़ताल का अधिकार, कोर्ट केस) केवल उसी व्यक्ति को मिलते हैं जो कानूनी रूप से श्रमिक की श्रेणी में आता है।
सरल शब्दों में, हर कर्मचारी श्रमिक नहीं होता, लेकिन हर श्रमिक कर्मचारी होता है।श्रमिक कौन - कानून के अनुसार, श्रमिक वह व्यक्ति है जो किसी उद्योग में मजदूरी या इनाम (Hire or Reward) के लिए काम पर रखा गया हो -
I. अकुशल और कुशल - जैसे मजदूर, मिस्त्री, या कारीगर।
II. तकनीकी - जैसे इंजीनियर, मैकेनिक या आईटी ऑपरेटर।
III. लिपिकीय - जैसे क्लर्क, टाइपिस्ट या डेटा एंट्री ऑपरेटर।
IV. पर्यवेक्षी (Supervisory) - वे लोग जो दूसरों के काम पर नजर रखते हैं (लेकिन एक सीमा तक)।
इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें छंटनी या बर्खास्त कर दिया गया है और जिनका विवाद अब कोर्ट में है।
श्रमिक कौन नहीं - धारा 2(s) के तहत कुछ लोगों को स्पष्ट रूप से श्रमिक की श्रेणी से बाहर रखा गया है -
सशस्त्र बल - थल सेना, वायु सेना और नौसेना के सदस्य।
पुलिस और जेल सेवा - पुलिस अधिकारी या जेल के कर्मचारी।
प्रबंधकीय वर्ग - वे लोग जो मुख्य रूप से प्रबंधन या प्रशासन का काम करते हैं (जैसे मैनेजर, सीईओ)।
उच्च वेतन वाले सुपरवाइजर - वे सुपरवाइजर जो प्रशासनिक कार्य करते हैं या जिनका वेतन ₹18,000 प्रति माह (वर्तमान सीमा के अनुसार) से अधिक है, उन्हें श्रमिक नहीं माना जाता।
श्रमिक होने की कसौटी - कोर्ट यह तय करने के लिए कि कोई श्रमिक है या नहीं, केवल उसके पद को नहीं देखता, बल्कि उसके वास्तविक कार्य को देखता है।
उदाहरण - यदि किसी का पद मैनेजर है लेकिन उसका काम केवल फाइलें ढोना या क्लर्क जैसा है, तो कोर्ट उसे श्रमिक ही मानेगा।
नियंत्रण - नियोक्ता का उस व्यक्ति के काम पर सीधा नियंत्रण होना चाहिए (मालिक-नौकर का संबंध)।
श्रमिकों के मुख्य अधिकार - धारा 2(s) के तहत श्रमिक को अधिकार -
I. बिना नोटिस या मुआवजे के नौकरी से न निकाला जाना।
II. कामबंदी और छंटनी के दौरान 50% या उससे अधिक मुआवजा पाना।
III. ट्रेड यूनियन बनाना और सामूहिक सौदेबाजी करना।
IV. विवाद होने पर लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना।
नियोक्ता (Employer) - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(g) में नियोक्ता को परिभाषित किया गया है। सरल शब्दों में, नियोक्ता वह व्यक्ति या संस्था है जो काम देता है और बदले में वेतन या मजदूरी प्रदान करता है।
चूंकि उद्योग अलग-अलग प्रकार के होते हैं, इसलिए कानून ने नियोक्ता को तीन श्रेणियों में स्पष्ट किया है -
नियोक्ता की कानूनी श्रेणियाँ - सरकारी विभाग के मामले में - यदि उद्योग सरकार (केंद्र या राज्य) द्वारा चलाया जा रहा है, तो उस विभाग का प्रमुख या वह अधिकारी जिसे सरकार ने इस काम के लिए नियुक्त किया है, नियोक्ता माना जाएगा।
शिक्षा विभाग में DEO तृतीय श्रेणी शिक्षक का नियोक्ता होता है, द्वितीय श्रेणी का अप निदेशक और प्रथम श्रेणी का निदेशक।
स्थानीय प्राधिकरण के मामले में - जैसे नगर निगम या नगरपालिका के मामलों में, वहाँ का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियोक्ता की श्रेणी में आता है।
निजी उद्योगों के मामले में - यहाँ वह व्यक्ति नियोक्ता है जिसका प्रतिष्ठान पर अंतिम नियंत्रण होता है। इसमें मालिक, प्रबंध निदेशक (MD), या एजेंट शामिल हो सकते हैं।
नियोक्ता के मुख्य गुण - कोर्ट यह तय करने के लिए कि कोई व्यक्ति नियोक्ता है या नहीं, इन तीन बिंदुओं को देखता है -
∆ नियुक्ति की शक्ति - क्या वह व्यक्ति श्रमिक को नौकरी पर रखने की शक्ति रखता है?
∆ वेतन का भुगतान - क्या मजदूरी का भुगतान उसके द्वारा या उसके नियंत्रण में किया जाता है?
∆ बर्खास्तगी का अधिकार - क्या उसके पास काम में गलती होने पर श्रमिक को नौकरी से निकालने (Fire) की शक्ति है?
नियोक्ता के प्रमुख दायित्व - कानून के अनुसार, एक नियोक्ता की कुछ अनिवार्य जिम्मेदारियां होती हैं -
सुरक्षित कार्यस्थल - श्रमिकों को काम करने के लिए सुरक्षित वातावरण प्रदान करना।
कानूनी भुगतान - समय पर वेतन, बोनस और छंटनी के समय उचित मुआवजे का भुगतान करना।
विवाद सुलझाना - यदि कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने के लिए बोर्ड या ट्रिब्यूनल के सामने उपस्थित होना।
नोटिस देना - कामबंदी, छंटनी या बंदी से पहले कानून के अनुसार उचित नोटिस देना।
अनुचित श्रम व्यवहार (Unfair Labour Practices) - अधिनियम की पाँचवीं अनुसूची (5th Schedule) के अनुसार, नियोक्ता को कुछ कामों से रोका गया है, जैसे -
∆ श्रमिकों को यूनियन बनाने से रोकना या डराना।
∆ यूनियन की गतिविधियों के कारण किसी को नौकरी से निकालना।
∆ भेदभावपूर्ण व्यवहार करना।
∆ जानबूझकर विवाद को लंबा खींचना।
समुचित सरकार (Appropriate Government) - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(a) में समुचित सरकार को परिभाषित किया गया है। यही तय करता है कि किसी विशेष विवाद में दखल देने, सुलह अधिकारी नियुक्त करने या मामले को लेबर कोर्ट भेजने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है या राज्य सरकार के पास।
सरल शब्दों में, समुचित सरकार वह सरकारी संस्था है जिसके अधिकार क्षेत्र में वह उद्योग आता है।
∆ केंद्र सरकार कब समुचित सरकार होगी -
∆ रेलवे, डाक और तार विभाग।
∆ बैंकिंग और बीमा कंपनियाँ।
∆ प्रमुख बंदरगाह (Ports) व हवाई अड्डे।
∆ खदानें (Mines) और तेल क्षेत्र (Oil fields)।
∆ छावनी बोर्ड (Cantonment Boards)।
∆ केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) जैसे सेल (SAIL), भेल (BHEL) आदि।
राज्य सरकार कब समुचित सरकार होगी - ऊपर दी गई सूची के अलावा, अन्य सभी औद्योगिक विवादों के लिए संबंधित राज्य की सरकार ही समुचित सरकार मानी जाती है। उदाहरण के लिए -
∆ स्थानीय कारखाने।
∆ राज्य परिवहन निगम।
∆ निजी दुकानें और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान।
∆ वे सभी उद्योग जो केंद्र सरकार की सीधी सूची में नहीं हैं।
समुचित सरकार की शक्तियाँ -
I. विवाद को भेजना (Reference) - धारा 10 के तहत, सरकार ही यह तय करती है कि किसी विवाद को लेबर कोर्ट या इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में भेजा जाना चाहिए या नहीं।
II. संस्थाओं का गठन - सुलह अधिकारियों जांच बोर्डों और श्रम न्यायालयों की नियुक्ति करना।
III. अनुमति देना - धारा 25-N और 25-O के तहत बड़ी कंपनियों को छंटनी या बंदी की अनुमति देना या खारिज करना।
IV. हड़ताल पर रोक - यदि कोई विवाद कोर्ट में लंबित है, तो सरकार उस दौरान होने वाली हड़ताल या तालाबंदी को रोकने का आदेश जारी कर सकती है।
भ्रम की स्थिति में क्या होता है - कभी - कभी यह तय करना मुश्किल होता है कि सरकार कौन सी होगी। ऐसे में कोर्ट यह देखता है कि उस उद्योग का मुख्य नियंत्रण किसके हाथ में है। यदि कोई उद्योग केंद्र सरकार के किसी विशेष कानून द्वारा नियंत्रित है, तो केंद्र ही समुचित सरकार होगी।
उदाहरण - यदि आपकी कोई सीमेंट फैक्ट्री है, तो उसके लिए राज्य सरकार समुचित सरकार होगी। लेकिन यदि कोयले की खान में केंद्र सरकार समुचित सरकार होगी।
हड़ताल Strike - हड़ताल (Strike) श्रमिकों का शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए करते हैं। कानूनी तौर पर इसे बहुत ही सटीक तरीके से परिभाषित किया गया है।
1. हड़ताल की परिभाषा - (धारा 2(q)) किसी उद्योग में नियोजित व्यक्तियों के समूह द्वारा काम बंद कर देना, या साथ मिलकर काम करने से इनकार करना, या काम को जारी रखने से मना करना हड़ताल कहलाता है।
हड़ताल के मुख्य तत्व -
∆ आपसी सहमति - कर्मचारियों के बीच आपसी सहमति या समझ होनी चाहिए।
∆ उद्देश्य - नियोक्ता पर दबाव बनाना।
∆ अस्थाई - अस्थायी रूप से काम का रोकना है, नौकरी छोड़ना नहीं।
हड़ताल के प्रकार - श्रमिक विभिन्न तरीकों से अपना विरोध जताते हैं -
सामान्य हड़ताल - पूरे उद्योग या क्षेत्र के श्रमिक एक साथ काम बंद कर देते हैं।
बैठो/काम रोको हड़ताल - (Stay-in / Sit-down Strike): श्रमिक कार्यस्थल पर तो आते हैं, लेकिन मशीनें नहीं चलाते और अपनी जगह पर बैठे रहते हैं।
पेन-डाउन हड़ताल (Pen-down Strike) - यह कार्यालयी कर्मचारियों (Clerical staff) द्वारा की जाती है, जहाँ वे अपनी कलम चलाने से मना कर देते हैं।
धीमे काम करो हड़ताल (Go-slow) - श्रमिक काम तो करते हैं, लेकिन जानबूझकर उत्पादन की गति बहुत धीमी कर देते हैं (इसे तकनीकी रूप से हड़ताल नहीं माना जाता, बल्कि अनुशासनहीनता माना जाता है)।
टोकन/चेतावनी हड़ताल (Token Strike) - यह मुख्य हड़ताल की चेतावनी देने के लिए केवल कुछ घंटों या एक दिन की छोटी हड़ताल होती है।
सहानुभूति हड़ताल - (Sympathetic Strike) - जब एक यूनियन किसी दूसरी यूनियन के समर्थन में हड़ताल करती है, भले ही उनका अपना कोई विवाद न हो।
कानूनी और अवैध हड़ताल (Legal vs Illegal Strike) - हर हड़ताल कानूनी नहीं होती। अधिनियम की धारा 22, 23 और 24 इसके नियम तय करती हैं।
हड़ताल अवैध -
बिना नोटिस के - जनोपयोगी सेवाओं (Public Utility Services जैसे अस्पताल, बिजली, रेलवे) में 14 दिन का नोटिस दिए बिना हड़ताल करना अवैध है।
नोटिस की अवधि के दौरान - नोटिस देने के बाद 6 सप्ताह के भीतर हड़ताल करना।
मामला कोर्ट/आधिकारिक स्तर पर लंबित होने पर - यदि विवाद सुलह अधिकारी (Conciliation Officer) या ट्रिब्यूनल के सामने चल रहा है, तो उस दौरान हड़ताल नहीं की जा सकती।
समझौते की अवधि में - यदि कोई समझौता (Settlement) लागू है, तो उसके दौरान उन्हीं मुद्दों पर हड़ताल करना मना है।
हड़ताल के परिणाम -
कानूनी हड़ताल - यदि हड़ताल कानूनी और उचित है, तो नियोक्ता श्रमिकों को नौकरी से नहीं निकाल सकता। हालांकि, काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत लागू होता है।
अवैध हड़ताल - अवैध हड़ताल में शामिल होने पर श्रमिकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है, उनका वेतन काटा जा सकता है और गंभीर मामलों में उन्हें नौकरी से निकाला भी जा सकता है।
एस्मा/रेस्मा लगने के बाद - सरकारी कर्मचारियों द्वारा हड़ताल करने पर सरकार अध्यादेश द्वारा रेस्मा/एस्मा (किसी सेवा को अस्थाई तौर पर आवश्यक सेवा घोषित करते हुए हड़ताल पर पाबंदी लगाई जाती है। राजस्थान में 1982,1998 की कर्मचारियों की हड़ताल में यह लगाई जा चुकी है।
तालाबंदी (Lock Out) - तालाबंदी (Lockout) को सरल शब्दों में मालिकों की हड़ताल कहा जा सकता है। जहाँ हड़ताल में श्रमिक काम करने से मना करते हैं, वहीं तालाबंदी में नियोक्ता कर्मचारियों को काम पर आने से रोक देता है।
तालाबंदी की परिभाषा (धारा 2(l) -
तालाबंदी का अर्थ है - किसी रोजगार के स्थान को अस्थायी रूप से बंद कर देना, या काम को निलंबित कर देना, या नियोक्ता द्वारा अपने यहाँ नियोजित व्यक्तियों को काम पर रखने से इनकार कर देना।
मुख्य बिंदु - यह नियोक्ता का एक हथियार है जिसका उद्देश्य श्रमिकों पर दबाव बनाना है ताकि वे उसकी शर्तें मान लें। यह व्यवसाय को स्थायी रूप से बंद करना नहीं है, बल्कि एक अस्थायी कदम है।
तालाबंदी क्यों - हड़ताल के जवाब में - जब श्रमिक अनुचित हड़ताल करते हैं, तो मालिक परिसर की सुरक्षा के लिए तालाबंदी कर सकता है।
अनुशासनहीनता के विरुद्ध - यदि श्रमिक कार्यस्थल पर हिंसा या तोड़-फोड़ कर रहे हों तो सुरक्षा की दृष्टि से तालाबंदी की जा सकती है।
सामूहिक सौदेबाजी के असफल होने पर - जब यूनियन ऐसी मांगें रखे जो मालिक के लिए मानना असंभव हों, तो वह दबाव बनाने के लिए तालाबंदी कर सकता है।
कानूनी और अवैध तालाबंदी (धारा 22, 23 और 24) - हड़ताल की तरह ही तालाबंदी के लिए भी कड़े नियम हैं। यदि इनका पालन न हो, तो तालाबंदी अवैध मानी जाती है -
नोटिस की अनिवार्यता - जनोपयोगी सेवाओं (Public Utility Services) में 14 दिन का पूर्व नोटिस दिए बिना तालाबंदी करना अवैध है।
विवाद के दौरान - यदि सुलह की कार्यवाही चल रही हो, तो उस दौरान तालाबंदी नहीं की जा सकती।
अदालती आदेश - यदि श्रम न्यायालय या ट्रिब्यूनल ने तालाबंदी पर रोक लगा रखी हो।
तालाबंदी के परिणाम -
∆ यदि तालाबंदी कानूनी और उचित है, तो नियोक्ता को उस अवधि का वेतन देने की आवश्यकता नहीं होती।
∆ यदि तालाबंदी अवैध पाई जाती है, तो अदालत मालिक को आदेश दे सकती है कि वह श्रमिकों को उस पूरी अवधि का पूरा वेतन और हर्जाना दे।
छंटनी (Retrenchment) - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत छंटनी का मतलब कर्मचारी को नौकरी से स्थायी रूप से निकालना है, लेकिन यह सजा के तौर पर नहीं होता। जब किसी कंपनी के पास काम कम हो जाता है या वह अपना खर्च घटाना चाहती है, तब वह अतिरिक्त कर्मचारियों की छंटनी करती है।
छंटनी की परिभाषा - (धारा 2(oo)
कानून के अनुसार, छंटनी का अर्थ है नियोक्ता द्वारा किसी भी कारण से श्रमिक की सेवा को समाप्त करना, लेकिन निम्नलिखित को छंटनी नहीं माना जाता -
सेवा समाप्ति/सजा - अनुशासनहीनता के कारण दी गई बर्खास्तगी।
रिटायरमेंट - उम्र पूरी होने पर सेवामुक्ति।
अनुबंध का अंत - यदि कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया हो।
खराब स्वास्थ्य - लगातार बीमारी के कारण सेवा का अंत।
छंटनी के लिए कानूनी शर्तें (धारा 25F) - अगर कोई कर्मचारी किसी कंपनी में 1 साल (240 दिन) से अधिक समय से काम कर रहा है, तो उसकी छंटनी करने से पहले मालिक को ये नियम मानने होंगे -
I. नोटिस - श्रमिक को 1 महीने का लिखित नोटिस देना होगा, जिसमें छंटनी का कारण लिखा हो। (नोटिस के बदले 1 महीने का वेतन भी दिया जा सकता है) सरकारी कर्मचारी को तीन महीने का वेतन अग्रिम दिया जाना आवश्यक है।
II. मुआवजा (Compensation) - यह सबसे जरूरी हिस्सा है। कर्मचारी को उसकी हर एक साल की सेवा के बदले 15 दिन का औसत वेतन मुआवजे के रूप में देना होगा। (अंतिम कार्य दिवस के अनुसार 15 दिन का वेतन x सेवा के वर्ष)
सरकार को सूचना - उचित सरकारी अधिकारी को इसकी जानकारी देनी होगी।
छंटनी का सिद्धांत - पहले आओ-अंतिम जाओ - (धारा 25G) - कानून छंटनी में पक्षपात रोकने के लिए Last Come, First Go (LCFG) का नियम लागू करता है। इसका मतलब है कि अगर एक ही श्रेणी के कई कर्मचारी हैं, तो नियोक्ता उस व्यक्ति को पहले निकालेगा जिसे सबसे अंत में नौकरी पर रखा गया था। अगर मालिक इस नियम को तोड़कर किसी पुराने कर्मचारी को निकालता है, तो उसे इसका ठोस कारण देना होगा।
दोबारा भर्ती का अधिकार (धारा 25H) - भविष्य में कंपनी दोबारा भर्ती (Re-employment) शुरू करती है, तो उसे उन श्रमिकों को प्राथमिकता देनी होगी जिनकी उसने पहले छंटनी की है। पुराने कर्मचारियों को मौका दिए बिना वह नए लोगों को नहीं रख सकता। (5B)
काम होने तक छुट्टी/कामबंदी/ले ऑफ (Lay-off) - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत ले-ऑफ का अर्थ काम का अस्थायी निलंबन है। यह छंटनी से अलग है क्योंकि इसमें कर्मचारी की नौकरी पक्की रहती है, मालिक उसे कुछ समय के लिए काम देने में असमर्थ होता है -
कामबंदी की परिभाषा धारा 2(kkk) -
लामबंदी तब माना जाता है जब कोई नियोक्ता जिसका नाम मास्टर रोल में दर्ज है, अपने किसी श्रमिक को निम्नलिखित कारणों से काम देने में विफल रहता है -
कच्चे माल की कमी - कोयले, बिजली या कच्चे माल की कमी के कारण काम ना होना।
अत्यधिक स्टॉक - स्टॉक का बहुत अधिक जमा हो जाना।
तकनीकी खराबी - मशीनरी का खराब होना।
आपदा - प्राकृतिक आपदा या कोई अन्य आकस्मिक कारण।
कामबंदी हेतु मुआवजे की शर्तें (धारा 25C) - यदि किसी कारखाने में 50 या उससे अधिक श्रमिक काम करते हैं और किसी श्रमिक ने 1 साल (240 दिन) की निरंतर सेवा पूरी कर ली है, तो कामबंदी के दौरान वह मुआवजा पाने का अधिकार है -
मुआवजे की राशि - श्रमिक को उसके मूल वेतन (Basic Pay) और महंगाई भत्ते (DA) का 50% भुगतान किया जाएगा।
अवधि - यह मुआवजा उन सभी दिनों के लिए दिया जाता है जब उसे काम नहीं दिया गया (साप्ताहिक छुट्टियों को छोड़कर)।
समय सीमा - आमतौर पर एक वर्ष में अधिकतम 45 दिनों के लिए यह मुआवजा दिया जाता है। यदि कामबंदी 45 दिनों से आगे बढ़ती है, तो नियोक्ता और श्रमिक के बीच समझौते के आधार पर आगे निर्णय लिया जाता है।
श्रमिक को मुआवजा नहीं मिलेगा (धारा 25E) यदि -
अन्यत्र काम करने से मना करने पर - वह उसी प्रतिष्ठान या पास के किसी अन्य प्रतिष्ठान में वैकल्पिक काम स्वीकार करने से मना कर देता है।
अनुपस्थिति - वह काम के घंटों के दौरान कम से कम एक बार प्रतिष्ठान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आता।
अन्य घटना - कामबंदी प्रतिष्ठान के किसी दूसरे हिस्से में हुई हड़ताल या स्लो-डाउन के कारण हुई हो।
विशेष प्रावधान (अध्याय 5B) -
यदि किसी कारखाने, खान (Mine) या बागान में 100 या अधिक श्रमिक हैं, तो वहाँ कामबंदी करने के लिए नियोक्ता को सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। बिना अनुमति के की गई कामबंदी को अवैध माना जाता है और श्रमिक पूरे वेतन के हकदार होते हैं।
कंपनी के पूर्णतया बंद (Clouser) पर श्रमिक हित - जब कोई कंपनी या औद्योगिक प्रतिष्ठान स्थायी रूप से बंद होता है, तो इसे कानून की भाषा में बंदी (Closure) कहा जाता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत ऐसे समय में श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं।
यहाँ कंपनी बंद होने पर श्रमिकों के मुख्य अधिकार और नियम दिए गए हैं -
नोटिस का अधिकार (धारा 25FFA और 25FFF) - कंपनी को बंद करने से पहले नियोक्ता को निम्नलिखित कदम उठाने होते हैं -
I. 60 दिन का नोटिस - यदि कंपनी में 50 से अधिक श्रमिक हैं, तो मालिक को कम से कम 60 दिन पहले समुचित सरकार को सूचित करना अनिवार्य है कि वह कंपनी बंद करने जा रहा है।
II. श्रमिकों को सूचना - श्रमिकों को भी इस निर्णय की पूर्व सूचना देनी होती है ताकि वे मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार हो सकें।
बंदी मुआवजे का अधिकार - यदि कोई कंपनी बंद होती है, तो वहां काम करने वाले हर उस श्रमिक को मुआवजा पाने का हक है जिसने 1 साल (240 दिन) की निरंतर सेवा पूरी कर ली है।
मुआवजे की गणना - कर्मचारी को उसकी सेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष के लिए 15 दिन का औसत वेतन मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
नोटिस वेतन - मुआवजे के अलावा, कर्मचारी को 1 महीने का नोटिस या उसके बदले 1 महीने का पूरा वेतन भी दिया जाना चाहिए।
विशेष सुरक्षा - 100 से अधिक श्रमिकों वाली कंपनी (अध्याय 5B) यदि किसी कारखाने, खदान या बागान में 100 या अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, तो नियम बहुत कड़े हो जाते हैं -
सरकार की अनुमति - ऐसी कंपनियों को बंद करने के लिए सरकार से कम से कम 90 दिन पहले लिखित अनुमति लेनी पड़ती है।
बिना अनुमति बंदी - यदि सरकार अनुमति देने से मना कर देती है और फिर भी मालिक कंपनी बंद करता है, तो ऐसी बंदी अवैध मानी जाती है। इस स्थिति में श्रमिक पूरे वेतन और लाभों के हकदार बने रहते हैं।
बकाया भुगतान का अधिकार (Full and Final Settlement) - कंपनी बंद होने पर श्रमिक को गत भुगतान तुरंत पाने का अधिकार है।
अर्जित अवकाश - बची हुई छुट्टियों का पैसा।
ग्रेच्युटी - यदि 5 साल या उससे अधिक की सेवा पूरी होने पर एक राशि का भुगतान।
बोनस - उस वर्ष का बकाया बोनस।
पीएफ - पीएफ खाते में जमा पूरी राशि और नियोक्ता का हिस्सा।
प्राथमिकता का अधिकार (Priority in Payment) - यदि कंपनी दिवालिया (Bankrupt) होने के कारण बंद हो रही है, तो कानून के अनुसार कंपनी की संपत्ति बेचकर जो पैसा आएगा, उसमें श्रमिकों के बकाया वेतन और मुआवजे को सुरक्षित लेनदारों (Secured Creditors) के बराबर प्राथमिकता दी जाती है।
औद्योगिक विवाद निपटान हेतु कानूनी ढांचा -
A. आंतरिक मशीनरी -
1. कार्य समिति
B. सरकारी मशीनरी -
2. सुलह अधिकारी
3. सुलह बोर्ड
C. अधिनिर्णयन शक्ति -
4. श्रम न्यायालय
5. औद्योगिक ट्रिब्यूनल
6. राष्ट्रीय न्यायाधिकरण
D. मध्यस्थता
7. स्वैच्छिक मध्यस्थता
औद्योगिक विवाद मशीनरी - जब आपसी बातचीत विफल हो जाती है, तो सरकार इसमें हस्तक्षेप करती है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत सुलह मशीनरी वह तंत्र है जो विवाद को कोर्ट-कचहरी तक पहुँचने से पहले ही आपसी बातचीत और समझौते से सुलझाने का प्रयास करता है।
इसका काम परामर्श और मध्यस्थता है, न कि दंड देना। इस मशीनरी का मुख्य उद्देश्य हड़ताल और तालाबंदी जैसी स्थितियों को रोककर शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालना है। इसे तीन मुख्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है -
A. आंतरिक मशीनरी - यह विवाद के शुरुआती स्तर पर ही समाधान खोजने का प्रयास करती है।
1 कार्य समिति (Works Committee - धारा 3) - औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 3 के तहत कार्य समिति (Works Committee) औद्योगिक शांति की पहली सीढ़ी मानी जाती है। यह विवादों को अदालत ले जाने के बजाय कारखाने के अंदर ही सुलझाने का एक लोकतांत्रिक मंच है।
यहाँ कार्य समिति का विस्तृत और सरल विवरण दिया गया है:
कार्य समिति का गठन - अनिवार्य शर्त - जिस भी औद्योगिक संस्थान में पिछले 12 महीनों में किसी भी दिन 100 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत रहे हों, वहाँ समुचित सरकार के आदेश पर कार्य समिति का गठन करना अनिवार्य है।
कार्य समिति की संरचना - इसमें नियोक्ता (मालिक) और श्रमिकों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
कार्य समिति में समानता का नियम - कानून के अनुसार, समिति में श्रमिकों के प्रतिनिधियों की संख्या नियोक्ता के प्रतिनिधियों से कम नहीं होनी चाहिए। यानी श्रमिकों की शक्ति बराबर या अधिक होगी।
कार्य समिति का चयन - श्रमिकों के प्रतिनिधियों का चुनाव खुद कर्मचारी करते हैं, और यदि वहाँ कोई पंजीकृत ट्रेड यूनियन है, तो चुनाव में उनकी सलाह ली जाती है।
कार्य समिति के उद्देश्य - कार्य समिति का मुख्य काम झगड़ा करना नहीं, बल्कि रिश्तों को मधुर बनाना है -
नियोक्ता और श्रमिकों के बीच अच्छे संबंध बनाए रखना।
ऐसे सामान्य हितों के मामलों पर चर्चा करना जो दोनों पक्षों के लिए जरूरी हों।
मतभेदों को विवाद बनने से पहले ही आपसी बातचीत से दूर करना।
कार्य समिति का कार्य क्षेत्र - सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न नियमों के अनुसार, कार्य समिति का दायरा तय किया गया है:
कार्यस्थल की स्थिति (रोशनी, हवा, स्वच्छता)।
पीने के पानी और कैंटीन की सुविधा।
सुरक्षा और दुर्घटनाओं को रोकना।
मनोरंजन और कल्याणकारी योजनाएं।
छुट्टियों का समायोजन।
निषिद्ध विषय - गंभीर विषयों पर कार्य समिति फैसला नहीं ले सकती, इनके लिए ट्रेड यूनियन और सामूहिक सौदेबाजी की जरूरत होती है -
∆ वेतन और भत्ते
∆ बोनस और लाभ साझा करना।
∆ पीएफ और ग्रेच्युटी।
∆ कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती या छंटनी।
कार्य समिति की सीमाएं -
∆ सिफारिशी प्रकृति - इसके निर्णय केवल सिफारिश होते हैं। इन्हें लागू करने के लिए मालिक को मजबूर करना कठिन होता है जब तक कि दोनों पक्ष सहमत न हों।
∆ ट्रेड यूनियन का विकल्प नहीं - यह ट्रेड यूनियन की जगह नहीं ले सकती। यूनियन का काम हक के लिए लड़ना है जबकि इसका काम शांति बनाए रखना है।
B. सरकारी मशीनरी -
1. सुलह अधिकारी -
(औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 4 के अनुसार सरकार द्वारा नियुक्त एक मध्यस्थ है। इसका काम दोनों पक्षों को मेज पर लाना और समझौता करवाना है। यह फैसला नहीं सुनाता, बल्कि समझौता करवाने में मदद करता है।
यह विवाद निपटान मशीनरी का सबसे सक्रिय और जमीनी हिस्सा होता है।
इसे एक शांतिदूत या मध्यस्थ की तरह देखा जा सकता है, जिसका काम कोर्ट-कचहरी से पहले ही झगड़े को बातचीत की मेज पर सुलझाना है।
सुलह अधिकारी की नियुक्ति - सुलह अधिकारी की नियुक्ति समुचित सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी कर की जाती है। सरकार एक अधिकारी को किसी खास इलाके के लिए या किसी खास उद्योग के लिए नियुक्त कर सकती है।सुलह अधिकारी की भूमिका और कार्य (धारा 12) - सुलह अधिकारी का मुख्य काम फैसला सुनाना नहीं, बल्कि समझौता करवाना है।
मध्यस्थया - वह दोनों पक्षों को एक साथ बैठाता है और उनके बीच की कड़वाहट को कम करने की कोशिश करता है।
जांच - विवाद के कारणों को समझने के लिए वह कारखाने का दौरा कर सकता है और जरूरी दस्तावेज मांग सकता है।
दबाव नहीं, सुझाव - वह किसी पर अपना फैसला थोप नहीं सकता, बल्कि वह ऐसे सुझाव देता है जिससे दोनों पक्षों का फायदा हो।
कार्यवाही की समय-सीमा - 15 दिन
अनिवार्य सुलह - यदि मामला जनोपयोगी सेवाओं (जैसे रेलवे, बिजली) से जुड़ा है और हड़ताल का नोटिस दिया गया है, तो अधिकारी के लिए सुलह शुरू करना अनिवार्य है।
रिपोर्ट जमा करना - सुलह की कार्यवाही शुरू होने के 14 दिनों के भीतर अधिकारी को अपनी रिपोर्ट सरकार को भेजनी होती है। (हालांकि, यदि दोनों पक्ष लिखित में सहमत हों, तो इस समय को बढ़ाया जा सकता है)।
सुलह के दो परिणाम -
I. समझौता होने पर एक मेमोरेंडम ऑफ सेटलमेंट तैयार किया जाता है। इस पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होते हैं और यह कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
II. यदि समझौता न हो तो अधिकारी एक विफलता रिपोर्ट तैयार करता है। इसमें वह लिखता है कि उसने क्या कोशिशें कीं और समझौता क्यों नहीं हो पाया। यह रिपोर्ट सरकार को भेजी जाती है।
सुलह अधिकारी की शक्तियाँ -
∆ उसे एक लोक सेवक माना जाता है।
∆ उसे किसी भी औद्योगिक परिसर में प्रवेश करने का अधिकार है।
∆ उसे दस्तावेज मंगवाने और गवाहों से पूछताछ करने की वैसी ही शक्तियाँ प्राप्त हैं जो एक सिविल कोर्ट को होती हैं (सीमित दायरे में)।
विशेष बात - सुलह अधिकारी की 'विफलता रिपोर्ट' मिलने के बाद ही सरकार यह तय करती है कि मामले को लेबर कोर्ट भेजना है या नहीं। इसे Refrence (धारा 10) कहा जाता है।
2. सुलह बोर्ड (Board of Conciliation - धारा 5) - जब कोई विवाद बहुत जटिल हो और एक अधिकारी उसे न सुलझा पाए, तो सरकार एक सुलह बोर्ड का गठन कर सकती है।
संरचना - इसमें एक स्वतंत्र अध्यक्ष और विवाद के दोनों पक्षों द्वारा नामित बराबर-बराबर संख्या में प्रतिनिधि (2 या 4) होते हैं।
कार्य - बोर्ड का उद्देश्य भी समझौता कराना ही है, लेकिन इसका स्वरूप अधिक औपचारिक होता है।
सुलह प्रक्रिया और समय सीमा (धारा 12) - सुलह की कार्रवाई एक निश्चित प्रक्रिया के तहत चलती है:
* कार्रवाई शुरू होना - नोटिस मिलने पर या विवाद की सूचना मिलने पर अधिकारी कार्यवाही शुरू करता है।
* समझौता (Settlement) - यदि दोनों पक्ष मान जाते हैं, तो एक मेमोरेंडम ऑफ सेटलमेंट पर हस्ताक्षर किए जाते हैं। यह समझौता दोनों पक्षों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
विफलता रिपोर्ट (Failure Report) - यदि सुलह अधिकारी को लगता है कि समझौता संभव नहीं है, तो वह सरकार को विफलता रिपोर्ट भेजता है। इसके बाद ही सरकार मामले को लेबर कोर्ट या ट्रिब्यूनल को भेजती है।
समय सीमा - सुलह अधिकारी को अपनी कार्यवाही शुरू होने के 14 दिनों के भीतर (और बोर्ड को 2 महीने के भीतर) अपनी रिपोर्ट सरकार को देनी होती है, हालांकि दोनों पक्षों की सहमति से इस समय को बढ़ाया जा सकता है।
सुलह के दौरान पाबंदियाँ (धारा 33) -
जब सुलह की कार्यवाही चल रही हो, तब:
* श्रमिक हड़ताल पर नहीं जा सकते।
* नियोक्ता (मालिक) तालाबंदी नहीं कर सकता।
* नियोक्ता श्रमिकों की सेवा शर्तों में कोई ऐसा बदलाव नहीं कर सकता जिससे विवाद और बढ़े।
3. जांच बोर्ड धारा 5 - गंभीर विवादों के लिए सरकार एक बोर्ड बना सकती है जिसमें एक स्वतंत्र अध्यक्ष और दोनों पक्षों के बराबर प्रतिनिधि होते हैं। जांच बोर्ड सुलह मशीनरी का एक उच्च स्तरीय रूप है। जब एक अकेला सुलह अधिकारी किसी बड़े या जटिल विवाद को सुलझाने में सफल नहीं हो पाता, तब सरकार इस बोर्ड का गठन करती है।
जाँच बोर्ड की संरचना और कार्यप्रणाली
बोर्ड का गठन - सरकार विशेष परिस्थितियों में राजपत्र में अधिसूचना के माध्यम से इसका गठन करती है। इसकी संरचना त्रिपक्षीय होती है:
अध्यक्ष - एक स्वतंत्र व्यक्ति जो आमतौर पर न्यायिक पृष्ठभूमि से होता है।
सदस्य - विवाद के दोनों पक्षों (मालिक और मजदूर) द्वारा नामित प्रतिनिधि। इनकी संख्या 2 या 4 हो सकती है (दोनों तरफ बराबर)।
विशेष शर्त - यदि कोई पक्ष अपने प्रतिनिधि का नाम नहीं देता है, तो सरकार खुद अपनी पसंद से उस पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य की नियुक्ति कर सकती है।
बोर्ड के कार्य और कर्तव्य (धारा 13) -
जांच बोर्ड का प्राथमिक कर्तव्य विवाद को मेज पर सुलझाना है, न कि केवल उसकी जांच करना।
समझौते का प्रयास - बोर्ड विवाद के तथ्यों की जांच करता है और दोनों पक्षों को ऐसे समझौते के लिए प्रेरित करता है जो उचित और सौहार्दपूर्ण हो।
समय सीमा - बोर्ड को अपनी कार्यवाही शुरू होने के 2 महीने के भीतर सरकार को रिपोर्ट सौंपनी होती है। (सरकार इस समय को लिखित में बढ़ा भी सकती है)।
बोर्ड की रिपोर्ट के दो पहलू
सुलह अधिकारी की तरह
यदि समझौता हो जाए - तो बोर्ड एक सेटलमेंट रिपोर्ट तैयार करेगा और उसे सरकार को भेजेगा। इस पर सभी सदस्यों और अध्यक्ष के हस्ताक्षर होंगे।
यदि समझौता न हो तो बोर्ड सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट भेजेगा जिसमें विफलता के कारण और विवाद के तथ्यों के बारे में अपनी सिफारिशें देगा।
सुलह अधिकारी और जांच बोर्ड में अंतर -
गठन - सुलह अधिकारी धारा 4 = जांच बोर्ड धारा 5
सदस्य संख्या - केवल एक व्यक्ति = अध्यक्ष + 2 या 4 सदस्य (बहु-सदस्यीय)
गठन - स्थायी रूप से नियुक्त होता है = विशेष विवाद के लिए गठित किया जाता है।
प्रकृति - नियमित प्रशासनिक कार्य = अधिक औपचारिक और न्यायिक
समय सीमा - 14 दिन के भीतर रिपोर्ट = 2 महीने के भीतर रिपोर्ट।
बोर्ड की शक्तियाँ - जांच बोर्ड को भी सिविल कोर्ट की कुछ शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे
∆ गवाहों को समन भेजना और उन्हें हाजिर करना।
∆ शपथ पर गवाही लेना।
∆ दस्तावेजों को पेश करने के लिए मजबूर करना।
निष्कर्ष - सुलह मशीनरी एक फिल्टर की तरह काम करती है। यह कोशिश करती है कि 90% विवाद बातचीत से ही खत्म हो जाएं ताकि अदालतों पर बोझ न बढ़े।
C. अधिनिर्णय मशीनरी (Adjudication Machinery) - यह विवाद सुलझाने का अंतिम और अनिवार्य कानूनी रास्ता है। यहाँ का फैसला 'अवार्ड' (Award) कहलाता है और दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
1. श्रम न्यायालय धारा 7 - जब आपसी बातचीत और सुलह की कोशिशें (जैसे कार्य समिति या सुलह अधिकारी) विफल हो जाती हैं, तब विवाद को न्यायिक निर्णय हेतु भेजा जाता है।
श्रम न्यायालय की कार्यप्रणाली -
गठन - समुचित सरकार (केंद्र या राज्य) राजपत्र में अधिसूचना के द्वारा एक या एक से अधिक श्रम न्यायालयों का गठन कर सकती है। इसमें एक व्यक्ति (न्यायाधीश) होता है, जिसे पीठासीन अधिकारी कहा जाता है।
पीठासीन अधिकारी की योग्यता-
अ. उच्च न्यायालय का न्यायाधीश का अनुभव
ब. न्यूनतम 3 वर्ष का जिला न्यायाधीश या अतिरिक्त जिला न्यायाधीश का अनुभव।
स. भारत में न्यूनतम 7 वर्ष तक किसी न्यायिक पद पर रहने का अनुभव।
द. न्यूनतम 5 वर्ष तक प्रांतीय अधिनियम के तहत गठित श्रम न्यायाधिकरण का पीठासीन अधिकारी रहा हो।
श्रम न्यायालय का क्षेत्राधिकार - श्रम न्यायालय उन विवादों की सुनवाई करता है जो अधिनियम की दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध (जैसे छंटनी, बर्खास्तगी, या आदेशों की व्याख्या) हैं।
A. नियोक्ता के आदेशों की वैधता - क्या मालिक द्वारा दिया गया कोई आदेश (जैसे ट्रांसफर या डिमोशन) कानूनी रूप से सही है या नहीं?
B. स्थायी आदेशों की व्याख्या - कंपनी के नियमों की व्याख्या करना।
C. बर्खास्तगी और छंटनी - किसी श्रमिक को नौकरी से निकालने या काम से हटाने की वैधता की जांच करना और उसे वापस काम पर रखने का आदेश देना।
D. वैधानिक अधिकारों की रक्षा - जैसे छुट्टी, वेतन या अन्य सुविधाओं से जुड़े अधिकार।
E. हड़ताल और तालाबंदी - यह तय करना कि कोई हड़ताल या तालाबंदी कानूनी है या अवैध।
श्रम न्यायालय का कार्य करने का तरीका -
अ. सिविल कोर्ट - श्रम न्यायालय को सिविल कोर्ट की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं (जैसे गवाहों को बुलाना, शपथ लेना)।
ब. शीघ्र न्याय - इसका मुख्य उद्देश्य शीघ्र न्याय करना है।
स. अवॉर्ड - श्रम न्यायालय जो फैसला सुनाता है, उसे अवार्ड कहा जाता है। यह अवार्ड सरकार को भेजा जाता है जो राजपत्र में प्रकाशित होने के 30 दिनों के बाद कानूनी रूप से बाध्यकारी हो जाता है।
श्रम न्यायालय के आदेश की अवहेलना पर धारा 33A के अंतर्गत कार्यवाही की जाती है।
2. औद्योगिक न्यायाधिकरण - (Industrial Tribunal - धारा 7A) - यह अधिक व्यापक मामलों को सुनता है (जैसे वेतन, भत्ते, बोनस, काम के घंटे)। यह दूसरी और तीसरी अनुसूची दोनों के मामलों को देख सकता है। यह श्रम न्यायालय से एक कदम ऊपर की संस्था है, क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र व्यापक होता है।
श्रम न्यायालय व्यक्तिगत मामलों (जैसे किसी एक की छंटनी) को देखता है, वहीं न्यायाधिकरण अक्सर सामूहिक विवादों (जैसे पूरे कारखाने के वेतन का मुद्दा) पर फैसला सुनाता है।
इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल का गठन - समुचित सरकार (केंद्र या राज्य) एक या अधिक औद्योगिक न्यायाधिकरणों का गठन कर सकती है जिसमें एक पीठासीन अधिकारी होता है।
पीठासीन अधिकारी की योग्यता - (Qualification)
पीठासीन अधिकारी बनने के लिए व्यक्ति के पास ये योग्यताएं होनी चाहिए:
A. उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो।
B. या 3 वर्ष तक जिला न्यायाधीश/ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश रहा हो।क्षेत्राधिकार - औद्योगिक न्यायाधिकरण अधिनियम की दूसरी और तीसरी दोनों अनुसूचियों में दिए गए मामलों की सुनवाई कर सकता है। तीसरी अनुसूची के मुख्य विषय ये हैं -
A. मजदूरी - वेतन की दरें और भुगतान का तरीका।
B. भत्ते - महंगाई भत्ता व अन्य भत्ते।
C. काम के घंटे - शिफ्ट का समय व आराम की अवधि।
D. अवकाश - सवैतनिक अवकाश व छुट्टियां।
E. बोनस और लाभ - बोनस, लाभ साझाकरण व भविष्य निधि (PF)।
F. ग्रेच्युटी: सेवा समाप्ति पर मिलने वाला लाभ।
G. अनुशासन के नियम - कंपनी के भीतर के अनुशासन संबंधी मामले।
H. कार्यबल का वर्गीकरण - कुशल, अकुशल, या ट्रेनिंग पर रहने वाले कर्मचारी।
ट्रिब्यूनल की शक्तियाँ और प्रक्रिया -
A. बाध्यकारी निर्णय - ट्रिब्यूनल का फैसला Award कहलाता है। एक बार सरकार इसे प्रकाशित कर दे, तो यह मालिक और मजदूर दोनों पर बाध्यकारी होता है।
B. सिविल कोर्ट की शक्तियाँ - इसे गवाहों को बुलाने, शपथ दिलाने और दस्तावेजों को अनिवार्य रूप से पेश कराने का पूरा अधिकार है।
C. स्वयं की प्रक्रिया - ट्रिब्यूनल को अपनी कार्यवाही को लचीला रखने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने की छूट होती है।
श्रम न्यायालय और न्यायाधिकरण में अंतर -
श्रम न्यायालय = औद्योगिक न्यायाधिकरण
आधार - श्रम न्यायालय धारा 7 = औद्योगिक न्यायाधिकरण धारा 7A।
कार्यक्षेत्र - सीमित, केवल दूसरी अनुसूची = व्यापक, दूसरी और तीसरी दोनों अनुसूचियाँ।
प्रकृति - व्यक्तिगत विवादों पर अधिक ध्यान = सामूहिक और आर्थिक विवादों (Collective Disputes) पर ध्यान।
शक्ति - वेतन और बोनस जैसे बड़े आर्थिक नीतिगत फैसले नहीं लेता = वेतन वृद्धि और बोनस जैसे बड़े बदलाव कर सकता है।
3. राष्ट्रीय न्यायाधिकरण (National Tribunal धारा 7B) - यदि विवाद राष्ट्रीय महत्व या दो से अधिक राज्यों के उद्योगों को प्रभावित करता हो, तो केंद्र सरकार इसका गठन करती है। यह उन्हीं मामलों को हाथ में लेता है जो पूरे देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।
राष्ट्रीय न्यायिक प्राधिकरण का गठन -
गठन का अधिकार - इसका गठन करने की शक्ति केवल केंद्र सरकार के पास होती है।
सदस्य - एक पीठासीन अधिकारी एवं/या दो निर्धारक/सहायक (Assessors) जो उस विशिष्ट उद्योग के विशेषज्ञ हों।
उद्देश्य - केंद्र सरकार को लगे कि औद्योगिक विवाद राष्ट्रीय महत्व का है या वह एक से अधिक राज्यों के उद्योगों को प्रभावित कर रहा है तब इसका गठन किया जाता है।
नियुक्ति हेतु योग्यता - राष्ट्रीय न्यायाधिकरण का पीठासीन अधिकारी . उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश को बनाया जा सकता है।
क्षेत्राधिकार - राष्ट्रीय न्यायाधिकरण का क्षेत्र व्यापक होता है जो -
A. राष्ट्रीय महत्व के विवाद - जैसे बैंकिंग, बीमा, रेलवे या विमानन (Aviation) से जुड़े बड़े विवाद।
B. बहु-राज्य प्रभाव - यदि विवाद ऐसा है जिसमें एक से अधिक राज्यों के उद्योग शामिल हैं और उनके हितों में टकराव हो रहा हो।
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के प्रभाव (धारा 10) - जब केंद्र सरकार किसी विवाद को राष्ट्रीय न्यायाधिकरण को भेजती (Refer) है तो इसके कुछ विशेष कानूनी परिणाम होते हैं -
A. श्रम न्यायालय/ औद्योगिक न्यायाधिकरण का अधिकार समाप्त - यदि वही मामला पहले किसी लेबर कोर्ट या इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में चल रहा था, तो वहाँ की कार्यवाही तुरंत रुक जाएगी।
B. सर्वोपरिता - उस विवाद पर केवल राष्ट्रीय न्यायाधिकरण ही सुनवाई करेगा।
C. बाध्यकारी अवार्ड - इसका फैसला (Award) पूरे देश में सभी संबंधित पक्षों पर अनिवार्य रूप से लागू होगा।
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले के विरुद्ध अपील - राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले के खिलाफ अपील करना बहुत कठिन होता है। इसके फैसले को केवल अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
4. मध्यस्थता -
A. स्वैच्छिक मध्यस्थता (Voluntary Arbitration - धारा 10A)
बाहरी हस्तक्षेप से अदालती देरी से बचने का एक बेहतरीन रास्ता है। यदि दोनों पक्ष सहमत हों, तो वे मामले को कोर्ट भेजने के बजाय अपनी पसंद के किसी तीसरे मध्यस्थ (Arbitrator) को सौंप सकते हैं। उसका फैसला भी कोर्ट के फैसले की तरह ही मान्य होता है।
स्वैच्छिक मध्यस्थता - जब मालिक और मजदूर दोनों को लगता है कि वे आपस में विवाद नहीं सुलझा पा रहे और लंबी अदालती कार्रवाई नहीं चाहते, तो वे मिलकर एक लिखित समझौते के तहत विवाद को एक या एक से अधिक मध्यस्थों को सौंपने के लिए तैयार हो जाते हैं।
मुख्य शर्तें -
A. लिखित सहमति - मध्यस्थता के लिए दोनों पक्षों की लिखित सहमति अनिवार्य है।
B. विवाद की स्थिति - जब विवाद समुचित सरकार द्वारा लेबर कोर्ट या ट्रिब्यूनल को न भेजा गया हो।
C. मध्यस्थ का चयन - पक्षकार अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति (जैसे कोई रिटायर्ड जज, विशेषज्ञ या सम्मानित व्यक्ति) को मध्यस्थ चुन सकते हैं।
प्रक्रिया -
A. लिखित कार्यवाही - मध्यस्थता समझौते हेतु दोनों पक्ष सहमति से एक फॉर्म पर हस्ताक्षर करते हैं जिसमें विवाद के बिंदु और चुने गए मध्यस्थ का नाम होता है।
B. सरकार को सूचना - इस समझौते की एक प्रति समुचित सरकार और सुलह अधिकारी को भेजी जाती है।
C. राजपत्र में प्रकाशन - सरकार इस समझौते को राजपत्र में प्रकाशित करती है ताकि अन्य प्रभावित श्रमिकों को भी इसकी जानकारी मिल सके।
D. सुनवाई - मध्यस्थ दोनों पक्षों की दलीलें सुनता है और सबूतों की जांच करता है।
E. निर्णय/पंचाट (Award):l - मध्यस्थ जो फैसला देता है, उसे भी अवार्ड कहा जाता है।
स्वैच्छिक मध्यस्थता के लाभ -
A. समय की बचत
B. पसंद का न्यायाधीश - पक्षकारों को उस व्यक्ति को चुनने का हक होता है जिस पर उन्हें भरोसा हो।
C. कम खर्चीला - इसमें वकीलों और अदालती फीस का भारी खर्च बच जाता है।
D. मधुर संबंध - चूँकि यह आपसी सहमति से होता है, इसलिए फैसला आने के बाद भी मालिक और मजदूर के बीच कड़वाहट कम रहती है।
पंचाट/फैसके की बाध्यकारिता - मध्यस्थ का फैसला (Arbitration Award) लेबर कोर्ट के फैसले की तरह ही कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है। यदि कोई पक्ष इसे मानने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ वही कानूनी कार्यवाही की जा सकती है जो कोर्ट के आदेश के उल्लंघन पर होती है।
B. अनिवार्य मध्यस्थता (अधिनिर्णय) धारा 10 - मालिक और मजदूर आपस में विवाद नहीं सुलझा पाते और सुलह अधिकारी की कोशिशें भी विफल हो जाती हैं, तब धारा 10 के तहत समुचित सरकार अपने अधिकारों का प्रयोग करती है। सरकार मामले को न्यायिक निर्णय हेतु श्रम न्यायालय या न्यायाधिकरण को भेज (Refer) देती है। इसे अधिनिर्णय भी कहा जाता है जिसमें पक्षों की सहमति की आवश्यकता नहीं होती, सरकार का आदेश ही अंतिम होता है। कोर्ट का फैसला (Award) दोनों पक्षों पर कानूनी रूप से थोपा/स्थापित जाता है।
सरकार कब हस्तक्षेप करती है -
A. औद्योगिक शांति भंग होने का खतरा होने पर।
B. विवाद जनोपयोगी सेवाओं (जैसे बिजली, पानी, अस्पताल) से जुड़ा हो।
C. हड़ताल या तालाबंदी के कारण जनता को भारी नुकसान हो रहा हो।
D. दोनों पक्ष समझौते हेतु बिल्कुल तैयार न हों।
अनिवार्य मध्यस्थता के लाभ - यह सुनिश्चित करता है कि विवाद अनंत काल तक न खिंचे और एक अंतिम फैसला आए। यह कमजोर पक्ष (अक्सर श्रमिक) की रक्षा करता है जब मालिक बात करने को तैयार न हो।
कमियाँ - यह प्रक्रिया लंबी और खर्चीली हो सकती है। चूँकि फैसला थोपा जाता है, इसलिए कई बार मालिक और मजदूर के बीच के रिश्ते और अधिक कड़वे हो जाते हैं।
कानूनी प्रभाव - जैसे ही सरकार अनिवार्य मध्यस्थता का आदेश देती है, चल रही हड़ताल या तालाबंदी पर तुरंत रोक लगाई जा सकती है। यदि कोई पक्ष फिर भी हड़ताल जारी रखता है, तो उसे अवैध माना जाता है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम (Industrial Dispute Act, 1947) -
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 भारत में ट्रेड यूनियन एक्ट यूनियनों को बनाने और चलाने के संदर्भ में है। यह अधिनियम मालिक और मजदूरों के बीच होने वाले झगड़ों को सुलझाने और उन्हें रोकने का तरीका बताता है। इसका मुख्य उद्देश्य औद्योगिक शांति बनाए रखना है।
औद्योगिक विवाद - अधिनियम की(धारा 2(k)) के अनुसार, विवाद केवल वेतन को लेकर नहीं होता। इसमें रोजगार, गैर-रोजगार, काम की शर्तों या श्रम की परिस्थितियों से संबंधित तत्व होते हैं -
∆ नियोक्ताओं और नियोक्ताओं के बीच।
∆ नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच।
∆ श्रमिकों और श्रमिकों के बीच।
विवाद सुलझाने वाली संस्थाएँ - इस एक्ट के तहत झगड़ों को निपटाने के लिए एक पदानुक्रम बनाया गया है।
कार्य समिति (Works Committee) - जहाँ 100 या अधिक श्रमिक हों, वहाँ छोटे विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाने के लिए।
I. सुलह अधिकारी (Conciliation Officer) - सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति जो दोनों पक्षों को समझौते के लिए एक मेज पर लाता है।
II. जांच बोर्ड (Board of Inquiry) - विवाद के कारणों की गहराई से जांच करने के लिए।
III. श्रम न्यायालय और ट्रिब्यूनल (Labour Court & Tribunals) - जब बातचीत विफल हो जाए, तब मामला यहाँ जाता है और कोर्ट का फैसला (Award) दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
हड़ताल और तालाबंदी (Strike & Lockout) - यह अधिनियम स्पष्ट करता है कि हड़ताल श्रमिकों का अधिकार तो है, लेकिन यह असीमित नहीं है।
नोटिस - सार्वजनिक उपयोगी सेवाओं (जैसे बिजली, पानी, अस्पताल): यहाँ हड़ताल पर जाने से पहले 14 दिन का नोटिस देना अनिवार्य है।
यदि मामला कोर्ट या ट्रिब्यूनल में लंबित है, तो उस दौरान हड़ताल या तालाबंदी अवैध मानी जाती है।
छंटनी और तालाबंदी के नियम (Lay-off, Retrenchment & Closure)
यह एक्ट श्रमिकों को मनमाने ढंग से नौकरी से निकाले जाने से बचाता है -
कामबंदी - यदि मालिक काम देने में असमर्थ है, तो उसे श्रमिक को मुआवजा देना होगा (आमतौर पर मूल वेतन का 50%)।
छंटनी - नौकरी से निकालने पर पहले आओ-अंतिम जाओ (First come, Last go) का नियम लागू होता है और नोटिस पीरियड के साथ मुआवजा देना पड़ता है।
बंदी (Closure) - इकाई को स्थायी रूप से बंद करने से पहले सरकार को सूचित करना और श्रमिकों को मुआवजा देना अनिवार्य है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धाराएं -
अधिनियम का मुख्य ढांचा
7 अध्याय - में कानून के विभिन्न चरणों का वर्गीकरण।
40 धाराओं - में विवाद सुलझाने, दंड और मुआवजे के नियम।
5 अनुसूचियों - में कौन से विवाद किस अदालत में जाएंगे और किन सेवाओं को आवश्यक माना जाएगा। |
1. अध्याय I - प्रारंभिक (धारा 1 से 2)
इसमें कानून का नाम और विस्तार बताया गया है।
धारा 2- औद्योगिक विवाद, श्रमिक, हड़ताल और ले-ऑफ जैसी कानूनी परिभाषाएँ देती है।
धारा 2: महत्वपूर्ण परिभाषाएँ - इसमें कई शब्दों को कानूनी रूप से परिभाषित किया गया है ताकि कोर्ट में कोई भ्रम न रहे।
धारा 2(j) उद्योग - इसमें केवल कारखाने ही नहीं, बल्कि कोई भी व्यवसाय, व्यापार, विनिर्माण या कॉलिंग शामिल है जहाँ नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध हो। (सुप्रीम कोर्ट की बैंगलोर वाटर सप्लाई केस में व्याख्या के बाद यह शब्द अधिक विस्तृत हो गया है।
धारा 2(k) - औद्योगिक विवाद - नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच का कोई भी विवाद जो रोजगार, गैर-रोजगार, या काम की शर्तों से जुड़ा हो।
धारा 2(l) तालाबंदी - मालिक द्वारा काम के स्थान को अस्थायी रूप से बंद करना।
धारा 2(n) जनोपयोगी सेवा - वे सेवाएँ जिनके बंद होने से जनता को भारी परेशानी हो (जैसे रेलवे, डाक, बिजली, पानी, अस्पताल)। इनके लिए हड़ताल के नियम अलग होते हैं।
धारा 2(oo) छंटनी - सजा के अलावा किसी भी कारण से कर्मचारी को नौकरी से स्थायी रूप से निकालना।
धारा 2(q) हड़ताल - श्रमिकों द्वारा एक साथ मिलकर काम बंद कर देना।
धारा 2(s) श्रमिक (Workman) - कोई भी व्यक्ति जो किसी उद्योग में कुशल, अकुशल, तकनीकी, लिपिकीय या पर्यवेक्षी काम के लिए मजदूरी पर रखा गया हो।
अध्याय का महत्व - अध्याय 1 यह तय करता है कि
∆ क्या आपका कार्यस्थल कानूनी रूप से उद्योग है?
∆ क्या आप कानून की नजर में श्रमिक हैं?
∆ क्या आपका झगड़ा औद्योगिक विवाद की श्रेणी में आता है?
यदि कोई मामला इन परिभाषाओं के दायरे में नहीं आता है तो उस मामले पर इस अधिनियम की अन्य धाराएँ (जैसे मुआवजे या कोर्ट केस के नियम) लागू नहीं होतीं।
2. अध्याय II विवाद सुलझाने वाली संस्थाएँ (धारा 3 से 9)
औद्योगिक विवाद सुलझाने हेतु संस्थाएं -
धारा 3 - कार्य समिति
धारा 4-5 - सुलह अधिकारी और जांच बोर्ड।
धारा 7, 7A, 7B - श्रम न्यायालय और ट्रिब्यूनल का गठन।
3. अध्याय III - विवादों का निपटारा (धारा 10 से 10A)
धारा 10 - सरकार को अधिकार देती है कि वह किसी भी विवाद को सीधे कोर्ट या ट्रिब्यूनल को भेज सके।
4. अध्याय IV - प्रक्रिया और शक्तियाँ (धारा 11 से 21) - कोर्ट और सुलह अधिकारी कैसे काम करेंगे, सबूत कैसे लेंगे और उनके फैसले (Awards) कैसे लागू होंगे।
5. अध्याय V - हड़ताल और तालाबंदी (धारा 22 से 25) - हड़ताल की वैधता, धारा 22 से 23 नोटिस देने के नियमों के बारे में है।
6. अध्याय VA और VB - ले-ऑफ और छंटनी (धारा 25A से 25S) - श्रमिकों की सुरक्षा हेतु बाद में जोड़ी गई -
V(A) अध्याय - छोटी कंपनियों के लिए नियम।
V(B) अध्याय - बड़ी कंपनियों (100+ श्रमिक) के लिए कड़े नियम (सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य)।
7. अध्याय VI और VII - दंड और विविध (धारा 26 से 40) -
धारा 26 से 31 - अवैध हड़ताल या तालाबंदी करने पर जेल या जुर्माने का प्रावधान।
धारा 33 - विवाद के दौरान कर्मचारियों की सेवा शर्तों को न बदलने का नियम।
अनुसूचियाँ -
अनुसूची I - जनोपयोगी सेवाएँ (जैसे बैंकिंग, परिवहन)।
अनुसूची II व III - दूसरी और तीसरी : उन विषयों की सूची जिन पर श्रम न्यायालय और ट्रिब्यूनल फैसला सुना सकते हैं।
अनुसूची IV - वे सेवा शर्तें जिन्हें बदलने से पहले श्रमिक को नोटिस देना जरूरी है।
अनुसूची V - अनुचित श्रम व्यवहार (Unfair Labour Practices) की सूची।
अध्याय I - इस अध्याय दो धाराएँ (धारा 1 और 2) हैं, जिसमें धारा 2 इतनी विस्तृत है कि यह पूरे अधिनियम का आधार तय करती है।
धारा 1 - संक्षिप्त शीर्षक, विस्तार और प्रारंभ - कानून का परिचय -
अधिनियम का नाम इस अधिनियम का नाम औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 है।
विस्तार - यह संपूर्ण भारत में लागू है।
उद्देश्य - उद्योगों में शांति बनाए रखना और विवादों का समाधान करना।
ट्रेड यूनियन एक्ट व औद्योगिक विवाद अधिनियम में अंतर -
विशेषता - ट्रेड यूनियन एक्ट (1926) = औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947)
विषय - यूनियन का पंजीकरण और अधिकार = विवादों का निपटारा और शांति।
भूमिका - संगठन बनाने की शक्ति देता है = झगड़ों को सुलझाने का रास्ता दिखाता है।
कार्य - हड़ताल में सुरक्षा प्रदान करता है = हड़ताल की प्रक्रिया और शर्तों को नियंत्रित करता है।
औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 - यह भारत का एक महत्वपूर्ण श्रम कानून है जो नियोक्ताओं को अपने औद्योगिक प्रतिष्ठानों में रोजगार की शर्तों (जैसे काम के घंटे, छुट्टियां, वर्गीकरण) को लिखित रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करने और उन्हें श्रमिकों को बताने के लिए बाध्य करता है, ताकि पारदर्शिता बढ़े, विवाद कम हों और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा हो सके, खासकर 100 या अधिक श्रमिकों वाले उद्योगों में। इस अधिनियम के तहत, स्थायी आदेश (Standing Orders) बनाए जाते हैं, जिनका प्रमाणन एक अधिकारी द्वारा होता है और इनका उल्लंघन करने पर नियोक्ता पर जुर्माना लग सकता है।
मुख्य उद्देश्य -
01. नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच संबंधों को बेहतर बनाना।
02. रोजगार की शर्तों में एकरूपता लाना।
03. औद्योगिक विवादों को रोक कर निपटन करना।
मुख्य प्रावधान - स्थायी आदेश (Standing Orders) लिखित नियम होते हैं जो रोजगार की विभिन्न शर्तों को बताते हैं, जैसे -
01. कर्मचारियों का वर्गीकरण (स्थायी, अस्थायी, शिक्षु, आदि)।
02. काम के घंटे, अवकाश और वेतन दिवस।
03. छुट्टियों के लिए आवेदन की प्रक्रिया।
अनुशासनिक कार्रवाई (निलंबन, बर्खास्तगी) की शर्तें।
04. नियोजन की समाप्ति (Termination) की प्रक्रिया।
प्रमाणीकरण (Certification) - नियोक्ता को अपने स्थायी आदेशों का प्रारूप एक प्रमाणन अधिकारी (Certifying Officer) के पास जमा करना होता है, जो उन्हें प्रमाणित करता है।
अपील (Appeal) - प्रमाणित स्थायी आदेशों से असंतुष्ट होने पर कोई भी पक्ष अपीलीय प्राधिकारी (Appellate Authority) के पास अपील कर सकता है।
लागू होना (Applicability) - यह अधिनियम उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जहाँ पिछले 12 महीनों में किसी भी दिन 100 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों, लेकिन सरकार इसे छोटे उद्योगों पर भी लागू कर सकती है।
महत्व - यह अधिनियम श्रमिकों को सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिससे उन्हें अस्पष्ट नियमों के आधार पर मनमाने ढंग से हटाने या कम वेतन पर काम करने से बचाया जा सके।
औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम (Industrial Employment (Standing Order) Act 1946
परिचय -
18वीं शताब्दी के दौरान उद्योग में कार्यरत श्रमिकों की स्थितियाँ दयनीय थीं। जिन कठिन परिस्थितियों में उन्हें काम करना पड़ाता था उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। नियोक्ता उन्हें अपने नियमों और शर्तों पर काम पर रखता और बिना कोई कारण बताए किसी भी समय उन्हें बर्खास्त कर देता। छोटी-छोटी गलतियों के लिए उनके कम वेतन में से भारी कटौती की जाती, जिससे उनके पास बिल्कुल भी पैसा नहीं बचता था, परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति खराब हो जाती थी। ऐसे श्रमिक कठोर और दयनीय जीवन जीते थे।
इस स्थिति से अवगत होने पर सरकार ने श्रमिकों की कामकाजी परिस्थितियों के मुद्दे पर चर्चा और सम्मेलन आयोजित किए जिनके आधार पर श्रमिक हित में कई कानून बने जिन्होंने नियोक्ताओं की स्वतंत्रता को विनियमित कर कर्मकारों के लिए बेहतर कामकाजी स्थितियां प्रदान कीं। ऐसा ही एक कानून औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 है।
स्थाई रोजगार आदेश का अर्थ - स्थायी आदेश किसी भी रोजगार संबंध में कर्मचारियों और कामकाजी परिस्थितियों के लिए नियम और विनियम निर्धारित करते हैं। उदाहरण के लिए, कई ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म को अपने ग्राहकों को सदस्यता लेने और वार्षिक शुल्क का भुगतान करने की आवश्यकता होती है। यह एक प्रकार का मानक आदेश है जो ग्राहकों के लिए ऑनलाइन स्ट्रीमिंग का आनंद लेने के लिए शर्तें निर्धारित करता है।
अधिनियम की पृष्ठभूमि - पहले, काम करने की स्थिति और रोजगार की शर्तें नियोक्ता और कर्मचारी के बीच अनुबंध द्वारा शासित होती थीं। नियम और शर्तें विस्तार से निर्दिष्ट नहीं होने के कारण भ्रम और अराजकता की स्थिति पैदा होती रहती थी जिसे वर्ग संघर्ष का नाम दिया गया। अक्सर नियोक्ता व कार्मिक के मध्य मनमुटाव रहता था। 18वीं शताब्दी में देश में ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संघों के आगमन के साथ ही श्रमिकों की समस्याओं और उनकी दयनीय स्थिति पर ध्यान दिया जाने लगा। श्रमिक समस्याओं का समाधान राज्य के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय इसलिए बना कि इससे उद्योगों की उत्पादकता घटने से अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही थी। रोजगार की स्थितियों को सटीक रूप से परिभाषित करने की यह आवश्यकता त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों में चर्चा का ज्वलंत विषय बन गई, परिणामस्वरूप औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 अधिनियमित किया गया। इस अधिनियम द्वारा शासित उद्योगों हेतु कर्मचारियों की कार्य स्थितियों को परिभाषित करना अनिवार्य किया गया।कर्मकार को इसकी जानकारी होनी चाहिए कि उनके कार्य की क्या शर्ते एवं सुविधाएं लागू की गई हैं। दोनों को इसके लिए सहमति देनी होगी। इसका उद्देश्य रोजगार की शर्तों, कर्मचारियों की नियुक्ति, उनकी बर्खास्तगी, उनके खिलाफ की जाने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई (यदि कोई हो), छुट्टियां आदि को विनियमित करना है। इन शर्तों में एकरूपता लाने और कर्मचारियों के लिए बेहतर कामकाजी माहौल बनाने में मदद मिलती है और यह रोजगार एक ही श्रेणी के लिए है।
अधिनियम के उद्देश्य -
01. इस अधिनियम के तहत आने वाले कारखानों और उद्योगों में कामकाजी परिस्थितियों के नियमों और विनियमों को निर्धारित करने वाले स्थायी आदेशों के प्रावधान प्रदान करना।
02. कर्मचारियों और उनके कल्याण के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियाँ प्रदान करने हेतु नियोक्ताओं के लिए नियमों और शर्तों का पालन करना अनिवार्य बनाना।
03. नियोक्ता-कर्मचारी के बीच सौहार्दपूर्ण (हार्मोनियस) संबंध को बढ़ावा देना।
04. इस अधिनियम का उद्देश्य किसी उद्योग में शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना भी।
अधिनियम की पृष्ठभूमि - इस अधिनियम का उद्देश्य काम की शर्तों के साथ औद्योगिक विवादों और अराजकता के स्थान पर शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना भी है। यह अधिनियम भारत में स्थापित उन सभी उद्योगों पर लागू होता है जिनमें पिछले बारह महीनों के किसी भी महीने में 100 या अधिक कर्मचारी होते हैं, जिसके कुछ अपवाद हैं - ऐसे उद्योग जिन पर अधिनियम लागू नहीं होता है -
01. बॉम्बे औद्योगिक संबंध अधिनियम, 1946 के अंतर्गत आने वाले उद्योग।
02. मध्य प्रदेश औद्योगिक रोजगार स्थायी आदेश अधिनियम, 1946, के अंतर्गत आने वाले उद्योग।
03. अधिनियम की धारा 13B के अनुसार, कुछ उद्योग जो अन्य नियमों और विनियमों द्वारा विनियमित होते हैं, अधिनियम के अंतर्गत नहीं आते हैं -
I. मौलिक और पूरक (सप्लीमेंट्री) नियम
II. सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम
III. सिविल सेवा (अस्थायी सेवा) नियम
IV. संशोधित अवकाश नियम
V. सिविल सेवा विनियम,
VI. रक्षा सेवा में नागरिक (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम
VII. भारतीय रेलवे स्थापना कोड
समुचित सरकार द्वारा आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित कोई अन्य नियम और विनियम।
अधिनियम की विशेषताएं -
01. प्रत्येक नियोक्ता जिसका उद्योग अधिनियम के अंतर्गत आता है, को स्थायी आदेश बनाना और उन्हें प्रमाणन प्राधिकारी (सर्टिफाइंग अथॉरिटी) को जमा करना आवश्यक है। प्रमाणन प्राधिकारी आम तौर पर श्रम आयुक्त होता है।
02. प्रमाणित करने वाले अधिकारी को इसे प्रमाणित करने से पूर्व स्थायी आदेशों के ड्राफ्ट को संशोधित करने घटाने या जोड़ने की शक्ति प्राप्त है।
03. समान श्रेणी के उद्योगों में नियोक्ताओं के किसी भी समूह को संयुक्त स्थायी आदेश प्रस्तुत करने की अनुमति है।
04. नियोक्ताओं के लिए इसे आसान बनाने हेतु, सरकार एक मॉडल स्थायी आदेश निर्धारित कर सकती है जिसके साथ नियोक्ताओं द्वारा तैयार किए गए सभी स्थायी आदेशों का पालन करना होगा।
05. यह अधिनियम 100 या अधिक श्रमिकों वाले उद्योगों पर लागू होता है। प्रमाणन अधिकारियों/प्राधिकारी के पास अधिनियम के तहत मामलों में सिविल अदालत की सभी शक्तियां हैं।
06. किसी नियोक्ता को स्थायी आदेश जमा न करने या अंतिम आदेश दिए जाने पर उसके प्रावधानों का उल्लंघन करने के लिए उत्तरदायी ठहराया कर उन्हें इसके लिए दंडित भी किया जा सकता है।
07. समुचित सरकार के पास आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी भी उद्योग को अधिनियम के दायरे से छूट देने की शक्ति है।
अधिनियम के अंतर्गत प्रमाणन अधिकारी - श्रम आयुक्त/क्षेत्रीय श्रम आयुक्त या अधिनियम के तहत प्रमाणन अधिकारी के कार्यों को करने के लिए समुचित सरकार द्वारा नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति।
महत्वपूर्ण केस लॉज -
सरोज कुमार घोष बनाम चेयरमैन, उड़ीसा राज्य (1969)
इस मामले में, यह देखा गया कि रोजगार की समाप्ति और सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) को बराबर नहीं किया जा सकता है। यह एक सकारात्मक कार्य है जिसके द्वारा एक पक्ष दूसरे के रोजगार को समाप्त कर सकता है, जबकि सेवानिवृत्ति एक स्वचालित प्रक्रिया है। आगे यह देखा गया कि सेवानिवृत्ति की आयु निर्धारित करना जिसके कारण किसी व्यक्ति का रोजगार समाप्त हो सकता है, अधिनियम का उल्लंघन नहीं करता है।
यदि स्थायी आदेश में कर्मचारी को बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ अपना पक्ष और कारण प्रस्तुत करने का अवसर देने के लिए नोटिस दिए जाने का प्रावधान है, तो इसका पालन किया जाना चाहिए और बर्खास्तगी आदेश को वैध बनाने के लिए इसे एक शर्त के रूप में माना जाना चाहिए। यह सिद्धांत लक्ष्मीरतन कॉटन मिल्स बनाम कामगार (1975) के मामले में आयोजित किया गया था। एसोसिएटेड सीमेंट कंपनीज़ लिमिटेड बनाम टी.सी श्रीवास्तव (1984), में यह माना गया कि कर्मचारी को उपस्थित होने और कारण बताने का दूसरा अवसर आवश्यक नहीं है, न तो सामान्य भूमि कानून के तहत और न ही औद्योगिक कानून के तहत। यह तभी दिया जा सकता है जब स्थायी आदेश में इसका उल्लेख हो। लेकिन यदि ऐसा कोई अवसर नहीं दिया जाता है, तो यह किसी भी जांच को ख़राब नहीं करता है जो अन्यथा वैध है।
फ़्रीव्हील्स इंडिया लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य (1984) - यह मुद्दा स्थायी आदेश से संबंधित है, जिसमें प्रावधान है कि यदि कोई कर्मचारी लगातार 8 दिनों तक अनुपस्थित रहता है, तो उसे स्वचालित रूप से बर्खास्त कर दिया जाएगा। एक कर्मचारी ने मेडिकल प्रमाणपत्र पेश किया और लगातार आठ दिनों तक छुट्टी पर रहने के बाद अपनी ड्यूटी पर वापस आने का अनुरोध किया। पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने माना कि स्थायी आदेश के अनुसार, उनका रोजगार समाप्त हो गया है, लेकिन उनके पास अपनी अनुपस्थिति के लिए स्पष्टीकरण देकर अपनी अनुपस्थिति की अवधि को बिना वेतन छुट्टी में परिवर्तित करने का विकल्प है। उनके द्वारा ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया और अदालत ने कहा कि मेडिकल या फिटनेस प्रमाणपत्र को इस संबंध में स्पष्टीकरण नहीं माना जा सकता है।
स्थायी आदेश की तर्कसंगतता - अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, प्रमाणन अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी को अव्यवहारिकता, यदि कोई हो, की जांच करने का अधिकार है, जबकि धारा 4 उन्हें मसौदा स्थायी आदेश की निष्पक्षता और तर्कसंगतता के मुद्दे पर निर्णय लेने की शक्ति देता है।
जीवनलाल लिमिटेड बनाम कामगार (1972) - के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने माना कि सेवानिवृत्ति की आयु तय करने की वर्तमान प्रवृत्ति आमतौर पर 60 वर्ष है जब तक कि न्यायधिकरण (न्यायधिकरण ) को यह नहीं लगता कि काम खतरनाक है या कड़ी मेहनत की आवश्यकता है और नौकरीपेशा लोगों की कार्य कुशलता कम हो सकती है। इसके अलावा, एसोसिएटेड सीमेंट कंपनी लिमिटेड बनाम पीडी व्यास (1960) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अपने दायरे में अवैध हड़तालों को शामिल करने के लिए हड़तालों और उनके उकसावे के कारण होने वाले कदाचार से संबंधित स्थायी आदेश को संशोधित किया। इसे उचित माना गया।
अनुसूची में शामिल नहीं किए गए मामले -
रोहतक और हिसार जिला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (1965) - के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नियोक्ता को स्थायी आदेश की अनुसूची में शामिल नहीं किए गए मामलों से संबंधित शर्त जोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, इनके प्रवर्तन के साथ-साथ नियोक्ताओं और कर्मचारियों के अधिकारों और देनदारियों से संबंधित प्रावधान जोड़े जा सकते हैं।
बिनॉय कुमार चटर्जी बनाम मेसर्स जुगंतार लिमिटेड और अन्य (1983) - के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया, चूंकि अनुसूची में सेवानिवृत्ति की आयु के संबंध में कोई मंजूरी नहीं थी, इसलिए कर्मचारी को अपनी सेवा और रोजगार जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है। यह माना गया कि सेवानिवृत्ति की आयु, यानी, स्थायी आदेश के अनुसार, 60 वर्ष, नियोक्ता की शक्ति के भीतर है और इसलिए एक नए अनुबंध के कारण उत्पन्न होने वाली बाद की सेवा को मूल रोजगार की निरंतरता नहीं माना जा सकता है।
प्रमाणीकरण प्रक्रिया - एक स्थायी आदेश का मसौदा तैयार करने और उसके प्रमाणीकरण का उद्देश्य रोजगार के नियमों और शर्तों को विनियमित करना है। प्रक्रिया प्रमाणीकरण के बाद आदेश, नियोक्ता और कार्मिक पर बाध्यकारी होगा।
बरौनी रिफाइनरी प्रगतिशील बनाम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (1990) - के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि स्थायी आदेशों में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता है जब उनसे संबंधित समझौता लंबित हो या संचालन में हो।
हैदराबाद ऑलविन लिमिटेड बनाम एडिशनल इंडस्ट्रीज़ न्यायधिकरण, श्रम न्यायालय, हैदराबाद (1990) - में माना गया की प्रमाणित स्थायी आदेश के तहत नियोक्ता के पास किसी कर्मचारी को 58 वर्ष की आयु में या 35 वर्ष की पूर्ण सेवा के पूरा होने पर सेवानिवृत्त करने का विवेकाधिकार था। इसे उस रोज़गार में काम करने वाले सभी श्रमिकों के लिए बाध्यकारी माना गया, चाहे स्थायी आदेश से पहले या उसके प्रमाणीकरण के बाद हो।
अपट्रॉन इंडिया लिमिटेड बनाम शम्मी भान (1998) - में, न्यायालय ने माना कि किसी उद्योग में उत्पादन से सीधे संबंध के बिना रोजगार की स्वत: समाप्ति से संबंधित स्थायी आदेश में कोई भी प्रावधान खराब है यदि कर्मचारी को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया जाता है।
अपील -
बी.एच.ई.एल. कर्मचारी संघ बनाम मुख्य श्रम आयुक्त (1986),- में यह माना गया कि याचिकाकर्ता को पारगमन (ट्रांसिट) में किसी भी देरी के लिए उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता, जब उसने अपीलीय प्राधिकारी को आवश्यक दस्तावेज भेजते समय पर्याप्त साधन और देखभाल का उपयोग किया था, और इसलिए अपील को गुण-दोष के आधार पर तय करने का निर्देश दिया गया था। इसके अलावा,
बदरपुर पावर इंजीनियर्स एसोसिएशन बनाम डिप्टी उप मुख्य श्रम आयुक्त (1992) - के मामले में मुख्य श्रम आयुक्त, दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 6 औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के अनुसार, अपील दायर करने की समय अवधि उस तारीख से 30 दिनों के भीतर है जिस दिन प्रमाणित स्थायी आदेशों की प्रतियां नियोक्ता को भेजी जाती है।
स्थायी आदेशों का संचालन -अधिनियम की धारा 7 के अनुसार, यदि कोई अपील नहीं की जाती है, तो प्रमाणित स्थायी आदेश उस तारीख से 30 दिनों की समाप्ति पर लागू किया जा सकता है जिस दिन प्रतियां भेजी गई थीं। हालाँकि, यदि अपील की जाती है, तो स्थायी आदेश उस दिन से सात दिनों के भीतर लागू हो जाएगा जिस दिन अपीलीय प्राधिकारी के फैसले की प्रतियां भेजी गई थीं। लागू होने के बाद स्थायी आदेश नियोक्ता और कर्मचारियों पर बाध्यकारी माना जाता है। यह निर्णय
आगरा इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी लिमिटेड बनाम अल्लादीन (1970) के मामले में आयोजित किया गया था।
अधिनियम की धारा 8 में आगे प्रावधान है कि प्रमाणित स्थायी आदेश की एक प्रति इस उद्देश्य के लिए बनाए गए रजिस्टर में दर्ज की जानी चाहिए। इसे कोई भी व्यक्ति अनुरोध करने और निर्धारित शुल्क जमा करने पर प्राप्त कर सकता है।
धारा 9 नियोक्ता को प्रमाणित स्थायी आदेश को, एक बोर्ड पर चिपकाने का निर्देश देती है, जहां अधिकांश कर्मचारी उन सभी विभागों के साथ-साथ जहां वे काम कर रहे हैं, पहुंच सकें।
स्थायी आदेश में संशोधन -
मैनेजमेंट शाहदरा (दिल्ली) बनाम S.S. रेलवे वर्कर्स यूनियन (1968) - में, एक स्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्ति से संबंधित स्थायी आदेश को संशोधित किया गया था। संशोधन के बाद, नियोक्ता को बर्खास्तगी का कारण बताना होगा और कर्मचारी को एक महीने की अग्रिम सूचना के साथ इसकी सूचना देनी होगी। इस मामले ने स्थायी आदेशों में संशोधन के लिए शर्तें प्रदान कीं। संशोधन के लिए आवेदन निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है -
01. परिस्थितियों में बदलाव आने पर।
02. अंतिम प्रमाणित स्थायी आदेश के परिणामस्वरूप असुविधा, कठिनाई उत्पन्न होने पर।
03. प्रमाणन प्रक्रिया के समय कोई तथ्य छूट गया हो।
04. नियोक्ता/कार्मिकों द्वारा संशोधन की आवश्यकता महसूस की गई हो।
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम संयुक्त मुख्य श्रम आयुक्त (1989) - के मामले में, मॉडल स्थायी आदेश में सेवानिवृत्ति की आयु 58 वर्ष बताई गई थी, लेकिन कामगारों ने इसे संशोधित कर 60 वर्ष करने की मांग की। यह माना गया कि प्राधिकरण के पास ऐसे स्थायी आदेश को संशोधित करने का अधिकार क्षेत्र है जो मॉडल स्थायी आदेश के विपरीत है, केवल इस शर्त पर कि संशोधन निष्पक्ष और उचित होना चाहिए।
स्टेट्समैन क्लेरिकल स्टाफ एंड वर्कर्स यूनियन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2002) - के मामले में, अधिनियम की धारा 10 के तहत स्थायी आदेशों के आवेदन से संबंधित विवाद के लिए उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई थी। हालाँकि, यह सुनवाई योग्य नहीं था क्योंकि यह देखा गया था कि धारा 10 स्वयं एक वैकल्पिक उपाय प्रदान करती है, और जहां ऐसा कोई उपाय है, वहां रिट सुनवाई योग्य नहीं है।
प्रमाणन अधिकारी की शक्तियाँ - अधिनियम के धारा 11 तहत प्रमाणन प्राधिकारी की शक्तियाँ दी गई है। इसमें प्रावधान है कि ऐसे प्राधिकारी के पास सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी - 01. साक्ष्य प्राप्त करना।
02. शपथ दिलवाना।
03. गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करना।
04. दस्तावेज़ों की खोज और उत्पादन के लिए बाध्य करना।
05. स्थायी आदेश की व्याख्या।
06. जिस श्रम न्यायालय में प्रश्न या विवाद भेजा गया है, वह पक्षों को सुनवाई का अवसर देगा और फिर मुद्दे पर निर्णय करेगा। ऐसे न्यायालय का कार्य स्थायी आदेशों के आवेदन या व्याख्या से संबंधित प्रश्नों तक ही सीमित है। यह स्थायी आदेशों के तहत अधिकारों और दायित्वों के उल्लंघन के मुद्दे का समाधान नहीं कर सकता है।
राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम बनाम कृष्ण कांत (1995) - के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जो स्थायी आदेश प्रमाणित हैं, वे अधिनियम के तहत प्रत्यायोजित या अधीनस्थ कानून के तहत नहीं आते हैं। वे रोज़गार की ऐसी स्थितियाँ प्रदान करते हैं जो नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के लिए बाध्यकारी होती हैं।
वर्मा वी.के. बनाम हिंदुस्तान मशीन टूल्स लिमिटेड (1998) - के मामले में, यह माना गया कि ड्यूटी से अनुपस्थिति के कारण वेतन में कटौती के संबंध में स्थायी आदेश के तहत दिए गए प्रावधान को जुर्माना नहीं कहा जा सकता है। आगे यह देखा गया कि आदतन देर से उपस्थिति आदेश के तहत कदाचार है, और प्रबंधन वेतन में कटौती के अलावा अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है।
महत्वपूर्ण निर्णय -
मेसर्स लक्ष्मी प्रिसिजन स्क्रूज़ लिमिटेड बनाम राम भगत (2002)
मामले के तथ्य - इस मामले में, स्थायी आदेश के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी लगातार 10 दिनों तक अनुपस्थित रहता है, तो यह माना जाएगा कि उसने नौकरी छोड़ दी है। इस मामले में, एक कर्मचारी के 4 दिनों तक अनुपस्थित रहने पर अपीलकर्ता द्वारा नोटिस जारी किया गया था, जिसमें उसे 48 घंटे के भीतर काम पर शामिल होने के लिए कहा गया था। उनका प्रत्यावेदन अस्वीकार कर दिया गया और उन्हें कार्य से हटा दिया गया।
मामले में शामिल मुद्दे - क्या किसी श्रमिक को उसके रोजगार से हटाया जाना वैध और उचित है?
न्यायालय का निर्णय - उच्चतम न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता ने केवल 4 दिनों में कर्मचारी को नोटिस जारी करके मनमाने तरीके से काम किया, जबकि स्थायी आदेश में लगातार 10 दिनों की अनुपस्थिति का प्रावधान था। इसके अलावा, उन्हें अपना पक्ष रखने और अपनी अनुपस्थिति का कारण बताने का अवसर नहीं दिया गया। यह भी देखा गया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत स्थायी आदेशों की आवश्यकताओं में से एक हैं और इनका पालन किया जाना चाहिए। इस प्रकार अपीलकर्ता की अपील खारिज कर दी गई।
एन.डी.एम.सी. बनाम मोहम्मद शमीम (2003)
मामले के तथ्य - इस मामले में, एक व्यक्ति नई दिल्ली नगरपालिका समिति (NMDC) के बिजली विभाग में खलासी के पद पर कार्यरत था। कोई स्थायी आदेश नहीं थे, इसलिए उत्तरदाताओं ने अनुरोध किया कि मॉडल स्थायी आदेश उन पर लागू थे। याचिकाकर्ता के एक आदेश द्वारा बिना कोई कारण बताए उन्हें उनके कर्तव्यों और रोजगार से मुक्त कर दिया गया। परिणामस्वरूप, उन्होंने इस आधार पर आदेश को चुनौती दी कि इसने मॉडल स्थायी आदेश का उल्लंघन किया है।
मामले में शामिल मुद्दे - क्या आदेश ने मॉडल स्थायी आदेश का उल्लंघन किया है?
न्यायालय का निर्णय - इस मामले में औद्योगिक न्यायाधिकरण ने याचिकाकर्ता द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। यह देखा गया कि स्थायी कर्मचारी वह है जो स्थायी आधार पर कार्यरत है और उसने मॉडल स्थायी आदेश के अनुसार परिवीक्षा अवधि पूरी कर ली है। उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रतिवादी स्थायी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आता है। इसके अलावा, इसने कहा कि न्यायधिकरण के पास इस आवेदन पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। हालाँकि, न्यायालय ने माना कि प्रतिवादी की मृत्यु हो गई थी, और इसलिए यह माना गया कि मामले की सुनवाई के दौरान उसने जो वेतन प्राप्त किया था उसका 50% उसके परिवार और प्रतिनिधियों से वसूल नहीं किया जाएगा।
परिवहन प्रबंधक बनाम विलास शानू देवकर और अन्य (2003) -
मामले के तथ्य - इस मामले में, प्रतिवादियों को याचिकाकर्ताओं द्वारा ड्राइवर के रूप में नियुक्त किया गया था। कुछ कदाचार के कारण उन पर आरोप लगाया गया और उनके खिलाफ जांच की गई। इस दौरान याचिकाकर्ता ने उन्हें कोई काम नहीं दिया और उनके खिलाफ ‘नो ड्यूटी ऑर्डर’ जारी कर दिया गया। परिणामस्वरूप, उन्होंने इस आधार पर शिकायत दर्ज की कि उनके खिलाफ जारी किया गया आदेश काम से निलंबन के बराबर है और उन्हें निर्वाह भत्ता (सब्सिस्टेंस एलाउंस) दिया जाना चाहिए। औद्योगिक अदालत ने नियोक्ता को उन्हें निर्वाह भत्ता देने का आदेश दिया, जिसे उन्होंने चुनौती दी।
मामले में शामिल मुद्दे - औद्योगिक न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश सही है या नहीं।
न्यायालय का निर्णय - न्यायालय ने कहा कि यदि बदली श्रमिकों को नियोक्ता द्वारा काम नहीं दिया जाता है और उनके खिलाफ नो ड्यूटी का आदेश जारी किया जाता है, तो यह काम से निलंबन नहीं है। इस मामले में रोजगार का अनुबंध उसी दिन लागू होता है जिस दिन उसे रोजगार दिया जाता है, अन्य मामलों के विपरीत जहां कर्मचारी को नियोक्ता से हर दिन काम सुरक्षित करने का निहित अधिकार होता है। इस प्रकार, यह माना गया कि यदि बदल इस प्रकार, यह माना गया कि यदि बदली श्रमिक को काम नहीं दिया जाता है, तो निर्वाह भत्ते का कोई सवाल ही नहीं उठता।
विजया बैंक बनाम श्यामल कुमार लोध (2010)
मामले के तथ्य - इस मामले में, विजया बैंक के एक कर्मचारी ने जीवन निर्वाह भत्ते की गणना के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित श्रम न्यायालय के समक्ष एक आवेदन दायर किया। दूसरी ओर, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि श्रम न्यायालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है क्योंकि इसका गठन उपयुक्त सरकार, जो कि केंद्र सरकार है, द्वारा नहीं किया गया है। इस आपत्ति को श्रम न्यायालय ने खारिज कर दिया और उच्च न्यायालय ने इसे बरकरार रखा। परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गई।
मामले में शामिल मुद्दे - क्या अपील सुनवाई योग्य है और क्या अपीलकर्ता द्वारा उठाई गई आपत्ति वैध है?
न्यायालय का निर्णय - उच्चतम न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 की धारा 10-A (2) के अनुसार, एक श्रम न्यायालय के पास अपने भीतर स्थित प्रतिष्ठान में उत्पन्न होने वाले निर्वाह भत्ते से संबंधित किसी भी मुद्दे या विवाद पर विचार करने और निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र है। इसके अलावा, यह देखा गया कि यद्यपि कर्मचारी ने गलत प्रावधानों के साथ आवेदन दायर किया, लेकिन इससे अदालत के अधिकार क्षेत्र पर कोई असर नहीं पड़ता। अदालत के पास अभी भी मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है। इस प्रकार अपील खारिज कर दी गई।
निष्कर्ष - यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह अधिनियम कर्मचारियों और कामगारों के सामने आने वाली समस्याओं को रोकने और कम करने में सक्षम है। इसने काम के घंटों, अनुशासनात्मक कार्रवाइयों और रोजगार की अन्य शर्तों को विनियमित किया। इससे नियोक्ताओं की किसी भी नियम और शर्तों पर श्रमिकों को काम पर रखने की स्वतंत्रता कम हो गई। ये स्थितियाँ आमतौर पर कठोर होती थीं और श्रमिकों के पास जीविकोपार्जन के लिए इन्हें स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था। अहस्तक्षेप के सिद्धांत के कारण सरकार ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी। लेकिन कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के लागू होने के साथ ही विचारधारा में बदलाव आया है। इस संबंध में सरकार का लक्ष्य अब सामाजिक सुरक्षा उपायों की मदद से अच्छी कामकाजी परिस्थितियाँ और सभ्य जीवन स्तर सुरक्षित करना है।
हालाँकि, अधिनियम के लागू होने से स्थिति बदल गई है और रोजगार के नियमों और शर्तों में सुधार हुआ है। श्रमिक अब विनियमित वेतन और आराम के समय के साथ एक अनुकूल कार्य वातावरण का आनंद लेते हैं। उनके द्वारा हस्ताक्षरित रोजगार अनुबंध में वे सभी खंड और प्रावधान शामिल हैं जो उनके रोजगार के लिए शर्तें प्रदान करते हैं। यह कहा जा सकता है कि यह अधिनियम श्रमिक वर्ग के कल्याण के लिए बनाया गया सामाजिक कानून है। ऐसे अधिनियमों की मदद से, सरकार कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना चाहती है और नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित करने का कार्य करती है। ऐसी विचारधाराओं और उपायों के कारण, जो काम देता है वह अब मालिक नहीं है, और जो काम करता है वह नौकर नहीं है। नियोक्ता और कर्मचारी के बीच एक रिश्ता होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न -
प्रश्न 01. यह अधिनियम किन उद्योगों पर लागू होता है?
उत्तर - यह अधिनियम उन सभी उद्योगों पर लागू होता है जहां पिछले 12 महीनों में किसी भी दिन 100 या अधिक श्रमिक कार्यरत हैं या रहे हैं। ‘उपयुक्त सरकार’ के पास अधिनियम के प्रावधानों को 100 से कम श्रमिकों वाले किसी भी उद्योग तक विस्तारित करने की शक्ति है। सरकार भारत के राजपत्र (गैजेट) में एक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) के माध्यम से ऐसा करेगी और उस विशेष उद्योग को कम से कम दो महीने पहले नोटिस देगी। राज्यों के कानूनों के अनुसार, अधिनियम के प्रावधान मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित राज्यों में उद्योगों के कुछ वर्गों पर लागू नहीं होते हैं।
02. स्थायी आदेशों के विरुद्ध अपील करने के बारे में अधिनियम क्या कहता है?
उत्तर - कोई भी नियोक्ता, कर्मचारी, या ट्रेड यूनियन किसी स्थायी आदेश से व्यथित है, जिसे प्रमाणित अधिकारी द्वारा भी मंजूरी दी गई है, तो वह शिकायत के संबंध में ‘अपीलीय प्राधिकारी’ से अपील कर सकता है और आदेश को संशोधित करने का अनुरोध कर सकता है।
प्रश्न - 03 इस अधिनियम के तहत स्थायी आदेश कैसे प्रमाणित किये जाते हैं?
उत्तर - अधिनियम के तहत स्थायी आदेश को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए:
उद्योग पर अधिनियम लागू होने की तारीख से छह महीने के भीतर नियोक्ता द्वारा स्थायी आदेश के मसौदे की पांच प्रतियां प्रमाणन अधिकारी को प्रस्तुत की जानी चाहिए।
मसौदे में अनुसूची में उल्लिखित सभी मामलों से संबंधित प्रावधान शामिल होने चाहिए।
इसके साथ एक और विवरण संलग्न होना चाहिए जिसमें उस विशेष उद्योग में कार्यरत श्रमिकों का विवरण शामिल हो।
अधिनियम में यह भी कहा गया है कि जहां नियोक्ता समान औद्योगिक प्रतिष्ठान में हैं, वे स्थायी आदेश का संयुक्त मसौदा प्रस्तुत कर सकते हैं।
प्रश्न - 04 क्या नियोक्ता के लिए स्थायी आदेश प्रस्तुत करना अनिवार्य है?
उत्तर - हां, अधिनियम के तहत नियोक्ता अधिनियम की अनुसूची में दिए गए मामलों के संबंध में नियमों को परिभाषित करने वाले स्थायी आदेश का मसौदा तैयार करने और प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है। यदि कोई नियोक्ता ऐसा करने में विफल रहता है, तो उसे अधिनियम के तहत जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
प्रश्न 05 - कौन सा मजिस्ट्रेट अधिनियम की धारा 13 के तहत अपराध की सुनवाई कर सकता है?
उत्तर - मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या द्वितीय श्रेणी का न्यायिक मजिस्ट्रेट अधिनियम की धारा 13 के तहत अपराध से संबंधित किसी भी मामले की सुनवाई के लिए अधिकृत है।
प्रश्न 06 - कोई स्थायी आदेश कब वैध हो सकता है?
उत्तर - एक स्थायी आदेश तब वैध हो जाता है जब इसे प्रमाणित प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किया जाता है और यह उस तारीख से 30 दिनों की समाप्ति पर लागू होता है जिस दिन प्रमाणित स्थायी आदेश की प्रतियां नियोक्ता को भेजी गई थीं।
प्रश्न 07- अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दंड क्या हैं?
उत्तर - धारा 13 के तहत प्रावधान, इसके प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान करता है। जो नियोक्ता अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार स्थायी आदेश प्रस्तुत करने में विफल रहता है, उसे पांच हजार रुपये का जुर्माना देना होगा, और यदि विफलता जारी रहती है, तो उसे प्रति दिन दो सौ रुपये का भुगतान करना होगा। इसके अलावा, इसमें प्रावधान है कि जो नियोक्ता प्रमाणित स्थायी आदेश का पालन करने में विफल रहता है, वह सौ रुपये का जुर्माना देने के लिए उत्तरदायी होगा, और यदि वह ऐसा करना जारी रखता है, तो उसे हर दिन पच्चीस रुपये का भुगतान करना होगा।
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UNIT IV
अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन
(International Labour Organization - ILO)
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का संविधान
प्रस्तावना - चूंकि सार्वभौमिक और स्थायी शांति केवल तभी स्थापित की जा सकती है जब वह सामाजिक न्याय पर आधारित हो;
और चूंकि श्रम की ऐसी स्थितियां विद्यमान हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोगों के लिए अन्याय, कठिनाई और अभाव शामिल है, जिससे इतना बड़ा असंतोष उत्पन्न होता है कि विश्व की शांति और सद्भाव खतरे में पड़ जाते हैं; और उन स्थितियों में सुधार की तत्काल आवश्यकता है; उदाहरण के तौर पर -
1.कार्य के घंटों का विनियमन, जिसमें अधिकतम कार्य दिवस और सप्ताह का निर्धारण शामिल है
I श्रम आपूर्ति का विनियमन।
II बेरोजगारी की रोकथाम।
III पर्याप्त जीवन निर्वाह मजदूरी का प्रावधान।
IV. नियोजन (रोजगार) से उत्पन्न होने वाली बीमारी, रोग और चोट के विरुद्ध श्रमिक का संरक्षण -
A. बच्चों, युवाओं और महिलाओं का संरक्षण
B. वृद्धावस्था और चोट के लिए प्रावधान
C. अपने देश से बाहर अन्य देशों में कार्यरत श्रमिकों के हितों का संरक्षण
V. समान मूल्य के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक के सिद्धांत की मान्यता
VI. संघ बनाने की स्वतंत्रता के सिद्धांत की मान्यता
VII. व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा का आयोजन तथा अन्य उपाय।
संपादक की टिप्पणियाँ -
संशोधन - 1919 में स्थापित संविधान के मूल पाठ को 1922, 1945, 1946, 1953, 1962, 1972 और 1997 के संशोधनों द्वारा समय-समय पर संशोधित किया गया है।
VIII. लैंगिक समानता - कार्य की दुनिया में महिलाओं और पुरुषों के लिए समानता अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का एक मूल मूल्य है। 2011 में अपनाए गए संकल्प के अनुसार, संगठन के कानूनी ग्रंथों में लैंगिक समानता झलकनी चाहिए। यह स्पष्ट किया गया है कि संविधान और अन्य कानूनी दस्तावेजों में किसी एक लिंग का संदर्भ दूसरे लिंग के संदर्भ को भी अपने आप में सम्मिलित करता है।
चूंकि किसी भी राष्ट्र द्वारा श्रम की मानवीय स्थितियों को न अपनाना उन अन्य राष्ट्रों के मार्ग में बाधा है जो अपने देशों में स्थितियों में सुधार करना चाहते हैं।
उच्च संविदाकारी पक्ष न्याय और मानवता की भावनाओं से प्रेरित होकर तथा विश्व की स्थायी शांति सुनिश्चित करने की इच्छा से, और इस प्रस्तावना में निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के निम्नलिखित संविधान पर सहमत होते हैं -
अध्याय I. संगठन
अनुच्छेद 1 - स्थापना और सदस्यता -
I. इस संविधान की प्रस्तावना में और 10 मई 1944 को फिलाडेल्फिया में अपनाए गए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यों से संबंधित घोषणापत्र (जिसका पाठ इस संविधान के साथ संलग्न है) में निर्धारित उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए एतद्द्वारा एक स्थायी संगठन की स्थापना की जाती है।
II. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सदस्य वे देश होंगे जो 1 नवंबर 1945 को संगठन के सदस्य थे और ऐसे अन्य देश जो इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 3 और 4 के प्रावधानों के अनुसरण में सदस्य बन सकते हैं।
III. संयुक्त राष्ट्र का कोई भी मूल सदस्य और संयुक्त राष्ट्र का कोई भी ऐसा देश जिसे चार्टर के प्रावधानों के अनुसार महासभा के निर्णय द्वारा सदस्यता दी गई है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के संविधान के दायित्वों की औपचारिक स्वीकृति भेजकर इस संगठन का सदस्य बन सकता है।
IV. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का सामान्य सम्मेलन सत्र में उपस्थित प्रतिनिधियों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा, जिसमें उपस्थित और मतदान करने वाले प्रतिनिधियों का दो-तिहाई बहुमत शामिल हो, नए सदस्यों को प्रवेश दे सकता है। ऐसा प्रवेश तब प्रभावी होगा जब नए सदस्य की सरकार अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को संगठन के संविधान के दायित्वों की अपनी औपचारिक स्वीकृति संप्रेषित कर देगी।
V. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का कोई भी सदस्य संगठन से तब तक अलग नहीं हो सकता, जब तक कि वह अपनी इस मंशा की सूचना अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को न दे दे। ऐसी सूचना महानिदेशक द्वारा प्राप्त होने की तिथि के दो वर्ष बाद प्रभावी होगी, बशर्ते कि उस समय तक सदस्य ने अपनी सदस्यता से उत्पन्न होने वाले सभी वित्तीय दायित्वों को पूरा कर लिया हो। जब किसी सदस्य ने किसी अंतर्राष्ट्रीय श्रम अभिसमय (सम्मेलन) की पुष्टि की हो, तो ऐसी वापसी उस अभिसमय के तहत या उससे संबंधित सभी दायित्वों की निरंतर वैधता को उस अवधि के लिए प्रभावित नहीं करेगी जो अभिसमय में प्रदान की गई है।
A. यदि कोई देश संगठन का सदस्य नहीं रह जाता है, तो उसे पुनः सदस्यता देने की प्रक्रिया इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 3 या पैराग्राफ 4 के प्रावधानों (जैसा भी मामला हो) द्वारा शासित होगी।
अनुच्छेद 2 - अंग - स्थायी में संगठन निम्नलिखित शामिल होंगे -
(क) सदस्यों के प्रतिनिधियों का एक सामान्य सम्मेलन (General Conference);
(ख) एक शासी निकाय (Governing Body) जिसका गठन अनुच्छेद 7 में वर्णित अनुसार होगा, और
(ग) शासी निकाय द्वारा नियंत्रित एक अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय।
अनुच्छेद - 3 - सम्मेलन -
I. सदस्यों के प्रतिनिधियों के सामान्य सम्मेलन की बैठकें समय-समय पर आवश्यकतानुसार आयोजित की जाएंगी, और वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य होंगी। यह प्रत्येक सदस्य के चार प्रतिनिधियों से मिलकर बनेगा, जिनमें से दो सरकारी प्रतिनिधि होंगे और अन्य दो प्रतिनिधि क्रमशः प्रत्येक सदस्य के नियोक्ताओं (Employers) और श्रमिकों (Workpeople) का प्रतिनिधित्व करेंगे।
II. प्रत्येक प्रतिनिधि के साथ सलाहकार हो सकते हैं, जिनकी संख्या बैठक के एजेंडे की प्रत्येक मद के लिए दो से अधिक नहीं होगी। जब सम्मेलन द्वारा विशेष रूप से महिलाओं को प्रभावित करने वाले प्रश्नों पर विचार किया जाना हो, तो सलाहकारों में से कम से कम एक महिला होनी चाहिए।
III. प्रत्येक सदस्य, जो गैर-महानगरीय क्षेत्रों के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए जिम्मेदार है, अपने प्रत्येक प्रतिनिधि के लिए अतिरिक्त सलाहकार नियुक्त कर सकता है।
(क) ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें उस सदस्य द्वारा किसी ऐसे क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में नामित किया गया हो, उन मामलों के संबंध में जो उस क्षेत्र की स्वशासी शक्तियों (Self-governing powers) के भीतर आते हैं, और
(ख) ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें गैर-स्वशासी क्षेत्रों से संबंधित मामलों में अपने प्रतिनिधियों को सलाह देने के लिए नामित किया गया हो।
∆ दो या दो से अधिक सदस्यों के संयुक्त अधिकार वाले क्षेत्र के मामले में, ऐसे सदस्यों के प्रतिनिधियों को सलाह देने के लिए व्यक्तियों को नामित किया जा सकता है।
∆ सदस्य देश इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं कि वे गैर-सरकारी प्रतिनिधियों और सलाहकारों का चयन उन औद्योगिक संगठनों (यदि ऐसे संगठन अस्तित्व में हैं) की सहमति से करेंगे, जो संबंधित देशों में नियोक्ताओं या श्रमिकों के सबसे अधिक प्रतिनिधि संगठन हैं।
∆ सलाहकार तब तक नहीं बोलेंगे जब तक कि उस प्रतिनिधि द्वारा अनुरोध न किया जाए जिसके साथ वे आए हैं और सम्मेलन के अध्यक्ष द्वारा विशेष अनुमति न दी जाए; साथ ही सलाहकारों को मतदान करने का अधिकार नहीं होगा।
∆ कोई प्रतिनिधि, अध्यक्ष को संबोधित लिखित सूचना द्वारा, अपने सलाहकारों में से किसी एक को अपने उप-प्रतिनिधि (Deputy) के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकता है, और वह सलाहकार, उस रूप में कार्य करते समय, बोलने और मतदान करने का हकदार होगा।
∆ प्रतिनिधियों और उनके सलाहकारों के नाम प्रत्येक सदस्य देश की सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय को भेजे जाएंगे।
∆ प्रतिनिधियों और उनके सलाहकारों के प्रत्यय-पत्रों (Credentials) की जांच सम्मेलन द्वारा की जाएगी, जो उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों के दो-तिहाई बहुमत से किसी भी ऐसे प्रतिनिधि या सलाहकार को प्रवेश देने से इनकार कर सकता है, जिसे वह इस अनुच्छेद के अनुसार नामित नहीं मानता है।
अनुच्छेद 4 - मतदान के अधिकार -
I. प्रत्येक प्रतिनिधि सम्मेलन द्वारा विचार किए जाने वाले सभी मामलों पर व्यक्तिगत रूप से मतदान करने का हकदार होगा।
II. यदि कोई सदस्य उन गैर-सरकारी प्रतिनिधियों में से किसी एक को नामित करने में विफल रहता है जिसे नामित करने का उसे अधिकार है, तो दूसरे गैर-सरकारी प्रतिनिधि को सम्मेलन में बैठने और बोलने की अनुमति तो दी जाएगी, लेकिन मतदान करने की नहीं।
IV. यदि अनुच्छेद 3 के अनुसार सम्मेलन किसी सदस्य के प्रतिनिधि को प्रवेश देने से इनकार कर देता है, तो इस अनुच्छेद के प्रावधान उसी प्रकार लागू होंगे मानो उस प्रतिनिधि को नामित ही न किया गया हो।
अनुच्छेद 5 - सम्मेलन की बैठकों का स्थान - सम्मेलन की बैठकें, सम्मेलन द्वारा पिछली बैठक में लिए गए किसी भी निर्णय के अधीन रहते हुए, ऐसे स्थान पर आयोजित की जाएंगी जो शासी निकाय (Governing Body) द्वारा तय किया जाए।
अनुच्छेद 6 अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय का मुख्यालय - अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के मुख्यालय में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का निर्णय सम्मेलन द्वारा, उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों के दो-तिहाई बहुमत से लिया जाएगा।
अनुच्छेद 7 - शासी निकाय - शासी निकाय में छप्पन (56) व्यक्ति शामिल होंगे:
(क) अट्ठाइस (28) सरकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले।
(ख) चौदह (14) नियोक्ताओं (Employers) का प्रतिनिधित्व करने वाले; और
(ग) चौदह (14) श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले।
∆. सरकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अट्ठाइस व्यक्तियों में से, दस (10) की नियुक्ति मुख्य औद्योगिक महत्व वाले सदस्यों द्वारा की जाएगी, और अठारह (18) की नियुक्ति उन सदस्यों द्वारा की जाएगी जिन्हें सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा (उपरोक्त दस सदस्यों के प्रतिनिधियों को छोड़कर) इस उद्देश्य के लिए चुना गया हो।
∆. शासी निकाय आवश्यकतानुसार यह निर्धारित करेगा कि संगठन के मुख्य औद्योगिक महत्व वाले सदस्य कौन से हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाएगा कि मुख्य औद्योगिक महत्व वाले सदस्यों के चयन से संबंधित सभी प्रश्नों पर शासी निकाय द्वारा निर्णय लिए जाने से पहले एक निष्पक्ष समिति द्वारा विचार किया जाए। शासी निकाय की इस घोषणा के विरुद्ध किसी सदस्य द्वारा की गई कोई भी अपील कि कौन से सदस्य मुख्य औद्योगिक महत्व वाले सदस्य हैं, उसका निर्णय सम्मेलन द्वारा किया जाएगा, लेकिन सम्मेलन में की गई ऐसी अपील शासी निकाय की घोषणा के लागू होने को तब तक स्थगित नहीं करेगी जब तक कि सम्मेलन उस अपील पर अपना निर्णय न दे दे।
∆. नियोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों और श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों का चुनाव सम्मेलन में क्रमशः नियोक्ता प्रतिनिधियों और श्रमिक प्रतिनिधियों द्वारा किया जाएगा।
∆. शासी निकाय के कार्यालय की अवधि तीन वर्ष होगी। यदि किसी कारणवश इस अवधि की समाप्ति पर शासी निकाय के चुनाव नहीं हो पाते हैं, तो शासी निकाय तब तक पद पर बना रहेगा जब तक कि चुनाव नहीं हो जाते।
∆. रिक्तियों को भरने की पद्धति, स्थानापन्न (Substitutes) नियुक्त करने और अन्य समान प्रश्नों का निर्णय शासी निकाय द्वारा सम्मेलन के अनुमोदन (Approval) के अधीन किया जा सकता है।
∆. शासी निकाय समय-समय पर अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष और दो उपाध्यक्ष चुनेगा, जिनमें से एक सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाला, एक नियोक्ताओं का और एक श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति होगा।
∆. शासी निकाय अपनी प्रक्रिया का स्वयं नियमन करेगा और अपनी बैठकों का समय स्वयं निर्धारित करेगा। यदि शासी निकाय के कम से कम सोलह प्रतिनिधियों द्वारा इस आशय का लिखित अनुरोध किया जाता है, तो एक विशेष बैठक आयोजित की जाएगी।
अनुच्छेद 8 - महानिदेशक -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय का एक महानिदेशक होगा, जिसकी नियुक्ति शासी निकाय द्वारा की जाएगी। वह शासी निकाय के निर्देशों के अधीन रहते हुए, अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के कुशल संचालन और उसे सौंपे गए अन्य कर्तव्यों के लिए उत्तरदायी होगा।
II. महानिदेशक या उसका उप-महानिदेशक शासी निकाय की सभी बैठकों में उपस्थित रहेगा।
अनुच्छेद 9 - कर्मचारी (Staff) -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के कर्मचारियों की नियुक्ति महानिदेशक द्वारा शासी निकाय द्वारा अनुमोदित नियमों के तहत की जाएगी।
II. कार्यालय के कार्य की कुशलता का उचित ध्यान रखते हुए जहाँ तक संभव हो, महानिदेशक विभिन्न राष्ट्रीयताओं के व्यक्तियों का चयन करेगा।
III. इन व्यक्तियों में एक निश्चित संख्या महिलाओं की होगी।
IV. महानिदेशक और कर्मचारियों की जिम्मेदारियाँ पूर्णतः अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप की होंगी। अपने कर्तव्यों के पालन में, महानिदेशक और कर्मचारी किसी भी सरकार या संगठन के बाहर के किसी अन्य प्राधिकारी से निर्देश नहीं मांगेंगे और न ही प्राप्त करेंगे। वे किसी भी ऐसे कार्य से दूर रहेंगे जो केवल संगठन के प्रति उत्तरदायी अंतर्राष्ट्रीय अधिकारियों के रूप में उनकी स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता हो।
V. संगठन का प्रत्येक सदस्य महानिदेशक और कर्मचारियों की जिम्मेदारियों के विशेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप का सम्मान करने और उनके उत्तरदायित्वों के निर्वहन में उन्हें प्रभावित न करने का वचन देता है।
अनुच्छेद 10 - अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के कार्य -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के कार्यों में औद्योगिक जीवन और श्रम की स्थितियों के अंतर्राष्ट्रीय समायोजन से संबंधित सभी विषयों पर सूचनाओं का संग्रह और वितरण शामिल होगा, और विशेष रूप से उन विषयों की जांच करना जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय अभिसमयों (Conventions) के समापन के उद्देश्य से सम्मेलन के समक्ष लाने का प्रस्ताव है, और ऐसी विशेष जांच का संचालन करना जिसका आदेश सम्मेलन या शासी निकाय द्वारा दिया जाए।
II. शासी निकाय द्वारा दिए गए निर्देशों के अधीन, कार्यालय निम्नलिखित कार्य करेगा -
(क) सम्मेलन की बैठकों के एजेंडे की विभिन्न मदों पर दस्तावेज़ तैयार करना;
(ख) सरकारों के अनुरोध पर, उनके देशों में श्रम स्थितियों में सुधार के लिए कानूनों और नियमों को बनाने के संबंध में अपनी शक्ति के भीतर सभी उचित सहायता प्रदान करना, सम्मेलन के निर्णयों के आधार पर प्रशासनिक प्रथाओं और निरीक्षण प्रणालियों में सुधार करना -
(ग) अभिसमयों (Conventions) के प्रभावी अनुपालन के संबंध में इस संविधान के प्रावधानों द्वारा अपेक्षित कर्तव्यों का पालन करना।
(घ) उन भाषाओं में, जिन्हें शासी निकाय वांछनीय समझे, अंतर्राष्ट्रीय हित के उद्योग और रोजगार की समस्याओं से संबंधित प्रकाशनों का संपादन और जारी करना।
III. सामान्यतः, इसके पास ऐसे अन्य अधिकार और कर्तव्य होंगे जो सम्मेलन या शासी निकाय द्वारा इसे सौंपे जाएं।
अनुच्छेद 1 - सरकारों के साथ संबंध -
सदस्यों में से किसी भी देश के सरकारी विभाग, जो उद्योग और रोजगार के प्रश्नों से संबंधित हैं, अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक के साथ सीधे संवाद कर सकते हैं। यह संवाद शासी निकाय में उनकी सरकार के प्रतिनिधि के माध्यम से होगा, या ऐसे प्रतिनिधि के अभाव में, सरकार द्वारा इस उद्देश्य के लिए नामित किसी अन्य योग्य अधिकारी के माध्यम से किया जा सकेगा।
अनुच्छेद 12 - अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ संबंध -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन इस संविधान की शर्तों के भीतर किसी भी ऐसे सामान्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन के साथ सहयोग करेगा जिसे विशेष उत्तरदायित्व वाले सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की गतिविधियों के समन्वय का कार्य सौंपा गया है, तथा संबंधित क्षेत्रों में विशेष उत्तरदायित्व रखने वाले अन्य सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ भी सहयोग करेगा।
II. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों के लिए बिना मतदान के इसकी चर्चाओं में भाग लेने हेतु उचित व्यवस्था कर सकता है।
III. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन नियोक्ताओं, श्रमिकों, कृषकों और सहकारी समितियों के अंतर्राष्ट्रीय संगठनों सहित मान्यता प्राप्त गैर-सरकारी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ परामर्श करने के लिए ऐसी उपयुक्त व्यवस्था कर सकता है जिसे वह वांछनीय समझे।
अनुच्छेद 13 - वित्तीय और बजटीय व्यवस्थाएं -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के साथ ऐसी वित्तीय और बजटीय व्यवस्थाएं कर सकता है जो उपयुक्त प्रतीत हों।
II. ऐसी व्यवस्थाओं के संपन्न होने तक, या यदि किसी भी समय ऐसी कोई व्यवस्था लागू न हो -
(क) प्रत्येक सदस्य अपने प्रतिनिधियों और उनके सलाहकारों, तथा सम्मेलन या शासी निकाय (जैसा भी मामला हो) की बैठकों में भाग लेने वाले अपने प्रतिनिधियों के यात्रा और निर्वाह व्यय (subsistence expenses) का भुगतान स्वयं करेगा।
(ख) अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के तथा सम्मेलन या शासी निकाय की बैठकों के अन्य सभी खर्चों का भुगतान अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सामान्य कोष से किया जाएगा।
(ग) अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बजट के अनुमोदन (Approval), आवंटन और संग्रह की व्यवस्था सम्मेलन द्वारा उपस्थित प्रतिनिधियों के दो-तिहाई बहुमत से निर्धारित की जाएगी; और यह व्यवस्था सरकारी प्रतिनिधियों की एक समिति द्वारा बजट के अनुमोदन और संगठन के सदस्यों के बीच खर्चों के आवंटन के लिए प्रावधान करेगी।
III. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के खर्चों का वहन सदस्यों द्वारा इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 1 या पैराग्राफ 2(ग) के आधार पर लागू व्यवस्थाओं के अनुसार किया जाएगा।
IV. संगठन का कोई भी सदस्य, जिसका संगठन को दिए जाने वाले वित्तीय अंशदान (Contribution) का भुगतान बकाया है, उसे सम्मेलन में, शासी निकाय में, किसी भी समिति में, या शासी निकाय के सदस्यों के चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं होगा, यदि उसकी बकाया राशि पिछले दो पूर्ण वर्षों के देय अंशदान की राशि के बराबर या उससे अधिक है।
परंतु, सम्मेलन उपस्थित प्रतिनिधियों के दो-तिहाई बहुमत से ऐसे सदस्य को मतदान करने की अनुमति दे सकता है, यदि वह इस बात से संतुष्ट हो कि भुगतान करने में विफलता सदस्य के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण है।
V. अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय का महानिदेशक, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की निधियों (Funds) के उचित व्यय के लिए शासी निकाय के प्रति उत्तरदायी होगा।
अध्याय II. प्रक्रिया
अनुच्छेद 14 - एजेंडा और सम्मेलन की तैयारी -
I. सम्मेलन की सभी बैठकों का एजेंडा शासी निकाय द्वारा तय किया जाएगा, जो एजेंडा के संबंध में किसी भी सदस्य देश की सरकार, या अनुच्छेद 3 के उद्देश्य के लिए मान्यता प्राप्त किसी भी प्रतिनिधि संगठन, या किसी भी सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय संगठन द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करेगा।
II. शासी निकाय यह सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाएगा कि सम्मेलन द्वारा किसी अभिसमय या सिफारिश को अपनाने से पहले, प्रारंभिक सम्मेलन या अन्य माध्यमों से गहन तकनीकी तैयारी और मुख्य रूप से संबंधित सदस्यों के साथ पर्याप्त परामर्श किया जाए।
अनुच्छेद 15 - सम्मेलन के लिए एजेंडा और रिपोर्ट का प्रेषण -
I. महानिदेशक सम्मेलन के महासचिव के रूप में कार्य करेगा, और वह एजेंडा को इस प्रकार प्रेषित करेगा कि वह सम्मेलन की बैठक से चार महीने पहले सदस्यों तक और उनके माध्यम से नियुक्त होने पर गैर-सरकारी प्रतिनिधियों तक पहुँच जाए।
II. एजेंडा की प्रत्येक मद पर रिपोर्ट इस प्रकार भेजी जाएगी कि वे सम्मेलन की बैठक से पहले पर्याप्त विचार-विमर्श के लिए समय पर सदस्यों तक पहुँच जाएं। शासी निकाय इस प्रावधान के क्रियान्वयन के लिए नियम बनाएगा।
अनुच्छेद 16 - एजेंडा पर आपत्तियां -
I. सदस्यों में से कोई भी सरकार एजेंडा में किसी भी मद या मदों को शामिल किए जाने पर औपचारिक रूप से आपत्ति कर सकती है। ऐसी आपत्ति के आधार महानिदेशक को संबोधित करते हुए विवरण में स्पष्ट किए जाएंगे, जो इसे संगठन के सभी सदस्यों को प्रसारित करेगा।
II. वे मदें जिनके विरुद्ध ऐसी आपत्ति की गई है, उन्हें एजेंडा से बाहर नहीं किया जाएगा, यदि सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों का दो-तिहाई बहुमत उन पर विचार करने के पक्ष में हो।
III. यदि सम्मेलन (पिछले पैराग्राफ के अलावा अन्य तरीके से) उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों के दो-तिहाई बहुमत से यह निर्णय लेता है कि किसी विषय पर सम्मेलन द्वारा विचार किया जाना चाहिए, तो उस विषय को अगली बैठक के एजेंडा में शामिल किया जाएगा।
अनुच्छेद 17 - सम्मेलन के अधिकारी, प्रक्रिया और समितियाँ -
I. सम्मेलन एक अध्यक्ष और तीन उपाध्यक्षों का चुनाव करेगा। उपाध्यक्षों में से एक सरकारी प्रतिनिधि, एक नियोक्ता प्रतिनिधि और एक श्रमिक प्रतिनिधि होगा। सम्मेलन अपनी प्रक्रिया का स्वयं नियमन करेगा और किसी भी मामले पर विचार करने तथा रिपोर्ट देने के लिए समितियों की नियुक्ति कर सकता है।
II. इस संविधान में या सम्मेलन को शक्तियाँ प्रदान करने वाले किसी अभिसमय या अन्य दस्तावेज़ की शर्तों में, या अनुच्छेद 13 के आधार पर अपनाई गई वित्तीय और बजटीय व्यवस्थाओं में स्पष्ट रूप से दिए गए प्रावधानों को छोड़कर, अन्य सभी मामलों का निर्णय उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों के साधारण बहुमत से किया जाएगा।
III. मतदान तब तक अमान्य (Void) माना जाएगा जब तक कि डाले गए कुल मतों की संख्या सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों की संख्या के आधे के बराबर न हो।
अनुच्छेद 18 - तकनीकी विशेषज्ञ -
सम्मेलन अपने द्वारा नियुक्त किसी भी समिति में तकनीकी विशेषज्ञों को जोड़ सकता है, लेकिन उन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं होगा।
अनुच्छेद 19 - अभिसमय और सिफारिशें -
I. जब सम्मेलन एजेंडा की किसी मद के संबंध में प्रस्तावों को अपनाने का निर्णय ले लेता है, तो यह सम्मेलन पर निर्भर करेगा कि वह यह निर्धारित करे कि इन प्रस्तावों को निम्नलिखित में से किसका रूप लेना चाहिए -
(क) एक अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय का, या
(ख) एक सिफारिश का, जो ऐसी परिस्थितियों के लिए हो जहाँ संबंधित विषय या उसके किसी पहलू को उस समय अभिसमय के लिए उपयुक्त या उचित नहीं माना जाता है।
II. दोनों ही मामलों में, सम्मेलन द्वारा अभिसमय या सिफारिश (जैसा भी मामला हो) को अपनाने के लिए अंतिम मतदान में उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होगा।
III. सामान्य अनुप्रयोग वाले किसी भी अभिसमय या सिफारिश को तैयार करते समय, सम्मेलन उन देशों का उचित ध्यान रखेगा जिनमें जलवायु परिस्थितियों, औद्योगिक संगठन के अपूर्ण विकास, या अन्य विशेष परिस्थितियों के कारण औद्योगिक स्थितियाँ मूल रूप से भिन्न हैं, और सम्मेलन उन संशोधनों का सुझाव देगा (यदि कोई हो), जिन्हें वह ऐसे देशों की स्थिति के लिए आवश्यक मानता है।
IV. अभिसमय या सिफारिश की दो प्रतियां सम्मेलन के अध्यक्ष और महानिदेशक के हस्ताक्षरों द्वारा प्रमाणित की जाएंगी। इन प्रतियों में से एक अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के अभिलेखागार (Archives) में और दूसरी संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के पास जमा की जाएगी। महानिदेशक अभिसमय या सिफारिश की एक प्रमाणित प्रति प्रत्येक सदस्य को भेजेगा।
V. अभिसमय के मामले में -
(क) अभिसमय को अनुसमर्थन (Ratification) के लिए सभी सदस्यों को भेजा जाएगा।
(ख) प्रत्येक सदस्य यह वचन देता है कि वह सम्मेलन के सत्र की समाप्ति से अधिकतम एक वर्ष की अवधि के भीतर, या यदि असाधारण परिस्थितियों के कारण एक वर्ष के भीतर ऐसा करना असंभव हो, तो जल्द से जल्द व्यावहारिक क्षण में और किसी भी स्थिति में सत्र की समाप्ति से 18 महीने के बाद नहीं, उस प्राधिकारी या प्राधिकारियों के समक्ष अभिसमय को प्रस्तुत करेगा जिनके अधिकार क्षेत्र में वह विषय आता है, ताकि कानून बनाया जा सके या अन्य कार्रवाई की जा सके।
(ग) सदस्य देश अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को इस अनुच्छेद के अनुसार अभिसमय को उक्त सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए किए गए उपायों की सूचना देंगे, जिसमें उन प्राधिकारियों का विवरण शामिल होगा जिन्हें सक्षम माना गया है, और उनके द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण भी दिया जाएगा।
(घ) यदि सदस्य देश उस प्राधिकारी या प्राधिकारियों की सहमति प्राप्त कर लेता है जिनके कार्यक्षेत्र में वह विषय आता है, तो वह महानिदेशक को अभिसमय के औपचारिक अनुसमर्थन की सूचना देगा और ऐसे अभिसमय के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करेगा।
(ङ) यदि सदस्य देश को उस प्राधिकारी या प्राधिकारियों की सहमति प्राप्त नहीं होती है जिनके कार्यक्षेत्र में वह विषय आता है, तो उस सदस्य पर कोई और दायित्व नहीं होगा; सिवाय इसके कि वह शासी निकाय द्वारा अनुरोध किए जाने पर उचित अंतराल पर महानिदेशक को अभिसमय में निपटाए गए मामलों के संबंध में अपने कानून और व्यवहार की स्थिति की रिपोर्ट देगा। इसमें यह दर्शाया जाएगा कि कानून, प्रशासनिक कार्रवाई, सामूहिक समझौते या अन्य माध्यमों से अभिसमय के किन प्रावधानों को लागू किया गया है या लागू करने का प्रस्ताव है, और उन कठिनाइयों का विवरण भी देगा जो ऐसे अभिसमय के अनुसमर्थन को रोकती हैं या उसमें देरी करती हैं।
VI. सिफारिश के मामले में -
(क) सिफारिश को सभी सदस्यों को उनके विचारार्थ भेजा जाएगा ताकि उसे राष्ट्रीय कानून या अन्य माध्यमों से प्रभावी बनाया जा सके।
(ख) प्रत्येक सदस्य वचन देता है कि वह सम्मेलन के सत्र की समाप्ति से अधिकतम एक वर्ष की अवधि के भीतर, या असाधारण परिस्थितियों के कारण ऐसा संभव न होने पर जल्द से जल्द और किसी भी स्थिति में 18 महीने के भीतर, सिफारिश को उस सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकारियों के समक्ष कानून बनाने या अन्य कार्रवाई के लिए प्रस्तुत करेगा।
(ग) सदस्य देश अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को इस अनुच्छेद के अनुसार सिफारिश को उक्त सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए किए गए उपायों की सूचना देंगे, जिसमें सक्षम माने गए प्राधिकारियों और उनके द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण होगा, और
(घ) सिफारिश (Recommendation) को उक्त सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने के अलावा, सदस्यों पर कोई अन्य दायित्व नहीं होगा; सिवाय इसके कि वे शासी निकाय के अनुरोध पर उचित अंतराल पर महानिदेशक को सिफारिश में दिए गए विषयों के संबंध में अपने देश के कानून और व्यवहार की स्थिति की रिपोर्ट देंगे। इसमें यह दर्शाया जाएगा कि सिफारिश के प्रावधानों को किस सीमा तक प्रभावी बनाया गया है या बनाने का प्रस्ताव है, और उन प्रावधानों में ऐसे संशोधनों का विवरण भी दिया जाएगा जिन्हें अपनाते या लागू करते समय आवश्यक पाया गया है।
VII. संघीय राज्य के मामले में निम्नलिखित प्रावधान लागू होंगे -
(क) उन अभिसमयों और सिफारिशों के संबंध में जिन्हें संघीय सरकार अपनी संवैधानिक प्रणाली के तहत संघीय कार्रवाई के लिए उपयुक्त मानती है, संघीय राज्य के दायित्व वही होंगे जो उन सदस्यों के हैं जो संघीय राज्य नहीं हैं।
(ख) उन अभिसमयों और सिफारिशों के संबंध में जिन्हें संघीय सरकार अपनी संवैधानिक प्रणाली के तहत, पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से, संघीय कार्रवाई के बजाय घटक राज्यों, प्रांतों या कैंटनों की कार्रवाई के लिए उपयुक्त मानती है, वहां संघीय सरकार -
(A) अपने संविधान और संबंधित राज्यों, प्रांतों या कैंटनों के संविधानों के अनुसार, ऐसे अभिसमयों और सिफारिशों को सम्मेलन के सत्र की समाप्ति से 18 महीने के भीतर कानून बनाने या अन्य कार्रवाई के लिए उचित संघीय, राज्य, प्रांतीय या कैंटोनल प्राधिकारियों के पास भेजने की प्रभावी व्यवस्था करेगी।
(B) संबंधित राज्य, प्रांतीय या कैंटोनल सरकारों की सहमति के अधीन, संघीय और राज्य/प्रांतीय प्राधिकारियों के बीच सावधिक परामर्श की व्यवस्था करेगी, ताकि ऐसे अभिसमयों और सिफारिशों के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए संघीय राज्य के भीतर समन्वित कार्रवाई को बढ़ावा दिया जा सके।
(C) अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को इन अभिसमयों और सिफारिशों को उचित संघीय, राज्य, प्रांतीय या कैंटोनल प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए इस अनुच्छेद के अनुसार किए गए उपायों की सूचना देगी, जिसमें उन प्राधिकारियों का विवरण होगा जिन्हें उचित माना गया है और उनके द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण दिया गया है।
(D) ऐसे प्रत्येक अभिसमय के संबंध में जिसे उसने अनुसमर्थित नहीं किया है, शासी निकाय के अनुरोध पर उचित अंतराल पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को रिपोर्ट देगी, जिसमें अभिसमय के संबंध में संघ और उसके घटक राज्यों, प्रांतों या कैंटनों के कानून और व्यवहार की स्थिति बताई जाएगी। इसमें यह भी दर्शाया जाएगा कि कानून, प्रशासनिक कार्रवाई, सामूहिक समझौते या अन्य माध्यमों से अभिसमय के प्रावधानों को किस सीमा तक प्रभावी बनाया गया है या बनाने का प्रस्ताव है।
(E) ऐसी प्रत्येक सिफारिश के संबंध में, शासी निकाय के अनुरोध पर उचित अंतराल पर महानिदेशक को रिपोर्ट देगी, जिसमें सिफारिश के संबंध में संघ और उसके घटक राज्यों, प्रांतों या कैंटनों के कानून और व्यवहार की स्थिति बताई जाएगी। इसमें यह दर्शाया जाएगा कि सिफारिश के प्रावधानों को किस सीमा तक प्रभावी बनाया गया है या बनाने का प्रस्ताव है, और उन्हें अपनाने या लागू करने में आवश्यक पाए गए संशोधनों का विवरण भी दिया जाएगा।
∆. किसी भी स्थिति में, सम्मेलन द्वारा किसी अभिसमय या सिफारिश को अपनाया जाना, या किसी सदस्य द्वारा किसी अभिसमय का अनुसमर्थन करना, किसी ऐसे कानून, अधिनिर्णय (Award), प्रथा या समझौते को प्रभावित नहीं करेगा जो संबंधित श्रमिकों को अभिसमय या सिफारिश में प्रदान की गई शर्तों की तुलना में अधिक अनुकूल शर्तें सुनिश्चित करता है।
∆. शासी निकाय के प्रस्ताव पर कार्रवाई करते हुए, सम्मेलन उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों के दो-तिहाई बहुमत से, इस अनुच्छेद के प्रावधानों के अनुसार अपनाए गए किसी भी अभिसमय को निरस्त कर सकता है, यदि ऐसा प्रतीत होता है कि उस अभिसमय ने अपना उद्देश्य खो दिया है या वह अब संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में उपयोगी योगदान नहीं दे रहा है।
अनुच्छेद 20 - संयुक्त राष्ट्र के पास पंजीकरण - इस प्रकार अनुसमर्थित (Ratify) किसी भी अभिसमय की सूचना अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक द्वारा संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को दी जाएगी। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 102 के प्रावधानों के अनुसार पंजीकरण के लिए भेजी जाएगी, लेकिन यह केवल उन्हीं सदस्यों पर बाध्यकारी होगी जो इसका अनुसमर्थन (Ratification) करते हैं।
अनुच्छेद 21 सम्मेलन द्वारा नहीं अपनाए गए अभिसमय -
I. यदि सम्मेलन के समक्ष अंतिम विचार के लिए आने वाला कोई भी अभिसमय, उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा डाले गए मतों का दो-तिहाई समर्थन प्राप्त करने में विफल रहता है, तो भी संगठन के किन्हीं भी सदस्यों को आपस में ऐसे अभिसमय पर सहमत होने का अधिकार होगा।
II. इस प्रकार सहमत किसी भी अभिसमय को संबंधित सरकारों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 102 के प्रावधानों के अनुसार पंजीकरण के लिए प्रेषित किया जाएगा।
अनुच्छेद 22 अनुसमर्थित अभिसमयों पर वार्षिक रिपोर्ट -
प्रत्येक सदस्य उन अभिसमयों के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए किए गए उपायों पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय को एक वार्षिक रिपोर्ट देने के लिए सहमत है, जिनका वह पक्षकार है। ये रिपोर्टें ऐसे प्रपत्र में तैयार की जाएंगी और उनमें ऐसी जानकारियां शामिल होंगी जैसा कि शासी निकाय अनुरोध करे।
अनुच्छेद 23 - रिपोर्टों की जांच और संप्रेषण -
I. महानिदेशक, अनुच्छेद 19 और 22 के अनुसरण में सदस्यों द्वारा उसे भेजी गई जानकारी और रिपोर्टों का एक सारांश सम्मेलन की अगली बैठक के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
II. प्रत्येक सदस्य अनुच्छेद 19 और 22 के अनुसरण में महानिदेशक को भेजी गई जानकारी और रिपोर्टों की प्रतियां उन प्रतिनिधि संगठनों (नियोक्ताओं और श्रमिकों के संगठन) को भेजेगा जो अनुच्छेद 3 के प्रयोजन के लिए मान्यता प्राप्त हैं। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 102 के प्रावधानों के अनुसार पंजीकरण के लिए भेजी जाएगी, लेकिन यह केवल उन्हीं सदस्यों पर बाध्यकारी होगी जो इसका अनुसमर्थन करते हैं।
अनुच्छेद 24 अभिसमयों के अननुपालन के संबंध में प्रतिवेदन -
यदि नियोक्ताओं या श्रमिकों के किसी औद्योगिक संघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय को यह प्रतिवेदन दिया जाता है कि किसी सदस्य देश ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर किसी ऐसे अभिसमय का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने में विफलता बरती है जिसका वह पक्षकार है, तो शासी निकाय इस प्रतिवेदन को उस सरकार को भेज सकता है जिसके विरुद्ध यह किया गया है, और उस सरकार को इस विषय पर अपना वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित कर सकता है जिसे वह उचित समझे।
अनुच्छेद 25 -प्रतिवेदन का प्रकाशन -
यदि संबंधित सरकार से उचित समय के भीतर कोई वक्तव्य प्राप्त नहीं होता है, या यदि प्राप्त वक्तव्य को शासी निकाय द्वारा संतोषजनक नहीं माना जाता है, तो शासी निकाय को उस प्रतिवेदन और उसके उत्तर में दिए गए वक्तव्य (यदि कोई हो) को प्रकाशित करने का अधिकार होगा।
अनुच्छेद 26 अननुपालन की शिकायतें -
I. किसी भी सदस्य देश को अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय में शिकायत दर्ज करने का अधिकार होगा, यदि वह इस बात से संतुष्ट नहीं है कि कोई अन्य सदस्य देश उस अभिसमय का प्रभावी पालन सुनिश्चित कर रहा है जिसे दोनों ने उपरोक्त अनुच्छेदों के अनुसार अनुसमर्थित किया है।
II. शासी निकाय, यदि उचित समझे, तो ऐसी शिकायत को जांच आयोग को सौंपने से पहले, संबंधित सरकार के साथ अनुच्छेद 24 में वर्णित तरीके से संवाद कर सकता है।
III. यदि शासी निकाय संबंधित सरकार को शिकायत संप्रेषित करना आवश्यक नहीं समझता है, या यदि संवाद के बाद उचित समय के भीतर कोई ऐसा उत्तर प्राप्त नहीं होता है जिसे शासी निकाय संतोषजनक माने, तो शासी निकाय शिकायत पर विचार करने और उस पर रिपोर्ट देने के लिए एक जांच आयोग नियुक्त कर सकता है।
IV. शासी निकाय यही प्रक्रिया या तो स्वप्रेरणा (own motion) से या सम्मेलन के किसी प्रतिनिधि से शिकायत प्राप्त होने पर अपना सकता है।
V. जब अनुच्छेद 25 या 26 से उत्पन्न कोई मामला शासी निकाय द्वारा विचाराधीन हो, तो संबंधित सरकार (यदि शासी निकाय में उसका पहले से प्रतिनिधित्व न हो) उस मामले पर विचार-विमर्श के दौरान कार्यवाही में भाग लेने के लिए एक प्रतिनिधि भेजने की हकदार होगी। संबंधित सरकार को उस तिथि की पर्याप्त सूचना दी जाएगी जिस दिन मामले पर विचार किया जाना है।
अनुच्छेद 27 जांच आयोग के साथ सहयोग -
सदस्य देश इस बात पर सहमत हैं कि अनुच्छेद 26 के तहत किसी शिकायत को जांच आयोग को भेजे जाने की स्थिति में, वे प्रत्येक (चाहे वे शिकायत से सीधे संबंधित हों या नहीं) अपने पास मौजूद उन सभी सूचनाओं को आयोग को उपलब्ध कराएंगे जो शिकायत की विषय-वस्तु से संबंधित हैं।
अनुच्छेद 28 जांच आयोग की रिपोर्ट -
जब जांच आयोग शिकायत पर पूरी तरह विचार कर लेगा, तो वह एक रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें पक्षों के बीच विवाद को निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक तथ्यों के सभी प्रश्नों पर उसके निष्कर्ष शामिल होंगे। इसमें ऐसी सिफारिशें भी होंगी जिन्हें वह शिकायत के समाधान के लिए उठाए जाने वाले कदमों और उन कदमों को उठाए जाने वाली समय-सीमा के संबंध में उचित समझे।
अनुच्छेद 29 जांच आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक, जांच आयोग की रिपोर्ट को शासी निकाय और शिकायत से संबंधित प्रत्येक सरकार को संप्रेषित करेंगे, और इसे प्रकाशित करवाएंगे।
II. इनमें से प्रत्येक सरकार तीन महीने के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को सूचित करेगी कि वह आयोग की रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों को स्वीकार करती है या नहीं और यदि नहीं कि क्या वह शिकायत को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को भेजने का प्रस्ताव रखती है।
अनुच्छेद 30 -
सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष अभिसमयों या सिफारिशों को प्रस्तुत करने में विफलता
यदि कोई सदस्य किसी अभिसमय या सिफारिश के संबंध में अनुच्छेद 19 के पैराग्राफ 5(ख), 6(ख) या 7(ख)(i) द्वारा अपेक्षित कार्रवाई करने में विफल रहता है, तो कोई भी अन्य सदस्य मामले को शासी निकाय को भेजने का हकदार होगा। यदि शासी निकाय यह पाता है कि ऐसी विफलता हुई है, तो वह मामले की रिपोर्ट सम्मेलन को देगा।
अनुच्छेद 31 - अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों की अंतिम प्रकृति -
अनुच्छेद 29 के अनुसरण में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को भेजी गई किसी शिकायत या मामले के संबंध में न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा।
अनुच्छेद 32 -
जांच आयोग के निष्कर्षों या सिफारिशों पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों का प्रभाव
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, जांच आयोग के किसी भी निष्कर्ष या सिफारिश (यदि कोई हो) की पुष्टि कर सकता है, उनमें परिवर्तन कर सकता है या उन्हें उलट सकता है।
अनुच्छेद 33 -
जांच आयोग या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की सिफारिशों को लागू करने में विफलता
यदि कोई सदस्य निर्दिष्ट समय के भीतर जांच आयोग की रिपोर्ट में या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय में (जैसा भी मामला हो) निहित सिफारिशों को लागू करने में विफल रहता है, तो शासी निकाय सम्मेलन को ऐसी कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है जिसे वह उनका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उचित और समीचीन (Expedient) समझे।
अनुच्छेद 34 जांच आयोग या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की सिफारिशों का अनुपालन -
चूक करने वाली सरकार किसी भी समय शासी निकाय को सूचित कर सकती है कि उसने जांच आयोग की सिफारिशों या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय (जैसा भी मामला हो) का अनुपालन करने के लिए आवश्यक कदम उठा लिए हैं, और वह शासी निकाय से अपने दावे की पुष्टि के लिए एक जांच आयोग गठित करने का अनुरोध कर सकती है। इस मामले में अनुच्छेद 27, 28, 29, 31 और 32 के प्रावधान लागू होंगे, और यदि जांच आयोग की रिपोर्ट या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय चूक करने वाली सरकार के पक्ष में होता है, तो शासी निकाय तत्काल अनुच्छेद 33 के अनुसरण में की गई किसी भी कार्रवाई को बंद करने की सिफारिश करेगा।
अध्याय III. सामान्य
अनुच्छेद 35 गैर-महानगरीय क्षेत्रों पर अभिसमयों का लागू होना -
I. सदस्य देश यह वचन देते हैं कि इस संविधान के प्रावधानों के अनुसार उनके द्वारा अनुसमर्थित अभिसमय उन गैर-महानगरीय क्षेत्रों पर लागू किए जाएंगे जिनके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए वे जिम्मेदार हैं (जिनमें वे न्यास क्षेत्र) भी शामिल हैं जिनके लिए वे प्रशासनिक प्राधिकरण हैं)। इसमें वे क्षेत्र अपवाद होंगे जहाँ -
A. अभिसमय की विषय-वस्तु उस क्षेत्र की स्वशासी शक्तियों के भीतर आती है, या
B. स्थानीय परिस्थितियों के कारण अभिसमय लागू करने योग्य नहीं है, या
C. अभिसमय को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक संशोधनों के अधीन है।
II. अभिसमय का अनुसमर्थन करने वाला प्रत्येक सदस्य, अनुसमर्थन के बाद यथाशीघ्र अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को एक घोषणा भेजेगा। इसमें नीचे दिए गए पैराग्राफ 4 और 5 में उल्लिखित क्षेत्रों के अलावा अन्य क्षेत्रों के संबंध में यह बताया जाएगा कि वह अभिसमय के प्रावधानों को किस सीमा तक लागू करने का वचन देता है, और अभिसमय द्वारा निर्धारित विवरण भी देगा।
III. प्रत्येक सदस्य जिसने पिछले पैराग्राफ के आधार पर घोषणा भेजी है, वह समय-समय पर, अभिसमय की शर्तों के अनुसार, पिछली किसी घोषणा की शर्तों में संशोधन करते हुए और ऐसे क्षेत्रों के संबंध में वर्तमान स्थिति बताते हुए एक अगली घोषणा भेज सकता है।
जिगर चूरूवी जी, अनुच्छेद 35 के इन तकनीकी उप-खंडों (4 से 8) का शुद्ध हिंदी अनुवाद यहाँ दिया गया है:
IV. जहाँ किसी अभिसमय की विषय-वस्तु किसी गैर-महानगरीय क्षेत्र की स्वशासी शक्तियों के भीतर आती है, तो उस क्षेत्र के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए जिम्मेदार सदस्य देश, उस क्षेत्र की सरकार द्वारा कानून बनाने या अन्य कार्रवाई करने की दृष्टि से, यथाशीघ्र उस सरकार के संज्ञान में अभिसमय को लाएगा। इसके पश्चात, वह सदस्य देश, उस क्षेत्र की सरकार की सहमति से, अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को उस क्षेत्र की ओर से अभिसमय के दायित्वों को स्वीकार करने वाली एक घोषणा संप्रेषित कर सकता है।
V. किसी भी अभिसमय के दायित्वों को स्वीकार करने वाली घोषणा अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को निम्नलिखित द्वारा भेजी जा सकती है:
(क) संगठन के दो या दो से अधिक सदस्यों द्वारा, किसी ऐसे क्षेत्र के संबंध में जो उनके संयुक्त अधिकार के अधीन हो; या
(ख) किसी ऐसे अंतर्राष्ट्रीय प्राधिकरण द्वारा, जो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के आधार पर या अन्यथा, किसी क्षेत्र के प्रशासन के लिए उत्तरदायी हो।
VI. इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 4 या 5 के आधार पर अभिसमय के दायित्वों की स्वीकृति में, संबंधित क्षेत्र की ओर से अभिसमय की शर्तों द्वारा निर्धारित दायित्वों और संगठन के संविधान के तहत उन दायित्वों की स्वीकृति शामिल होगी जो अनुसमर्थित अभिसमयों पर लागू होते हैं। स्वीकृति की घोषणा में अभिसमय के प्रावधानों में ऐसे संशोधनों का उल्लेख किया जा सकता है जो अभिसमय को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक हों।
VII. प्रत्येक सदस्य या अंतर्राष्ट्रीय प्राधिकरण, जिसने इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 4 या 5 के आधार पर घोषणा भेजी है, वह समय-समय पर अभिसमय की शर्तों के अनुसार, पिछली किसी घोषणा की शर्तों में संशोधन करने वाली या संबंधित क्षेत्र की ओर से अभिसमय के दायित्वों की स्वीकृति को समाप्त करने वाली एक अगली घोषणा भेज सकता है।
VIII. यदि किसी ऐसे क्षेत्र की ओर से अभिसमय के दायित्व स्वीकार नहीं किए जाते हैं जिससे पैराग्राफ 4 या 5 संबंधित है, तो संबंधित सदस्य या अंतर्राष्ट्रीय प्राधिकरण अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय के महानिदेशक को उस क्षेत्र के कानून और व्यवहार की स्थिति की रिपोर्ट देगा। इस रिपोर्ट में यह दर्शाया जाएगा कि अभिसमय के प्रावधानों को किस सीमा तक प्रभावी बनाया गया है या बनाने का प्रस्ताव है। कानून, प्रशासनिक कार्रवाई, सामूहिक समझौते या अन्य माध्यमों से (अभिसमय के प्रावधानों को लागू किया गया है) और उन कठिनाइयों का विवरण देगा जो ऐसे अभिसमय की स्वीकृति को रोकती हैं या उसमें देरी करती हैं।
अनुच्छेद 36 संविधान में संशोधन -
इस संविधान में किए गए संशोधन, जिन्हें सम्मेलन द्वारा उपस्थित प्रतिनिधियों के दो-तिहाई बहुमत से अपनाया गया हो, तब प्रभावी होंगे जब उन्हें संगठन के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा अनुसमर्थित या स्वीकार कर लिया जाए। इन दो-तिहाई सदस्यों में शासी निकाय के उन दस सदस्यों में से कम से कम पाँच सदस्य शामिल होने चाहिए जो इस संविधान के अनुच्छेद 7 के पैराग्राफ 3 के प्रावधानों के अनुसार मुख्य औद्योगिक महत्व वाले सदस्यों के रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं।
अनुच्छेद 37 संविधान और अभिसमयों की व्याख्या -
I. इस संविधान की व्याख्या, या इस संविधान के प्रावधानों के अनुसरण में सदस्यों द्वारा संपन्न किसी भी आगामी अभिसमय की व्याख्या से संबंधित कोई भी प्रश्न या विवाद निर्णय के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को भेजा जाएगा।
II. इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 1 के प्रावधानों के बावजूद, शासी निकाय किसी अभिसमय की व्याख्या से संबंधित किसी भी विवाद या प्रश्न के शीघ्र निपटान के लिए एक ट्रिब्यूनल (अधिकरण) की नियुक्ति हेतु नियम बना सकता है और उन्हें अनुमोदन के लिए सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। ऐसे विवाद शासी निकाय द्वारा या अभिसमय की शर्तों के अनुसार ट्रिब्यूनल को भेजे जा सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का कोई भी लागू निर्णय या परामर्शदात्री राय इस पैराग्राफ के आधार पर स्थापित किसी भी ट्रिब्यूनल पर बाध्यकारी होगी। ऐसे ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया कोई भी अधिनिर्णय (Award) संगठन के सदस्यों को प्रसारित किया जाएगा और उन पर उनके द्वारा की गई किसी भी टिप्पणी को सम्मेलन के समक्ष लाया जाएगा।
अनुच्छेद 38 क्षेत्रीय सम्मेलन -
I. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए ऐसे क्षेत्रीय सम्मेलनों का आयोजन कर सकता है और ऐसी क्षेत्रीय एजेंसियाँ स्थापित कर सकता है जो वांछनीय हों।
II. क्षेत्रीय सम्मेलनों की शक्तियाँ, कार्य और प्रक्रिया शासी निकाय द्वारा तैयार किए गए नियमों द्वारा शासित होंगे और पुष्टि के लिए सामान्य सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे।
अध्याय IV. विविध प्रावधान
अनुच्छेद 39 संगठन की कानूनी स्थिति -
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन को पूर्ण विधिक व्यक्तित्व प्राप्त होगा और विशेष रूप से निम्नलिखित क्षमताएँ होंगी -
(क) अनुबंध (Contract) करने की;
(ख) अचल और चल संपत्ति प्राप्त करने और उसका निपटान करने की;
(ग) कानूनी कार्यवाही शुरू करने की।
अनुच्छेद 40 - विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ -
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन अपने प्रत्येक सदस्य के क्षेत्र में ऐसे विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का उपभोग करेगा जो इसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक हैं।
I. सम्मेलन के प्रतिनिधि, शासी निकाय के सदस्य, महानिदेशक और कार्यालय के अधिकारी भी इसी तरह उन विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का उपभोग करेंगे जो संगठन के संबंध में उनके कार्यों के स्वतंत्र निर्वहन के लिए आवश्यक हैं।
II. ऐसे विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों को एक अलग समझौते में परिभाषित किया जाएगा, जिसे संगठन द्वारा सदस्य देशों की स्वीकृति के लिए तैयार किया जाएगा।
अनुलग्नक (Annex) - अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यों के संबंध में घोषणा - (फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र) -
01. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का सामान्य सम्मेलन, फिलाडेल्फिया में अपने छब्बीसवें सत्र में बैठक करते हुए, आज दस मई, उन्नीस सौ चवालीस (1944) को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यों तथा उन सिद्धांतों की वर्तमान घोषणा को अपनाता है, जिन्हें इसके सदस्यों की नीति को प्रेरित करना चाहिए।
सम्मेलन उन मौलिक सिद्धांतों की पुष्टि करता है जिन पर संगठन आधारित है और विशेष रूप से यह कि -
(क) श्रम कोई वस्तु (Commodity) नहीं है।
(ख) निरंतर प्रगति के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संघ बनाने की स्वतंत्रता अनिवार्य है।
(ग) कहीं भी व्याप्त गरीबी, हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है।
(घ) अभाव के विरुद्ध युद्ध को प्रत्येक राष्ट्र के भीतर निरंतर उत्साह के साथ, और निरंतर तथा ठोस अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों द्वारा चलाए जाने की आवश्यकता है, जिसमें श्रमिकों और नियोक्ताओं के प्रतिनिधि, सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ समान दर्जा प्राप्त करते हुए, सामान्य कल्याण को बढ़ावा देने की दृष्टि से स्वतंत्र चर्चा और लोकतांत्रिक निर्णय में उनके साथ शामिल हों। यह विश्वास करते हुए कि अनुभव ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के संविधान में दिए गए इस कथन की सत्यता को पूरी तरह सिद्ध कर दिया है कि स्थायी शांति तभी स्थापित की जा सकती है जब वह सामाजिक न्याय पर आधारित हो, सम्मेलन पुष्टि करता है कि -
(क) सभी मनुष्यों को, चाहे वे किसी भी जाति, पंथ, या लिंग के हों, स्वतंत्रता और गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसर की स्थितियों में अपने भौतिक कल्याण और अपने आध्यात्मिक विकास दोनों को प्राप्त करने का अधिकार है -
(ख) उन स्थितियों की प्राप्ति, जिनमें यह संभव हो सके, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति का केंद्रीय लक्ष्य होना चाहिए;
(ग) सभी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों और उपायों, विशेष रूप से आर्थिक और वित्तीय स्वरूप के उपायों को इस परिप्रेक्ष्य में परखा जाना चाहिए और उन्हें केवल उसी सीमा तक स्वीकार किया जाना चाहिए जहाँ तक वे इस मौलिक उद्देश्य की उपलब्धि को बढ़ावा देते हों न कि उसमें बाधा डालते हों।
(घ) इस मौलिक उद्देश्य के प्रकाश में सभी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक और वित्तीय नीतियों और उपायों की जांच करना और उन पर विचार करना अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की जिम्मेदारी है।
(ङ) सौंपे गए कार्यों को पूरा करने में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन सभी प्रासंगिक आर्थिक और वित्तीय कारकों पर विचार करने के बाद, अपने निर्णयों और सिफारिशों में ऐसे किसी भी प्रावधान को शामिल कर सकता है जिसे वह उचित समझे।
II. सम्मेलन विश्व के राष्ट्रों के बीच ऐसे कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के गंभीर दायित्व को स्वीकार करता है जो निम्नलिखित प्राप्त करेंगे -
(क) पूर्ण रोजगार और जीवन स्तर को ऊपर उठाना
(ख) श्रमिकों को उन व्यवसायों में नियोजित करना जिनमें वे अपने कौशल और उपलब्धियों का पूर्ण प्रदर्शन करने की संतुष्टि प्राप्त कर सकें और सामान्य कल्याण में अपना अधिकतम योगदान दे सकें।
(ग) इस लक्ष्य की प्राप्ति के साधन के रूप में और सभी संबंधितों के लिए पर्याप्त गारंटी के तहत, प्रशिक्षण और श्रम के हस्तांतरण की सुविधाओं का प्रावधान, जिसमें रोजगार और बसने के लिए प्रवास (Migration) शामिल है।
(घ) मजदूरी और कमाई, काम के घंटों और अन्य स्थितियों के संबंध में ऐसी नीतियां जो सभी को प्रगति के फलों में उचित हिस्सा और रोजगार में लगे उन सभी को न्यूनतम निर्वाह मजदूरी सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई हों जिन्हें ऐसे संरक्षण की आवश्यकता है।
(ङ) सामूहिक सौदेबाजी (Collective bargaining) के अधिकार की प्रभावी मान्यता, निरंतर सुधार में प्रबंधन और श्रम का सहयोग, उत्पादक दक्षता में सुधार, और सामाजिक एवं आर्थिक उपायों को तैयार करने तथा उन्हें लागू करने में श्रमिकों और नियोक्ताओं का सहयोग;
(च) सामाजिक सुरक्षा उपायों का विस्तार ताकि संरक्षण की आवश्यकता वाले सभी लोगों को एक बुनियादी आय और व्यापक चिकित्सा देखभाल प्रदान की जा सके;
(छ) सभी व्यवसायों में श्रमिकों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त सुरक्षा;
(ज) बाल कल्याण और मातृत्व संरक्षण के लिए प्रावधान;
(झ) पर्याप्त पोषण, आवास और मनोरंजन तथा संस्कृति के लिए सुविधाओं का प्रावधान;
(ञ) शैक्षिक और व्यावसायिक अवसर की समानता का आश्वासन।
IV. सम्मेलन को विश्वास है कि इस घोषणा में निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक विश्व के उत्पादक संसाधनों का पूर्ण और व्यापक उपयोग प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कार्रवाई द्वारा सुरक्षित किया जा सकता है। इसमें उत्पादन और उपभोग बढ़ाने, गंभीर आर्थिक उतार-चढ़ाव से बचने, विश्व के कम विकसित क्षेत्रों की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देने, प्राथमिक उत्पादों की विश्व कीमतों में अधिक स्थिरता सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के उच्च एवं स्थिर स्तर को बढ़ावा देने के उपाय शामिल हैं।
सम्मेलन इस महान कार्य और सभी लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी में हिस्सा लेने वाले अंतर्राष्ट्रीय निकायों के साथ अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के पूर्ण सहयोग का संकल्प लेता है।
V. सम्मेलन पुष्टि करता है कि इस घोषणा में निर्धारित सिद्धांत हर जगह के सभी लोगों पर पूरी तरह से लागू होते हैं। हालांकि, उन्हें लागू करने का तरीका प्रत्येक राष्ट्र द्वारा प्राप्त सामाजिक और आर्थिक विकास के स्तर को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाना चाहिए, लेकिन उन लोगों के लिए जो अभी भी पराधीन हैं, और उनके लिए भी जिन्होंने स्वशासन प्राप्त कर लिया है, इन सिद्धांतों का प्रगतिशील अनुप्रयोग संपूर्ण सभ्य जगत के लिए चिंता का विषय है।
लीग ऑफ नेशंस (राष्ट्र संघ) - लीग ऑफ नेशंस/राष्ट्र संघ प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया में शांति स्थापित करने हेतु बनाया गया पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय संगठन जो संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का पूर्वज माना जाता है।
स्थापना - 10 जनवरी, 1920 को हुई थी।आधार - प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली वर्साय की संधि
प्रेरक - अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के 14 सिद्धांत में इसकी रूपरेखा रखी थी (विडंबना रही कि अमेरिका इसका सदस्य नहीं बना)।
मुख्यालय - जेनेवा, स्विट्जरलैंड।
समाप्त - 20 अप्रैल, 1946
राष्ट्र संघ के अंग -
1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
2. अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO)
मुख्य उद्देश्य -
A. युद्ध रोकना - अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत और मध्यस्थता से सुलझाना।
B. निःशस्त्रीकरण - हथियारों की होड़ को कम करना।
C. सामूहिक सुरक्षा - यदि कोई एक देश दूसरे पर हमला करे, तो सभी सदस्य देश मिलकर उसका विरोध करेंगे।
D. मानवीय कार्य - दास प्रथा, नशीले पदार्थों के व्यापार और श्रमिकों की स्थिति में सुधार करना (इसी के तहत ILO का जन्म हुआ)।
राष्ट्र संघ संगठन का ढांचा (तीन मुख्य अंग) -
सभा - सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व (प्रत्येक सदस्य देश के दो प्रतिनिधि)।
परिषद - कुछ स्थायी सदस्य (ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान) और कुछ अस्थायी सदस्य।
सचिवालय - प्रशासनिक कार्य देखता है।
सदस्य देश - 187 (भारत संस्थापक स्थाई सदस्य देश 1919 से)
राष्ट्र संघ की विफलता के कारण - लीग ऑफ नेशंस द्वितीय विश्व युद्ध 1939 को रोकने में असफल रहा। इसकी विफलता के मुख्य कारण थे -
A. अमेरिका की अनुपस्थिति - सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका इसका सदस्य नहीं बना, जिससे संगठन कमजोर हो गया।
B. अपनी सेना का अभाव - लीग के पास अपनी कोई सेना नहीं थी। उसे आदेश लागू करने के लिए सदस्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता था।
C. तानाशाहों का उदय - हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली) और जापान की विस्तारवादी नीतियों को रोकने में नाकाम रहा।
D. कमजोर शक्तियां - ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश अपने खुद के स्वार्थों में लगे रहे।
E. हारे हुए देशों का प्रतिशोध - प्रथम विश्व युद्ध में हारे हुए देशों के जनमन में राष्ट्र संघ के प्रति प्रतिशोध की भावना।
लीग का अंत और विरासत - द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होते ही लीग ऑफ नेशंस व्यावहारिक रूप से खत्म हो गया। 20 अप्रैल, 1946 को इसे आधिकारिक रूप से भंग कर दिया गया और इसकी संपत्ति व फाइलें संयुक्त राष्ट्र को सौंप दी गईं।
ILO की आवश्यकता एवं महत्व - अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) की आवश्यकता को केवल एक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि दुनिया भर के श्रमिकों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक अनिवार्य तंत्र के रूप में देखा जाता है।औद्योगिक क्रांति के बाद श्रमिकों का अत्यधिक शोषण होने लगा तो पूरी दुनिया ने महसूस किया कि एक ऐसी संस्था होनी चाहिए जो देशों की सीमाओं से ऊपर उठकर काम करे। ILO की आवश्यकता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं -
1. सामाजिक न्याय और स्थायी शांति - प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने यह सबक सीखा कि जब तक समाज के एक बड़े वर्ग (श्रमिकों) के साथ अन्याय होगा, तब तक यहां शांति नहीं रह सकती।
तर्क - गरीबी और शोषण ही असंतोष और युद्ध का बीज बोते हैं। इसलिए, वैश्विक शांति हेतु सामाजिक न्याय (Social Justice) जरूरी है।
2. अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को संतुलित करना - यदि एक देश/उद्योग अपने श्रमिकों को बेहतर सुविधाएं (जैसे काम के घंटे, अधिक वेतन) देता है, तो उसकी उत्पादन लागत बढ़ जाएगी और वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछड़ सकता है।
ILO की भूमिका - सभी देशों के लिए न्यूनतम मानक तय करता है ताकि कोई भी देश अपने श्रमिकों का शोषण करके व्यापार में अनुचित लाभ न कमा सके।
3. मानवीय कार्य दशाएं सुनिश्चित करना - औद्योगिक क्रांति के दौरान श्रमिकों से 14-16 घंटे काम लिया जाता था, कार्यस्थल असुरक्षित थे और बच्चों से भी काम कराया जाता था। दूसरे शब्दों श्रमिकों को वस्तु माना जाता था।
श्रमिक वस्तु नहीं - श्रमिकों को वस्तु (Commodity) के बजाय इंसान समझने के लिए और उन्हें सम्मानजनक कार्य वातावरण देने के लिए ILO जरूरी था।
4. सामूहिक सौदेबाजी और संघ बनाने की शक्ति - अकेला श्रमिक नियोक्ता (मालिक) के सामने कमजोर होता है वह लड़ना तो चाहता है पर लड़ नहीं सकता। अतः श्रमिकों को अपनी आवाज उठाने के लिए ट्रेड यूनियन बनाने और सामूहिक रूप से अपनी मांगें रखने का कानूनी अधिकार दिलाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की आवश्यकता थी।
5. सामाजिक सुरक्षा (Social Security) - बीमारी, बुढ़ापा, बेरोजगारी या काम के दौरान दुर्घटना होने पर श्रमिक और उसका परिवार सड़क पर न आ जाए, इसके लिए दुनिया भर में पेंशन, बीमा और चिकित्सा सुविधाओं के मानक तय करना ILO का मुख्य उद्देश्य है।
6. बाल श्रम और जबरन श्रम का उन्मूलन - दुनिया के कई हिस्सों में आज भी बच्चों और बंधुआ मजदूरों से काम कराया जाता है। ऐसी अमानवीय प्रथाओं को खत्म करने के लिए देशों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना और कड़े नियम लागू करवाना ILO की प्राथमिक आवश्यकता है।
ILO का महत्व - अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) का महत्व केवल कागजी कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के करोड़ों श्रमिकों के जीवन स्तर को सुधारने वाला एक शक्तिशाली मंच है।
इसके महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. वैश्विक श्रम मानकों का निर्धारण -
ILO का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इसने दुनिया के लिए श्रम का संविधान तैयार किया है। इसने अब तक 190 से अधिक अभिसमय (Conventions) बनाए हैं।
2. बुनियादी अधिकार - यह सुनिश्चित करता है कि चाहे कोई श्रमिक भारत में हो या अमेरिका में, उसके बुनियादी अधिकार (जैसे काम के घंटे, न्यूनतम मजदूरी) एक समान हों।
3. शोषण की समाप्ति - इससे देशों के बीच रेस टू द बॉटम (मजदूरों का शोषण करके सस्ता माल बेचने की होड़) रुकती है।
4. सम्मानजनक कार्य की अवधारणा -
ILO ने दुनिया को सिखाया कि काम का मतलब सिर्फ पैसा कमाना नहीं है, बल्कि सम्मानजनक काम होता है। इसके चार स्तंभ हैं -
I. कार्यस्थल पर अधिकारों की रक्षा।
II. रोजगार के बेहतर अवसर।
III. सामाजिक सुरक्षा (पेंशन, बीमा, स्वास्थ्य)।
IV.सामाजिक संवाद (मालिक और मजदूर के बीच बातचीत)।
5. त्रिपक्षीय संवाद (Tripartism) का महत्व - ILO दुनिया का एकमात्र संगठन है जहाँ सरकार के साथ-साथ नियोक्ता और श्रमिक को समान वोटिंग का अधिकार है। इसके कारण यहाँ नीतियां केवल एसी कमरों में बैठकर सरकारें नहीं बनातीं, बल्कि वे लोग बनाते हैं जो वास्तव में कारखानों में काम करते हैं या उन्हें चलाते हैं। इससे नीतियों को लागू करना आसान होता है।
5. कमजोर वर्गों की सुरक्षा - ILO ने विशेष रूप से उन समूहों के लिए कानून बनाने में मदद की है जिनका शोषण सबसे अधिक होता है:
∆ बाल श्रम - स्टॉप चाइल्ड लेबर जैसे अभियानों के माध्यम से करोड़ों बच्चों को कारखानों से निकालकर स्कूलों तक पहुँचाया।
∆ महिला श्रमिक - मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) और समान काम समान वेतन के सिद्धांतों को वैश्विक मान्यता दिलाई गई।
∆ प्रवासी श्रमिक - दूसरे देशों में जाकर काम करने वाले मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की।
6. सामाजिक सुरक्षा का रक्षक - ILO का महत्व इस बात में है कि यह संकट के समय श्रमिकों का ढाल बनता है।
बेरोजगारी, बीमारी, या बुढ़ापे की स्थिति में श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, यह विचार ILO ने ही पूरी दुनिया में फैलाया है। भारत में ESI (कर्मचारी राज्य बीमा) और PF (भविष्य निधि) जैसी योजनाएं काफी हद तक ILO के मानकों पर आधारित हैं।
7. तकनीकी सहायता और डेटा - ILO दुनिया भर के श्रम बाजार का सबसे सटीक डेटा इकट्ठा करता है। यह सदस्य देशों को उनके श्रम कानूनों को आधुनिक बनाने के लिए तकनीकी सलाह और ट्रेनिंग भी प्रदान करता है।
ILO के उद्देश्य - अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) के उद्देश्यों को मुख्य रूप से 1944 के फिलाडेल्फिया घोषणापत्र में परिभाषित किया गया है स्थाई शांति के लिए सामाजिक न्याय। इकके मुख्य उद्देश्यों को हम चार प्रमुख भागों में बाँट सकते हैं, जिन्हें डेसेंट वर्क एजेंडा भी कहा जाता है:
1. काम के मौलिक सिद्धांतों और अधिकारों को बढ़ावा देना - ILO का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कार्यस्थल पर श्रमिकों के बुनियादी मानवाधिकारों का सम्मान हो।
∆ यहां श्रमिक को संगठन (यूनियन) बनाने की स्वतंत्रता हो जिसके तहत वह सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार का उपयोग कर सके।
∆ अमानवीय प्रथाओं का अंत - जबरन श्रम, बंधुआ मजदूरी और बाल श्रम को पूरी तरह समाप्त करना।
∆ भेदभाव का खात्मा - रोजगार और व्यवसाय में किसी भी तरह के भेदभाव (लिंग, जाति या धर्म के आधार पर) को रोकना।
2. रोजगार के अवसर पैदा करना -
केवल अधिकार देना ही काफी नहीं है, लोगों के पास काम होना भी जरूरी है।
∆ सरकारी नीतियां - सरकारों को ऐसी नीतियां बनाने में मदद करना जिससे निवेश बढ़े और पुरुषों व महिलाओं के लिए समान रूप से रोजगार के नए अवसर पैदा हों।
∆. कौशल विकास और ट्रेनिंग - मजदूरों को बेहतर काम की परिस्थितियां उपलब्ध करवाने हेतु (सेवा पूर्व एवं सेवारत) प्रशिक्षण पर जोर दिया गया, ताकि वे आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल बैठा सकें।
3. सामाजिक सुरक्षा का विस्तार (Social Protection) - ILO का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि श्रमिक केवल काम करने की मशीन नहीं है, ना ही वह कच्चा माल है, वह भी समाज का हिस्सा है। अतः संकट के समय उसे सामाजिक सुरक्षा मिले।
∆ स्वास्थ्य और सुरक्षा - कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कड़े मानक तय करना।
∆ सामाजिक लाभ - बीमारी, मातृत्व, बुढ़ापे में पेंशन एवं बेरोजगारी के समय वित्तीय सहायता सुनिश्चित करना।
∆ मजदूरी - श्रमिकों को इतनी न्यूनतम मजदूरी मिले जिससे वह सम्मानजनक जीवन यापन कर सके।
4. सामाजिक संवाद को मजबूत करना (Social Dialogue) - यह ILO का सबसे अनूठा उद्देश्य है।
∆ त्रिपक्षीयता - बातचीत से सरकार, नियोक्ता और श्रमिकों के बीच आपसी विश्वास को बढ़ावा देना।
∆ विवादों का निपटन - इसका उद्देश्य यह है कि औद्योगिक विवादों को झगड़े के बजाय वार्ता से सुलझाया जाए, जिससे औद्योगिक शांति बनी रहे।
ILO का जन्म ( श्रमिक कल्याण का सबसे बड़ा कल्याणकारी कदम) -
लीग ऑफ नेशंस के तहत श्रमिक कल्याण का सबसे ठोस परिणाम अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) की स्थापना थी। लीग ने माना कि श्रमिकों के मुद्दों को संभालने के लिए एक विशेषज्ञ संस्था की जरूरत है।लीग और ILO के बीच गहरा संबंध, लीग का हर सदस्य स्वतः ही ILO का सदस्य बन जाता था। शुरुआती दौर में लीग के बजट से ILO का खर्च चलाया जाता था।
अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन विश्व के श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए काम करती है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की एकमात्र ऐसी एजेंसी जिसमें सरकार, नियोक्ता (मालिक) और श्रमिक तीनों मिलकर नीतियां बनाते हैं।
4. विशिष्ट कल्याणकारी लक्ष्य - लीग ऑफ नेशंस और उसके शुरुआती सम्मेलनों में श्रमिकों के लिए कुछ मानक तय किए गए थे -
I. काम के घंटों की सीमा - औद्योगिक क्रांति के बाद हो रहे शोषण को रोकने के लिए काम के घंटे (8 घंटे का दिन) तय।
II. बाल श्रम पर रोक - बच्चों के कारखानों में काम करने पर प्रतिबंध लगाने और उनकी शिक्षा पर जोर देने के बिंदु।
III. महिला सुरक्षा - रात में महिलाओं के काम करने और मातृत्व सुरक्षा से संबंधित शुरुआती नियम बनाए गए।
IV. न्यूनतम मजदूरी - श्रमिकों को इतना वेतन मिलना चाहिए जो उनके जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त हो।
5. संघ बनाने का अधिकार - लीग ऑफ नेशंस के चार्टर में दबे स्वर में ही सही, पर यह स्वीकार किया गया कि श्रमिकों को अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन या यूनियन बनाने का अधिकार होना चाहिए। यह बिंदु बाद में ILO के मुख्य सिद्धांतों का आधार बना।
निष्कर्ष - लीग ऑफ नेशंस ने पहली बार यह स्वीकार किया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा या बेचा जाए, बल्कि यह इंसानों से जुड़ा विषय है। हालांकि लीग खुद राजनीतिक रूप से विफल रही, लेकिन उसके श्रमिक कल्याण के इन बिंदुओं ने आधुनिक श्रम कानून की नींव रखी।
लीग ऑफ नेशंस के समय भारत में श्रमिक कल्याणकारी कानूनों (वर्कमैन कंपनसेशन एक्ट, 1923) को अपनाया गया।
अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन -
ILO स्थापना और इतिहास -
नाम संस्था - अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघ (ILO)
संस्था का प्रकार - लीग ऑफ नेशंस (राष्ट्र संघ) की स्वायत्त संस्था।
वर्ष - प्रथम विश्व युद्ध के बाद सन 1919
गठन का आधार - अनुसार वर्साय की संधि के बाद चैप्टर XIII में।
मुख्यालय - जेनेवा, स्विट्जरलैंड में बनाया गया।
उद्देश्य -सामाजिक न्याय के आधार पर विश्व में स्थायी शांति स्थापित करने हेतु
घोषणा - फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र 1944
संयुक्त राष्ट्र संघ का भाग - 1946
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (गठन के कारण) -
19वीं सदी के अंत व 20वीं शताब्दी की शुरुआत में औद्योगिक क्रांति के कारण श्रमिकों की स्थिति दास से बदतरीन एवं दयनीय हो गई। इस स्थिति में बदलाव हेतु लीग ऑफ नेशंस के सदस्य देशों ने श्रमिक हितार्थ एक स्वायत्त संस्था का निर्माण किया। लीग ऑफ नेशंस (राष्ट्र संघ) के संविधान में श्रमिक कल्याण को केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के लिए एक अनिवार्य शर्त माना गया था। राष्ट्र संघ की संविदा (Covenant) की धारा 23(a) विशेष रूप से श्रमिक कल्याण के लिए समर्पित थी। लीग ऑफ नेशंस के संस्थापकों का मानना था कि दुनिया में तब तक स्थायी शांति नहीं हो सकती जब तक श्रमिकों का शोषण होता रहेगा। इसीलिए उन्होंने स्वीकार किया कि:
श्रमिकों हेतु काम की मानव कल्याण की परिस्थितियां उत्पन्न करना अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है, इस हेतु -
1. अन्यायपूर्ण श्रम स्थितियाँ दुनिया की शांति और सद्भाव को खतरे में डालती हैं।
2. धारा 23(a) के तहत राष्ट्र संघ ने इस धारा के तहत निम्नलिखित जिम्मेदारियाँ स्वीकार कीं -
अ. मानवीय कार्य दशाएँ - अपने देशों में और उन देशों में जहाँ उनका व्यापारिक प्रभाव है, पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए काम की निष्पक्ष और मानवीय परिस्थितियाँ बनाए रखना।
ब. अंतरराष्ट्रीय समन्वय - इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना करना, जिसके तीन मुख्य कारण थे -
A. मानवीय कारण - श्रमिकों के शोषण (लंबे घंटे, कम वेतन, असुरक्षित कार्यस्थल) को रोकना।
B. राजनीतिक कारण - रूस की रक्तहीन क्रांति (1917) के बाद सरकारों को डर था कि यदि श्रमिकों की स्थिति नहीं सुधारी गई, तो पूरे विश्व में हिंसक क्रांतियां हो सकती हैं।
C. आर्थिक कारण (Global Standards) - यदि एक देश श्रमिकों को अच्छी सुविधाएँ देता है, तो उसकी उत्पादन लागत बढ़ जाएगी। इसलिए, सभी देशों के लिए समान श्रम मानक बनाना जरूरी था ताकि व्यापार में प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
फिलाडेल्फिया का घोषणा पत्र (1944) के अनुसार - द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब दुनिया बदल रही थी, तब 1944 में ILO ने फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र अपनाया। इसने संगठन के लक्ष्यों को और आधुनिक बनाया। फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र के चार अमर सिद्धांत
ILO के इन उद्देश्यों की नींव इन चार बातों पर टिकी है -
I. श्रम वस्तु नहीं जिसे बाजार में खरीदा-बेचा नहीं जा सकता (बंधुआ मजदूरी और दास प्रथा का अंत)।
II. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (संगठन/यूनियन बनाने का अधिकार)।
III. गरीबी समृद्धि के लिए खतरा है
IV. अभाव के विरुद्ध युद्ध - सभी इंसानों को अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का अधिकार है।
ILO के चार विश्व प्रसिद्ध सिद्धांत -
1. श्रम कोई वस्तु नहीं।
2. अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता विकास के लिए अनिवार्य है।
3. कहीं भी मौजूद गरीबी, हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है।
4. अभाव के विरुद्ध युद्ध हर राष्ट्र को पूरी शक्ति से लड़ना चाहिए।
D. ILO का संयुक्त राष्ट्र के साथ जुड़ाव (1946) - द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) बना, तो 1946 में ILO संयुक्त राष्ट्र की पहली विशिष्ट एजेंसी बन गया। तब से यह वैश्विक स्तर पर श्रम अधिकारों का रक्षक बना हुआ है।
E. नोबेल शांति पुरस्कार (1969) -
ILO की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर, 1969 में इसे नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। ILO ने उद्योग विकास हेतु मालिक, श्रमिकों और सरकार के बीच न्याय और शांति स्थापित कर विश्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
F. भारत और ILO का इतिहास - भारत उन चुनिंदा देशों में से है जो 1922 (आजादी से पहले) से ही ILO के शासी निकाय (Governing Body) का स्थायी सदस्य रहा है।
भारत में प्रथम ट्रेड यूनियन अधिनियम (1926) - और अन्य शुरुआती श्रम कानून सीधे तौर पर ILO के साथ भारत के जुड़ाव का परिणाम थे।
विशेष तथ्य - ILO की संरचना में त्रिपक्षीयता का विचार ब्रिटिश श्रम प्रतिनिधियों की देन था, ताकि सरकारें मजदूरों के हक को न दबा सकें।
ILO का कार्य करने का तरीका -
ILO दो तरह के दस्तावेज जारी करता है
I. अभिसमय (Conventions) और
II. सिफारिशें (Recommendations) करना।
A. अभिसमय - ये अंतरराष्ट्रीय संधियाँ हैं। यदि कोई देश इन्हें स्वीकार (Ratify) कर लेता है, तो उसे अपने घरेलू कानूनों में बदलाव कर इन्हें लागू करना अनिवार्य होता है।
B. सिफारिशें - ये केवल मार्गदर्शक सिद्धांत होते हैं, जो सरकारों को नीतियां बनाने में मदद करते हैं।
A. ILO के मूल सिद्धांत (8 मुख्य संधियां) - अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) ने वैसे तो 190 से अधिक संधियां बनाई हैं, लेकिन उनमें से 8 संधियों को मौलिक माना जाता है। इन्हें श्रमिकों के मानवाधिकार के रूप में देखा जाता है।
इन 8 संधियों को 4 मुख्य श्रेणियों में बाँटा गया है। ILO ने 8 मुख्य संधियों को मूल सिद्धांत माना है, जो हर देश के लिए जरूरी हैं -
I. संघ बनाने की स्वतंत्रता (87)
II. संगठित होने सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार (98)
III. जबरन श्रम पर रोक (29)
IV. राजनैतिक सजा के तहत जबरन श्रम पर रोक (105)
V. समान अवसर (100)
VI. रोजगार में भेदभाव (Discrimination) की समाप्ति। (111)
VII. बाल श्रम का उन्मूलन। (138)
VIII. खतरनाक कार्यों पर बालकों का नियोजन नहीं। (182)
श्रेणी 1- संगठन बनाने की स्वतंत्रता -
I. संधि संख्या 87 संगठन बनाने का अधिकार - यह श्रमिकों और नियोक्ताओं को बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपना संगठन (यूनियन) बनाने और उसमें शामिल होने का अधिकार देती है।
II. संधि संख्या 98 संगठित होने, सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार - यह श्रमिकों को संघ बनाने के कारण भेदभाव से बचाती है और मालिकों के साथ सामूहिक रूप से बातचीत (सौदेबाजी) करने का अधिकार देती है।
श्रेणी 2 - जबरन श्रम का उन्मूलन -
III. संधि संख्या 29 जबरन श्रम रोकने की संधि - यह सभी प्रकार के जबरन या अनिवार्य श्रम (जैसे बंधुआ मजदूरी) पर रोक लगाती है।
IV. संधि संख्या 105 - राजनैतिक सजा के तहत जबरन श्रम पर रोक - यह विशेष रूप से राजनीतिक सजा, आर्थिक विकास के साधन या अनुशासन बनाए रखने के लिए किए जाने वाले जबरन श्रम को प्रतिबंधित करती है।
श्रेणी 3: समान अवसर और भेदभाव का अंत
V. संधि संख्या 100 समान अवसर - यह समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत लागू करती है, यानी लिंग के आधार पर वेतन में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
VI. संधि संख्या 111 रोजगार में भेदभाव का अंत- यह रोजगार के क्षेत्र में जाति, रंग, लिंग, धर्म या राजनीतिक विचार के आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव को रोकने की बात करती है।
श्रेणी 4 - बाल श्रम का उन्मूलन
VII. संधि संख्या 138 बाल श्रम निरोध - यह काम पर रखने की न्यूनतम आयु निर्धारित करती है (आमतौर पर शिक्षा पूरी होने की आयु, जो 15 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए)।
VIII. संधि संख्या 182 बालकों को खतरनाक उद्योग पर लगाने का निषेध - यह बच्चों से कराए जाने वाले सबसे खतरनाक कामों (जैसे गुलामी, वेश्यावृत्ति, नशीली दवाओं का व्यापार या जोखिम भरे कारखाने) को तुरंत रोकने पर जोर देती है।
भारत पर ILO की संधियों का प्रभाव -
भारत सरकार ने इन 8 में से 6 संधियों को लागू कर दिया है। लंबे समय तक भारत ने बाल श्रम से जुड़ी संधियों (138 और 182) को मंजूरी नहीं दी थी, लेकिन 2017 में भारत ने इन दोनों को भी अपना लिया।
भारत में 2 संधियां अभी भी लागू नहीं -
संधि संख्या 87 और 98 - भारत ने इन्हें तकनीकी कारणों से (विशेषकर सरकारी कर्मचारियों के संघ बनाने के अधिकारों के संबंध में) अभी तक औपचारिक रूप से मंजूरी नहीं दी गई है, हालांकि भारत के घरेलू कानून काफी हद तक इनका पालन करते हैं।
ILO की त्रिपक्षीय संरचना - ILO की सबसे बड़ी विशेषता इसका त्रिपक्षीय ढांचा है। यहाँ फैसले केवल सरकारें नहीं लेतीं, बल्कि निम्न तीन तत्वों के प्रतिनिधि समान स्तर पर बैठकर चर्चा करते हैं।
∆ सरकार (Government)
∆ नियोक्ता (Employers)
∆ श्रमिक (Workers)
ILO के स्तंभ कार्य मानक (Decent Work Agenda) - ILO के कार्यों को चार प्रमुख स्तंभों में समझा जा सकता है -
1. काम के मानक - श्रम मानकों और मौलिक सिद्धांतों को स्थापित करना और उन्हें लागू करवाना।
2. रोजगार के अवसर - पुरुषों और महिलाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार के अवसर पैदा करना।
3. सामाजिक सुरक्षा - श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं (पेंशन, बीमा, स्वास्थ्य) को मजबूत करना।
4. सामाजिक संवाद - नियोक्ता और श्रमिकों के बीच आपसी बातचीत (Social Dialogue) को बढ़ावा देना।
भारत में मानकों की पालना - भारत के कई श्रम कानून सीधे तौर पर ILO के मानकों से प्रभावित हैं -
I. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926
II. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 -
III. भारत में न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटे और महिला श्रमिकों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों में ILO का बड़ा योगदान है।
IV. स्थाई आदेश अधिनियम 1946
V. वार्कमेन कंपनसेशन एक्ट 1926
VI. ट्रेड यूनियन एक्ट 1926
ILO का बजट - अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) का आर्थिक तंत्र बहुत ही पारदर्शी और अनुशासित है। चूँकि यह एक त्रिपक्षीय संगठन है, इसलिए इसका पैसा कहाँ से आता है और कहाँ खर्च होता है, इसकी निगरानी सरकारें, मालिक और मजदूर तीनों मिलकर करते हैं।
यहाँ इसके आर्थिक तंत्र के कार्य करने के मुख्य तरीके दिए गए हैं:
1. आय के स्रोत - ILO का आर्थिक ढांचा
I. निर्धारित योगदान - यह ILO का नियमित बजट है। संयुक्त राष्ट्र के नियमों के अनुसार, हर सदस्य देश को अपनी आर्थिक क्षमता के आधार पर एक निश्चित राशि देनी होती है। यदि कोई देश समय पर यह पैसा नहीं देता, तो सम्मेलन में उसके वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है।
II. स्वैच्छिक योगदान - इसे अतिरिक्त-बजटीय सहायता भी कहते हैं। विकसित देश या बड़ी संस्थाएं (जैसे बिल गेट्स फाउंडेशन या यूरोपीय संघ) किसी विशेष प्रोजेक्ट (जैसे बाल श्रम मुक्त भारत) के लिए अलग से फंड देते हैं।
नियमित बजट पूरक खाता (RBSA) - यह एक लचीला फंड है। कुछ देश ILO को पैसा देते समय यह शर्त नहीं लगाते कि इसे कहाँ खर्च करना है। ILO इस पैसे का उपयोग उन गरीब देशों में करता है जहाँ अचानक कोई संकट आ गया हो।
2. ILO बजट निर्माण और अनुमोदन की प्रक्रिया -
ILO में पैसा खर्च करने की प्रक्रिया काफी लोकतांत्रिक है -
प्रस्ताव - महानिदेशक (Director-General) अगले दो साल का बजट प्लान तैयार करते हैं।
समीक्षा - शासी निकाय (Governing Body) की कार्यक्रम, वित्तीय और प्रशासनिक समिति इस पर बारीक चर्चा करती है।
वोटिंग - अंत में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) में सदस्य देशों के बीच वोटिंग होती है। बजट पास होने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
3. व्यय का प्रबंधन (Expenditure Management) -
ILO अपना धन मुख्य रूप से चार रणनीतिक उद्देश्यों पर खर्च करता है -
I. मानक और सिद्धांत - अंतरराष्ट्रीय नियमों को बनाने और उनकी जांच करने वाली समितियों पर।
II. रोजगार सृजन एवं तकनीकी सहायता - विभिन्न देशों में युवाओं और महिलाओं के लिए नौकरी के अवसर बढ़ाने वाले प्रोजेक्ट्स पर।
III. सामाजिक सुरक्षा - पेंशन और स्वास्थ्य योजनाओं के मॉडल तैयार करने पर।
IV. क्षेत्रीय कार्यालय - जेनेवा के अलावा दिल्ली, बैंकॉक और अन्य क्षेत्रीय कार्यालयों के संचालन पर।
V. अनुसंधान और डेटा - वैश्विक श्रम बाजार की रिपोर्ट तैयार करना।
4. ऑडिट और पारदर्शिता (Audit & Transparency) - आर्थिक तंत्र में भ्रष्टाचार न हो, इसके लिए दोहरी सुरक्षा -
आंतरिक ऑडिट - संगठन के भीतर की टीम नियमित जांच करती है।
बाहरी परीक्षक - किसी एक सदस्य देश के 'नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक' (CAG) को बाहरी ऑडिट के लिए चुना जाता है।
विशेष - वर्तमान बजट (2024-2025)
ILO का नियमित बजट 2024-25 की अवधि के लिए लगभग 854.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 85.4 करोड़ डॉलर) प्रस्तावित किया गया है। जिसमें अनुमानित खर्च (विभिन्न समायोजनों के बाद) यह राशि लगभग 885 मिलियन डॉलर के आसपास पहुँचती है।
ILO की साख - अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) की साख इस बात पर टिकी है कि वह अपने कार्यों और धन के उपयोग में कितना पारदर्शी है। चूँकि इसमें सरकारों के साथ-साथ मजदूरों और मालिकों का भी पैसा और भरोसा लगा होता है, इसलिए इसका उत्तरदायित्व तंत्र को बहुत मजबूत किया गया है।
I. त्रिपक्षीय निगरानी (Tripartite Oversight) - ILO की सबसे पहली पारदर्शिता इसकी संरचना में है। यहाँ कोई भी निर्णय बंद कमरों में केवल अधिकारी नहीं लेते।
II. साझा जिम्मेदारी - हर रिपोर्ट, बजट और ऑडिट की जांच शासी निकाय (Governing Body) द्वारा की जाती है, जिसमें श्रमिक और नियोक्ता प्रतिनिधि सरकारों के साथ बैठकर एक-एक पैसे और नीति का हिसाब मांगते हैं।
खुली चर्चा - अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) की कार्यवाहियाँ सार्वजनिक होती हैं, जिससे सदस्य देशों और जनता को पता चलता है कि कौन सा देश श्रम मानकों का पालन कर रहा है और कौन सा नहीं।
2. स्वतंत्र ऑडिट प्रणाली - आर्थिक पारदर्शिता के लिए ILO दो स्तरों पर काम करता है-
बाहरी परीक्षक - किसी सदस्य देश के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) को एक निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है। वे पूरी तरह स्वतंत्र होकर ILO के खातों की जांच करते हैं। (वर्तमान में भारत के CAG (गिरीश चंद्र मुर्मू) को भी इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए चुना जा चुका है)।
आंतरिक ऑडिट - आंतरिक जांच कार्यालय (OIAI) संगठन के भीतर वित्तीय नियमों के पालन की निगरानी करता है।
3. प्रदर्शन आधारित बजटिंग (Results-Based Management) - ILO प्रदर्शन आधारित प्रबंधन (RBM) का पालन करता है। इसका मतलब है कि बजट केवल खर्च करने के लिए नहीं दिया जाता, बल्कि यह देखा जाता है कि उस पैसे से नतीजे (Results) क्या निकले। हर दो साल में एक कार्यान्वयन रिपोर्ट जारी की जाती है, जो बताती है कि निर्धारित लक्ष्यों (जैसे बाल श्रम में कमी या रोजगार सृजन) को कितना हासिल किया गया।
4. मानक प्रवर्तन की पारदर्शिता - जब कोई देश किसी श्रम संधि (Convention) का उल्लंघन करता है, तो ILO की उत्तरदायित्व प्रणाली सक्रिय हो जाती है -
I. विशेषज्ञ समिति (CEACR) - यह स्वतंत्र कानूनी विशेषज्ञों की एक समिति है जो देशों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों की तटस्थ जांच करती है और अपनी टिप्पणियां सार्वजनिक करती है।
II. शिकायत तंत्र - यदि कोई देश नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसकी रिपोर्ट दुनिया भर के सामने पेश की जाती है, जिससे उस पर नैतिक दबाव बनता है।
5. सार्वजनिक सूचना नीति - ILO अपनी वेबसाइट पर बजट, खर्च, प्रोजेक्ट्स की प्रगति और मूल्यांकन रिपोर्टों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराता है। इसे ILO Transparency Portal कहा जाता है, जहाँ कोई भी देख सकता है कि किस देश में कौन सा प्रोजेक्ट चल रहा है और उस पर कितना निवेश हुआ है।
ILO की मॉनिटरिंग प्रक्रिया - दुनिया की सबसे पुरानी और प्रभावी प्रणालियों में से एक है। यह सुनिश्चित करती है कि सदस्य देश केवल संधियों पर हस्ताक्षर ही न करें, बल्कि उन्हें अपने देश में लागू भी करें।
इस प्रक्रिया को पर्यवेक्षी तंत्र कहा जाता है जिसके दो भाग हैं -
1. नियमित मॉनिटरिंग (Regular Reporting) - हर सदस्य देश के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वह अपने द्वारा अपनाई गई संधियों के बारे में रिपोर्ट दे।
I. रिपोर्ट भेजना (Submission of Reports) - सदस्य देशों को समय-समय पर (आमतौर पर मौलिक संधियों के लिए हर 3 साल में और अन्य के लिए हर 5 साल में) विस्तृत रिपोर्ट भेजनी पड़ती है कि उन्होंने उन कानूनों को कैसे लागू किया।
II. विशेषज्ञ समिति (CEACR) - यह 20 स्वतंत्र कानूनी विशेषज्ञों की एक समिति है। इनका काम देशों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों की निष्पक्ष जांच करना है। वे देखते हैं कि क्या देश का कानून और व्यवहार ILO की संधि के अनुरूप है।
III. प्रत्यक्ष अनुरोध और टिप्पणियाँ - यदि समिति को कोई कमी दिखती है, तो वह सरकार को प्रत्यक्ष अनुरोध भेजती है या अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सार्वजनिक टिप्पणी (Observation) प्रकाशित करती है।
2. विशेष प्रक्रियाएं (Complaints & Disputes) - यदि नियमित मॉनिटरिंग से काम नहीं चलता, तो ILO के पास कड़े कदम उठाने के तीन रास्ते हैं:
I. प्रतिनिधित्व (Representation) - यदि कोई श्रमिक संगठन या नियोक्ता संगठन यह दावा करता है कि किसी देश ने संधि का पालन नहीं किया है, तो वे सीधे ILO के शासी निकाय (Governing Body) को शिकायत कर सकते हैं।
II. शिकायत (Complaint) - एक सदस्य देश दूसरे देश के खिलाफ शिकायत कर सकता है। इसके बाद एक जांच आयोग (Commission of Inquiry) बनाया जाता है, जो ILO का सबसे कड़ा कदम माना जाता है।
III. संगठन की स्वतंत्रता संबंधी समिति (CFA) - यह विशेष रूप से तब सक्रिय होती है जब किसी देश में श्रमिकों को यूनियन बनाने से रोका जाता है या उनका उत्पीड़न किया जाता है। इसकी शिकायत कोई भी कर सकता है, चाहे उस देश ने संबंधित संधि को मंजूरी दी हो या नहीं।
3. त्रिपक्षीय समीक्षा (The Conference Committee) - विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर हर साल अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) में चर्चा होती है। इस त्रिपक्षीय समिति (सरकार, मालिक, मजदूर) सबसे गंभीर मामलों वाले देशों को बुलाती है।
उस देश की सरकार को दुनिया के सामने खड़े होकर जवाब देना पड़ता है कि वे नियमों का पालन क्यों नहीं कर पा रहे हैं। इसे नैतिक दबाव (Moral Suasion) कहा जाता है।
4. तकनीकी सहायता (Technical Assistance) - ILO का मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि सुधार करना है। यदि कोई देश किसी नियम को लागू करने में असमर्थ है, तो वहां ILO
* अपने विशेषज्ञ उस देश में भेजता है।
* नया कानून लिखने में मदद करता है।
* अधिकारियों और यूनियन नेताओं को ट्रेनिंग देता है।
ILO का भारत के संदर्भ में मानवाधिकारीय प्रभाव -
वैश्विक प्रभाव - ILO के प्रभाव से दुनिया भर में 8 घंटे का कार्यदिवस, प्रसुति अवकाश, मातृत्व अवकाश, न्यूनतम मजदूरी और बाल श्रम के खिलाफ कड़े कानून बने। इसे 1969 में इसके कार्यों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
2. ILO और भारत में मानवाधिकार -
भारत में श्रम अधिकारों को मानवाधिकार के रूप में देखा जाता है। ILO के मानकों का भारतीय संविधान और कानूनों पर गहरा प्रभाव है।
भारत द्वारा स्वीकृत मुख्य कन्वेंशन -
भारत ने ILO के 8 प्रमुख कोर सम्मेलनों में से 6 को मंजूरी (Ratify) दी है जिनमें -
∆ बंधुआ मजदूरी - बलात् श्रम बंधुआ मजदूरी के खिलाफ (No. 29 & 105)।
∆ समान पारिश्रमिक - समान काम के लिए समान वेतन (No. 100)।
∆ भेदभाव - रोजगार में भेदभाव को रोकना (No. 111)।
∆ बाल श्रम - बाल श्रम के खात्मे के लिए (No. 138 & 182)।
भारत ने संघ बनाने की स्वतंत्रता (No. 87) और सामूहिक सौदेबाजी (No. 98) पर अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं, क्योंकि भारत के सरकारी कर्मचारियों के नियमों के साथ इसके कुछ तकनीकी टकराव हैं।
ILO का भारतीय कानूनों पर प्रभाव -
I. फैक्ट्री अधिनियम, 1948 - इसमें काम के घंटे और सुरक्षा के मानक ILO के निर्देशों पर आधारित हैं।
II. बाल श्रम कानून - ILO के प्रभाव से ही भारत में बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम में संशोधन कर इसे और सख्त बनाया गया।
III. सामाजिक सुरक्षा - हाल के डेटा (2025-26) के अनुसार, ILO के सहयोग और नीतियों के कारण भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़कर लगभग 64.3% तक पहुँच गया है।
मानवाधिकारों की दिशा में हालिया कदम - ILO भारत में घरेलू कामगारों के अधिकारों, डिजिटल लेबर प्लेटफ़ॉर्म (Gig workers) की सुरक्षा और लैंगिक समानता के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है। हाल ही में भारत ने युवाओं को वैश्विक रोजगार से जोड़ने के लिए ILO के साथ अंतरराष्ट्रीय संदर्भ व्यवसाय वर्गीकरण (International Standard Classification of Occupations) पर समझौता भी किया है।
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महत्वपूर्ण केस लॉज -
केस संख्या (01) एक्सेल वियर बनाम भारत संघ (Excel Wear v. Union of India, 1978) - यह मामला मुख्य रूप से किसी उद्योग या व्यवसाय को बंद (Closer) करने के अधिकार से संबंधित है।
1. मामले की पृष्ठभूमि -
आपातकाल के दौरान, सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में धारा 25 (O) जोड़ी। इस धारा के अनुसार, यदि किसी मालिक को अपना कारखाना या उद्योग बंद करना होता था, तो उसे सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य किया गया। बिना अनुमति के काम बंद करना गैर-कानूनी माना गया।
एक्सेल वियर ऐसी ही संस्था थी जिसने घाटे और अन्य कारणों से उद्योग को बंद करने की अनुमति मांगी, लेकिन सरकार ने जनहित का हवाला देते हुए अनुमति देने से मना कर दिया।
2. मुख्य विवाद - सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल -
∆. क्या संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने के अधिकार में व्यापार बंद करने का अधिकार भी शामिल है?
∆. क्या सरकार किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध व्यापार जारी रखने के लिए मजबूर कर सकती है?
3. सुप्रीम कोर्ट का फैसला - अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यापार बंद करने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g)) व्यापार करने का अधिकार देता है, वैसे ही इसमें व्यापार बंद करने का अधिकार भी शामिल है। किसी व्यक्ति को जबरदस्ती ऐसा काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिसे वह नहीं करना चाहता, खासकर तब जब उसे भारी घाटा हो रहा हो। अतः धारा 25(O) को असंवैधानिक घोषित किया। I. कोर्ट का मानना था कि यह धारा मालिक पर अनुचित प्रतिबंध लगाती है क्योंकि इसमें यह स्पष्ट नहीं था कि किन परिस्थितियों में सरकार अनुमति देगी या मना करेगी।
II. समाजवाद बनाम व्यक्तिगत अधिकार - कोर्ट ने कहा कि भारत एक समाजवादी राष्ट्र है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निजी संपत्ति या व्यापारिक अधिकारों को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। व्यापार बंद करने से मजदूरों की बेरोजगारी का डर तो है, लेकिन किसी मालिक को दिवालिया होने के कगार पर पहुँचने के बावजूद काम जारी रखने के लिए कहना न्यायपूर्ण नहीं है।
4. निर्णय के प्रभाव और परिणाम - इस फैसले के बाद, सरकार ने बाद में धारा 25(O) में संशोधन किया और उसे नए तरीके से पेश किया ताकि वह संवैधानिक मानदंडों पर खरी उतर सके। अब कानून यह है कि सरकार को अनुमति देने या न देने का कारण लिखित में देना होगा व मालिक सुनवाई का मौका देना होगा।
5 निष्कर्ष -
एक्सेल वियर केस ने यह स्थापित किया कि मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन होना चाहिए। यह मामला आज भी उद्योगों के प्रबंधन और श्रमिकों के अधिकारों के बीच के कानूनी संघर्षों में एक नजीर माना जाता है।
केस संख्या (02) नेशनल टेक्सटाइल वर्कर यूनियन बनाम P.R. रामकृष्णन (National Textile Workers Union v. P.R. Ramakrishnan, 1983) - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार यह माना कि किसी कंपनी को बंद करने की प्रक्रिया में श्रमिकों का भी अधिकार होता है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - यह विवाद एक कंपनी को बंद करने यानी कानूनी रूप से बंद करने की प्रक्रिया से शुरू हुआ। उस समय के कंपनी अधिनियम, 1956 के अनुसार, जब किसी कंपनी को बंद करने के लिए कोर्ट में याचिका डाली जाती, तो केवल शेयरधारकों और लेनदारों को ही अपनी बात रखने का अधिकार था। श्रमिकों को इस प्रक्रिया में कोई पक्ष नहीं माना जाता था, भले ही कंपनी बंद होने से उनकी आजीविका खत्म होने वाली हो।
2. मुख्य कानूनी प्रश्न -
∆ क्या किसी कंपनी को बंद करने की याचिका पर सुनवाई करते समय श्रमिकों या उनकी यूनियन को कोर्ट में अपना पक्ष रखने (Locus Standi) का अधिकार है?
3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - न्यायमूर्ति भगवती ने इस मामले में एक बहुत ही प्रगतिशील निर्णय सुनाया -
I. श्रमिकों का अधिकार - कोर्ट ने कहा कि श्रमिक केवल किराए के कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि वे उद्योग में बराबर के भागीदार हैं। यदि कंपनी बंद होती है, तो सबसे बुरा असर श्रमिकों पर पड़ता है। इसलिए उन्हें सुनवाई का अवसर मिलना ही चाहिए।
II. प्राकृतिक न्याय - कोर्ट ने ऑडी अल्टरम पार्टम (Audi Alteram Partem) के सिद्धांत का हवाला दिया, जिसका अर्थ है कि "दूसरे पक्ष को भी सुनो"। चूंकि कंपनी बंद होने से मजदूरों के जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) पर असर पड़ता है, इसलिए उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
III. सामाजिक न्याय - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी केवल मुनाफे के लिए नहीं होती, उसका एक सामाजिक उत्तरदायित्व भी होता है। मजदूरों का पसीना और मेहनत कंपनी बनाने में लगी होती है, अतः उनका हित शेयरधारकों से कम नहीं है।
4. केस का प्रभाव (Impact) -
I. कानूनी स्थिति में बदलाव: इस फैसले के बाद यह अनिवार्य हो गया कि कंपनी बंद करने की कार्यवाही के दौरान श्रमिकों की यूनियन को नोटिस दिया जाए और उनकी चिंताओं को सुना जाए।
II. मानवाधिकार और श्रम - इसने श्रम अधिकारों को संवैधानिक मानवाधिकारों के साथ जोड़ दिया।
III. न्यायिक सक्रियता - यह केस भारत में न्यायिक सक्रियता का एक उत्कृष्ट उदाहरण बना, जहाँ कोर्ट ने कानून की संकीर्ण व्याख्या (Narrow Interpretation) से ऊपर उठकर सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी।
5. निष्कर्ष -
सरल शब्दों में, नेशनल टेक्सटाइल वर्कर यूनियन केस ने यह संदेश दिया कि मजदूर मशीन नहीं, कंपनी की आत्मा हैं। इसने कंपनी कानून के उस पुराने ढांचे को तोड़ दिया जो केवल मालिकों और कर्जदाताओं की बात करता था।
केस संख्या (03) पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (1982) (एशियाड वर्कर्स केस) - यह केस श्रम अधिकारों और जनहित याचिका (PIL) के लिए एक मील का पत्थर है।
1. मामले की पृष्ठभूमि - 1982 में दिल्ली में एशियाई खेलों का आयोजन होना था। इसके लिए बड़े पैमाने पर स्टेडियम, फ्लाईओवर और होटलों का निर्माण चल रहा था। इन परियोजनाओं में हजारों मजदूर लगे थे। पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) नामक संगठन ने पाया कि इन मजदूरों के साथ भारी शोषण हो रहा है।
A. मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही थी।
B. महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन दिया जा रहा था।
C. 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से खतरनाक काम कराया जा रहा था।
2. मुख्य कानूनी प्रश्न -
∆ क्या न्यूनतम मजदूरी न देना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत जबरन श्रम माना जाएगा?
∆ क्या कोई तीसरा पक्ष (जैसे NGO) मजदूरों के अधिकारों के लिए कोर्ट जा सकता है?
3. सुप्रीम कोर्ट का फैसला - न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने कहा कि -
I. न्यूनतम मजदूरी और अनुच्छेद 23 - कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी गरीबी या मजबूरी के कारण न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम कर रहा है, तो वह जबरन श्रम है। अनुच्छेद 23 केवल बेगार को ही नहीं, बल्कि हर उस स्थिति को रोकता है जहाँ व्यक्ति को उसकी इच्छा या कम कीमत पर काम करने के लिए मजबूर किया जाए।
II. गरिमा के साथ जीवन (अनुच्छेद 21) - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जीवन के अधिकार का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा के साथ जीना है। मजदूरों को बुनियादी सुविधाएं और उचित वेतन न देना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
III. जनहित याचिका (PIL) और लोकस स्टैंडी (Locus Standi) - इस केस ने जनहित याचिका के रास्ते खोल दिए। कोर्ट ने माना कि यदि समाज का कोई गरीब वर्ग खुद अदालत नहीं पहुँच सकता, तो कोई भी सार्वजनिक व्यक्ति या संस्था उनकी ओर से याचिका दायर कर सकती है।
IV. राज्य की जिम्मेदारी - सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही काम ठेकेदारों द्वारा कराया जा रहा हो, लेकिन मुख्य नियोक्ता के रूप में सरकार (भारत संघ, दिल्ली प्रशासन और DDA) की यह जिम्मेदारी है कि वह श्रम कानूनों का पालन सुनिश्चित करे।
4. निष्कर्ष -
एशियाड वर्कर्स केस ने भारतीय कानून में यह स्थापित किया कि
∆ श्रम कानूनों का उल्लंघन सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लंघन है।
∆ जबरन श्रम की परिभाषा में आर्थिक मजबूरी के कारण कम वेतन पर काम करना भी शामिल है।
केस संख्या (04) सोम प्रकाश रेखी बनाम भारत संघ (Som Prakash Rekhi v. Union of India, 1981) - यह संविधान के अनुच्छेद 12 (राज्य की परिभाषा) एवं पेंशन अधिकारों की व्याख्या के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है।
1. मामले की पृष्ठभूमि -
सोम प्रकाश रेखी बर्मा शेल नामक तेल कंपनी में कर्मचारी थे। वर्ष 1973 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली। उस समय वे पेंशन, भविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी के हकदार थे। वर्ष 1976 में सरकार ने बर्मा शेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया और वह भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) बन गई। कंपनी ने सोम प्रकाश की पेंशन में से PF और ग्रेच्युटी की रकम के आधार पर कटौती करना शुरू कर दिया, जिससे उनकी पेंशन ₹165 से घटकर मात्र ₹40 रह गई। इसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
2. मुख्य कानूनी प्रश्न -
∆ क्या BPCL (एक सरकारी कंपनी) संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य है? (क्योंकि मौलिक अधिकारों के हनन के लिए राज्य के खिलाफ ही रिट जारी की जा सकती है)।
∆ क्या पेंशन में इस तरह की कटौती करना कानूनी रूप से सही है?
3. सुप्रीम कोर्ट का फैसला - न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर ने इस मामले में निर्णय सुनाया कि -
I. BPCL 'राज्य' है - कोर्ट ने कहा कि भले ही BPCL कंपनी अधिनियम के तहत एक पंजीकृत कंपनी है, परन्तु इस पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है और यह सार्वजनिक कार्य करती है, अतः यह राज्य की एक एजेंसी या उपकरण है। अतः इसके खिलाफ मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की याचिका दायर की जा सकती है।
II. पेंशन और सामाजिक न्याय - कोर्ट ने कहा कि पेंशन कोई खैरात नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा दी गई सेवाओं का प्रतिफल है। PF और ग्रेच्युटी अलग-अलग लाभ हैं, और इनके आधार पर पेंशन में कटौती करना अन्यायपूर्ण और अवैध है।
III. कटौती असंवैधानिक - कोर्ट ने कंपनी के उन नियमों को रद्द कर दिया जो पेंशन में कटौती की अनुमति देते थे और सोम प्रकाश को पूरी पेंशन देने का आदेश दिया।
IV. राज्य की परिभाषा के लिए 5 टेस्ट -
इस केस में कोर्ट ने यह निर्धारित करने के लिए कुछ सिद्धांत दिए कि कोई संस्था राज्य है या नहीं -
A. संस्था की पूरी पूंजी सरकार की हो।
B. सरकार का गहरा व व्यापक नियंत्रण।
C. वह सार्वजनिक महत्व का कार्य।
D. सरकार का कोई विभाग उसे हस्तांतरित किया गया हो।
E. उसे राज्य द्वारा एकाधिकार प्राप्त हो।
निष्कर्ष -
सोम प्रकाश केस ने अनुच्छेद 12 के दायरे को बहुत विस्तृत कर दिया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि सरकारी कंपनियां और निगम अपनी मर्जी से कर्मचारियों के अधिकारों का हनन नहीं कर सकते। इसने सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मजबूत किया।
दिल्ली कपड़ा एवं जनरल मिल्स बनाम शंभूनाथ मुखर्जी (1977) -
इस केस को अक्सर Goliath vs. Dwarf एक विशालकाय और एक बौने की लड़ाई) कहा जाता हैयह मामला मुख्य रूप से औद्योगिक विवाद अधिनियम (Industrial Disputes Act, 1947) और कर्मचारी को सेवा से हटाए (छंटनी) जाने की प्रक्रिया से जुड़ा है।
मामले के मुख्य तथ्य पृष्ठभूमि -
शंभू नाथ मुखर्जी दिल्ली क्लॉथ एंड जनरल मिल्स में एक श्रमिक (Motion Setter) के रूप में कार्यरत थे। 1964 में कंपनी ने पुनर्गठन किया और उनके पद को समाप्त कर दिया।
विवाद - (Section 2A या Force Majeure) कंपनी ने उन्हें दूसरे पद (Fitter) पर काम करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन जब उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया, तो कंपनी ने उनका नाम मस्टर रोल (हाजिरी रजिस्टर) से काट दिया। इसे कंपनी ने स्वचालित रूप से सेवा समाप्ति माना। शंभू नाथ ने इसे लेबर कोर्ट में चुनौती दी।
श्रम न्यायालय का रुख - लेबर कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बिना किसी उचित प्रक्रिया के नाम काटा जाना छंटनी (Retrenchment) की श्रेणी में आता है और यह अवैध है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय -
छंटनी की परिभाषा - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी का नाम रोल से हटा देना छंटनी माना जाएगा, चाहे वह किसी भी कारण से हो (अनुशासनात्मक कार्रवाई को छोड़कर)।
धारा 25F का उल्लंघन - कोर्ट ने कहा कि छंटनी करने से पहले कर्मचारी को नोटिस देना या उसके बदले वेतन देना और मुआवजा देना अनिवार्य है। चूंकि कंपनी ने ऐसा नहीं किया था, इसलिए शंभूनाथ की बर्खास्तगी को अवैध करार दिया गया।
पुनर्बहाली (Reinstatement) - कोर्ट ने उन्हें सेवा में वापस लेने और पिछला बकाया वेतन (Back wages) देने का आदेश दिया।
विशेष टिप्पणी - एक गरीब मजदूर ने एक बड़ी मिल के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। दुर्भाग्यवश, अंतिम फैसला आने तक शंभू नाथ मुखर्जी का निधन हो गया, कोर्ट ने उनकी विधवा को मुआवजा दिलाने का आदेश दिया।
केस संख्या (05)एयर इंडिया बनाम नरगिस मिर्ज़ा (1981) - यह मामला कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है।
1. मुख्य विवाद - उस समय एयर इंडिया के सर्विस नियमों (Regulation 46 & 47) में महिला एयर होस्टेस के लिए सख्त और भेदभावपूर्ण शर्तें थीं। एक एयर होस्टेस को नौकरी से तब हाथ धोना पड़ता था यदि -
I. वह नौकरी जॉइन करने के 4 साल के भीतर शादी कर ले।
II. वह गर्भवती (Pregnant) हो जाए।
III. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर ले।
जबकि पुरुष फ्लाइट अटेंडेंट के रिटायरमेंट की उम्र 58 वर्ष थी और उन पर शादी या पितृत्व से जुड़ी ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी।
नरगिस मिर्ज़ा की चुनौती - नरगिस मिर्ज़ा और अन्य एयर होस्टेस ने इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) और 16 (अवसर की समानता) का उल्लंघन करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला - सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक मिला-जुला लेकिन ऐतिहासिक निर्णय दिया
I. गर्भावस्था का नियम अवैध - कोर्ट ने पहली गर्भावस्था पर नौकरी से निकालने वाले नियम को क्रूर, अपमानजनक और भारतीय नारीत्व का अपमान बताया। कोर्ट ने कहा कि माँ बनना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इस आधार पर नौकरी छीनना असंवैधानिक है।
II. शादी का नियम - कोर्ट ने 4 साल के भीतर शादी न करने वाले नियम को तो बरकरार रखा (यह मानते हुए कि इससे परिवार नियोजन और स्थिरता को बढ़ावा मिलता है), लेकिन शादी होते ही नौकरी जाने वाले प्रावधान को गलत माना।
III. रिटायरमेंट की उम्र - कोर्ट ने उस समय 35 साल की उम्र में रिटायरमेंट को उचित माना क्योंकि उनके अनुसार एयर होस्टेस का काम शारीरिक रूप से थकाने वाला था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 45 और फिर पुरुषों के बराबर कर दिया गया।
केस का महत्व एवं प्रभाव -
I. कोई भी सरकारी या निजी संस्थान महिलाओं के खिलाफ मनमाने नियम नहीं बना सकता।
II. प्रजनन अधिकार (Reproductive Rights) एक महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा हैं।
III. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समानता का मतलब केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी होना चाहिए।
विशेष - एयर इंडिया का तर्क कि एयर होस्टेस का युवा और आकर्षक दिखना जरूरी है, जिसे कोर्ट ने खारिज करते हुए इसे मानवीय गरिमा के खिलाफ माना।
केस संख्या 06 BEST Undertaking (बॉम्बे) बनाम श्रीमती एग्रिस (1964) वर्कमेन कंपनसेशन एक्ट 1923 के तहत लैंडमार्क केस है। यह केस इस सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि रोज़गार के दौरान की सीमा कहाँ तक होती है।
मामले की पृष्ठभूमि (Facts) -
I. ननु रमन नामक व्यक्ति BEST (मुंबई बस परिवहन कंपनी) में बस ड्राइवर था।
II. एक दिन अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद, वह डिपो में बस खड़ी करके घर जाने हेतु दूसरी BEST बस में सवार हुआ (कर्मचारियों को मुफ्त यात्रा की सुविधा मिली हुई थी)।
III. रास्ते में उस बस का एक्सीडेंट हो गया और ननु रमन की मृत्यु हो गई।
IV. उनकी विधवा, श्रीमती एग्रिस ने मुआवजे के लिए दावा किया।
कानूनी प्रश्न -
∆ सवाल यह था कि क्या ड्यूटी खत्म होने के बाद घर जाते समय हुआ एक्सीडेंट रोज़गार के दौरान माना जाएगा?
∆ कंपनी का तर्क था कि ड्यूटी खत्म हो चुकी थी, इसलिए वे जिम्मेदार नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय - प्रदत्त विस्तार का सिद्धांत" (Doctrine of Notional Extension) -
I. छुट्टी के बाद यात्रा ड्यूटी का हिस्सा - कोर्ट ने कहा कि ड्राइवर को बस में मुफ्त यात्रा की सुविधा इसलिए दी गई थी ताकि वह समय पर और कुशलता से अपनी ड्यूटी पर पहुँच सके। यह केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि उसकी सेवा की एक शर्त (Condition of Service) थी।
II. रोज़गार का विस्तार - कोर्ट ने "Notional Extension" (प्रदत्त विस्तार) का सिद्धांत लागू किया। इसका मतलब है कि कर्मचारी का रोज़गार केवल तभी शुरू नहीं होता जब वह मशीन छूता है, और न ही तब खत्म होता है जब वह मशीन छोड़ता है।
कोर्ट का फैसला - कोर्ट ने माना कि चूंकि ड्राइवर उसी बस का उपयोग कर रहा था जो कंपनी ने उसे उपलब्ध कराई थी, इसलिए यह माना जाएगा कि एक्सीडेंट रोज़गार के दौरान ही हुआ है। कंपनी को मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
केस का महत्व (Significance) -
यह निर्णय कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह सिखाता है कि -
I. यदि कर्मचारी नियोक्ता (Employer) द्वारा दी गई बस या वाहन से घर से ऑफिस या ऑफिस से घर जा रहा है, तो वह समय भी ड्यूटी का ही हिस्सा माना जाएगा।
II. एक्सीडेंट होने पर कंपनी मुआवजे की जिम्मेदारी से यह कहकर नहीं बच सकती कि ड्यूटी का समय खत्म हो गया था।
केस संख्या 07 DS नकारा बनाम भारत संघ (1983) - यह मामला भारतीय पेंशन व्यवस्था और समानता के अधिकार (Right to Equality) के लिए सबसे महत्वपूर्ण लैंडमार्क केस माना जाता है। इस केस ने सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन को सरकार की दया (Bounty) नहीं, बल्कि एक कानूनी अधिकार बना दिया।
मामले की पृष्ठभूमि - 1979 में भारत सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए लिबरलाइज्ड पेंशन योजना (Liberalized Pension Scheme) शुरू की। लेकिन सरकार ने इसमें एक शर्त (Cut-off date) जोड़ दी -
∆ यह योजना केवल उन लोगों पर लागू होगी जो 31 मार्च 1979 या उसके बाद रिटायर हुए हैं।
∆ जो लोग इस तारीख से पहले रिटायर हुए थे, उन्हें इस बढ़ी हुई पेंशन का लाभ नहीं दिया गया।
∆ डी.एस. नकारा (रिटायर्ड सिविल सर्वेंट) ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि केवल रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर पेंशनभोगियों के बीच भेदभाव करना गलत है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला - सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने इस मामले में अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की नई परिभाषा लिखी -
I. पेंशनभोगी एक ही वर्ग (Class) हैं - कोर्ट ने कहा कि चाहे कोई 1970 में रिटायर हुआ हो या 1980 में, सभी पेंशनभोगी एक ही समान वर्ग के सदस्य हैं। रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर उन्हें दो अलग समूहों में बांटना मनमाना और अतार्किक है।
पेंशन कोई खैरात नहीं है -
I. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन सरकार की तरफ से दी जाने वाली कोई बक्शिस या इनाम नहीं है। यह कर्मचारी द्वारा की गई पुरानी सेवाओं का बदला (Deferred Wage) है और उसका सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है।
II. अनुच्छेद 14 का उल्लंघन - कोर्ट ने माना कि एक ही तरह का काम करने वाले और एक ही पद से रिटायर होने वाले लोगों को केवल तारीख के आधार पर कम या ज्यादा पेंशन देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
केस का प्रभाव -
∆ समानता - इस फैसले के बाद, सरकार को उन सभी पुराने पेंशनभोगियों को भी लाभ देना पड़ा जो कट-ऑफ तारीख से पहले रिटायर हुए थे।
∆ समाजवादी उद्देश्य - कोर्ट ने कहा कि भारत एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) है, जिसका लक्ष्य बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन देना है।
∆ पेंशन की गणना - इसने भविष्य के लिए यह सिद्धांत तय कर दिया कि पेंशन के नियमों में होने वाले सकारात्मक सुधारों का लाभ सभी मौजूदा पेंशनभोगियों को मिलना चाहिए।
निष्कर्ष - DS नकारा केस ने यह सुनिश्चित किया कि रिटायरमेंट के बाद सरकार अपने पूर्व कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती।
केस संख्या (08)एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम भारत संघ (1958) - यह मामला भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण केस है।
विवाद - एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स और भारत संघ के बीच दो प्रमुख केस हुए हैं (1958 और 1985), लेकिन 1958 का केस बुनियादी सिद्धांतों के लिए ज्यादा जाना जाता है।
1. एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम भारत संघ (1958)
2. यह केस मुख्य रूप से वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट, 1955 की संवैधानिकता को लेकर था।
विवाद - सरकार ने पत्रकारों की कार्यदशा और वेतन सुधारने के लिए एक कानून बनाया और पत्रकार वेतन बोर्ड (Wage Board) का गठन किया। एक्सप्रेस न्यूजपेपर ने इसे कोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि वेतन बढ़ाने से अखबारों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा, जिससे सर्कुलेशन कम होगा और यह अनुच्छेद 19(1)(a) (बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी) का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला -
I. कोर्ट ने कहा कि प्रेस को कोई विशेष छूट नहीं है, उन पर सामान्य श्रम कानून (Labour Laws) लागू होते हैं।
II. प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि वे अपने कर्मचारियों को कम वेतन दें।
III. हालाँकि, कोर्ट ने वेतन बोर्ड के फैसले को रद्द कर दिया क्योंकि बोर्ड ने वेतन तय करते समय अखबारों की भुगतान क्षमता (Capacity to pay) पर विचार नहीं किया था।
2. केस संख्या (09) इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम भारत संघ (1985) -
यह केस न्यूजप्रिंट (अखबार का कागज) पर आयात शुल्क (Import Duty) लगाने के खिलाफ था।
विवाद - सरकार ने बाहर से आने वाले कागज पर भारी टैक्स लगा दिया जिससे अखबारों की कीमत बढ़ गई और उनकी बिक्री (Circulation) कम होने लगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला- कोर्ट ने ऐतिहासिक टिप्पणी की कि प्रेस लोकतंत्र का हृदय है।
I. कोर्ट ने माना कि सरकार टैक्स लगा सकती है, लेकिन टैक्स इतना ज्यादा नहीं होना चाहिए कि वह अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दे।
II. कोर्ट ने सरकार को अपने टैक्स ढांचे पर फिर से विचार करने का आदेश दिया।
इन दोनों केसों का मुख्य निष्कर्ष -
I. स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं - प्रेस पर सामान्य कानून और टैक्स लागू होते हैं।
II. परोक्ष अंकुश गलत है - सरकार सीधा सेंसरशिप नहीं लगा सकती, और न ही आर्थिक बोझ के जरिए अखबारों को चुप करा सकती है।
III. अभिव्यक्ति का अधिकार - अनुच्छेद 19(1)(a) में प्रेस की स्वतंत्रता स्पष्ट रूप से नहीं लिखी है, लेकिन इन केसों के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान का अभिन्न हिस्सा बना दिया।
विशेष - सरकार अखबारों पर टैक्स तो लगा सकती है, लेकिन वह टैक्स उनकी आवाज दबाने का हथियार नहीं बनना चाहिए।
केस संख्या (10) - रॉयल टॉकीज (हैदराबाद) बनाम ई.एस.आई. कॉरपोरेशन (1978) - यह मामला श्रम कानून में कर्मचारी की परिभाषा और नियोक्ता की जिम्मेदारी को समझने हेतु एक मील का पत्थर है। यह केस मुख्य रूप से कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (ESI Act, 1948) की धारा 2(9) की व्याख्या से संबंधित है।
मामले की पृष्ठभूमि -
रॉयल टॉकीज हैदराबाद में एक सिनेमा हॉल (थिएटर) था। थिएटर परिसर के भीतर दो अलग-अलग सुविधाएं थीं
I. कैंटीन
II. एक साइकिल स्टैंड।
सिनेमा के मालिक ने इन दोनों सुविधाओं को चलाने का ठेका बाहरी ठेकेदारों को दे रखा था।
विवाद - ईएसआई (ESI) कॉर्पोरेशन ने मांग की कि कैंटीन और साइकिल स्टैंड में काम करने वाले कर्मचारी भी रॉयल टॉकीज के कर्मचारी माने जाएंगे, और मालिक को उनके लिए ईएसआई अंशदान (Contribution) जमा कराना होगा।
मालिक का तर्क - सिनेमा हॉल के मालिक का कहना था कि ये लोग मेरे कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि ठेकेदार के कर्मचारी हैं। मेरा काम फिल्में दिखाना है, न कि समोसे बेचना या साइकिल खड़ी करना।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय - जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने इस मामले में फैसला सुनाया कि -
I. मुख्य कार्य से संबंध - कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को कर्मचारी मानने के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह मुख्य व्यवसाय (फिल्म दिखाना) से सीधे तौर पर जुड़ा हो।
II. सहायक कार्य (Ancillary Work) - सिनेमा देखने आने वाले दर्शकों के लिए कैंटीन और साइकिल स्टैंड सहायक लेकिन जरूरी' सेवाएं हैं। इनके बिना सिनेमा हॉल का संचालन सुचारू रूप से नहीं हो सकता।
III. धारा 2(9) की व्याख्या - कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी संस्थान के काम के संबंध में (In connection with) काम कर रहा है, तो वह ESI एक्ट के तहत कर्मचारी माना जाएगा।
IV. नियोक्ता की जिम्मेदारी - चूंकि ये सुविधाएं सिनेमा हॉल के परिसर के भीतर थीं और थिएटर के व्यवसाय को बढ़ावा दे रही थीं, इसलिए मुख्य नियोक्ता यानी सिनेमा मालिक ही उनके ESI अंशदान हेतु जिम्मेदार है।
केस का महत्व -
I. व्यापक परिभाषा - इस फैसले ने कर्मचारी' की परिभाषा को बहुत व्यापक बना दिया। अब कंपनियां यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकतीं कि ये तो कॉन्ट्रैक्ट लेबर है।
II. सामाजिक सुरक्षा - इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि छोटे कामों (जैसे सफाई, कैंटीन, सुरक्षा) में लगे लोगों को भी बीमा और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिले।
निष्कर्ष - अगर कोई काम आपके व्यवसाय को चलाने में मदद कर रहा है और आपके परिसर में हो रहा है, तो उसमें लगे लोग आपके 'कर्मचारी' माने जा सकते हैं, भले ही वे किसी ठेकेदार के जरिए आए हों।
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नोट्स - LLB सेमेस्टर प्रथम
द्वारा - शमशेर भालू खां
छात्र - LLB प्रथम सेमेस्टर 2025
296 सदफ आशियाना, कायमखानी बस्ती, सहजूसर (चूरू)
9587243963
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संदर्भ एवं स्त्रोत -
I. पुस्तक - श्रम एवं औद्योगिक विधि
लेखक - प्रोफेसर सूर्य नारायण मिश्र
प्रकाशक - सेंट्रल लॉ एजेंसी, प्रयागराज
II. Dr. अनिता कुमावत - व्याख्याता राजकीय लॉ कॉलेज, चूरू (श्रम विधि)
III. एडवोकेट अंजलि
IV. भारत का संविधान
V. विभिन्न आलेख एवं पत्रिकाएं
VI. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म,
VII. गूगल जैमिनाई
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Thank you
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